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भोपाल गैस काण्ड के असली अपराधी

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भोपाल हादसे पर साढे पच्चीस साल बाद आये फैसले के बाद से हादसे दर हादसे घटित हो रहे हैं. पहला हादसा फैसला ही बना. दूसरा हादसा इस आरोप के साथ आया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने तीन करोड़ रुपया लेकर यूनियन कार्बाइड के नान एक्टिंग सीईओ वारेन एण्डरसन को भोपाल से दिल्ली जाने दिया.

तीसरा हादसा इस खबर के साथ आया कि अर्जुन सिंह ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें दिल्ली से जो कहने के लिए कहा गया था उन्होंने वही किया. दिल्ली से उन्हें ऐसा करने के लिए कहा किसने? राजीव गांधी ने? तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आखिर किस दबाव में अर्जुन सिंह को कहा होगा कि भोपाल गैस त्रासदी के बाद घटनास्थल पर पहुंचे वारेन एंडरसन को सकुशल वापस भेज दो इसे आसानी से समझा जा सकता है. 25 साल पहले जिस दबाव में वारेन एण्डरसन को तत्कालीन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने वारेन एण्डरन को सकुशल वापस भेज दिया क्या आज वह दबाव कम हुआ है या बढ़ा है? भोपाल गैस काण्ड के अपराधियों की खोज करते समय इसी प्वाइंट से खोज शुरू करते हैं.

2-3 दिसंबर की रात खराब हवा ने जिस मिथाइल आइसोसाइनाइट के रिसाव ने हादसे को अंजाम दिया वह हाइड्रोजन साइनाइट से 500 गुना अधिक जहरीली थी. इसका "आविष्कार" पहले विश्वयुद्ध की देन थी. मिथाइल आइसोसाइनाइट को शून्य डिग्री सेन्टीग्रेट पर प्रिजर्व रखना होता है और संवेदनशीलता इतनी अधिक है कि यह अपने आप विस्फोटित हो सकता है. इतनी जहरीली गैस को भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने में निर्मित नहीं किया जाता था बल्कि उसे अमेरिका से आयात किया जाता था. जिस अमेरिका से इसे आयात किया जाता था उस अमेरिका में नियम ऐसा सख्त था कि आधा टन से अधिक मिथाइल आइसोसाइनाइट को एक साथ रखना प्रतिबंधित है. लेकिन भारत में उस वक्त लापरवाही ऐसी कि जिस टैंक से रिसाव हुआ उसमें 67 टन मिथाइल आइसोसाइनाइट रखा हुआ था. निश्चित रूप से यूनियन कार्बाइड की स्थापना के साथ ही इस बात के पुख्ता इंतजाम किये गये थे कि जहरीले रसायन के कारोबार में कंपनी को किसी प्रकार के अवरोध का सामना न करना पड़े. निश्चित रूप से इसके लिए कंपनी ने उस वक्त की समाजवादी आर्थिक व्यवस्था के साथ जमकर खिलवाड़ किया होगा. उदाहरण देखिए. 1 जनवरी 1973 में भारत सरकार ने फेरा कानून को लागू किया और तय किया कि किसी भी कंपनी में 40 प्रतिशत से अधिक विदेशी निवेश फेरा कानूनों का उल्लंघन माना जाएगा. यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन ने भारत सरकार के साथ मिलकर मिथाइल आइसोसाइनाइट का जो कारखाना स्थापित किया उसमें उसने 60 प्रतिशत शेयर अपने पास रखा.

इस पृष्ठभूमि में अगर हम भोपाल गैस त्रासदी को देखेंगे तो पायेंगे कि त्रासदी की पृष्ठभूमि जानबूझकर तैयार की गयी. अव्वल तो नियम कानून थे ही नहीं, और अगर कुछ रहे भी होंगे तो उनकी अनदेखी करना अधिकारियों और नेताओं ने अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझा क्योंकि कोई अमेरिकी कंपनी भारत सरकार के साथ मिलकर कोई कारखाना स्थापित कर रही थी. लेकिन दुर्घटना के 25 सालों बाद भी क्या परिस्थितियां बदल गयी है? जिन परिस्थितियों में उस वक्त यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन को इस बात के असीमित अधिकार दिये गये कि वह हादसे की हद तक लापरवाही बरत सकता है क्या आज कंपनियों को उससे अधिक अधिकार नहीं मिले हुए हैं? उस वक्त भी जब कंपनी के नान एक्टिंग सीईओ वारेन एण्डरसन को पता चला कि हादसा हुआ है तो हादसे के चार दिन बाद 7 दिसंबर को वे मुंबई होते हुए भोपाल पहुंचते हैं. उस वक्त प्रत्यक्षदर्शी आज बयान दे रहे हैं कि जब एंडरसन हवाई अड्डे पर पहुंचा तो उसके हाथ एक ब्रीफकेश और एक गैस मास्क था. हवाई अड्डे से ही एंडरसन श्यामला हिल्स स्थित यूनियन कार्बाइड के गेस्ट हाउस पहुंचते हैं और उन्हें चार घण्टे के लिए गिरफ्तार किया जाता है. उनके ऊपर धारा 304 ए, 304,120 बी और 429 के तहत मामला दर्ज किया गया. जिन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया उसमें उन्हें पुलिस जमानत नहीं दे सकती थी लिहाजा गेस्ट हाउस में ही मजिस्ट्रेट को बुलाया गया और उन्हें जमानत दे दी गयी. इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से उन्हें राज्य सरकार का विशेष विमान मुहैया कराया गया और वे दिल्ली लाये गये. कुछ देर नार्थ ब्लाक के आस पास टहलने के बाद अपने विशेष विमान से वे अमेरिका रवाना हो गये. इन सारी परिस्थितियों के बीच क्या आप वारेन एण्डरसन को अपराधी मान सकते हैं? अगर वारेन एण्डरसन अपराधी थे तो फिर वे भोपाल क्यों गये? आखिर प्रधानमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री सचिवालय नहीं चाहता तो क्या वारेन एंडरसन जो कि खुद चलकर भोपाल गये थे, वहां से भाग सकते थे? निश्चित तौर पर अमेरिकी प्रशासन ने भारत सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री पर दबाव डाला होगा और अपने एक महत्वपूर्ण नागरिक को सकुशल वापस आने के लिए कहा होगा. अमेरिका का ऐसा करना आश्चर्यजनक नहीं है और न ही एंडरसन को राक्षस कह देने से गुस्सा खत्म हो जाता है. क्या राजीव गांधी, अर्जुन सिंह और तत्कालीन नौकरशाही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? एंडरनसन तो अपराध बोध में भोपाल गया था, फिर वहां से उसे निरपराध मानकर बाहर निकलने का अपराध किसने किया? आज पच्चीस साल बाद क्या अमेरिका का दबदबा भारतीय प्रधानमंत्री कार्यालय से खत्म हो गया है?

अगर ऐसा नहीं हुआ है तो न तो एंडरसन को गाली देने से भोपाल का पाप मिटता है और न ही अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड को दोषी कह देने से कहानी खत्म हो जाती है. यह हमारे लाखों नागरिकों की जिन्दगी का सवाल था जो किसी भी एंडरसन की इकलौती जिंदगी से ज्यादा कीमती थी. अगर अमेरिका अपने एक नौकर को बचाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय तक को इस्तेमाल कर लेता है तो उस प्रधानमंत्री कार्यालय पर हम कब लानत भेजेंगे तो ताजा ताजा बिछी 15 हजार लाशों से गुजरकर उस एंडरसन को बाहर जाने देता है. इस घटनाक्रम के बाद पिछले पच्चीस सालों में जो कुछ हुआ वह लाशों पर की गयी भद्दी राजनीति है जो इस देश में बार बार की जाती है. मामला अदालत में गया तो भारत सरकार खुद ही पीड़ितों की पक्षधर हो गयी जो कि खुद यूनियन कार्बाइड की एक हिस्सेदार थी. नौ साल पहले अमेरिका की ही दूसरी केमिकल कंपनी डाउ केमिकल्स यूनियन कार्बाइड को खरीद लेती है और हमारे देश के एक और महान उद्योगपति रतन टाटा उसकी सिफारिश करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं. भोपाल फैसले के बाद जो मंत्रिसमूह गठित किया गया है उसके मुखिया बनाये गये हैं पी चिदम्बरम. पिछली यूपीए सरकार में जब वे वित्तमंत्री थे तो उन्होंने प्रधानंत्री को डाउ केमिकल्स की सिफारिश करते हुए पत्र लिखा था. तर्क यह कि डाउ केमिकल्स ने यूनियन कार्बाइड का जो अधिग्रहण किया है उसमें भोपाल संयत्र शामिल नहीं है. अब तो वह यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन अस्तित्व में ही नहीं है जिसे अपराधी मानकर फैसला सुनाया गया है. जो मंत्रिसमूह गठित किया गया है उसमें औद्योगिक घरानों के हिमायती हैं इसलिए वे इस फैसले के बारे में क्या राय देंगे इसे समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. और जब तक हाइकोर्ट में अपील की जाएगी, सुनवाई दोबारा शुरू की जाएगी अगले दस पंद्रह साल और गुजर जाएंगे और तब तक तो वारेन एंडरसन भी शायद न रहें और वे लोग भी जिन्हें दो दो साल की सजा देकर "उपकृत" किया गया है.

अब आप किसे दोषी मानेंगे? किससे न्याय की उम्मीद करेंगे? जो मर गये वे तो तर गये जो आज भी भोपाल का दंश झेल रहे हैं वे कौड़ी दो कौड़ी पाकर ही अपना दुख दर्द कम कर लेना चाहते हैं और मान लेना चाहते हैं कि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं. लेकिन यह लोकतंत्र खास लोगों और खास देशों की सेवा में इतनी गंभीरता से तल्लीन है जो नागरिकों में भी अमीर गरीब का भयानक भेदभाव करती है. अब भी आप यही मानेंगे कि एंडरनसन और यूनियन कार्बाइड दोषी है? अगर वे दोषी हैं तो उन्हें यह अपराध करने का मौका किसने दिया? फैसला आपको करना हो तो किसे ज्यादा सख्त सजा देंगे?

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ghakki on 11 June, 2010 23:58;57
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जब अपना सिक्का ही खोता हो तो दूसरों को क्या दोष दें | अब अगला केस परमाणु दुर्घटना का हो गा | फिर उसके पचीस साल बाद जब फैसला आये गा तब फिर हम लोग इसे तरह की चर्चा करेंगे और थोड़े समय बाद भोल जायेंगे और फिर किसे नए आपदा से हलाल होने के लिए तैयार हो जायेंगे पर वर्तमान में परमाणु समझौते में जो जिमेदारी और मुआवजा से बचने की साजिश हो रही गई उसका विरोध नहीं करेंगे| क्योकि हमें तो बिजली चाहिए किसी भी कीमत पर |
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शैलेन्द्र कुमार on 12 June, 2010 00:46;39
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निर्मला रानी, सलीम अख्तर, शेष नारायण जी कहाँ है कृपया इस साजिश में नरेन्द्र मोदी और बीजेपी की भूमिका स्पष्ट करें
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शैलेन्द्र कुमार on 12 June, 2010 01:02;19
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अरे मैं तो उषा चांदना जी को आमंत्रित करना ही भूल गया
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शेष नारायण सिंह on 12 June, 2010 06:40;19
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शासक वर्गों का एक ही चरित्र होता है . उसका नाम कुछ भी हो सकता है .कांगेस या बी जे पी या कोई और पार्टी .भोपाल गैस काण्ड के दिनों में अर्जुन सिंह , राजीव गाँधी वगैरह वही काम करते थे जो बाद में नरेंद्र मोदी जैसे लोगों ने किया . उसके पहले वही काम इंदिरा गाँधी आदि ने किया था . आजकल आम आदमी के खिलाफ आपके नरेंद्र मोदी जी और उनके बन्दे बतौर लठैत सक्रिय हैं, कभी यही काम संजय गांधी किया करते थे. शासक वर्गों का एक चरित्र होता है जो जनविरोधी होता है . हर वक़्त में उसका नाम बदलता रहता है . अगर किसी को मुगालता है कि कांग्रेस और बी जे पी अलग अलग विचारधारा की पार्टियां हैं , तो उस व्यक्ति से कोई सार्थक बहस नहीं की जा सकती . दोनों ही जनविरोधी , सामंतवादी और दलाल समर्थक मानसिकता की हैं और दोनों ही अमरीकी पूंजीवादी साम्राज्यवाद को आगे बढाने का काम कर रही हैं . यही हाल १९८४ में भी था. आज की बी जे पी की औकात उन दिनों कुछ ख़ास नहीं थी लेकिन बी जे पी वाला काम कांग्रेसी कर रहे थे . उस दौर के सामंती सोच के नायक अर्जुन सिंह और राजीव गाँधी के दून स्कूल वाले भाई लोग, सारे जनविरोधी काम का ज़िम्मा संभाले हुये थे. कहीं यह न समझें कि कम्युनिस्ट बड़े अच्छे होते हैं . आजकल वे भी उसी जनविरोधी लाइन पर काम कर रहे हैं . इस देश में आख़िरी क्रांतिकारी आन्दोलन १९७४-७७ में हुआ था. उसके पहले १९२० से १९४६ तक. हालांकि १९२० में कांगेस का नेतृत्व था और १९७४-७७ में आर एस एस भी शामिल था. यह दोनों ही संगठन जनविरोधी हैं लेकिन इतिहास के उस मोड़ पर आम आदमी ने इनको भी क्रांतिकारी परिवर्तन की लड़ाई में खड़ा होने को मजबूर कर दिया था. एक बात और.. जो पत्रकार किसी राजनीतिक पार्टी का जयकारा लगाते हैं वे भी जनविरोधी ताक़तों के साथ होते हैं . अगर आप में से कोई किसी पार्टी को हमेशा सही मानता है तो आत्मालोचन करिए क्योंकि गोस्वामी तुलसी दास ने ही कह दिया है

कीन्हें प्राकृतजन गुन गाना
सिर धुनि गिरा लागि पछिताना
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मुकुल शुक्ला on 12 June, 2010 09:40;15
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कहाँ है पंकज चतुर्वेदी जिनके हीरो देश की महान आत्मा और युगद्रष्टा राजीव गाँधी थे जो की असल में एक बहुत बड़े हत्यारे और विदेशियों के गुलाम निकले | पंकज जी कुछ तो बोलिए अपने हीरो हत्यारे राजीव गाँधी के लिए | हमें तो बहुत पाठ पढ़ाया गया भारतीय संस्कृति का अब मीडिया का क्या जो की राजीव को हत्यारा साबित कर चुकी है | शायद मीडिया भी भारतीय संस्कृति भूल कर सच को सामने लाने का प्रयास कर रही है |
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sushil Gangwar on 12 June, 2010 10:10;14
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15000 मौते ,एक लाख से ज्यादा विकलांग और २५ साल बाद फिर भी मेरा भारत महान । भोपाल गैस कांड की त्रासदी पूरे भोपाल वासिओ ने झेली । रात छोटा बच्चा अपनी माँ के आचल से चिपक कर सोया था । दाल भात खाते समय अपनी तुतलाती आवाज में बोला , माँ कल मै पिंकी के घर जाउगा । वह नहीं जनता था कि उसकी जिन्दगी की आखरी रात होगी । मुजरिम एंडरसन मौत का तीखा जहर यूनियन कार्बाइड देकर देश को दलालों की मदद से देश छोड़ चुका था। उसके सहयोग करने में भोपाळ सरकार थी । अगर यह हादसा अमेरिका में होता तो क्या ऐसा मुजरिम देश छोड़कर भाग सकता था। एंडरसन गिरप्तार किया गया तो उसे गेस्ट हाउस में रखा गया । एक मुजरिम को सलाखों के पीछे होना चाहिए था बह गेस्ट हाउस में आराम की नीद सो रहा था । उसे नीद की गोली भोपाल सरकार ने दी थी । क्या यह लोग मुजरिम नहीं ,जो एक मुजरिम का साथ दे रहे थे । भारत में घोटालो की कहानी अक्सर सामने आती रहती है । भोपाल गैस त्रासदी की आड़ में पैसो का लेनदेन नहीं हुआ होगा ? जरा दिमाग पर जोर डालने वाली बात है ।
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sushil Gangwar on 12 June, 2010 10:49;13
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Hum chor lutere ghotalebaaj hai . hame keval paisa chahiye. Hum desh ko barbaad karna chahte hai Kyo ki hum bharat ke badkismat neta hai. Jise fark nahi padta hai. Eske peeche hamare desh ke ghatiya neta hai. Jo paiso ki baisakhi ke bina nahi chal sakte hai. Unhe mout ke manjar par paisa kamane ki chahat ne jinda rakha hai. 15000 मौते ,एक लाख से ज्यादा विकलांग और २५ साल बाद फिर भी मेरा भारत महान । भोपाल गैस कांड की त्रासदी पूरे भोपाल वासिओ ने झेली । Us रात छोटा बच्चा अपनी माँ के आचल से चिपक कर सोया था । दाल भात खाते समय अपनी तुतलाती आवाज में बोला , माँ कल मै पिंकी के घर जाउगा । वह नहीं जनता था कि उसकी जिन्दगी की आखरी रात होगी । मुजरिम एंडरसन मौत का तीखा जहर यूनियन कार्बाइड देकर देश को दलालों की मदद से देश छोड़ चुका था। उसके सहयोग करने में भोपाळ सरकार थी । अगर यह हादसा अमेरिका में होता तो क्या ऐसा मुजरिम देश छोड़कर भाग सकता था। एंडरसन गिरप्तार किया गया तो उसे गेस्ट हाउस में रखा गया । एक मुजरिम को सलाखों के पीछे होना चाहिए था बह गेस्ट हाउस में आराम की नीद सो रहा था । उसे नीद की गोली भोपाल सरकार ने दी थी । क्या यह लोग मुजरिम नहीं ,जो एक मुजरिम का साथ दे रहे थे । भारत में घोटालो की कहानी अक्सर सामने आती रहती है । भोपाल गैस त्रासदी की आड़ में पैसो का लेनदेन नहीं हुआ होगा ? जरा दिमाग पर जोर डालने वाली बात है
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Pushakr on 12 June, 2010 13:03;39
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पता नहीं कुछ लोगो के लिए (निर्मला रानी, सलीम अख्तर, शेष नारायण जी, उषा चांदना ) के लिए कांग्रेस के सो खूंन माफ़ हैं सरी जिंदगी गुजरात का रोना रोते हैं . कुछ शर्म बाकि है तो राजीव गाँधी की कारगुजारियो पर भी लिखो ! त्व्विटर पर पढ़ा " I hereby propose renaming the Bhopal disaster as Rajiv Gandhi Gas Leak Yojna "
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sanjay modi on 12 June, 2010 14:38;09
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आज राजीव गाँधी जिन्दा नहीं है, वर्ना शायद किसी meeting में उन पे जुत्तों की बोछार होती तो कोई ताज्जुब की बात नहीं होती, कलंकित किया है उसने देश की आत्मा को, न्याय को और उन congression को जिन्होंने इस पार्टी की नीव डाली थी.
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Kirti Mehta on 12 June, 2010 17:34;27
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दिल्ही कोंग्रेस के लोग कहते हे की एंडरसन को भगाने का काम उन्होंने नहीं किया हे! अर्जुन सिंह जी कहते हे की उन्होंने दिल्ही के आदेश अनुसार काम किया हे! सच कभी सामने आने वाला नहीं हे, अर्जुन सिंह जी पहले ही बलि का बकरा बना दिए गए हे और कोंग्रेस से बेदखल हे शायद, वरना उनका भी हाल "तेल के बदले अनाज" का इराक का जो कार्यक्रम था उसमे कुंवर श्री नटवर सिंह जी का हाल हुआ था वैसा ही होता!
और अब भी बहुत नटवर सिंह बाकि है, जो की भोपाल गैस कांड या ऊपर पुष्कर जी ने लिखा है वैसे "राजीव गाँधी गैस लीकेज योजना" के तहत बकरे बनाये जायेंगे! और राज निति में यह जरुरी भी है, वर्ना मेडम जी, प्रधान मंत्री जी और बहुत लोगों को इस्तीफा देनेसे रोकने के लिए भी तो बकरे चाहिए ना? और कुछ बकरे अपनी मर्जी से अपनी गर्दन तलवार के नीच भी रख देंगे!
सब से बड़ी दुःख की बात यह है की जनता की याददास्त बहुत कमजोर होती है, और उसी का फायदा उठाते है यह राज्नितिग्य!
दूसरी अहेम बात यह भी है की भारत की कोर्ट ने जो फेसला २५ साल के बाद सुनाया है भोपाल गैस कांड के केस में, वह अगर उसी वक्त (२५ साल पहले गैस कांड हुआ तब) सुनाया जाता तो क्या यह कोर्ट के फैसले के तहत विदेशी (अमेरिकेन) एंडरसन वगेरह दोषी लोगों को फांसी पर लटका ने की ताकत रखती है हमारी सरकार?
यह सिर्फ एक तमाशा है, जिस में आखिरकार कोई ना कोई बकरा फांसी के फंदे के लिए तैयार कर ही दिया जाये गा!
साथ ही साथ आइ पी एल के गफ्ले में से श्री शरद राव पवार जी को कितनी राहत मिलेगी? और शरद पवार जी को हटाने के लिए असमर्थ यु पी ऐ सरकार को भी कितनी राहत मिल गयी हे? यह सोचा हे किसीने? और सचमुच "इसे कहते हे राजनीति!!!"
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
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सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
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मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
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आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
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सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
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आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
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एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
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