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मेरी जात हिन्दुस्तानी

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जाति की जनगणना के लिए तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा। उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न पूछी जाए। लेकिन इस देश में मेरे जैसे भी कई लोग हैं, जो कहते हैं कि मेरी जात सिर्फ हिंदुस्तानी है और जो जन्म के आधार पर दिए जानेवाले हर आरक्षण के घोर विरोधी हैं।

ऐसे लोगों की मान्यता है कि जन्म याने जाति के आधार पर दिया जानेवाला आरक्षण न केवल राष्ट्र-विरोधी है बल्कि जिन्हें वह दिया जाता है, उन व्यक्तियों और जातियों के लिए भी विनाशकारी है। इसीलिए जन-गणना में से जाति को बिल्कुल उड़ा दिया जाना चाहिए। यदि 2010 की इस जनगणना में जाति को जोड़ा जाएगा तो वह बिल्कुल निरर्थक होगा क्योंकि आरक्षण की सीमा उच्चतम न्यायालय ने पहले ही बांध रखी है। 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता। यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गई हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गई हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें। इसलिए प्रश्न उठता है कि जनगणना में जाति को घसीट कर लाने से किसको क्या फायदा होनेवाला है ?

जाति पर आधारित आरक्षण ने गरीबों और वंचितों का सबसे अधिक नुकसान किया है। आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है ? सिर्फ नौकरियाँ ! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिए गए हैं| उनके विशेष अवसर, विशेष सुविधा और विशेष सहायता के द्वार बंद कर दिए गए हैं। उन्हें खोलना बहुत जरूरी है। क्या 5 हजार रेवडि़याँ बांट देने से 60-70 करोड़ वंचितों के पेट भर जाएंगे? आरक्षण न सिर्फ उनके पेट पर लात मारता है बल्कि उनके सम्मान को भी चोट पहुंचाता है। जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाज़े से घुस आए हैं। हमारे नेताओं ने जाति को आरक्षण का सबसे सरल आधार मान लिया था लेकिन अब वह सबसे जटिल आधार बन गया है| अभी आरक्षण का आधार बहुत संकरा है, उसे बहुत चौड़ा करना जरूरी है| जाति का आधार सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होता है। इसके कारण हमारे देश के मुसलमानों और ईसाइयों में जो वंचित लोग हैं, उनको भी बड़ा नुकसान हुआ है। जिसे जरूरत थी, उसे रोटी नहीं मिली और जिसके पास जात थी, वह मलाई ले उड़ा।

जन-गणना में जाति का समावेश किसने किया, कब से किया, क्यों किया, क्या यह हमें पता है ? यह अंग्रेज ने किया, 1871 में किया और इसलिए किया कि हिंदुस्तान को लगातार तोड़े रखा जा सके| 1857 की क्रांति ने भारत में जो राष्ट्रवादी एकता पैदा की थी, उसकी काट का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि भारत के लोगों को जातियों, मजहबों और भाषाओं में बांट दो। मज़हबों और भाषाओं की बात कभी और करेंगे, फिलहाल जाति की बात लें| अंग्रेज के आने के पहले भारत में जाति का कितना महत्व था ? क्या जाति का निर्णय जन्म से होता था ? यदि ऐसा होता तो दो सौ साल पहले तक के नामों में कोई जातिसूचक उपनाम या 'सरनेम' क्यों नहीं मिलते ? राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, महेश, बुद्घ, महावीर किसी के भी नाम के बाद शर्मा, वर्मा, सिंह या गुप्ता क्यों नहीं लगता ? कालिदास, कौटिल्य, बाणभट्रट, भवभूति और सूर, तुलसी, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण आदि सिर्फ अपना नाम क्यों लिखते रहे ? इनके जातिगत उपनामों का क्या हुआ ? वर्णाश्रम धर्म का भ्रष्ट होना कुछ सदियों पहले शुरू जरूर हो गया था लेकिन उसमें जातियों की सामूहिक राजनीतिक चेतना का ज़हर अंग्रेजों ने ही घोला| अंग्रेजों के इस ज़हर को हम अब भी क्यों पीते रहना चाहते हैं ? मज़हब के ज़हर ने 1947 में देश तोड़ा, भाषाओं का जहर 1964-65 में कंठ तक आ पहुंचा था और अब जातियों का ज़हर 21 वीं सदी के भारत को नष्ट करके रहेगा। जन-गणना में जाति की गिनती इस दिशा में बढ़नेवाला पहला कदम है। इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था।

1931 में आखिर अंग्रेज 'सेंसस कमिश्नर' जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को घसीटने का विरोध क्यों किया था ? वे कोरे अफसर नहीं थे। वे प्रसिद्घ नृतत्वशास्त्री भी थे। उन्होंने बताया कि हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी फर्जी जातियॉं लिखवा देते हैं ताकि उनकी जातीय हैसियत ऊँची हो जाए| कुछ जातियों के बारे में ऐसा भी है कि एक प्रांत में वे वैश्य है तो दूसरे प्रांत में शूद्र| एक प्रांत में वे स्पृश्य हैं तो दूसरे प्रांत में अस्पृश्य ! हर जाति में दर्जनों से लेकर सैकड़ों उप-जातियॉं हैं और उनमें भी ऊँच-नीच का झमेला है। 58 प्रतिशत जातियॉ तो ऐसी हैं, जिनमें 1000 से ज्यादा लोग ही नहीं हैं। उन्हें ब्राह्रमण कहें कि शूद्र, अगड़ा कहें कि पिछड़ा, स्पृश्य कहें कि अस्पृश्य - कुछ पता नहीं| आज यह स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है, क्योंकि अब जाति के नाम पर नौकरियॉं, संसदीय सीटें, मंत्री और मुख्यमंत्री पद, नेतागीरी और सामाजिक वर्चस्व आदि आसानी से हथियाएं जा सकते हैं। लालच बुरी बलाय ! लोग लालच में फंसकर अपनी जात बदलने में भी संकोच नहीं करते| सिर्फ गूजर ही नहीं हैं, जो 'अति पिछड़े' से 'अनुसूचित' बनने के लिए लार टपका रहे हैं, उनके पहले 1921 और 1931 की जन-गणना में अनेक राजपूतों ने खुद को ब्राह्रमण, वैश्यों ने राजपूत और कुछ शूद्रों ने अपने आप को वैश्य और ब्राह्रमण लिखवा दिया। जिन स्त्री और पुरूषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी ? जनगणना करने वाले कर्मचारियों के पास किसी की भी जात की जाँच-परख करने का कोई पैमाना नहीं है| हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी। वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी। कोई आश्चर्य नहीं कि जब आरक्षणवाले आज़ाद भारत में कुछ ब्राह्रमण अपने आप को दलित लिखवाना पसंद करें बिल्कुल वैसे ही जैसे कि जिन दलितों ने अपने आप को बौद्ध लिखवाया था, आरक्षण से वंचित हो जाने के डर से उन्होंने अपने आप को दुबारा दलित लिखवा दिया। यह बीमारी अब मुसलमानों और ईसाइयों में भी फैल सकती है| आरक्षण के लालच में फंसकर वे इस्लाम और ईसाइयत के सिद्घांतों की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं। जाति की शराब राष्ट्र और मज़हब से भी ज्यादा नशीली सिद्घ हो सकती है।

आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आज़ाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है। कांग्रेस जैसी महान पार्टी का कैसा दुर्भाग्य है कि आज उसके पास न तो इतना सक्षम नेतृत्व है और न ही इतनी शक्ति कि वह इस राष्ट्रभंजक मांग को रद्द कर दे| उसे अपनी सरकार चलाने के लिए तरह-तरह के समझौते करने पड़ते हैं। भाजपा ने अपने बौद्घिक दिग्भ्रम के ऐसे अकाट्य प्रमाण पिछले दिनों पेश किए हैं कि जाति के सवाल पर वह कोई राष्ट्रवादी स्वर कैसे उठाएगी। आश्चर्य तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मौन पर है, जो हिंदुत्व की ध्वजा उठाए हुए है लेकिन हिंदुत्व को ध्वस्त करनेवाले जातिवाद के विरूद्घ वह खड़गहस्त होने को तैयार नहीं है। समझ मे नहीं आता कि वर्ग चेतना की अलमबरदार कम्युनिस्ट पार्टियों को हुआ क्या है? उन्हें लकवा क्यों मार गया है ? सबसे बड़ी विडंबना हमारे तथाकथित समाजवादियों की है। कार्ल मार्क्स कहा करते थे कि मेरा गुरू हीगल सिर के बल खड़ा था। मैंने उसे पाव के बल खड़ा कर दिया है लेकिन जातिवाद का सहारा लेकर लोहिया के चेलों ने लोहियाजी को सिर के बल खड़ा कर दिया है। लोहियाजी कहते थे, जात तोड़ो। उनके चेले कहते हैं, जात जोड़ो| नहीं जोड़ेंगे तो कुर्सी कैसे जुड़ेगी ? लोहिया ने पिछड़ों को आगे बढ़ाने की बात इसीलिए कही थी कि समता लाओ और समता से जात तोड़ो। रोटी-बेटी के संबंध खोलो। जन-गणना में जात गिनाने से जात टूटेगी या मजबूत होगी ? जो अभी अपनी जात गिनाएंगे, वे फिर अपनी जात दिखाएंगे। कुर्सियों की नई बंदर-बांट का महाभारत शुरू हो जाएगा। जातीय ईर्ष्या का समुद्र फट पड़ेगा। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है कि जब सारे राजनीतिक दल एक तरफ हैं और भारत की जनता दूसरी तरफ ! इस मुद्दे पर भारत के करोड़ों नागरिक जब तक बगावत की मुद्रा धारण नहीं करेंगे, हमारे नेता निहित स्वार्थों में डूबे रहेंगे। जो लोग अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में जाति के जाल में फंसे रहना चाहते हैं, फंसे रहें लेकिन राष्ट्र के राजनीतिक जीवन में से जाति का पूर्ण बहिष्कार होना चाहिए।

दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, ग्रामीणों, गरीबों को आगे बढ़ाने का अब एक ही तरीका है। सिर्फ शिक्षा में आरक्षण हो, पहली से 10 वीं कक्षा तक। आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक हो। जन्म नहीं, कर्म ! आरक्षण याने सिर्फ शिक्षा ही नहीं, भोजन, वस्त्र्, आवास और चिकित्सा भी मुफ्त हो। प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से सक्षम बने और जीवन में जो कुछ भी प्राप्त करे, वह अपने दम-खम से प्राप्त करे। यह विशेष अवसर के सिद्घांत का सर्वश्रेष्ठ अमल है। इस व्यवस्था में जिसको जरूरत है, वह छूटेगा नहीं और जिसको जरूरत नहीं है, वह घुस नहीं पाएगा, उसकी जात चाहे जो हो| जात पर आधरित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है। जात घटेगी तो देश बढ़ेगा। वोट-बैंक की राजनीति को बेअसर करने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह भी है कि देश में मतदान को अनिवार्य बना दिया जाए। जन-गणना से जाति को हटाना काफी नहीं है, जातिसूचक नामों और उपनामों को हटाना भी जरूरी है| जातिसूचक नाम लिखनेवालों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए। उन्हें सरकारी पदों और नौकरियों से वंचित किया जाना चाहिए। यदि मजबूर सरकार के गणक लोगों से उनकी जाति पूछें तो वे या तो मौन रहें या लिखवाऍं – ‘मैं हिंदुस्तानी  हूं’। हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं है।

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dalit beshay on 28 May, 2010 22:04;06
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Itihas gawah hai ki jo char jatiya brahman, chhatriya, vaisya aur shudra KARM ke adhar per hoti thi usko vanswad kisne banaya. Itihas gawah hai ki mandiro me kisko nahi ghusne diya jata tha aur jute uthwaye jate the. Itihas gawah hai ki kisko padhai ka adhikar tha aur kisko nahi tha. Aaj agar reservation hai aur jati aadharit jangarna ho raha hai to usme akhir dikkat kaha hai. Itihas gawah hai ham NAN JATO per kitne julm hue hai. Itihas gawah hai ki kiske julmo aur shan-o-shaukat ke karan croro hindu boddh gaye. Itihas gawah hai ki kaun man betiyo ki ijjat nilam karwata tha. aaj bhi fail hone per kaun RESERVATION ko jyada aur apne kamjorpan ko KAM karke apne ma bap aur apne dosto ko batata hai. Itihas gawah hai ki kisi bhi SATTA jyada din nahi reh saki. Itihas gwah hai kaun kan me pighle sishe dalta tha. sachhai ye hai jisper ham raj karte the wo aaj hamse aage hai business me aur har jagah.
LOKTANTRA HAI AAP APNE JANSANKHYA KE ANUSAR PARTITION KARWAO AUR AAPKO KHUD APNA HISSA PATA LAG JAYEGA.

RASSI JAL GAYI LEKIN AAITHAN NAHI GAYI.

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dalit beshay on 28 May, 2010 22:04;06
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Itihas gawah hai ki jo char jatiya brahman, chhatriya, vaisya aur shudra KARM ke adhar per hoti thi usko vanswad kisne banaya. Itihas gawah hai ki mandiro me kisko nahi ghusne diya jata tha aur jute uthwaye jate the. Itihas gawah hai ki kisko padhai ka adhikar tha aur kisko nahi tha. Aaj agar reservation hai aur jati aadharit jangarna ho raha hai to usme akhir dikkat kaha hai. Itihas gawah hai ham NAN JATO per kitne julm hue hai. Itihas gawah hai ki kiske julmo aur shan-o-shaukat ke karan croro hindu boddh gaye. Itihas gawah hai ki kaun man betiyo ki ijjat nilam karwata tha. aaj bhi fail hone per kaun RESERVATION ko jyada aur apne kamjorpan ko KAM karke apne ma bap aur apne dosto ko batata hai. Itihas gawah hai ki kisi bhi SATTA jyada din nahi reh saki. Itihas gwah hai kaun kan me pighle sishe dalta tha. sachhai ye hai jisper ham raj karte the wo aaj hamse aage hai business me aur har jagah.
LOKTANTRA HAI AAP APNE JANSANKHYA KE ANUSAR PARTITION KARWAO AUR AAPKO KHUD APNA HISSA PATA LAG JAYEGA.

RASSI JAL GAYI LEKIN AAITHAN NAHI GAYI.

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dalit beshay on 28 May, 2010 22:09;19
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SAMUCHA BHARAT JANTA HAI KI AAJ AAPLOGO KA CHALNE WALA NAHI HAI.
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dalit beshay on 28 May, 2010 22:12;36
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जहा आरक्षण नहीं है वहा आपलोगों ने जगह बना रखी है. मुस्लमान और ब्रह्मण के किसी भी संसथान में जाइये और पता लगाइए की उनकी जाती वालो का प्रतिशत उस संसथान में कितना है आप खुद समझ जायेंगे. ये तो रहा उनका निजी संसथान और कंपनी. समूचा देश जनता है की ज्यादातर समाचार पत्र किसका है और उसमे कम करने वाले कौन है.
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राजेंद्र on 28 May, 2010 23:23;26
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इस लेख का स्वागत हे, आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए, जाती तो समाज की कुरीति हे जो इसको मिटने के प्रयास होने चाहिए, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी जाती आधारित जनगणना का विरोध करता हे, टीवी न्यूज़ में श्री राम माधव ने स्पष्ट किया हे .
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on 29 May, 2010 00:22;54
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respected vaidikji , yah lekh sachchai se bahut door kalpnik lok main rahkar likha gaya lagta hai . jati is desh ki sachchai hai.jatiyan keval kshudron ki hoti hai . savarno ki nahi unke keval varn hote hai. jaise brahmin, kshatriya, vaishy, bas... yadi kshudra apni ginti karvana chate hai to isme aapatti kya hai. aakhir unko bhi maloom ho ki 80% kshudron par kaise 20% savarna raj kar rahe hain. sadiyon se jo burai samaj main vyapt hai , use achcha vaicharik mullama chadhaya hai vaidik ji ne . ye aapke atigyani hone ka praman hai. kripaya GULASMGIRI(jyotiba phule ki book) ko padhiyae .angrejon ne jati ke aadhar par desh ko bata ? kya khoobsurat tark hai .vah badhai vaidikji .aapka gyan samriddh hota rahe yahi kamna hai . har desh ka jatiy gaurav hi use mahan banata hai . is desh ki har jati ko apne par aur apne purvajon par garv hai . aur rahega . yeh aapka samaj aur sarkar ko gumrah karne vala lekh hai . jis arya samaj par jati hatane ki jimmedari thi vah to kuch savarno tak hi simit rah gai hai. ab to yah jati - janganna ho hi jane dijiye . taki samaj sach ka samna kar sake . jai hind
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दिलीप मंडल on 29 May, 2010 01:08;22
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वैदिक जी का सामान्य ज्ञान

उनके लेख के कुछ हिस्से नीचे हैं और ब्रैकेट में मेरे जवाब हैं।

"50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता। यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गई हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गई हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें।" (वैदिक जी, इसी देश के कई राज्य 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देते हैं। तमिलनाडु 69 फीसदी आरक्षण देता है। और यह किसने कहा कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण किसी हालत में नहीं दिया जा सकता। 50 फीसदी की सीमा सुप्रीम कोर्ट ने बालाजी केस में लगाई थी। इसे सुप्रीम कोर्ट की ज्यादा जजों की पीठ भी बदल सकती है और संसद भी। और नवीं अनुसूची में डालकर संसद ऐसे कानून को अदालती पड़ताल से मुक्त भी कर सकती है।)

"आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है ? सिर्फ नौकरियाँ ! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिए गए हैं|" (5-7 हजार नौकरियां??? कई सारे शून्य जोड़ना भूल गए हैं वैदिक जी। प्रूफ की गलती भी हो सकती है। सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियों में 1 जनवरी 2006 को 5.84 लाख दलित, 2.20 लाख आदिवासी और 1.89 लाख ओबीसी थे। राज्यों का आंकड़ा इससे कई गुणा ज्यादा है। देखते-देखते देश में दलितों का मिडिल क्लास बन गया। 60 करोड़ का आंकड़ा वैदिक जी पता नहीं कहां से लेकर आए हैं, लेकिन यह जरूर है कि केंद्र सरकार की 32 लाख नौकरियों के हिसाब से ये संख्याएं कम जरूर हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है ताकि हर समुदाय को लगे कि देश उसका भी है।)

"जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाज़े से घुस आए हैं।" (ये चोर दरवाजा संवैधानिक प्रावधान है वैदिक जी। चोर दरवाजा है तो अदालत में शिकायत कीजिए। आपको न्याय जरूर मिलेगा।)


"हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था।" (जाति की गणना कभी बंद नहीं हुई। आजादी के बाद की जनगणनाओं में अनुसूचित जाति की गिनती होती रही है।)

जिन स्त्री और पुरूषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी ? (किसी भी वकील से पूछ लीजिए, आपको जवाब मिल जाएगा। भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में ये पूछे जाने योग्य सवाल नहीं है।)

"हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी। वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी।" (जनगणना में गलत जानकारी देने पर सजा का प्रावधान है। जनगणना अधिनियम 1948 को पढ़ें। और किसी ने अपनी जाति कुछ भी लिखा दी, वह कानूनी प्रमाण है, यह किस विद्वान ने बता दिया? एक बार तथ्यों को दोबारा जांच लें। जनगणना में दलित लिखा देने से कोई दलित बन जाए, यह जादू इस देश में नहीं होता।)

"आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आज़ाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है।" (अंग्रेजों ने जनगणना में जाति को नहीं हटाया। 1941 में विश्वयुद्ध के कारण जनगणना का काम पूरा नहीं हो पाया था। अगली जनगणना आजाद भारत में हुई।)

"जात पर आधरित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है।" (किसने कहा आरक्षण खत्म होगा ही। संविधान ने नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण को लेकर कोई समय सीमा नहीं लगाई है। एक बार संविधान फिर से पढ़िए।)
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Ravi on 29 May, 2010 10:41;26
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जाती के आधार पर आरक्षण का लाभ किसी भी परिवार को केवल एक बार ही मिले यह प्रावधान होने से वास्तविक वंचितों को इसका लाभ मिल सकेगा ! अभी तो जो लाभ ले रहा है वह तो बार बार फायदा उठा रहा है . और जो वंचित है वह अब भी वंचित है ! जाती आधारित जनगणना से लाभ नेताओ को कितना होंगा यह तो पता नहीं पर समाज में वैमनष्यता बढ़ने का नुकसान जरूर होगा !
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anjule on 29 May, 2010 14:14;55
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alok shrivastav said:

वैदिक जी के आंदोलनों का मकसद क्या होता है, यह पिछले 30 सालों से जग जाहिर है. ये भाई साहब धर्मयुग, दिनमान, पराग, सारिका, माधुरी आदि पत्रिकाएं बड़े भव्य और व्यापक रूप से निकालने वाले थे. इनसे जरा पूछिए तो उन पत्रिकाओं का क्या हुआ. वह फर्जी चंद्रप्रभा प्रकाषन कहां गया, जिसके बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि यह एग्रीमेंट फ्राड है. दरअसल होता यह है, कि आदमी एक बार अपने अपराध की सजा से बच जाए तो उसमें अपराध करने का हौसला आ जाता है. धर्मयुग के 15 कर्मचारियों ने इनके खिलाफ मुंबई के लेबर कोर्ट में मुकदमा डाला था, यदि यही मुकदमा मुंबई के क्रिमिनल कोर्ट में डाला गया होता, तो जिस एग्रीमेंट को भारत का सर्वोच्च न्यायालय फ्रॉड कह रहा है, उसके लिए आपराधिक धाराओं में क्या सजा उल्लेखित है, यह जाना जा सकता है. इन महोदय के हर आंदोलन के परखचे उड़ाना आवष्यक है, क्योंकि ये सभी आंदोलन निहित स्वार्थ से प्रेरित होते हैं.
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anjule on 29 May, 2010 14:16;55
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मुझे बड़ी हंसी आती है जब कोई शदियों से दबाये गए लोगों के आरक्षण का तो बिरोध करता है मगर ..खुद अपनी जाती और बिरादरी की आरक्षण सुबिधा देने के लिए तम्मं तरह के तर्क देता है....जैसा अभी कुछ साल पहले उच्च शिक्षा में आरक्षण मामले में hum देख चुके हैं.जो लोग ये कह कर दलितों और पिछड़ों के आरक्षण का विरोद कर रहे थे की ये डॉ. बनने के लायक नहीं वही अपने कुनबे के गरीबों के लिए आरक्षण की मांग कर रहे थे...तब मेरे दिमाग में ये बात आती थी क्या ये उच्च जाति के गरीब लोग आरक्षण पा कर गर डॉ .बनते हैं तो क्या ये मरीज के पेट में कैंची नहीं छोड़ेंगे.या प्रतिभा केवल ऊँची जाति वालों की बपौती है. ये हकीकत है की भेद भाव अभी भी जारी है और दलितों और पिछड़ों को आज भी ये सम्मान और एक इन्सान के तौर पे जिन्दा नहीं देखना चाहते...और ये बाते जो कहते हैं की शहरों में इस तर लोग नहीं सोचते तो उनसे कहना चाहूँगा कभी इस तरह की बातें शहरी उच्च वर्ग के सामने छेडिये जवाब मिल जायेगा की कोंन कितने पानी में है और लोग अपनी ५० साल की सोच पे अब भी कायम है...और यहाँ ये मेरी जात हिन्दुस्तानी का माला जपने वाले डॉ. वेदप्रताप वैदिक भी उसी सोच के आदमीं हैं..ऐसे फर्जी लोगों के आर्टिकल यहाँ छपते क्यों है ये ही मेरी समझ में नहीं आता ..इस आर्टिकल के संधर्भ में मोहल्ला लाइव पे दिलिम मंडेला का आर्टिकल है और वहीँ पे इस तथा कथित डॉ. वेदप्रताप वैदिककी पोल खोलती एक टिप्पड़ी आई है जरा आप लोग पढ़िए यहाँ उपदेस बात रहे इस सवर्ड वादी की ...
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alok shrivastav said:

वैदिक जी के आंदोलनों का मकसद क्या होता है, यह पिछले 30 सालों से जग जाहिर है. ये भाई साहब धर्मयुग, दिनमान, पराग, सारिका, माधुरी आदि पत्रिकाएं बड़े भव्य और व्यापक रूप से निकालने वाले थे. इनसे जरा पूछिए तो उन पत्रिकाओं का क्या हुआ. वह फर्जी चंद्रप्रभा प्रकाषन कहां गया, जिसके बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि यह एग्रीमेंट फ्राड है. दरअसल होता यह है, कि आदमी एक बार अपने अपराध की सजा से बच जाए तो उसमें अपराध करने का हौसला आ जाता है. धर्मयुग के 15 कर्मचारियों ने इनके खिलाफ मुंबई के लेबर कोर्ट में मुकदमा डाला था, यदि यही मुकदमा मुंबई के क्रिमिनल कोर्ट में डाला गया होता, तो जिस एग्रीमेंट को भारत का सर्वोच्च न्यायालय फ्रॉड कह रहा है, उसके लिए आपराधिक धाराओं में क्या सजा उल्लेखित है, यह जाना जा सकता है. इन महोदय के हर आंदोलन के परखचे उड़ाना आवष्यक है, क्योंकि ये सभी आंदोलन निहित स्वार्थ से प्रेरित होते हैं.
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image डॉ वैदिक डॉ वेदप्रताप वैदिक भारतीय पत्रकारिता में जीवित किंवदन्ती बन गये हैं. अपना शोध प्रबंध उस वक्त हिन्दी में लिखा जब शोध का अर्थ ही अंग्रेजी होता था. 1971 में जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय मामलों में पीएचडी हासिल करने के बाद पत्रकारिता में आये. नवभारत टाइम्स के संपादक (विचार) फिर समाचार एजंसी भाषा के संपादक रहे. वर्तमान में भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में कार्य और नियमित लेखन. dr.vaidik@gmail.com
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रोम रोम में इरोम
कश्मीरी अलगाववादियों की तरह उसने आज तक अपने हाथ में कभी पत्थर नहीं उठाया. हालांकि उसका भी विरोध उसी बात को लेकर है जिसे लेकर कश्मीर में पत्थरबाजों की पूरी फौज सड़कों पर उतार दी गयी. पूर्वोत्तर में सशस्त्र सेना अधिनियम समाप्त किया जाए. इरोम शर्मिला विरोध कर रही है लेकिन उसका हथियार आंदोलन नहीं, आत्मोत्सर्ग है. पिछले दस साल से उसने अन्न त्याग कर रखा है. पुलिस और प्रशासन नाक की नलियों से पौष्टिक पदार्थ पहुंचाकर भले ही उसके शरीर को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन उसे जब भी मौका मिलता है वह राजघाट जाती है और फफककर रोती है. शायद शर्मिला के सत्याग्रह को समझने के लिए देश में दूसरी कोई जगह बची भी नहीं है. ...
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जिसके दर पर फाइल पहुंची, उसने रात गुजार ली
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो. मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है वह दिल दहला देनेवाली है. जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो वहां एक 31 मंजिला बिल्डिंग अवैध जमीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी. भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था. कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा. ...
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बहुत बड़ा दुखारी है बुखारी
हाल में ही लखनऊ में एक पत्रकार को पीटकर अहमद बुखारी एक बार फिर चर्चा में आ गये. अहमद बुखारी ने लखनऊ में जिस पत्रकार को पीटा वह न तो किसी बड़े अखबार से जुड़ा था और न ही कोई बड़ा नाम था. लेकिन उस पत्रकार ने सवाल बड़ा किया था जिससे बौखलाकर बुखारी ने उसकी पिटाई कर दी थी. बुखारी का चरित्र यही रहा है कि वे हमेशा छोटे लोगों पर ही हाथ डालते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं....
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श्रीमान जी, मैं यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया का संपादक और सीईओ हूं!
सेवा में, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली / लखनऊ। श्रीमान, मैं यशवंत सिंह पुत्र श्री लालजी सिंह निवासी ग्राम अलीपुर बनगांवा थाना नंदगंज, जनपद गाजीपुर, उत्तर प्रदेश (हाल पता- ए-1107, जीडी कालोनी, मयूर विहार फेज-3, दिल्ली-96) हूँ. मैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एक वेब मीडिया कंपनी भड़ास4मीडिया में कार्यरत हूं. इस कंपनी के पोर्टल का वेब पता www.bhadas4media.com है. मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर हूं. इससे पहले मैं दैनिक जागरण, अमर उजाला एवं अन्य अखबारों में कार्यरत रहा हूँ. ...
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कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।...
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अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...
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गिलानी साहब, कश्मीर आजाद है!
यह बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि कश्मीरी अवाम जिसे आज़ादी कहता है उसका मातलब भारत में विलय है और गिलानी टाइप पाकिस्तानी पैसे पर पलने वालों को यह हक नहीं है कि वे पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात करें क्योंकि पाकिस्तान ही कश्मीर की आज़ादी का असली दुश्मन है....
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बुखारी को सबक सिखाना जरूरी
शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
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अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
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सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
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मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
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आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
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सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
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आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
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एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
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