मेरी जात हिन्दुस्तानी
जाति की जनगणना के लिए तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा। उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न पूछी जाए। लेकिन इस देश में मेरे जैसे भी कई लोग हैं, जो कहते हैं कि मेरी जात सिर्फ हिंदुस्तानी है और जो जन्म के आधार पर दिए जानेवाले हर आरक्षण के घोर विरोधी हैं।
ऐसे लोगों की मान्यता है कि जन्म याने जाति के आधार पर दिया जानेवाला आरक्षण न केवल राष्ट्र-विरोधी है बल्कि जिन्हें वह दिया जाता है, उन व्यक्तियों और जातियों के लिए भी विनाशकारी है। इसीलिए जन-गणना में से जाति को बिल्कुल उड़ा दिया जाना चाहिए। यदि 2010 की इस जनगणना में जाति को जोड़ा जाएगा तो वह बिल्कुल निरर्थक होगा क्योंकि आरक्षण की सीमा उच्चतम न्यायालय ने पहले ही बांध रखी है। 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता। यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गई हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गई हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें। इसलिए प्रश्न उठता है कि जनगणना में जाति को घसीट कर लाने से किसको क्या फायदा होनेवाला है ?
जाति पर आधारित आरक्षण ने गरीबों और वंचितों का सबसे अधिक नुकसान किया है। आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है ? सिर्फ नौकरियाँ ! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिए गए हैं| उनके विशेष अवसर, विशेष सुविधा और विशेष सहायता के द्वार बंद कर दिए गए हैं। उन्हें खोलना बहुत जरूरी है। क्या 5 हजार रेवडि़याँ बांट देने से 60-70 करोड़ वंचितों के पेट भर जाएंगे? आरक्षण न सिर्फ उनके पेट पर लात मारता है बल्कि उनके सम्मान को भी चोट पहुंचाता है। जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाज़े से घुस आए हैं। हमारे नेताओं ने जाति को आरक्षण का सबसे सरल आधार मान लिया था लेकिन अब वह सबसे जटिल आधार बन गया है| अभी आरक्षण का आधार बहुत संकरा है, उसे बहुत चौड़ा करना जरूरी है| जाति का आधार सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होता है। इसके कारण हमारे देश के मुसलमानों और ईसाइयों में जो वंचित लोग हैं, उनको भी बड़ा नुकसान हुआ है। जिसे जरूरत थी, उसे रोटी नहीं मिली और जिसके पास जात थी, वह मलाई ले उड़ा।
जन-गणना में जाति का समावेश किसने किया, कब से किया, क्यों किया, क्या यह हमें पता है ? यह अंग्रेज ने किया, 1871 में किया और इसलिए किया कि हिंदुस्तान को लगातार तोड़े रखा जा सके| 1857 की क्रांति ने भारत में जो राष्ट्रवादी एकता पैदा की थी, उसकी काट का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि भारत के लोगों को जातियों, मजहबों और भाषाओं में बांट दो। मज़हबों और भाषाओं की बात कभी और करेंगे, फिलहाल जाति की बात लें| अंग्रेज के आने के पहले भारत में जाति का कितना महत्व था ? क्या जाति का निर्णय जन्म से होता था ? यदि ऐसा होता तो दो सौ साल पहले तक के नामों में कोई जातिसूचक उपनाम या 'सरनेम' क्यों नहीं मिलते ? राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, महेश, बुद्घ, महावीर किसी के भी नाम के बाद शर्मा, वर्मा, सिंह या गुप्ता क्यों नहीं लगता ? कालिदास, कौटिल्य, बाणभट्रट, भवभूति और सूर, तुलसी, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण आदि सिर्फ अपना नाम क्यों लिखते रहे ? इनके जातिगत उपनामों का क्या हुआ ? वर्णाश्रम धर्म का भ्रष्ट होना कुछ सदियों पहले शुरू जरूर हो गया था लेकिन उसमें जातियों की सामूहिक राजनीतिक चेतना का ज़हर अंग्रेजों ने ही घोला| अंग्रेजों के इस ज़हर को हम अब भी क्यों पीते रहना चाहते हैं ? मज़हब के ज़हर ने 1947 में देश तोड़ा, भाषाओं का जहर 1964-65 में कंठ तक आ पहुंचा था और अब जातियों का ज़हर 21 वीं सदी के भारत को नष्ट करके रहेगा। जन-गणना में जाति की गिनती इस दिशा में बढ़नेवाला पहला कदम है। इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था।
1931 में आखिर अंग्रेज 'सेंसस कमिश्नर' जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को घसीटने का विरोध क्यों किया था ? वे कोरे अफसर नहीं थे। वे प्रसिद्घ नृतत्वशास्त्री भी थे। उन्होंने बताया कि हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी फर्जी जातियॉं लिखवा देते हैं ताकि उनकी जातीय हैसियत ऊँची हो जाए| कुछ जातियों के बारे में ऐसा भी है कि एक प्रांत में वे वैश्य है तो दूसरे प्रांत में शूद्र| एक प्रांत में वे स्पृश्य हैं तो दूसरे प्रांत में अस्पृश्य ! हर जाति में दर्जनों से लेकर सैकड़ों उप-जातियॉं हैं और उनमें भी ऊँच-नीच का झमेला है। 58 प्रतिशत जातियॉ तो ऐसी हैं, जिनमें 1000 से ज्यादा लोग ही नहीं हैं। उन्हें ब्राह्रमण कहें कि शूद्र, अगड़ा कहें कि पिछड़ा, स्पृश्य कहें कि अस्पृश्य - कुछ पता नहीं| आज यह स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है, क्योंकि अब जाति के नाम पर नौकरियॉं, संसदीय सीटें, मंत्री और मुख्यमंत्री पद, नेतागीरी और सामाजिक वर्चस्व आदि आसानी से हथियाएं जा सकते हैं। लालच बुरी बलाय ! लोग लालच में फंसकर अपनी जात बदलने में भी संकोच नहीं करते| सिर्फ गूजर ही नहीं हैं, जो 'अति पिछड़े' से 'अनुसूचित' बनने के लिए लार टपका रहे हैं, उनके पहले 1921 और 1931 की जन-गणना में अनेक राजपूतों ने खुद को ब्राह्रमण, वैश्यों ने राजपूत और कुछ शूद्रों ने अपने आप को वैश्य और ब्राह्रमण लिखवा दिया। जिन स्त्री और पुरूषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी ? जनगणना करने वाले कर्मचारियों के पास किसी की भी जात की जाँच-परख करने का कोई पैमाना नहीं है| हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी। वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी। कोई आश्चर्य नहीं कि जब आरक्षणवाले आज़ाद भारत में कुछ ब्राह्रमण अपने आप को दलित लिखवाना पसंद करें बिल्कुल वैसे ही जैसे कि जिन दलितों ने अपने आप को बौद्ध लिखवाया था, आरक्षण से वंचित हो जाने के डर से उन्होंने अपने आप को दुबारा दलित लिखवा दिया। यह बीमारी अब मुसलमानों और ईसाइयों में भी फैल सकती है| आरक्षण के लालच में फंसकर वे इस्लाम और ईसाइयत के सिद्घांतों की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं। जाति की शराब राष्ट्र और मज़हब से भी ज्यादा नशीली सिद्घ हो सकती है।
आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आज़ाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है। कांग्रेस जैसी महान पार्टी का कैसा दुर्भाग्य है कि आज उसके पास न तो इतना सक्षम नेतृत्व है और न ही इतनी शक्ति कि वह इस राष्ट्रभंजक मांग को रद्द कर दे| उसे अपनी सरकार चलाने के लिए तरह-तरह के समझौते करने पड़ते हैं। भाजपा ने अपने बौद्घिक दिग्भ्रम के ऐसे अकाट्य प्रमाण पिछले दिनों पेश किए हैं कि जाति के सवाल पर वह कोई राष्ट्रवादी स्वर कैसे उठाएगी। आश्चर्य तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मौन पर है, जो हिंदुत्व की ध्वजा उठाए हुए है लेकिन हिंदुत्व को ध्वस्त करनेवाले जातिवाद के विरूद्घ वह खड़गहस्त होने को तैयार नहीं है। समझ मे नहीं आता कि वर्ग चेतना की अलमबरदार कम्युनिस्ट पार्टियों को हुआ क्या है? उन्हें लकवा क्यों मार गया है ? सबसे बड़ी विडंबना हमारे तथाकथित समाजवादियों की है। कार्ल मार्क्स कहा करते थे कि मेरा गुरू हीगल सिर के बल खड़ा था। मैंने उसे पाव के बल खड़ा कर दिया है लेकिन जातिवाद का सहारा लेकर लोहिया के चेलों ने लोहियाजी को सिर के बल खड़ा कर दिया है। लोहियाजी कहते थे, जात तोड़ो। उनके चेले कहते हैं, जात जोड़ो| नहीं जोड़ेंगे तो कुर्सी कैसे जुड़ेगी ? लोहिया ने पिछड़ों को आगे बढ़ाने की बात इसीलिए कही थी कि समता लाओ और समता से जात तोड़ो। रोटी-बेटी के संबंध खोलो। जन-गणना में जात गिनाने से जात टूटेगी या मजबूत होगी ? जो अभी अपनी जात गिनाएंगे, वे फिर अपनी जात दिखाएंगे। कुर्सियों की नई बंदर-बांट का महाभारत शुरू हो जाएगा। जातीय ईर्ष्या का समुद्र फट पड़ेगा। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है कि जब सारे राजनीतिक दल एक तरफ हैं और भारत की जनता दूसरी तरफ ! इस मुद्दे पर भारत के करोड़ों नागरिक जब तक बगावत की मुद्रा धारण नहीं करेंगे, हमारे नेता निहित स्वार्थों में डूबे रहेंगे। जो लोग अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में जाति के जाल में फंसे रहना चाहते हैं, फंसे रहें लेकिन राष्ट्र के राजनीतिक जीवन में से जाति का पूर्ण बहिष्कार होना चाहिए।
दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, ग्रामीणों, गरीबों को आगे बढ़ाने का अब एक ही तरीका है। सिर्फ शिक्षा में आरक्षण हो, पहली से 10 वीं कक्षा तक। आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक हो। जन्म नहीं, कर्म ! आरक्षण याने सिर्फ शिक्षा ही नहीं, भोजन, वस्त्र्, आवास और चिकित्सा भी मुफ्त हो। प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से सक्षम बने और जीवन में जो कुछ भी प्राप्त करे, वह अपने दम-खम से प्राप्त करे। यह विशेष अवसर के सिद्घांत का सर्वश्रेष्ठ अमल है। इस व्यवस्था में जिसको जरूरत है, वह छूटेगा नहीं और जिसको जरूरत नहीं है, वह घुस नहीं पाएगा, उसकी जात चाहे जो हो| जात पर आधरित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है। जात घटेगी तो देश बढ़ेगा। वोट-बैंक की राजनीति को बेअसर करने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह भी है कि देश में मतदान को अनिवार्य बना दिया जाए। जन-गणना से जाति को हटाना काफी नहीं है, जातिसूचक नामों और उपनामों को हटाना भी जरूरी है| जातिसूचक नाम लिखनेवालों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए। उन्हें सरकारी पदों और नौकरियों से वंचित किया जाना चाहिए। यदि मजबूर सरकार के गणक लोगों से उनकी जाति पूछें तो वे या तो मौन रहें या लिखवाऍं – ‘मैं हिंदुस्तानी हूं’। हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं है।
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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LOKTANTRA HAI AAP APNE JANSANKHYA KE ANUSAR PARTITION KARWAO AUR AAPKO KHUD APNA HISSA PATA LAG JAYEGA.
RASSI JAL GAYI LEKIN AAITHAN NAHI GAYI.
BYE
LOKTANTRA HAI AAP APNE JANSANKHYA KE ANUSAR PARTITION KARWAO AUR AAPKO KHUD APNA HISSA PATA LAG JAYEGA.
RASSI JAL GAYI LEKIN AAITHAN NAHI GAYI.
BYE
उनके लेख के कुछ हिस्से नीचे हैं और ब्रैकेट में मेरे जवाब हैं।
"50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता। यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गई हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गई हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें।" (वैदिक जी, इसी देश के कई राज्य 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देते हैं। तमिलनाडु 69 फीसदी आरक्षण देता है। और यह किसने कहा कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण किसी हालत में नहीं दिया जा सकता। 50 फीसदी की सीमा सुप्रीम कोर्ट ने बालाजी केस में लगाई थी। इसे सुप्रीम कोर्ट की ज्यादा जजों की पीठ भी बदल सकती है और संसद भी। और नवीं अनुसूची में डालकर संसद ऐसे कानून को अदालती पड़ताल से मुक्त भी कर सकती है।)
"आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है ? सिर्फ नौकरियाँ ! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिए गए हैं|" (5-7 हजार नौकरियां??? कई सारे शून्य जोड़ना भूल गए हैं वैदिक जी। प्रूफ की गलती भी हो सकती है। सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियों में 1 जनवरी 2006 को 5.84 लाख दलित, 2.20 लाख आदिवासी और 1.89 लाख ओबीसी थे। राज्यों का आंकड़ा इससे कई गुणा ज्यादा है। देखते-देखते देश में दलितों का मिडिल क्लास बन गया। 60 करोड़ का आंकड़ा वैदिक जी पता नहीं कहां से लेकर आए हैं, लेकिन यह जरूर है कि केंद्र सरकार की 32 लाख नौकरियों के हिसाब से ये संख्याएं कम जरूर हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है ताकि हर समुदाय को लगे कि देश उसका भी है।)
"जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाज़े से घुस आए हैं।" (ये चोर दरवाजा संवैधानिक प्रावधान है वैदिक जी। चोर दरवाजा है तो अदालत में शिकायत कीजिए। आपको न्याय जरूर मिलेगा।)
"हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था।" (जाति की गणना कभी बंद नहीं हुई। आजादी के बाद की जनगणनाओं में अनुसूचित जाति की गिनती होती रही है।)
जिन स्त्री और पुरूषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी ? (किसी भी वकील से पूछ लीजिए, आपको जवाब मिल जाएगा। भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में ये पूछे जाने योग्य सवाल नहीं है।)
"हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी। वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी।" (जनगणना में गलत जानकारी देने पर सजा का प्रावधान है। जनगणना अधिनियम 1948 को पढ़ें। और किसी ने अपनी जाति कुछ भी लिखा दी, वह कानूनी प्रमाण है, यह किस विद्वान ने बता दिया? एक बार तथ्यों को दोबारा जांच लें। जनगणना में दलित लिखा देने से कोई दलित बन जाए, यह जादू इस देश में नहीं होता।)
"आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आज़ाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है।" (अंग्रेजों ने जनगणना में जाति को नहीं हटाया। 1941 में विश्वयुद्ध के कारण जनगणना का काम पूरा नहीं हो पाया था। अगली जनगणना आजाद भारत में हुई।)
"जात पर आधरित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है।" (किसने कहा आरक्षण खत्म होगा ही। संविधान ने नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण को लेकर कोई समय सीमा नहीं लगाई है। एक बार संविधान फिर से पढ़िए।)
वैदिक जी के आंदोलनों का मकसद क्या होता है, यह पिछले 30 सालों से जग जाहिर है. ये भाई साहब धर्मयुग, दिनमान, पराग, सारिका, माधुरी आदि पत्रिकाएं बड़े भव्य और व्यापक रूप से निकालने वाले थे. इनसे जरा पूछिए तो उन पत्रिकाओं का क्या हुआ. वह फर्जी चंद्रप्रभा प्रकाषन कहां गया, जिसके बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि यह एग्रीमेंट फ्राड है. दरअसल होता यह है, कि आदमी एक बार अपने अपराध की सजा से बच जाए तो उसमें अपराध करने का हौसला आ जाता है. धर्मयुग के 15 कर्मचारियों ने इनके खिलाफ मुंबई के लेबर कोर्ट में मुकदमा डाला था, यदि यही मुकदमा मुंबई के क्रिमिनल कोर्ट में डाला गया होता, तो जिस एग्रीमेंट को भारत का सर्वोच्च न्यायालय फ्रॉड कह रहा है, उसके लिए आपराधिक धाराओं में क्या सजा उल्लेखित है, यह जाना जा सकता है. इन महोदय के हर आंदोलन के परखचे उड़ाना आवष्यक है, क्योंकि ये सभी आंदोलन निहित स्वार्थ से प्रेरित होते हैं.
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alok shrivastav said:
वैदिक जी के आंदोलनों का मकसद क्या होता है, यह पिछले 30 सालों से जग जाहिर है. ये भाई साहब धर्मयुग, दिनमान, पराग, सारिका, माधुरी आदि पत्रिकाएं बड़े भव्य और व्यापक रूप से निकालने वाले थे. इनसे जरा पूछिए तो उन पत्रिकाओं का क्या हुआ. वह फर्जी चंद्रप्रभा प्रकाषन कहां गया, जिसके बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि यह एग्रीमेंट फ्राड है. दरअसल होता यह है, कि आदमी एक बार अपने अपराध की सजा से बच जाए तो उसमें अपराध करने का हौसला आ जाता है. धर्मयुग के 15 कर्मचारियों ने इनके खिलाफ मुंबई के लेबर कोर्ट में मुकदमा डाला था, यदि यही मुकदमा मुंबई के क्रिमिनल कोर्ट में डाला गया होता, तो जिस एग्रीमेंट को भारत का सर्वोच्च न्यायालय फ्रॉड कह रहा है, उसके लिए आपराधिक धाराओं में क्या सजा उल्लेखित है, यह जाना जा सकता है. इन महोदय के हर आंदोलन के परखचे उड़ाना आवष्यक है, क्योंकि ये सभी आंदोलन निहित स्वार्थ से प्रेरित होते हैं.
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