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राख के ढेर में आग भड़काने की कोशिश

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बहुत दिनों की खामोशी के बाद संघ परिवार राख हो चुके राममंदिर मुद्दे में आग लगाने की कोशिश करेगा। अब आरएसएस ने मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी ली है। इसी 16 अगस्त से संघ परिवार पूरे देश में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम शुरु करने का ऐलान किया है। सवाल यह है कि आखिर संघ ने अभी क्यों मंदिर निर्माण का राग अलापना शुरु किया है?

बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्म भूमि विवाद का फैसला सितम्बर के मध्य में आ सकता है। इसी के मद्देनजर संघ परिवार ने अपना कार्यक्रम तय किया है। संघ परिवार एक माह तक इस मुद्दे को गर्माएगा। इस बीच अदालत का जो भी फैसला आएगा, उसकी रोशनी में संघ परिवार अपनी उग्र हरकतें शुरु करेगा। उदाहरण के लिए, मान लीजिए फैसला संघ परिवार के हक में आया तो वह उसको सहज नहीं लेगा, बल्कि उसको 'हिन्दुत्व' की जीत के रुप में प्रचारित करेगा। गली-गली विजयी जलूस निकाले जाएंगे। मुसलमानों को चिढ़ाने और उकसाने वाले नारे लगाए जाएंगे। जबरदस्त आतिश बाजी की जाएगी। इन हरकतों का क्या परिणाम होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यदि फैसला बाबरी मस्जिद के हक में आया तो संघ परिवार उग्र आन्दोलन शुरु करेगा। इसका नतीजा क्या होगा इसका अंदाजा लगाना और भी ज्यादा आसान है। संघ परिवार यही कहता रहा है कि आस्था का फैसला अदालत नहीं कर सकती। उत्तर प्रदेश सरकार को भी साम्प्रदायिक दंगों की आहट लग रही है। इसीलिए उसने सभी जिला प्रशासन को एलर्ट रहने के लिए कहा है।

उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा सिर्फ उग्र हिन्दु साम्प्रदायिक संगठनों से ही नहीं है। यह अंदेशा मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वाले उन राजनैतिक दलों से भी है, जो आजकल मुसलमानों के नाराजगी चलते मुस्लिम समर्थन पाने के लिए छटपटा रहे हैं। हालांकि आरएसएस ने कहा है कि 16 अगस्त से शुरु होने वाले कार्यक्रमों में भाजपा की कोई भूमिका नहीं होगी, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा संघ परिवार का अभिन्न अंग है। कहने के लिए संघ परिवार में कई तरह के संगठन हैं, लेकिन सबका एजेण्डा समान ही है। इसलिए यह महज कहने की ही बात है कि भाजपा कार्यक्रमों से दूर रहेगी। क्योंकि भाजपा को आज भी यही लगता है कि राममंदिर ही उसकी नैया को दोबारा पार लगा सकता है।

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी', इस हालत में नहीं है कि वह कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर सके। उसका वजूद अब लगभग खत्म हो चुका है। शायद इसीलिए 'बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी' के संयोजक और अदालत में बाहैसियत एक वकील मुसलमानों की तरफ से पैरवी कर रहे जफरयाब जिलानी कहते हैं कि 'हम बाबरी मस्जिद पर मामले पर मुकदमा लड़ रहे हैं। हमें आंदोलन चलाने की कोई जरुरत नहीं है'। 'बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी' के संस्थापक चैयरमैन रह चुके जावेद हबीब का भी जफरयाब जिलानी की तरह यही कहना है कि 'विहिप के प्रस्तावित आंदोलन के जवाब में कोई आंदोलन चलाने का हमारा कोई इरादा नहीं है'। जावेद हबीब तो एक कदम आगे जाकर मसले का हल अदालत से बाहर जाकर बातचीत से करने पर जोर देते हैं। इस तरह से कहा जा सकता है कि आज की तारीख में बाबरी मस्जिद के नाम पर आंदोलन करने के लिए मुसलमानों की न तो इच्छा है और न ही उनके पास कोई संगठन है। उत्तर प्रदेश का मुसलमान फिलहाल चुप है। जो भी मुस्लिम नेतृत्व है, वह अदालत का फैसला, चाहे जो भी हो, मानने की बात करता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अब मुसलमान बाबरी मस्जिद से आगे की सोचने लगा है। राममंदिर-बाबरी मस्जिद आन्दोलन के चलते मुसलमानों ने बहुत कुछ खोया है। उन्हें एहसास हो गया है कि किसी भी सूरत में नुकसान उनका ही होता है। धर्मनिरपेक्षता और मुसलमानों का हमदर्द होने का स्वांग रचने वाले राजनैतिक दलों को फायदा होता है। इधर, अब संघ परिवार से मुसलमानों ने डरना छोड़ दिया है। मुसलमानों ने देख लिया है कि भाजपा भी उनके वोटों के लिए ऐसे ही लार टपकाती है, जैसे अन्य राजनैतिक दल टपकाते हैं। हिन्दुओं का एक बहुत बड़ा वर्ग भाजपा के साथ इसलिए लगा था कि वह अपने आप को एक अलग तरह की पार्टी बताती थी। लेकिन उस वर्ग ने भी देखा कि भाजपा के नेता भी उतने ही भ्रष्ट और नाकरा है, जितने अन्य दलों के नेता हैं।

इन हालात में भी यदि संघ परिवार सोचता है कि राममंदिर मुद्दे में फिर से जान डाली जा सकती है तो यही का जाएगा कि वह मूर्खों की जन्न्त में रहते हैं। क्या राख के ढेर में आग लगायी जा सकती है? हालात तो यह कह रहे हैं कि संघ परिवार को को मुंह की खानी पड़ेगी। अभी पिछले पखवाड़े विहिप के फायर ब्रांड कहे जाने वाले प्रवीण भाई तोगड़िया मेरठ आए थे। नब्बे के दशक में प्रवीण भाई तोगड़िया के बयानों से आग लग जाती थी। लेकिन 2010 में मेरठ के लोगों ने उन्हें बुरी तरह से नकार दिया। उनके कार्यक्रम में मुट्ठी भर लोग ही जमा थे। जो वक्ता थे, वो ही श्रोता भी थे। इन हालात में अंदाजा लगाया जा सकता है कि राममंदिर मुद्दे में जान डालना कितना टेढ़ा काम है। लेकिन यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि भले ही संघ परिवार के पास आज की तारीख में मंदिर मुद्दे को गरमाने के लिए जन समर्थन न हो लेकिन संघ परिवार मुद्दे को गर्माने की पूरी कोशिश करेगा। इस कोशिश में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को खतरा तो हो ही सकता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार यदि फूंक-फुंक रख रही है तो वह सही कर रही है। उसे पता है कि इस मुद्दे पर उसके किसी भी गलत फैसले से उसका हश्र भी भाजपा और कांग्रेस जैसा हो सकता है।

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Psudo on 15 August, 2010 14:08;11
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Here comes congress agent with his paid news.
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singrauli.patrika on 15 August, 2010 15:11;23
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इस देश में आज कल कौन क्या कहेगा कुछ पता ही नहीं.ऐसा लगता है की अब बुद्धि जीवी लोग मौन वर्त कर लिए है.तभी तो बिना सर पैर की उलजुलूल बात या फिर अभद्र शब्द का इस्तमाल करना क्या यह विचारो का दिवालियापन नहीं तो क्या है. इतनी भी सहर नहीं है लोगों को के टिप्णी लेख पर करना होता है लेखक पे नहीं.
Saleem अख्तर साहब आपका लेख उम्दा है. आप हांथी की मुस्त चल चले बाकि जो ......... है उनको ....... दीजिये अब आप उनकी मानसिकता तो नहीं बदल सकते.
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prashant mehrishi on 15 August, 2010 21:18;07
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"अब मुसलमान बाबरी मस्जिद से आगे की सोचने लगा है।"
अब उसका लक्ष्य दिल्ली में मुग़ल सलतन की स्थापना है .
सलीम भाई आपके लेख में ये लाइन लिखने से रह गयी थी
पर हमारी भी सुन लो हमारा लक्ष्य भी कंधार से ढाका ,नेपाल से बर्मा तक अखंड भारत की स्थापना है . राम मंदिर का निर्माण तो उसका उद्घाटन कार्यक्रम है.
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vivek on 16 August, 2010 10:02;46
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हिन्दू राष्ट्र की स्थापना, बस यही हो लक्ष्य हमारा
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girish on 17 August, 2010 13:12;14
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हिन्दुस्तान हिन्दुओं का है क्यों फड़फड़ाते रहते हो। जाकर पाकिस्तान में मस्जिद बनाओ व ढहाओ कोई नहीं राकेगा। रही राम मंदिर निर्माण की तो वह तो बनकर ही रहेगा। उसे कोई नहीं रोक सकता।
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sanjay Modi on 17 August, 2010 15:00;09
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मुसलमानों के चिढने की बात , तो वे वैसे ही चिढोक्ले है, जब भारत क्रिकेट जितता है तो भी चिढतें है,
रही प्रवीण तोगड़िया जी के कार्यक्रम की , चलो आपकी बात मन लेतें है वहाँ मुट्ठी भर लोग थे ,जो श्रोता थे वे ही वक्ता लेकिन ये भी बताने का कष्ट करें आप किस हेसियत से थे वहाँ पे वक्ता या श्रोता? या फिर मंदिर बनाने की कसम खाने गए थे और यहाँ आ के ठुक के चांट रहे है.
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Deepak Dudeja on 17 August, 2010 21:19;24
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संघ कुछ करे या न करे - पर आप जैसे तथा कथित बुद्धिजीवी पत्रकार जरूर उसकाने वाले काम करते हैं. मैंने तो कहीं नहीं पढ़ की संघ की ये निति है. आप कहाँ से आनाप शनाप लिखते रहते हैं. पहले तो जो आप लिख रहे है - उसकी प्रमाणिकता कहीं से सिद्ध कर सकते हैं. दूसरे ऐसे चित्र लगा कर आप अपनी बिरादरी को उसकाने वाले काम कर रहे हैं और संघ का होव्वा खड्डा कर रहे हैं. संघ की सोच की सोच बहुत विशाल है - पहले संघ के बारे में समझो - फिर लिखो - और उसके बाद अपनी बिरादरी को समझाओ.
और एक बात और तुम लोग जितना अला-बला बकते और लिखते रहते हो - इतना किसी रचनात्मक कार्य में दिमाग लगाया होता तो तुमारी कौम आज कहाँ होती - कभी सोचा है तुमने ?
जय राम जी की
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manas mishra on 19 August, 2010 13:55;08
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रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद पर फैसला आने ही वाला है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बहुप्रतीक्षित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया है। उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल हैं। चूंकि न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा सितंबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसलिए माना जा रहा है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में फैसला सितंबर महीने के पूर्व कभी भी आ सकता है।

लेकिन इस मसले पर आम मुसलमान और मुस्लिम संगठनों की चुप्पी रहस्यमय दिखती है। क्या यह तूफान के पहले की शांति है! उर्दू मीडिया ने पहले से ही कहना शुरु कर दिया है कि न्यायालय का निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आ सकता है। इस मामले में मुस्लिम संगठनों के दोनों हाथों में लड्डू दिखता है। अगर निर्णय उनके पक्ष में आया तो वे नष्ट हो चुके जर्जर बाबरी मस्जिद ढांचे के स्थान पर भव्य मस्जिद की मांग सरकार के सामने रखेंगे। अगर हाईकोर्ट का निर्णय सुन्नी वक्फ बोर्ड के खिलाफ और हिन्दू पक्षकारों के पक्ष में हुआ तो क्या होगा? न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में सबसे अहम बात तो यह है कि जिन संगठनों या व्यक्तियों की ओर से न्यायालय में पक्ष रखा जा रहा है क्या उन्हें अपने कौम का समर्थन और सहमति प्राप्त है? संभव है न्यायालय के निर्णय के बाद हिन्दुओं या मुसलमानों का कोई संगठन यह कह दे कि हमें निर्णय मंजूर नहीं, क्योंकि यह हमारे श्रद्धा-आस्था या अक़ीदत का मामला है। ये अलग बात है कि मुस्लिम संगठनों ने इसे अपनी इज्जत का मामला बना रखा है।

उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ वर्ष 1996 से इस विवाद की सुनवाई कर रही थी। मुकदमे में चार पक्षकार हैं। हिंदुओं की ओर से तीन पक्षकार हैं जिसमें एक प्रमुख पक्षकार विवादित परिसर में विराजमान रामलला स्वयं हैं। दूसरे श्री गोपाल सिंह विशारद और तीसरा निर्मोही अखाड़ा हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड पक्षकार है। गोपाल सिंह विशारद ने रामलला के एक भक्त के रूप में निर्बाध दर्शन-पूजन की अनुमति के लिए जनवरी,1950 ईस्वी में अपना मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में दायर किया था। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़े ने अपना मुकदमा जिला अदालत में दायर कर अदालत से मांग की थी कि सरकारी रिसीवर हटाकर जन्मभूमि मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था का अधिकार अखाड़े को सौंपा जाय। दिसंबर, 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड अदालत में गया। बोर्ड ने अदालत से मांग की कि विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित किया जाए, वहां से रामलला की मूर्ति और अन्य पूजा सामग्री हटाई जाएं तथा परिसर का कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंपा जाए। जुलाई, 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने एक भक्त के रूप में खुद को रामलला का अभिन्न मित्र घोषित करते हुए न्यायालय के समक्ष रामलला की ओर से वाद दाखिल किया। 40 साल तक मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में लंबित पड़ा रहा। शीघ्र सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय के आदेश से सभी मुकदमे सामुहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सौंपे गए। गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से वर्ष 1993 में एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या विवादित स्थल पर 1528 ईस्वी के पहले कभी कोई हिंदू मंदिर था अथवा नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर की राडार तरंगों से फोटोग्राफी और पुरातात्विक खुदाई भी करवाई। जजों के सेवानिवृत्त होते रहने के कारण उच्च न्यायालय की विशेष पीठ का लगभग 13 बार पुनर्गठन हो चुका है। अंतिम पुनर्गठन 11 जनवरी, 2010 को हुआ।
इसी बीच 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा हिन्दुओं ने जमींदोज कर दिया। अक्तूबर, 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने विवाद के मामले में अंतिम निर्णय की सारी जिम्मेदारी उच्च न्यायालय के हवाले कर दी। तब से उच्च न्यायालय इस मामले की निरंतर सुनवाई कर रहा है। उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन कर संपूर्ण मामला दो हिंदू और एक मुस्लिम जज की पूर्ण पीठ के हवाले कर दिया। शायद इसके पीछे यह सोच रही हो कि मुसलमानों के साथ कोई अन्याय न हो जाये। इसीलिए एक मुसलमान जज भी पीठ में रखा गया।

हालांकि न्यायालय में सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाडा आमने-सामने है, लेकिन अदालत के बाहर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विश्व हिन्दू परिषद् है। इनके अलावा भी हिन्दुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन हैं। आम हिन्दुओं को डर सता रहा है कि अदालत का फैसला खिलाफ आने पर आम मुसलमान किसकी सुनेगा, किसकी नहीं सुनेगा? मुस्लिम जनता हमेशा अपने कट्टर नेतृत्व का कहा ही मानती आई है। देश विभाजन के समय से लेकर शाहबानों, तस्लीमा, घुसपैठ, आतंकवाद समेत ऐसे अनेक मामले हैं जिन पर उदार मुस्लिम नेतृत्व को मुंह की खानी पड़ी है। आम मुसलमान कट्टर और रूढ़िवादी नेतृत्व की ही सुनता आया है। बंगलादेशी घुसपैठियों का मामला हो या आतंकी और आतंकी संगठनों को पनाह देने का मामला, आम मुसलमानों का सहयोग हमेशा इन्हें ही मिलता आया है। आज भले ही बाबरी एक्शन कमेटी के संयोजक और अदालत में मुसलमानों की तरफ से पैरवी कर रहे जफरयाब जिलानी और बाबरी एक्शन कमेटी के संस्थापक रह चुके जावेद हबीब न्यायालय का फैसला मानने और किसी आंदोलन के इरादे को नकार रहे हों, लेकिन क्या पता कल ‘हिन्दुओ के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन’’ का फतवा या आह्वान आ जाये। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की हालत भले ही खराब हो चुकी हो, लेकिन इतनी भी खराब नहीं कि देश का मुसलमान उनकी बातों की अनदेखी कर दे। मुसलमानों के लिए देश के भीतर और बाहर संघर्ष करने वालों की कमी नहीं है। कांग्रेस समेत देश की सभी राजनैतिक पार्टियां, सरकारें, न्यायालय, मीडिया और अ-हिन्दू भारतीय सब मुसलमानों के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हैं। मुसलमान अपनी मर्जी से न्यायालय का और न्यायाधीश का चयन कर सकता है। उसके लिए गुजरात का मामला दिल्ली में और मध्यप्रदेश का मामला मुम्बई में ले जाया जा सकता है। जो काम हिन्दुओं के लिए पूरा संघ परिवार नहीं कर सकता वह अकेले जफरयाब जिलानी कर सकते हैं, बखूबी कर रहे हैं। अगर मामला मुसलमानों से जुड़ा हो तो न्यायालय की सुनता कौन है? शाहबानों और अफजल का उदाहरण सबके सामने है। एक में कांग्रेस ने कानून बना कर सर्वोच्च न्यायालय को आइना दिखाया तो दूसरे में सजा का क्रियान्वयन ही रोक दिया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर-फारुख अब्दुल्ला ने खुलेआम कहा कि अफजल को फांसी देने से कश्मीर के हालात बिगड़ सकते हैं।

पुराने अनुभव तो यही बताते हैं कि आम मुसलमान अपने कट्टरपंथी नेतृत्व के साथ पहले न्यायालय पर दबाव बनायेंगे, फैसला अनुकूल आया तो ठीक वर्ना कह देंगे- फैसला कूड़ेदान के लायक है। केन्द्र सरकार समेत अनेक आयोग उस कचरे को सुरक्षित करने के लिए कूड़ेदान की तलाश में लग जायेंगे। न्यायालय का फैसला न मानने के लिए ‘वोट की राजनीति’ का दबाव तो मुसलमानों के लिए हमेशा से उपलब्ध है ही। देश के प्रधानमंत्री भी ‘देश के संसाधनों’ पर मुसलमानों का पहला हक देकर उनके वोट पर अपना पहला और आखिरी हक अख्तियार करना चाहते हैं। उन्हें अपराध या आतंक के लिए आरोपी मत बनाइये, क्योंकि वे मुसलमान हैं। उन्हें न्यायालय में अपराधी या आतंकी सिद्ध करने का प्रयास मत कीजिये क्योंकि वे ‘‘बेचारे मुसलमान’‘ हैं। सजा सुनाये जाने के बाद भी उसे लागू मत कीजिये क्योंकि उससे अल्पसंख्यकों में तनाव पैदा होने, मानवाधिकार को चोट पहुंचने का खतरा है। अब हिन्दू बेचारा क्या करे। कब तक वह तथाकथित सेक्यूलर संविधान और न्याय व्यवस्था पर भरोसा करे। शायद इसीलिए विहिप ‘जनता के न्यायालय’ में जाने को विवश हुई हो। विहिप या संघ परिवार का प्रयास देश की जनता-जर्नादन को जागृत करने का है। ताकि इससे देश की राजनैतिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव पड़े। संभव है ‘‘बहुसंख्यक दबाव की राजनीति’’ का कुछ असर हो जाये और राम मंदिर विवाद का समाधान जनता के सदन ‘संसद’ में हो जाये।

सच बात तो यह है कि न तो हिन्दुओं को चिढ़ाने या अनावश्यक जिद्द करने से मामला सुलझने वाला है और न ही मुसलमानों के तुष्टीकरण से। विभिन्न राजनैतिक दल अगर ईमानदार प्रयास करें तो अयोध्या विवाद का राजनैतिक हल निकल सकता है। इस मामले में मुसलमानों के उदार नेतृत्व को आगे आना ही होगा। पहल उन्हें ही करनी है। समस्या निराकरण नुख्सा उन्ही के पास है। अमन पसंद और विकास की चाहत रखने वाले राजनैतिक दल आगे आएं तो समस्या का निराकरण और भ्री आसान हो जायेगा। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कर कांग्रेस और उनके नेताओं न एक नजीर पेश की है। अयोध्या समझदारी का दूसरा उदाहरण हो सकता है। कांग्रेस पहल करे, भाजपा और अन्य दल मदद करें- राम मंदिर की भव्यता का प्रश्न संसद से हल करें। यह शांति और भाइचारे का तकाजा भी है।
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Amitabh tripathi on 19 August, 2010 13:58;12
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सलीम साहब अपनी सेक्युलर विचारधारा के प्रति जिस प्रकार समर्पित हैं उसके लिये उनकी सराहना की जानी चाहिये। लेकिन दुख यह है कि उनका सेक्युलरिज्म सदैव एकाँगी होता है और वे संघ और हिन्दुत्व के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त ही नहीं हो पाते। इस लेख में सलीम साहब का एक दर्द तो स्पष्ट तौर पर परिलक्षित है कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बाबरी मस्जिद बनाने के लिये आन्दोलन कर पाने की स्थिति में नहीं है।

यह एक गम्भीर और चिंताजनक सोच है क्योंकि शायद सलीम साहब भूल गये कि इसी एक्शन कमेटी के लोगों नें और मुस्लिम नेतृत्व ने सदैव यह कहा कि यदि यह प्रमाणित हो जाये कि राममन्दिर का ध्वंस कर उसी ध्वंसावशेष से मस्जिद का निर्माण हुआ है तो वे इस स्थान पर अपना दावा छोड देंगे। 90 के दशक में मुस्लिम नेतृत्व के ऐसे बयान रिकार्ड में हैं परन्तु सलीम साहब को यह नहीं दिखता। आज जब पिछले अनेक वर्षों से पुरातात्विक खोज और कार्बन डेटिंग सहित रिमोट सेंसिंग खोज से यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि तथाकथित बाबरी मस्जिद राममन्दिर के ध्वंसावशेष पर बनी थी तो किस मुँह से बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी उस स्थान पर दावा करेगी।
मुझे तो सलीम साहब की सोच पर आश्चर्य हो रहा है कि ये अपने लेख में मुस्लिम समुदाय को हठधर्मिता के लिये उकसाने का प्रयास कर रहे हैं। आज मान भी लें कि निर्णय मुस्लिम समुदाय के पक्ष में आ जाये तो भी किसमें साहस है कि वहाँ से रामलला को हटाकर उस स्थान पर बाबरी मस्जिद का निर्माण कर दे।

अरे सलीम साहब यह तो सीधे सीधे श्री राम से जुडा स्थान है और आप उस पर उनका ही मन्दिर सहन नहीं कर पा रहे हैं जबकि अमेरिका में तो उस स्थान के आस पास मस्जिद बनाने का विरोध हो रहा है जहाँ इस्लामी आतंकवादियों ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर 11 सितम्बर 2001 को ढहा दिया था।

वैसे भी आपका लेख भावना के आवेग में लिखा गया है जिसमें अनेक तथ्यो की अवहेलना की गयी है जैसे कि 90 के दशक में प्रवीण तोगडिया तो केवल गुजरात तक सीमित थे राष्ट्रीय क्षितिज पर तो वे 2000 के बाद और विशेष रूप से 2002 में गोधरा में कारसेवकों को जीवित जलाये जाने के बाद हुए घटनाक्रम में सामने आये थे। वैसे यह एक संयोग ही है कि सितम्बर माह में ही गुजरात के न्यायालय में यह निर्णय भी आ रहा है कि गोधरा में साबरमती ट्रेन में आग किसने लगायी थी?
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image सलीम अख्तर देश के अनेक समाचार-पत्रों में सामायिक मुद्दों पर लेख आदि लिखने के साथ ही टेक्निकल पुस्तकों का स्वतन्त्र लेखन। लेखन या पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया। लिखने की शुरुआत 1984 से दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 'हिन्दुस्तान' और 'नवभारत टाइम्स' में सम्पादक के नाम पत्रों से की थी। हौसला बढ़ा तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए लिखना शुरु किया। मशहूर पत्रकार स्व0 उदयन शर्मा मेरे आइडियल रहे हैं। इसलिए कलम का इस्तेमाल हमेशा ही फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ और दबे-कुचले लोगों के पक्ष में चली है। जनवादी लेखक संघ से भी जुड़ा हुआ हूँ। संपर्क: saleem_iect@yahoo.co.in
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श्रीमान जी, मैं यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया का संपादक और सीईओ हूं!
सेवा में, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली / लखनऊ। श्रीमान, मैं यशवंत सिंह पुत्र श्री लालजी सिंह निवासी ग्राम अलीपुर बनगांवा थाना नंदगंज, जनपद गाजीपुर, उत्तर प्रदेश (हाल पता- ए-1107, जीडी कालोनी, मयूर विहार फेज-3, दिल्ली-96) हूँ. मैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एक वेब मीडिया कंपनी भड़ास4मीडिया में कार्यरत हूं. इस कंपनी के पोर्टल का वेब पता www.bhadas4media.com है. मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर हूं. इससे पहले मैं दैनिक जागरण, अमर उजाला एवं अन्य अखबारों में कार्यरत रहा हूँ. ...
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कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।...
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अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...
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गिलानी साहब, कश्मीर आजाद है!
यह बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि कश्मीरी अवाम जिसे आज़ादी कहता है उसका मातलब भारत में विलय है और गिलानी टाइप पाकिस्तानी पैसे पर पलने वालों को यह हक नहीं है कि वे पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात करें क्योंकि पाकिस्तान ही कश्मीर की आज़ादी का असली दुश्मन है....
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बुखारी को सबक सिखाना जरूरी
शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
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अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
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सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
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मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
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आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
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सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
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आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
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एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
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