छलावा है नक्सलियों से बातचीत का दावा
कुछ अजीब सी बात है। नक्सलियों और सरकार के बीच वार्ता के लिए वातावरण बनाने में लगे हुए स्वामी अग्निवेश ने 12 अगस्त को मीडिया के सामने स्पष्ट कर दिया कि माओवादी वार्ता के लिए राजी हैं। लेकिन उनकी एक महत्वपूर्ण शर्त है नक्सली नेता चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की घटना की न्यायिक जांच कराई जाए। अभी कुछ दिन पूर्व 16 अगस्त को नई दिल्ली में एक नितांत व्यक्तिगत बातचीत में उन्होंने खुलासा किया कि वार्ता से संबंधित माओवादियों का एजेंडा केन्द्र सरकार को सौंप दिया गया है। अब निर्णय सरकार को लेना है किंतु वह ढिलाई बरत रही है।
इधर 15 अगस्त के दिन लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलियों को वार्ता के लिए आगे आने आह्वान किया। इसकी पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी अपने संबोधन में यह बात दुहराई। संवैधानिक सत्ता के इन दो शीर्ष व्यक्तियों के साथ-साथ केन्द्र सरकार के अन्य नुमाइंदे पिछले कई महीनों से नक्सलियों को वार्ता के लिए आगे आने का आह्वान कर रहे हैं और अब जब दूसरा पक्ष राजी है तो देर किस बात की है? सवाल उठता है कि क्या वार्ता की पेशकश का केवल दिखावा किया जा रहा है? जब माओवादी वार्ता के लिए तैयार हैं और अपने सम्पर्क के जरिए इसकी विधिवत सूचना सरकार को दे रहे हैं तब प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय पर्व पर अपील करने की क्या जरूरत? वे (माओवादी) तो तैयार हैं? क्या आप तैयार नहीं? या आपको जानकारी ही नहीं? आखिर क्या बात है? इसके दो ही मतलब निकाले जा सकते हैं। एक तो ये कि वार्ता की पेशकश केवल हवाई है। यानी माओवादियों की सहमति संबंधी कोई लिखित सूचना स्वामी अग्निवेश की ओर से केन्द्र को अभी तक नहीं मिली है। इसलिए सरकार अभी भी नक्सलियों से अपील का राग अलाप रही है। दूसरा अर्थ है क्या यह माना जाए कि स्वामी अग्निवेश का देश के मीडिया के सामने दिया गया बयान झूठा है? लेकिन पूरा देश जानता है कि इन दिनों सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश केन्द्र सरकार की रजामंदी से माओवादियों को वार्ता की टेबिल पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। खुद गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने इसे स्वीकार किया है। लिहाजा जब वे सरकार को इत्तिला कर चुके हैं तो इसमें संशय की गुंजाइश कहां है?
दरअसल वार्ता के प्रति केन्द्र सरकार का रुख उत्साहजनक नजर नहीं आ रहा है। जैसी गर्मजोशी अपीलों में हुआ करती है वैसी लक्ष्य तक पहुंचने के बाद दिखाई नहीं दे रही है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री स्तर तक भी इसे नजरअंदाज किया जा रहा है? क्या इसके पीछे कोई रहस्य है? कुछ छुपाने की कोशिशें हैं? क्या सरकार यह सोच रही है कि नक्सलियों के खिलाफ जारी साझा रणनीति से समस्या पर काबू पा लिया जाएगा। यानी प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय नक्सलियों को मार गिराने के साथ-साथ युद्धस्तर पर विकास कार्य प्रारंभ कर दिए जाएंगे। वायुसेना को नक्सलियों पर गोली चलाने की छूट देने के क्या आपरेशन ग्रीन हंट में यही मायने हैं? क्या नक्सली नेताओं के मारे जाने या उनकी धरपकड़ से सरकार इतनी उत्साहित है कि बातचीत को अब जरूरी नहीं समझती? वार्ता के प्रति सरकार के ठंडेपन के ये कुछ कारण हो सकते हैं। बहरहाल वार्ता की एक प्रमुख शर्त के रूप में माओवादी चाह रहे हैं नक्सली नेता चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मौत के मामले की न्यायिक जांच की जाए। केन्द्र सरकार में रेल मंत्री ममता बेनर्जी, सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, विख्यात लेखिका महाश्वेता देवी, पर्यावरणविद मेधा पाटकर तथा कई अन्य प्रतिष्ठित मानवाधिकारवादी भी इस बात की मांग कर चुके हैं। लेकिन गृहमंत्री चिदम्बरम इसके लिए राजी नहीं। वे लोकसभा में यहां तक कह चुके हैं कि किस कानून में लिखा है कि मुठभेड़ की न्यायिक जांच होनी चाहिए। वैचारिक असहमति का यह बड़ा मुद्दा है। इस सवाल पर यदि केन्द्र का रुख अड़ियल रहा तो जाहिर है वार्ता की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी। लेकिन यदि माओवादी झुक गए और उन्होंने उच्चस्तरीय जांच की मांग पर जोर नहीं दिया तो बात अलग है। लेकिन इसकी संभावना नगण्य है।
बहरहाल गृहमंत्री का इनकार तो अपनी जगह है पर देश की जनता को घटना की वास्तविकता को जानने का हक है। हर आम आदमी के मन में यह शंका स्वाभाविक है कि नागपुर में आजाद एवं पत्रकार हेमचंद्र पांडे की गिरफ्तारी के बाद आदिलाबाद के जंगलों में उनकी मौत कैसे हो गयी? वह पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ के सच को जानना चाहती है। इसका एक ही तरीका है- सामान्य जांच तो अपनी जगह है, घटना की निष्पक्ष जांच के लिए जरूरी है उच्चस्तरीय जांच बैठायी जाए। वैसे भी देश के सामने पुलिस का जो चेहरा है और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ जैसी घटनाएं घटी हैं, वह पुलिस को दमनकारी साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। जाहिर सी बात है कि कानून एवं व्यवस्था के नाम पर किसी को भी मार गिराने की छूट चाहे वह नक्सली ही क्यों न हो, पुलिस को नहीं दी जा सकती। चूंकि आजाद की मौत भी ऐसे ही संदेह को पैदा कर रही है इसलिए माओवादियों की यह शर्त बेमानी तो हरगिज नहीं है। फिर जब स्वयं केन्द्र सरकार की एक मंत्री एवं देश के प्रखर बुद्धिजीवी इसका समर्थन करें तो इस मांग का महत्व और भी बढ़ जाता है। वैसे भी निष्पक्ष और पारदर्शिता की पैरोकार सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह जनभावनाओं को समझते हुए कार्रवाई करें।
माओवादियों की ओर से स्वामी अग्निवेश ने जो एजेंडा सरकार को भेजा है जिसका वे दावा करते हैं, उसका अभी कोई खुलासा नहीं हुआ है। पर पिछले तीन चार महीनों में सरकार और माओवादियों के जो विचार मीडिया में आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए अन्य शर्तों के संबंध में अनुमान लगाया जा सकता है। पहले गृहमंत्री पी.चिदम्बरम की बात करें। उन्होंने दर्जनों बार यह बात दुहराई कि 72 घंटे के युद्धविराम के लिए सरकार राजी है। इस बीच नक्सली कोई हिंसक वारदात नहीं करेंगे और न ही पुलिस कोई कार्रवाई करेगी। इससे पहले उन्होंने कहा था नक्सलियों को हथियार डालने होंगे, और उन्हें नि:शर्त बातचीत के लिए तैयार रहना होगा। फिर उन्होंने कहा, वार्ता के पूर्व हथियार नहीं डालेंगे तो भी चलेगा लेकिन वार्ता के पूर्व हिंसक वारदात नहीं होनी चाहिए। गृहमंत्री के विचारों के जवाब में माओवादियों ने कहा कि सरकार पहले आपरेशन ग्रीन हंट बंद करें। इस पर गृहमंत्री का बयान था- कोई आपरेशन ग्रीन हंट नहीं चलाया जा रहा। पुलिस सिर्फ कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी निभा रही है। दोनों पक्षों के बीच हवा में तैरते संवादों की इसी तरह की धरपकड ज़ारी रही। एक मौके पर नक्सलियों की ओर से कहा गया कि सरकार जेलों में बंद प्रमुख नक्सली नेताओं नारायण सान्याल, कोबाड गांधी आदि को रिहा करें क्योंकि सरकार के साथ बातचीत यही लोग करेंगे। नक्सलियों की इस पेशकश पर भी सरकार अभी मौन है। संभव है कि इस पर विचार चल रहा हो क्योंकि यह तय है माओवादियों के पक्ष को सबलता के साथ ये ही लोग रख पाएंगे। माओवादी विचारधारा के असली नुमाइंदे तो ये ही हैं।
माओवादियों के कथित एजेंडे में और भी शर्तें हो सकती हैं। ये शर्तें ऐसी नहीं हैं कि उन्हें सिरे से खारिज कर दिया जाए। उदाहरण के तौर पर नक्सली आदिवासियों के शोषण-चक्र का खात्मा चाहते हैं और चाहते हैं नक्सल प्रभावित इलाकों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं। यह एजेंडा तो सरकार का भी है अत: इनकार का सवाल कहां? अलबत्ता विकास के तयशुदा फार्मूले पर मतभेद संभव है। लेकिन इसे भी बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है। बातचीत यदि होती है तो ऐसे और भी प्रसंग आ सकते हैं लेकिन सबसे यादा अहम सवाल है बातचीत के लिए जो वातावरण बना है और बहुत मुश्किल से बना है, उसकी मौत नहीं होनी चाहिए। क्योंकि यह तय है देश की भीषणतम समस्याओं में शुमार नक्सली समस्या का खात्मा बंदूक की गोली से नहीं, बातचीत से ही संभव है। अब शायद कट्टर माओवादियों को भी समझ में आ रहा है कि जो वे चाहते हैं और जिसके लिए उन्होंने बंदूकें उठायी हैं, उसे पाने के लिए सत्ता के खिलाफ लंबी और सफल लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। इसीलिए वे लचीले हो गए हैं। अब बारी सरकार की है। उसे ही यह तय करना कि अपने पाले में फेंकी गेंद को वह किस तरह लौटाए। यह अच्छी बात है कि स्वामी अग्निवेश एवं वयोवृद्ध महाश्वेता देवी मध्यस्थता करने तैयार हैं। अत: वातावरण अनुकूल दिख रहा है पर गृह सचिव केजी पिल्लई जैसे उच्च प्रशासनिक अफसरों को यह समझना होगा कि वे ऐसा कुछ न करें जिससे वार्ता के प्रयासों को चोट पहुंचे। मुम्बई ब्लास्ट और रिचर्ड हेडली के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया से विवादित हुए पिल्लई के इस कथन से दुविधापूर्ण एवं संशय की स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसमें उन्होंने कहा था स्वामी अग्निवेश को नक्सलियों को वार्ता करने के लिए राजी करने का काम सौंपा नहीं गया है। यानी वे सरकार की ओर से तैनात नहीं किए गए हैं। उनके इस बयान पर स्वामी की संक्षिप्त टिप्पणी थी- 'केन्द्र सरकार से फटकारे जा चुके पिल्लई सहानुभूति के पात्र हैं।'
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