नक्सली हमारे अपने लेकिन तनी रहेंगी बंदूकें
बस्तर के सीने पर फिर रक्त की लकीरें खींच गयीं। कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर के गांव भुस्की में सीमा सुरक्षा बल एवं नक्सलियों के बीच 7 घंटे तक चली जंग में 5 जवान शहीद हो गए। इसके पूर्व अंतिम बड़ी वारदात 29 जून 2010 में हुई थी। नारायणपुर जिले के धौड़ाई शिविर पर हुए हमले में सीआरपीएफ के 26 जवान मारे गए थे। धौड़ाई और भुस्की तथा अन्य छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ दें तो बस्तर के दो महीने लगभग शांति से गुजरे हैं।
हालांकि नक्सली बंदूक की भाषा में रुक-रुककर बोलते रहे। इस बीच माओवादियों ने अपने प्रमुख नेता आजाद के मारे जाने के बाद विरोध में दंडकारण्य बंद रखा एवं शहीदी सप्ताह मनाया। इसे अर्द्धसैनिक बलों एवं पुलिस की तैयारी कहें या दबाव, नक्सलियों को कहीं भी बड़ी वारदात करने का मौका नहीं मिला। इसे आपरेशन ग्रीन हंट की कामयाबी कह सकते हैं किंतु इस आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता कि नक्सली बड़े हमले की फिराक में हैं और उनकी खामोशी दरअसल रणनीतिक हैं, तैयारियों का हिस्सा हैं। छत्तीसगढ़ राज्य की पुलिस इस सूचना से सचेत एवं चौकन्नी भी हैं कि नक्सली शहरों की ओर रुख कर रहे हैं तथा उनके निशाने पर केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम, उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह सहित अनेक विशिष्ट नेता हैं। इस खुफिया सूचना के बावजूद इस बात की संभावना फिलहाल बहुत ही कम है कि नक्सली वनग्रामों को छोड़कर शहरों की ओर रुख करेंगे। इसी वर्ष सांसद बलीराम कश्यप के बेटे की हत्या की घटना को छोड़कर पिछले दशक में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिसमें माओवादियों ने शहर में घुसकर वारदात की हो। वे सिर्फ जंगलों में ही सुरक्षित हैं जहां उनका अघोषित कब्जा है। इसलिए रणभूमि जंगल ही है जहां पुलिस और उनके बीच चूहे-बिल्ली का खेल शुरू है। दोनों एक-दूसरे की ताक में हैं। सर्चिंग आपरेशन के जरिए अर्द्धसैन्य बल की संयुक्त कमान का लक्ष्य नक्सलियों को उनके सुरक्षित ठिकानों से बाहर निकालना है जबकि नक्सली इस गुंताडे में हैं कि ताड़मेटला घटना की तरह जवानों के एक बड़े दल को जाल में फांसा जाए। चूंकि गुपचुप खेल जारी है इसलिए बस्तर की फिजां में सन्नाटा पसरा हुआ है। यद्यपि यह सन्नाटा छोटी-मोटी घटनाओं से टूटता रहा है लेकिन बड़ी वारदात की आशंकाएं बनी हुई हैं।
बहरहाल इन दिनों केन्द्र सरकार के कप्तान एवं अन्य नुमाइंदों की ओर से जो बयान आ रहे हैं, उन पर गौर फर्माएं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नईदिल्ली में 26 अगस्त से राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में नक्सलियों को यह कहकर एक तरह से गले लगा लिया कि वे हमारे अपने हैं और यदि हथियार डालकर शांति के लिए आगे आते हैं तो हम वार्ता के लिए तैयार हैं। आगे वे कहते हैं- ''नक्सल प्रभावित इलाकों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देकर माओवादियों को काबू में किया जा सकता है।'' उनके इस कथन का यह अर्थ भी ध्वनित होता है कि शांति समझौता हुआ तो ठीक, वरना कोई बात नहीं। अब गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के बयान पर विचार करें। 25-26 अगस्त के इसी सम्मेलन में उन्होंने कहा कि माओवादियों की ओर से वार्ता के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रस्ताव नहीं मिला है। यदि वे तैयार हैं तो हम भी तैयार हैं। लगता है गृहमंत्री ने प्रमुख नक्सली नेता किशनजी के उस बयान को देखा-पढ़ा नहीं जो देश के मीडिया के जरिए छोटे-बड़े सभी अखबारों एवं न्यूज चैनलों पर आया था जिसमें उन्होंने केन्द्र सरकार की वार्ता की पेशकश स्वीकार की थी तथा कुछ शर्तों के साथ मध्यस्थता के लिए नाम भी सुझाए थे जिनमें अरुंधति राय, ममता बेनर्जी के भी नाम थे। संभव है माओवादी नेताओं की ओर से कोई लिखित प्रस्ताव न आया हो लेकिन जब केन्द्र सरकार और स्वयं चिदंबरम शांति वार्ता के प्रति भारी उत्सुकता अरसे से दिखा रहे हैं तो सवाल है किशनजी के मौखिक प्रस्ताव के परिप्रेक्ष्य में सरकार की ओर से क्या पहल हुई? उसने बयान को गंभीरता से लिया अथवा नहीं? क्या स्वामी अग्निवेश जो कथित तौर पर मध्यस्थ की भूमिका में हैं, को आगे की जिम्मेदारी सौंपी गयी? पुलिस प्रमुखों के सम्मेलन के ठीक पूर्व एक उत्साहवर्धक खबर यह भी रही कि रेलमंत्री ममता बेनर्जी नक्सलियों से वार्ता की स्थिति में मध्यस्थता के लिए राजी हो गईं। 9 अगस्त को लालगढ़ की उनकी सभा में नक्सली नेताओं की मौजूदगी से इस बात पर कोई संदेह नहीं रह गया है कि उनका माओवादियों से सीधा सम्पर्क है, संवाद है। लिहाजा किशनजी के प्रस्ताव के बाद वह केन्द्र सरकार एवं माओवादियों के बीच पुल का काम अधिक सहजता से कर सकती है। क्या चिदम्बरम उनके इस बयान से भी वाकिफ नहीं हैं? इन सारी स्थितियों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि केन्द्र सरकार केवल अपनी शर्तों पर बातचीत चाहती है क्योंकि उसे बंदूक पर भी भरोसा है। ऐसी स्थिति में बंदूक से बात करने वाले नक्सली भी नि:शर्त वार्ता के लिए कैसे राजी हो सकते हैं?
वार्ता की न्यूनतम संभावना के पीछे कुछ ठोस कारण गिनाए जा सकते हैं। सबसे प्रमुख आजाद की मौत का मामला है। नागपुर में पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद यह माओवादी नेता आदिलाबाद के जंगल में मारा गया। पुलिस ने इसे मुठभेड़ में मौत बताया। नक्सलियों की मांग है इस घटना की न्यायिक जांच करायी जाए। उनका यह विश्वास है कि राजकुमार उर्फ आजाद की पुलिस ने हत्या की। रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने भी लालगढ़ की अपनी जनसभा में इसे हत्या कहा तथा न्यायिक जांच की मांग का समर्थन किया। स्वामी अग्निवेश, अरुंधति राय एवं अन्य मानवाधिकारवादियों ने भी न्यायिक जांच की मांग दोहराई। लेकिन गृहमंत्री को यह मंजूर नहीं है। इसलिए वार्ता की संभावना इस सवाल पर दम तोड़ती नजर आती है क्योंकि तय है नक्सली इस मांग को छोडने तैयार नहीं होंगे। इस पेंच के बाद नक्सलियों की दूसरी बड़ी शर्त आपरेशन ग्रीन हंट को बंद करने की है। 25 अगस्त को प्रधानमंत्री के साथ अपनी मुलाकात में ममता बेनर्जी ने भी पुलिस आपरेशन स्थगित रखने की वकालत की। वार्ता की स्थिति में दोनों पक्षों की ओर से एक निश्चित समय तक संघर्ष विराम, वार्ता के लिए जेलों में बंद प्रमुख नक्सली नेताओं की रिहाई जैसी बातें काफी प्रचारित हो चुकी हैं लेकिन सरकार की ओर से अभी तक इस बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। केवल यही बात दुहरायी जा रही है कि हिंसा छोड़ने पर ही सरकार वार्ता करेगी लेकिन माओवादी नहीं मान रहे हैं। इन स्थितियों में सच क्या है, बखूबी महसूस किया जा सकता है। दरअसल दोनों एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। इसलिए जब एक पक्ष आगे बढ़ता है तो दूसरा खुले मन से उसका स्वागत नहीं करता। यानी दोनों ओर से आंखमिचौली का खेल चल रहा है। सरकार खेल-खेल में माओवादियों को नि:शक्त करना चाहती है जबकि माओवादी शक्ति बटोरना चाहते हैं ताकि आतंक व दहशत का माहौल जो काफी कुछ ठंडा पड़ गया है, फिर कायम हो सके। चूंकि देश में शांति व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी केन्द्र एवं राय सरकारों की है तो पहल भी उन्हें ही करनी होगी। पहले स्वामी अग्निवेश वातावरण बनाने के लिए गृहमंत्री की ओर से अधिकृत थे तो अब स्वयं ममता बेनर्जी हाजिर हैं। यानी सरकार की एक जिम्मेदार मंत्री सरकार की इच्छा (?) पर मध्यस्थता के लिए तैयार है तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। प्रधानमंत्री का यह कहना कि नक्सली हमारे अपने हैं, घाव पर आत्मीयता का मरहम लगाने जैसा है बशर्ते सरकार और अधिक पारदर्शिता का परिचय दे। आजाद की मौत की घटना की न्यायिक जांच के आदेश देकर सरकार ऐसा कर सकती है। अब इस मामले को टाला इसलिए नहीं जाना चाहिए क्योंकि 'आऊटलुक' जैसी पत्रिका ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि आजाद को बहुत नजदीक से गोली मारी गयी, लगभग शरीर से सटाकर। वार्ता की संभावनाएं इसी मुद्दे पर टिकी हुई हैं। यह नहीं तो वार्ता नहीं।
नक्सल समस्या के सन्दर्भ में प्रधानमंत्री प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक तरक्की की बात करते हैं। नक्सल समस्या के खात्मे के लिए केन्द्र की रणनीति यही है- सैन्य सुरक्षा के बीच आर्थिक विकास। यानी विकास कार्यों के जरिए एक-एक करके नक्सलियों के किले भेदना। उसे उम्मीद है ताकत और विकास के जरिए तीन-चार साल के भीतर नक्सल प्रभावित रायों खासकर छत्तीसगढ़ में अमन-चैन कायम हो जाएगा। सरकार इस खुशफहमी में रह सकती है लेकिन यह तथ्य सर्वविदित है कि आदिवासियों के बेइंतिहा शोषण की वजह से ही माओवाद पनपा है। अब आदिवासियों की नई-पुरानी पीढ़ी उन बन्दूकधारियों के साथ है जो शोषकों से उनकी रक्षा करते हैं। विकास के जरिए समस्या को खत्म करने का संकल्प लेने वाली सरकारें क्या इस बात की गारंटी दे सकती है कि नक्सलियों को खदेड़ने अथवा उन्हें खत्म करने के बाद गरीब किसानों, आदिवासियों के शोषण का चक्र थम जाएगा? बस्तर में ही विकास के नाम पर अब तक अरबों रुपए खर्च हो गए। कितना हुआ विकास? किसका हुआ विकास? दरअसल सफेदपोश शोषकों की वजह से ही माओवाद हिंसक हुआ है। अधोसंरचना के विकास से ही यदि शोषण थम जाए तो यह काम सरकारों को फटाफट कर लेना चाहिए। लेकिन वे असलियत से वाकिफ है। आदिवासी जनता भी नक्सलवाद का सच जानती है। इसलिए नक्सल प्रभावित वनांचलों में बन्दूकों के तने रहने की संभावना यादा दिखाई पड़ती है।
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Digg
जैन साब को गुसा क्यों आता है ?
ये तो सब को मालूम है|
मालूम है ना
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