Home | बियाबान में शोर | मीडिया प्रायोजित 'हिन्दू' आतंकवाद

मीडिया प्रायोजित 'हिन्दू' आतंकवाद

image

आजकल मीडिया में आतंकवाद, खासकर ‘हिन्दू आतंक’ चर्चा में है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि ‘हिन्दू आतंक’ मीडिया के कारण ही चर्चा में है। कई बार किसी खास मुद्दे और विषय पर चर्चा करते समय उस मुद्दे पर और उसके माध्यम पर भी चर्चा होने लगती है। कुछ ऐसा ही हुआ जब पिछले हफ्ते आजतक के सहयोगी चैनल ‘हेडलाइन्स टुडे’ ने स्टिंग आॅपरेशन दिखाने का दावा किया।

बाद में इस चैनल के खिलाफ कुछ हजार लोगों ने प्रदर्शन किया। इन प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि इस चैनल ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, कुछ लोगों की आपसी चर्चा या मीटिंग और उस चर्चा में कही गई बातों का हवाला देकर ‘हिन्दू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंक’ का सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की। प्रदर्शन करने वाले इस बात से सख्त नाराज थे कि चैनल के इस ‘दोषारोपण कार्यक्रम’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके पदाधिकारियों के नाम का उल्लेख किया गया। संघ और उसके अधिकारी को आरोपित करने की कोशिश की गई। कुछ प्रदर्शनकारी उस चैनल के कृत्य से इतने उद्वेलित और आवेशित थे कि उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अवहेलना कर दी। उन्होंने वहां के कुछ गमले, कुछ फर्नीचर और कांच के कुछ दरवाजों को तोड़ डाला। हजारों की भीड़ ने जो कुछ किया उसका चयनित अंश ही कुछ मीडिया चैनलों ने दिखाया। जिस चैनल के खिलाफ प्रदर्शन हुआ उस चैनल ने भी प्रदर्शनकारियों को हिंसक, अलोकतांत्रिक और फासिस्ट तो बताया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसमें कितनी जनहानि हुई, कितने लोग हिंसा के शिकार हुए और कितने करोड़ का नुकसान हुआ? अगर प्रदर्शन हिंसक ही था तो आजतक या हेडलाइंस चैनल हजारों की भीड के के हिंसक आक्रमण से़ बर्बाद हो गया होगा। ऐसा कुछ अब तक पता नहीं चला है।

खैर चैनल के स्टिंग आॅपरेशन और उसके बाद हुए घटनाक्रम से कई बातें चर्चा योग्य बन गई। आखिर ये माध्यम क्या चाहते हैं? इनका उद्देश्य क्या है? वे मीडिया के ‘सूचना, शिक्षा और मनारंजन’ की उपादेयता को खतरे में क्यों डाल रहे हैं? दर्शक अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहा है कि उस स्टिंग आॅपरेशन से उसे किसी प्रकार की सूचना मिली, वह शिक्षित हो रहा है या उसका मनोरंजन हो रहा है! क्या उस स्टिंग आॅपरेशन से भगवा आतंक या हिन्दू आतंक का सिद्धांत स्थापित होता है या इस सिद्धांत को स्थापित करने के लिए यह स्टिंग आॅपरेशन किया गया? अव्वल तो वह स्टिंग आॅपरेशन था भी कि नहीं यह भी दर्शकों की समझ में नहीं आ रहा। अपने आॅपरेशन के बारे में बताते हुए स्वयं आॅपरेशनकर्ता ने खुलासा किया कि ‘हिन्दू आतंक’ को स्थापित करने वाला टेप बैठक में उपस्थित एक कथित हिन्दू आतंकी सरगना दयानंद पांडे की लैपटॉप के कैमरे से रिकॉर्ड किया गया था। कैमरा इतना कमजोर था कि न तो चित्र स्पष्ट है और ना ही उसकी आवाज। वह टेप देखकर लगता है कि दयानंद ने चुपके से चोरी-चोरी उस चर्चा को रिकॉर्ड कर लिया था। तो सवाल लाजिमी है कि ये दयानंद किसके इशारे पद, किसके लिए काम कर रहा था? उसने चोरी का माल किसे उपलब्ध कराया! क्या हेडलाइंस टुडे ने दयानंद को उस स्टिंग आॅपरेशन के लिए पहले से ही तय कर लिया था या दयानंद ने बाद में उस चोरी के टेप को बेच दिया? या गिरफ्तारी के बाद दयानंद के लैपटॉप से अश्लील विडियो के साथ यह टेप भी जांच एजेंसियों को मिला और उसे हेडलाइंस ने जुगाड़ लिया और उसे ही अपना स्टिंग आॅपरेशन बता दिया! पूर्व केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने टीआरपी और सरकारी विज्ञापन के बारे में इन दृश्य चैनलों की जद्दोजहद के बारे में जो कुछ बताया उससे तो यही लगता है कि ये स्टिंग आॅपरेशन मीडिया की जरूरत नहीं बल्कि मजबूरी है। ऐसे कार्यक्रमों से चैनल की टीआरपी बढ़ती है, वह चर्चा में आता है और उसके लिए विज्ञापन वसूली आसान हो जाता है।

मीडिया संस्थान को भी पैसा और पूंजी चाहिए। यह माध्यमों के अस्तित्व की पहली जरूरत है। यह पैसा और पूंजी भी इतनी बड़ी हो कि प्रतिस्पर्धा और सूचना साम्राज्यवाद में उसे टिकाए रख सके। पैसा और पूंजी से दर्शक और टीआरपी नहीं मिलते। इसके लिए आक्रामक, सनसनीखेज, आकर्षक, मनमोहक, उत्तेजक कार्यक्रम भी चाहिए होता है। भले ही यह सब ‘सूचना, शिक्षा और मनोरंजन’ की कीमत पर ही क्यों न हो। आज खालिस आतंकवाद, सिमी, माओवाद, भ्रष्टाचार, घोटाला सनसनी या आकर्षण पैदा नहीं कर पाता। इसके लिए कार्यक्रमों, समाचारों के लिए विषयों  आदि का चयन और निर्माण के तौर-तरीकों पर खासा ध्यान दिया जाता है। समाचारों और कार्यक्रमों में एक खास नजरिया न हो तो दर्शक, श्रोता या पाठक आकर्षित नहीं होता। जब तक माध्यमों का लक्ष्य समूह आकर्षित न हो, माध्यम पर विश्वास न करे तब तक उसे भ्रम में भी नहीं डाला जा सकता। दर्शक बटोरने के चक्कर में दृश्य माध्यमों ने अपना हेतु या उद्देश्य भी खो दिया और दर्शकों का भरोसा भी। आज कोई भी समाचार चैनल यह दावा नहीं कर सकता कि उसका कार्यक्रम दर्शकों को ‘सूचना, शिक्षा या मनोरंजन’ दे रहा है। समाचारों से मनोरंजन, हास्य कार्यक्रमों में सूचना और संगीत कार्यक्रमों से शिक्षा ढूंढने की नौबत आ गई है। चैनल बदलते जाओ-‘सूचना, शिक्षा या मनोरंजन’ ढूंढते रह जाओगे।

गौर करें तो मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसी मैनीपुलेशन और टीआरपी-विज्ञापन के खेल में लगा है। वह सूचना, शिक्षा और मनोरंजन को ताक पर रखकर वर्गीय, क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक मुद्दों पद सनसनी और उत्तेजना पैदा करने की लगातार कोशिश में है। ऐसा लग रहा है जैसे इस्लामी आतंकवाद, ईसाई मतान्तरण, माओवादी-नक्सली आतंक, पाकिस्तान-चीन के खतरे, बंगलादेशी घुसपैठ और भ्रष्टाचार आदि भारत में रातोरात खत्म हो गए और उसकी जगह हिन्दू आतंक, भगवा आतंक, भगवाकरण, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के फासीवादी-फासिस्ट व हिंसक रवैये ने ले लिया?

दृश्य माध्यमों के भारतीय दर्शक दुनिया के मुकाबले नये जरूर हैं, लेकिन इनके भीतर भी ‘दृश्य-साक्षरता’ और ‘दृश्य-शिक्षा’ विकसित हो चुकी है। दर्शकों का स्वतंत्र चिंतन कम भले ही हुआ हो, लेकिन उन्होंने अब भी स्वतंत्र रूप से सोचना और विचार करना बंद नहीं किया है। चाहे आजतक हो या हेडलाइंस टुडे या आइबीएन, स्टार न्यूज या कोई और भी चैनल, वह दर्शकों को अपने एकाधिकार-जाल में कैद नहीं कर सकता। अब दर्शक भी किसी एक चैनल या सिर्फ एक माध्यम को अंतिम सत्य मानने के लिए तैयार नहीं है। अब वह घटनाओं को, दृश्यों और उसकी व्याख्या को माध्यमों के परिपेक्ष्य के अलावा राजनैतिक परिपेक्ष्य में समझने की कोशिश करने लगा है। दर्शक अब यह समझने लगा है कि टीवी चैनल या दृश्य माध्यमों का परिपेक्ष्य मैनिपुलेशन और अद्र्धसत्य पर आधारित होता है। वह राजनीतिक हितों की पूर्ति करता है।

मालेगांव, पानीपत समझौता एक्सप्रेस, हैदराबाद की मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ दरगाह का विस्फोट अभी तक अनसुलझी पहेली है। इन आतंकवादी विस्फोट घटनाओं के तुरंत बाद ही केन्द्रीय जांच एजेंसियों ने भारतीय सीमा पार के आतंकी संगठनों को इसके जिले जिम्मेदार बताया था। केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने इस आशय की घोषणा भी की थी। क्या वह जांच और घोषणा झूठी थी? इस मामले में आरोपित लोगों की पृष्ठभूमि देखते हुए मुम्बई कोर्ट ने मकोका को निरस्त कर दिया था। पिछले ही हफ्ते महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने पूर्व के निर्णय को संशोधित करते हुए मकोका का जायज ठहराया है। संभव है कल उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय उलट दे। लेकिन जब तक अंतिम रूप से जांच, न्यायालयीन सुनवाई और न्यायालय का निर्णय नहीं आ जाय किसी को दोषी करार देने, उसके बारे में नकारात्मक और उसे लांछित करने वाली टिप्पणी करने का हक न तो किसी संगठन को है और न ही मीडिया को ही। लेकिन इन सब के बावजूद मीडिया ने आरोपियों को अपराधी सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, आखिर क्यों? क्या इन बम विस्फोटों की जिम्मेदारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या किसी अन्य हिन्दू संगठन ने ली है? गिरफ्तार आरोपी भी इनमें अपनी भूमिका को लगातार नकार रहे हैं। अब यह कहा जा रहा है कि सही में अगर हिन्दुओं के रहनुमा हो, सही में अगर हिन्दुओं के ठेकेदार हो तो बम विस्फोट की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते? मुस्लिम आतंकी संगठन तो आगे बढ़ कर विस्फोटों और हिंसा की जिम्मेदारी लेते हैं, उनमें तो इसकी होड़ लगी रहती है, इन हिन्दू संगठनों को क्या हो गया, जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते! मीडिया चाहती है या तो हिन्दू संगठन आतंकी सिद्ध हो जायें या फिर कायर। संघ ने बार-बार, हर बार कहा है कि हम सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन हैं। हमारा हिंसा में कोई विश्वास नहीं है। अगर कुछ लोग उद्वेग और आक्रामक प्रतिकार के लिए हिंसा के रास्ते पर चले गए हैं या जाने को उत्सुक हैं उन्हें भी संघ वापस रचनात्मकता के मार्ग पर लाना चाहता हैं, लेकिन एक ऐसा हित समूह है जो आरएसएस समेत सभी हिन्दू संगठनों को तालिबान, लश्करे तैयबा जैसे संगठन सिद्ध करने पर उतारू है। मीडिया इस हित समूह का साथी बन बैठा है।

मीडिया से संबंधित अनेक अध्ययनों में यह बात स्वीकार की गई है कि माध्यमों में हिंसा की बार-बार पुस्तुति अंततः हिंसक घटनाओं को मदद पहंचाती है। हिंसा अगर माध्यमो में व्यापक रूप में अभिव्यक्ति पाती है तो इससे शांति या जागरुकता कम, हिंसा और दहशत को ही बल मिलता है। आम लोगों में आतंकवाद या हिंसा से लड़ने का भाव कम होने लगता है या खत्म हो जाता है। इस प्रकार का मीडिया कवरेज संक्रामक रोग की तरह है। तो हेडलाइंस टुडे या इसके जैसे अन्य चैनल आखिर क्या चाहते हैं? इन माध्यमों की मंशा क्या क्या है? क्या देश हिन्दू आतंक के समर्थन या विरोध में उठ खड़ा हो, या कि हिन्दू आतंक के खिलाफ इस्लामी आतंक और आक्रामक हो जाये? क्या माध्यमों के स्टिंग आॅपरेशन से जांच एजेंसियों, न्यायालय या अन्य संगठनों को कोई लाभ हुआ है या हो रहा है? क्या ये माध्यम, ये चैनल हिन्दू आतंक के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में राजनैतिक माहौल बना रहे हैं? क्या संघ या हिन्दू संगठनों को डराने, सबक सिंखाने या उन्हें हतोत्साहित करने के लिए स्टिंग आॅपरेशन और उसके बाद के कार्यक्रम को अंजाम दिया गया था?

संभव है स्टिंग आॅपरेशन करने और कार्यक्रम निर्माण के पूर्व ही पूरी तैयारी कर ली गई हो। शायद हेडलाइंस टुडे और आजतक समूह को स्टिंग आॅपरेशन के बाद प्रदर्शन और प्रदर्शन के उग्र हो जाने का अंदेशा भी हो। फिर प्रदर्शन के बाद प्रदर्शन के तरीके, प्रदर्शनकारी और एक विशेष संगठन पर पूरा कार्यक्रम फोकस कर दिया गया। सवाल यह भी है कि स्टिंग आॅपरेशन सुनियोजित था या मीडिया ने जो किया वह सुनियोजित था? आखिर इन दोनों ‘सुनियोजित’ घटनाओं और उसे देखने से देश की जनता का क्या और कितना भला हुआ? देश की जनता, हेडलाइंस टुडे और दर्शकों ने क्या खोया, क्या पाया इसका हिसाब भी किया जाना चाहिए। क्योंकि मीडिया सिर्फ पैसे, पूंजी और टीआरपी-विज्ञापन के लिए ही नहीं सामाजिक दायित्व के निर्वहन के लिए भी है। आरएसएस या कोई भी राजनीतिक-सामाजिक संगठन देश के प्रति जिम्मेदार और जवाबदेह है, मीडिया भी तो अपनी जिम्मेदारी समझे।

Subscribe to comments feed Comments (10 posted):

RAJ SINH on 23 July, 2010 13:22;35
avatar
बंधू ये राष्ट्रद्रोही तथाकथित ' सेक्युलर ' मीडिया इतना धूर्त है कि उस प्रदर्शन में अपने आदमी घुसा प्रायोजित तोड़फोड़ भी करा सकता है .क्योंकि इतने छोटे नुकसान से करोड़ों गुना ज्यादा फायदा उठाया जा सकता है . ये स्टिंग नहीं ' स्टिंक ' आपरेसन ज्यादा है .इसके पीछे के दुर्गंधित चेहरे पहचानिए ,सब समझ जायेंगे .
जय हिंद !
Thumbs Up Thumbs Down
2
Dr. Pawan kumar on 23 July, 2010 13:34;18
avatar
अनिल जी आपने ठीक लिखा मीडिया अपने अस्द्तितव के लिए ये सब कर रही ह और ये हिन्दुओ को कायर या आंतकवादी साबित करके कांग्रेस के लिए देश में माहोल बना रहे ह आज पैड न्यूज़ की बजे पैड मीडिया हो गयी ह. ये सब इस देश को बर्बाद कर देंगे और कांग्रेस के चमचे इस देश को पकिस्तान और चाइना को बेच देंगे सीबीआई को तो इन्होने कांग्रेस BEAURO OF INVESTIGATION BANA DIA
Thumbs Up Thumbs Down
0
vivek on 23 July, 2010 13:49;46
avatar
ये सब कांग्रेस की चल है R S S को बदनाम करने की और चुनावो में मुसलमानों को वोटो की खेती करने की. कांग्रेस के कारन ही देश का विभाजन हुआ था और ये पार्टी फिर से मुसलमानों का तुस्टीकरण कर रही है अर्थात सापो को दूध पिला रही है. यह सब देश के लिए अत्यधिक घातक है
Thumbs Up Thumbs Down
1
sunny on 23 July, 2010 14:38;32
avatar
आर.एस.एस 85 साल पुराना हिन्दू संगठन है कुछ सेकंड का झूठा क्लिप इस संगठन को बदनाम नही कर सकता [और जो लोग बोलते है की आर.एस.एस मुस्लिम विरोधी है [उनकी जानकारी के लिए बता दू की आर.एस.एस का एक उप संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच भी है और मुस्लिम भी आर.एस.एस से जुडे हुए है [कांग्रेस हमेशा से हे हिन्दू संगठनों के पीछे पड़ी रही है [इस ओची हरकत से संगठन को कोई फर्क नही पड़ता [कोई हिन्दू मुसलमान हो हे नही sakta
Thumbs Up Thumbs Down
0
avatar
"हिन्दू आतंकवाद" कहना सरासर गलत है .और आर एस एस सभी हिन्दुओं का प्रतिनिधि नहीं है . कुछ हिन्दू आर एस एस में हैं , कुछ कांग्रेस में हैं , कुछ कम्युनिस्ट पार्टियों में हैं . पिछले कुछ दिनों में आर एस एस से जुड़े कुछ लोग पकडे गए हैं जिनके बारे में पुलिस वालों का आरोप है कि वे आतंकवादी गतिविधियों में शामिल थे. लेकिन वे पूरे हिन्दू समाज के प्रतिनिधि नहीं हैं..हिन्दू समाज बहुत बड़ा है और आतंकवाद के खिलाफ लामबंद हो रही भारतीय जनता में सबसे ज्यादा संख्या हिन्दुओं की ही है . वह आतंकवाद चाहे पाकिस्तान प्रायोजित हो या आर एस एस प्रायोजित. आखिर प्रज्ञा ठाकुर एंड कंपनी के आतंकवाद को पकड़ा तो हिन्दू अफसर हेमंत करकरे ने ही था.इसलिए गलती से भी "हिन्दू आतंकवाद" या "मुस्लिम आतंकवाद" नहीं कहना चाहिए . आतंकवादी कोई भी हो सकता है ,चाहे हिन्दू हो या मुसलमान . सबसे ज़रूरी यह साफ़ करना है कि आर एस एस बहुत मामूली संख्या के हिन्दुओं का संगठन है , ज्यादातर भारतीय हिन्दू, आर एस एस के खिलाफ हैं .इसलिए वह हिन्दुओं का प्रतिनिधि तो बिलुकल नहीं है.
Thumbs Up Thumbs Down
1
nirbhai on 24 July, 2010 00:04;43
avatar
शेष जी की टिपण्णी ""सबसे ज़रूरी यह साफ़ करना है कि आर एस एस बहुत मामूली संख्या के हिन्दुओं का संगठन है "" शेष जी बताएँगे की वो ""मामूली संख्या """क्या है और अगर वो मामूली संगठन है तो फिर उसका हौवा खड़ा करने की क्या जरुरत है
Thumbs Up Thumbs Down
0
एक पुराना भाजपाई on 24 July, 2010 00:21;25
avatar
आरएसएस वाले भड़ुए हैं वे क्या आतंकवाद फैलाएंगे.
Thumbs Up Thumbs Down
-3
tulsisinghbisht@gmail.com on 24 July, 2010 12:51;48
avatar
हेडलाइंस टुडे और आजतक समूह अब पत्रकारिता नहीं करता। अब तो वो केवल पैसा कमाना चाहता है आैर अपनी टीआरपी बढ़ना चाहता है इसलिए उसने आर एस एस पर लांछन लगाया है। अब समय आ गया है कि आजतक पर भी कार्यवाही करनी चाहिए, क्योंकि वो भी देश की एकता में खलल डालने का काम कर रहा है इसके लिए उसके संपादक को सजा सुनानी चाहिए। कानून सबके लिए है चाहे वो मीिडया हो या आैर कोई। सभी राजनीतिज्ञों का फर्ज बनता है कि अब आजतक पर न तो आए आैर न ही इन्हें पनपने का मौका दिया जाए। जिस देश से रोटी िमलती है इन आजतक वालों ने उसी थाली में छेद करने लगे है। वाह रे आजतक।
Thumbs Up Thumbs Down
2
shailendra kumar on 25 July, 2010 14:04;27
avatar
अनिल जी एक बात नहीं समझ में आती की आरएसएस जैसा विशाल संगठन अपनी बातों को जनता तक पहुचाने के लिए इन दृश्य माध्यमों का इस्तेमाल क्यों नहीं करता जबकि आज युवा आरएसएस के कार्यों को नहीं समझ पा रहे है तो उसकी एक वजह है टीवी पर आरएसएस के खिलाफ दुष्प्रचार अगर आरएसएस अपना एक न्यूज़ चैनल शुरू करता है तो वो अपनी बात लोगो तक पहुचा पायेगा और इसका खर्च बीजेपी की राज्य सरकारें और स्वदेशी एवं राष्ट्रवादी उद्योगपति अपने विज्ञापनों के माध्यम से उठा सकते है क्योंकि केवल पांचजन्य और ओर्गनाइजर द्वारा इस प्रायोजीत दुष्प्रचार का सामना करना संभव नहीं है -
जय हिंद जय भारत
Thumbs Up Thumbs Down
0
Brijesh on 18 August, 2010 13:41;54
avatar
media ko Madani ki giraftari na hona koi mudda nahi dikhta wahin Gujrat mein Shah ki Giraftari ko headlines mein dikhaya jata hai double standard.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 10 | displaying: 1 - 10

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image Anil Saumitra जनसंचार माध्यमों की पहुंच विषय पर शोध करनेवाले अनिल सौमित्र भोपाल में रहते हैं. सामाजिक कार्य के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता और मीडिया एक्टिविस्ट के बतौर कार्यरत. विश्व संवाद केन्द्र में भी सक्रिय.
Rate this article
5.00
More from बियाबान में शोर
Previous
image
सुदर्शन का (कु) दर्शन
जबसे आरएसएस के लोगों की आतंकवादी घटनाओं में संलिप्तता सामने आयी है, तब से आरएसएस के नेता बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में ही शायद संघ के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इसके स्वयंसेवक विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। इसी बौखलाहट में आरएसएस के एक्स चीफ केएस सुदर्शन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और सोनिया गांधी के बारे में ऐसे शब्द बोल दिए, जिन्हें एक विकृत मानसिकता का आदमी ही बोल सकता है।...
image
सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?...
image
रोम रोम में इरोम
कश्मीरी अलगाववादियों की तरह उसने आज तक अपने हाथ में कभी पत्थर नहीं उठाया. हालांकि उसका भी विरोध उसी बात को लेकर है जिसे लेकर कश्मीर में पत्थरबाजों की पूरी फौज सड़कों पर उतार दी गयी. पूर्वोत्तर में सशस्त्र सेना अधिनियम समाप्त किया जाए. इरोम शर्मिला विरोध कर रही है लेकिन उसका हथियार आंदोलन नहीं, आत्मोत्सर्ग है. पिछले दस साल से उसने अन्न त्याग कर रखा है. पुलिस और प्रशासन नाक की नलियों से पौष्टिक पदार्थ पहुंचाकर भले ही उसके शरीर को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन उसे जब भी मौका मिलता है वह राजघाट जाती है और फफककर रोती है. शायद शर्मिला के सत्याग्रह को समझने के लिए देश में दूसरी कोई जगह बची भी नहीं है. ...
image
जिसके दर पर फाइल पहुंची, उसने रात गुजार ली
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो. मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है वह दिल दहला देनेवाली है. जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो वहां एक 31 मंजिला बिल्डिंग अवैध जमीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी. भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था. कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा. ...
image
बहुत बड़ा दुखारी है बुखारी
हाल में ही लखनऊ में एक पत्रकार को पीटकर अहमद बुखारी एक बार फिर चर्चा में आ गये. अहमद बुखारी ने लखनऊ में जिस पत्रकार को पीटा वह न तो किसी बड़े अखबार से जुड़ा था और न ही कोई बड़ा नाम था. लेकिन उस पत्रकार ने सवाल बड़ा किया था जिससे बौखलाकर बुखारी ने उसकी पिटाई कर दी थी. बुखारी का चरित्र यही रहा है कि वे हमेशा छोटे लोगों पर ही हाथ डालते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं....
image
श्रीमान जी, मैं यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया का संपादक और सीईओ हूं!
सेवा में, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली / लखनऊ। श्रीमान, मैं यशवंत सिंह पुत्र श्री लालजी सिंह निवासी ग्राम अलीपुर बनगांवा थाना नंदगंज, जनपद गाजीपुर, उत्तर प्रदेश (हाल पता- ए-1107, जीडी कालोनी, मयूर विहार फेज-3, दिल्ली-96) हूँ. मैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एक वेब मीडिया कंपनी भड़ास4मीडिया में कार्यरत हूं. इस कंपनी के पोर्टल का वेब पता www.bhadas4media.com है. मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर हूं. इससे पहले मैं दैनिक जागरण, अमर उजाला एवं अन्य अखबारों में कार्यरत रहा हूँ. ...
image
कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।...
image
अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...
image
गिलानी साहब, कश्मीर आजाद है!
यह बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि कश्मीरी अवाम जिसे आज़ादी कहता है उसका मातलब भारत में विलय है और गिलानी टाइप पाकिस्तानी पैसे पर पलने वालों को यह हक नहीं है कि वे पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात करें क्योंकि पाकिस्तान ही कश्मीर की आज़ादी का असली दुश्मन है....
image
बुखारी को सबक सिखाना जरूरी
शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
image
अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
image
सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
image
मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
image
आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
image
सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
image
आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
image
एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2