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सच्चाई से मुंह छिपाने का शर्मनाक खेल

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भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश में जहाँ आंकड़ों की बाजीगरी के द्वारा विकास किया जाता है वहां राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन की बात सोचना ही एक क्रूर मजाक करने के समान है, क्योंकि आज भी भारत के 60 फीसदी लोग प्रतिदिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए संघर्ष करने पर भी आधे पेट पानी पीकर सोकर मजबूर हैं। शुतुरमुर्ग की तरह रेत के ढेर में मुँह छिपाने से क्या सच को हम बदल सकते हैं? भारत के क्या हालत हैं, क्या यह दुनिया से छुपा है?

सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रमंडल खेल के लिए 24 फ्लाई ओवर, 3 स्टेडियम, 1,070 किलोमीटर लंबी लेन, 31 फुट ओवर ब्रिज, 450 किलोमीटर लंबी स्ट्रीट में प्रकाश का इंतजाम, 150 किलोमीटर के रेंज में साईनेज की व्यवस्था, 1 पावर प्लांट, 1 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, 1 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट,1 बस पार्किंग, जहाँ तकरीबन 1000 बसों की पार्किंग की जा सके आदि का पूर्ण होना अभी बाकी है। उल्लेखनीय है कि अभी तक किसी भी परियोजना को अंतिम रुप नहीं दिया जा सका है। इसके अलावा एनसीआर में भी सौंर्दयीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं, पर वहाँ भी बदलाव कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। इन भानुमती के पिटारों को नफासत के साथ खोलने लिए शुरु में कुल 63,284 करोड़ रुपयों के खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। इसमें दिल्ली सरकार अपना योगदान 16,580 करोड़ रुपयों की शक्ल में देने वाली थी। पर अब ताजा आकलन के अनुसार सभी परियोजनाओं को पूरा करने में 80,000 करोड़ से भी ज्यादा के खर्च होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

अक्टूबर में राष्ट्रमंडल खेल होना है, पर इसका निर्णय 8 साल पहले लिया गया था। फिर भी अभी तक पुराने स्टेडियमों के मरम्मत का कार्य चल ही रहा है। खेल गाँव के तैयार होने में और वक्त लगने की संभावना है। खेल गाँव से जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम तक सुरंग का निर्माण अभी भी अधर में लटका हुआ है। लगभग 125 किलोमीटर तक टाईल्स लगनी है। दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ से टाईल्स लगायी जा रही है तो दूसरी तरफ से वही टाईल्स उखड़ भी रही है। महँगे निर्माण सामग्रियों का खुलेआम चोरी  हो रहा है। फ्लाई ओवरों के नीचे रहने वाले गरीबों को हटाकर वहाँ पर गमलों को रखने का काम जोर-शोर से चल रहा है। दरअसल सरकार चाहती है कि एक स्टेडियम से दूसरे स्टेडियम जाने के क्रम में खिलाडि़यों को गरीब या झुग्गी-झोपड़ी न दिखायी दें।

आज की तारीख में पूरी दिल्ली खुदी पड़ी है। खुदाई के कारण एमटीएनएल से लेकर दूरसंचार की सेवा उपलब्ध करवाने वाली हर कंपनी और उपभोक्ता टेलीफोन के तारों के कटने के कारण हैरान-परेषान हैं। खुदाई और मलबों की वजह से रोज कोई न कोई दुर्घटना हो रही है। दिल्ली का दिल कहे जाने वाले क्नॉट सर्कस की हालत बदतर है। वह सचमुच का सर्कस बन गया है। ठीक-ठाक बारिश का आना अभी बाकी है। जब बारिश दिल्ली आ जाएगी तो दिल्ली वासियों का क्या हाल होगा, इसकी कल्पना करना भी दुःस्वप्न के समान है ? तुर्रा यह है कि राष्ट्रमंडल खेल को सुचारु रुप से संचालित करने के लिए नये कानून बनाये जा रहे हैं। साथ ही पुराने कानूनों में भी फेर-बदल किया जा रहा है। बाहर से आने वाले आराम से और सस्ती दरों में दिल्ली में रह सकें इसके लिए 1000 रुपयों में पेइंग गेस्ट रखने वालों को कर से मुक्त करने का प्रस्ताव है। नये पाँच सितारा होटल खोलने के लिए लाइसेंस दिये जा रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टल तक को 2-3 महीनों के लिए खाली करवाये जाने की योजना है।

अथितियों को ठहरने के लिए पहले 40,000 कमरों की जरूरत बताई जा रही थी। लेकिन लगता है कि अब नेता व अधिकारी गणित भूल गये हैं। सभी ने वास्तविक कमरों की जरूरत बारे में चुप्पी साध ली है। सचमुच ऐसी स्थिति का निर्माण किसी विडम्बना से कम नहीं है। समाज और इंसानियतपरक खेल आयोजन की बात कह रहा है। उनकी सुर में सुर मिलाते हुए सत्ता पक्ष के पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर भी इस खेल के ढीले पेचों को कसने की जरूरत पर बल दे रहे हैं। इन सभी का मानना है कि राष्ट्रमंडल खेल के लिए जो तैयारी चल रही है, उससे दिल्ली के मात्र 20 फीसदी हिस्से को ही फायदा पहँच रहा है। 80 फीसदी दिल्ली वाले, जहाँ अधिकांशत: गरीब लोग निवास करते हैं आज भी बिजली, पानी, सड़क, सीवर, अस्तपताल, और स्कूल जैसी बुनियादी और आधारभूत कमियों से जुझ रहा है।

दिल्ली और केन्द्र सरकार द्वारा लगातार लिए जा रहे मूर्खता पूर्ण निर्णयों के कारण अब दिल्ली सरकार की फजीहत हो रही है। रही-सही कसर को पूरा कर दिया है हाल ही के दिनों में हुई बारिश और केन्द्रीय सर्तकता आयोग(सीवीसी) द्वारा प्रकाषित की गई हालिया रपट ने। सीवीसी के द्वारा की गई जांच में यह तथ्य उभर कर सामने आया है कि निर्माण कार्यों में भीशण तरीके से अनियमितता बरती गई है साथ ही साथ स्थापित मानकों का भी जमकर उल्लघंन किया गया है।

सीवीसी ने यह भी कहा है कि अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के चलते न सिर्फ तय गुणवत्ता को नकारा ही गया है, वरन् अरबों-खरबों रुपयों की हेराफेरी भी की गई है। वैसे तो घपला करने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, फिर भी दिल्ली विकास प्राधिकरण, लोकनिर्माण विभाग, नगर निगम इतदि का नाम इनमें से प्रमुखता के साथ लिया जा सकता है। सीवीसी की रपट में स्पष्ट रुप से कहा गया है कि परियोजनाओं के लागत को बढा़ने और अतिरिक्त धन मंजूर करवाने के लिए सुनियोजित तरीके से खेल खेला गया है। ठेके देते समय और निविदा को अंतिम रुप देते हुए अनुभव और विषेशज्ञता का तनिक भी ख्याल नहीं रखा गया है। जांच में निर्माण का कार्य ऐसे लोग करते पाए गए हैं, जिनका कभी भी निर्माण के कार्य से दूर-दूर तक का रिष्ता नहीं रहा है।

भ्रष्टाचार के इस खेल में निविदाएं मंजूर करने के बाद भी कंपनियों और ठेकेदारों को अतिरिक्त धन मुहैया करवाया गया। रात की पाली में काम करने के लिए ठेकेदारों को 100 की जगह 200 रुपये दिये गये। बावजूद इसके रात की पाली में कभी भी काम नहीं हो सका। सरकार ने अपना खजाना खोल रखा है। किंतु राष्ट्रमंडल खेल के लिए दिल्ली सितम्बर तक तैयार हो जाएगी इसकी भविष्यवाणी पॉल बाबा भी नहीं कर सकते हैं। यह जरुर है कि जब राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी भारत को मिली थी और दिल्ली की सरकार ने जिस तरह से समय पर सफल आयोजन करवाने का दम भरा था, उसकी आज पूरी तरह से हवा निकल चुकी है। ‘रस्सी जल जाए पर ऐंठन न जाए’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अघ्यक्ष श्री सुरेश कलमाडी ने सिरे से सीवीसी के आरोपों को खारिज कर दिया है। ये वही सुरेश कलमाडी हैं जिन्होंने खेल की तैयारी को मूर्त्त देने की जिम्मेदारी से भी अपना पल्ला झाड़ लिया है।

सीवीसी के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय भी आर्थिक घोटले की जांच करने वाली है। निदेशालय इसके लिए खेल के समापन तक इंतजार करने के मूड में नहीं है। निदेशालय के अनुसार इस महाघोटाले में लंदन की एक विवादित कंपनी ए.एम. फिल्म भी शामिल है। राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के दो सदस्य श्री टी. एस. दरबारी और संजय महेन्द्रू के तार इस कंपनी से जुड़े हुए हैं। इसके बरक्स में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन के लिए दिल्ली सरकार ने परिवहन किराया, संपत्ति कर, रसोई गैस, पीने का पानी इत्यादि तक के दाम बढ़ा चुकी है। ज्ञातव्य है कि इस खेल के लिए अनुसूचित जाति कल्याण कोष के करोडों़ रुपयों तक की बलि दे दी गई है। यह तथ्य सूचना के अधिकार तहत जानकारी मांगने के पश्चात् हमारे समक्ष आई है। 

सवाल यह है कि खेल की तैयारी को लेकर जिस तरह से इंसानों की अनदेखी की गई है, उसकी भरपाई कौन करेगा ? गरीब जनता के खून-पसीने की कमाई का इस तरह से बेजा इस्तेमाल करना सरकार के दोगलेपन का परिचायक है। पर जो सरकार अब तक मंहगाई पर लगाम नहीं लगा पाई, वह दिल्ली के गरीब और मुफलिसी में जीने वाले इंसानों का कुछ भला करेगी, ऐसा सोचना मूर्खता के सिवाए कुछ नहीं होगा।

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pawan kuruklshetra on 02 August, 2010 11:19;12
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common wealth games means
congress wealth games
very good informative article
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pavan_singhai on 03 August, 2010 13:03;28
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Desh ka paisa desh men lage aur logon ko rojgar bhee mile. CWG theek dhang se nipat jayen. Desh ke liye behtar hoga.
Delhi men ho rahe vikas karyon (Flyovers, bridges) ka faayada aage bhee milegaa. Aur ab to british PM ko in khelon ke madhyam se munh tod jawab dene ka mauka hain. Jo bol rahe the ki London aa jao CWG ke liye.
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shailendra kumar on 03 August, 2010 18:28;56
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वन सिंघई जी दिल्ली का तो विकास बहुत हुआ बाकि देश का कब होगा इसी को तो पूँजी का केन्द्रीकरण कहते है और जहाँ तक ब्रिटिश पीएम को जवाब देने की बात है तो कहना चाहिए था की कामनवेल्थ खेलो का नेतृत्व भारत करेगा या राष्ट्रकुल देशों का कोई सदस्य और मशाल ब्रिटेन की महारानी के हाथों से नहीं ली जाएगी
जय हिंद जय भारत
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tulsisinghbisht@gmail.com on 08 August, 2010 15:32;57
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सतीश जी आपका लेख पढ़कर काफी खुशी हुई और काफी दुख भी हुआ। आज सभी दिल्ली वासी चाहते हैं कि किसी तरह यह राष्ट्रमंडल खेल हो जाए ताकि भारत की लाज बच जाए। दूसरी तरफ अभी भी लोगों ने इन राष्ट्रमंडल पर हो रहे खर्चों पर ठीक तरह से गौर नहीं किया है। कारण यह है कि आज हर आम आदमी सोचता है कि एक छोटे मोटे आयोजन पर भी एक दो लाख खर्च हो जाते है फिर यह रकम शायद कम ही होगी। लेकिन अगर वो थोड़ा अपना दिमाग खोल कर इस्तेमाल करें तो शायद उनका मुंह खुले का खुला ही रह जाए। राष्ट्रमंडल खेल पर खर्च हो रहे हैं 80 हजार करोड़ रुपए। और दिल्ली की आबादी है एक करोड़। अगर यही रुपए दिल्ली के नागरिकों को बांट दिए जाते तो प्रत्येक आदमी को 8 करोड़ रुपए मिलते। जब राष्ट्रमंडल खेल हो चुका होगा तब सरकार दिल्ली वासियों से ही ये 80 हजार करोड़ रुपए वसूल करेगी। टैक्स बढ़ाकर, बिजली के दाम बढ़ाकर, परिवहन बढ़ाकर और न जाने कितने टैक्स लगा दें। सचमुच में हमारे नेता भी महान है और हमारी जनता भी महान है जो गलत होने पर चिल्लाती भी नहीं है।
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pandey on 08 August, 2010 15:49;15
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क्या बात लिखी है तुलसी जी आपने। अगर 80 करोड़ रुपए 1 अरब 10 करोड़ लोगों में बांट दी जाती तो शायद गरीबी ही दूर हो जाती। सचमुच में भारत महान और हम महान है।
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amaresh kumar - delhi on 08 August, 2010 16:12;35
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सचमुच में हमारा देश महान है। राष्ट्रमंडल खेलों पर 80 हजार करोड़ रुपए और जनता बिलकुल नहीं चिला रही है। कहां गया मीडिया, न आजतक वालों ने ये बात कही, न स्टार न्यूज ने, न आईबीएन 7 ने। इतने पैसों का अगर किसी सही काम पर लगाया जाता तो शायद भारत की गरीबी सुधर जाती। आखिर कहां गए हमारे मौलिक अधिकार अब किसी व्यक्ति ने क्यों नहीं पूछा सरकार से कि वो 80 हजार करोड़ क्यों खर्च कर रही है। जबकि 50 प्रतिशत जनता आज भी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है। सचमुच मेरा देश महान है और हम भी महान है।
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image सतीश सिंह लंबे समय तक मुख्यधारा की पत्रकारिता करने के सतीश सिंह पिछले एक साल से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाईम्स के लिए काम किया. वर्तमान समय में दिल्ली में कार्यरत.
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