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एक अनोखे किसान आंदोलन का अंत

image आंदोलन के दौरान जमा हुए किसान

मुख्यमंत्री मायावती ने अपने कैबिनेट में एक निर्णय लिया. निर्णय यह कि प्रदेश में यमुना एक्सप्रेसवे के खिलाफ जो किसान आंदोलन कर रहे हैं उनको दो तरह के प्रस्ताव दिये जाएं. अगर वे इन दोनों तरह के प्रस्ताव को नहीं मानते हैं तो अपनी जमीन अपने पास रख सकते हैं. मायावती मंत्रिमण्डल के इस निर्णय का के बाद जेपी समूह ने टप्पल में प्रस्तावित अपनी नगर परियोजना को समाप्त करने की घोषणा कर दी. अब जो किसान नेता मुआवजा बढ़ाने का आंदोलन चला रहे थे वही समाजसेवी बनकर टप्पल में प्रस्तावित शहर न जाने देने के लिए मुख्यमंत्री को ज्ञापन लिख रहे हैं.

यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे टप्पल में जब प्रस्तावित जमीन का अधिग्रहण शुरू हुआ तो जमीन के ऊपर से कई किसान नेता पैदा हो गये जो जमीन अधिग्रहण का नहीं बल्कि जमीन को मिलनेवाले मुआवजे का विरोध कर रहे थे. उनकी मांग थी कि सरकार उनको ग्रेटर नोएडा के तर्ज पर मुआवजा दे. चालीस दिनों तक आंदोलन चला. हाईवे जाम रहा. जाने गईं. किसान घायल हुए. आंदोलन उग्र से उग्रतर होता गया. देश विदेश की मीडिया ने इस किसान आंदोलन को जमीन अधिग्रहण के सरकारी तरीकों पर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट किया. लेखकों ने दुहाई दी कि यह देश के किसानों के साथ सरासर अन्याय है. किसान आंदोलनों का इतिहास पलटा गया. टप्पल से लेकर दिल्ली तक उन्होंने किसान आंदोलन को जमकर धार दी. लेकिन एक चूक हो गयी. लोग यह नहीं समझ पाये कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ये किसान पास्को संयत्र के लिए किये जा रहे जमीन अधिग्रहण की तर्ज पर जमीन न देने का अभियान नहीं चला रहे थे बल्कि सिर्फ ज्यादा से ज्यादा पैसा ऐंठने की जुगत लगा रहे थे. उनकी इस जुगत को मायावती ने बहुत ही कायदे से छिन्न भिन्न कर दिया.

एक तरफ कैबिनेट ने निर्णय लिया कि जो किसान एक बार में ही अपनी जमीन देना चाहते हैं उन्हें दो लाख चालीस हजार रूपये एकड़ की दर से मुआवजा दिया जाएगा. जो ऐसा नहीं करना चाहते वे अपनी जमीन तैंतीस साल की लीज पर दे सकते हैं. ऐसे किसानों को कहा गया कि उन्हें बीस हजार रूपया सालाना दिया जाएगा जिसमें प्रति वर्ष छह सौ रूपये की बढ़ोत्तरी की जाएगी. किसानों के सामने कंपनी के प्रस्तावित प्रोजेक्ट में शेयरधारिता लेने का प्रस्ताव भी रखा गया. निजी कंपनियों द्वारा जो जमीन अधिग्रहण किया जाता है उनके रिकार्ड देखें तो मायावती प्रशासन द्वारा किसानों के सामने रखा गया प्रस्ताव बहुत अच्छा नहीं था. हरियाणा में तीन साल पहले जब रिलायंस ने अपने एसईजेड के लिए जमीन अधिग्रहण शुरू किया था तब वहां भी ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी. छुटपुट किसान आंदोलन भी चले थे. लेकिन जब हमने झज्जर में किसान सभाओं में जाकर हकीकत देखी तो होश उड़ गये. किसानों में सिर्फ एक बूढ़े बाबा यह तर्क दे रहे थे कि हमें किसी कीमत पर जमीन नहीं देनी है. अन्यथा तथाकथित किसान नेता एक करोड़ एकड़ का रोना ही रो रहे थे. रिलायंस ने वहां पंद्रह से बीस लाख रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन अधिग्रहण किया है.

लेकिन मायावती प्रशासन ने जैसे ही जमीन अधिग्रहण के लिए यह प्रस्ताव पारित किया, किसानों ने आंदोलन को और उग्र करने की घोषणा कर दी. स्वाभाविक था किसान नेताओं को इतने कमतर प्रस्ताव की उम्मीद नहीं थी. लेकिन मायावती प्रशासन की ओर से एक और चाल चली गयी. प्रशासन ने स्थानीय डीएम के हवाले से खबर प्रसारित करवाई कि जो किसान अपनी जमीन वापस लेना चाहते हैं वे चेक जमा कर दें और जमीन के कागजात वापस लेकर जाएं. परियोजना रद्द कर दी गयी है. बस इसी घोषणा के बाद परिस्थितियां नाटकीय रूप से रूपांतरित हो गयीं. जो किसान नेता आंदोलन चला रहे थे उन्हीं में कुछ समाजसेवी हो गये और मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने चले गये कि किसी भी सूरत में परियोजना रद्द नहीं होनी चाहिए. किसान आंदोलन भी समाप्त कर दिया गया. हालांकि यह शुद्ध रूप से मायावती प्रशासन की चालाकी है. अभी भी टाउनशिप समाप्त करने की घोषणा मौखिक ही की गयी है. लिखित रूप से कुछ नहीं कहा गया है. इसलिए मायावती प्रशासन और जेपी समूह दोनों ही इस बात को शायद जानते समझते हैं किसान उन्हीं के द्वारा तय की गयी कीमतों पर आखिरकार अपनी जमीन बेंच देंगे. मायावती और जेपी समूह को यह आत्मविश्वास क्यों है? शायद किसानों का लालच वह एकमात्र कारण है जो आखिरकार मायावती प्रशासन के सामने झुकने के लिए उन्हें मजबूर कर देगा. उत्तर भारत में ऐसे अनेकों किसान आंदोलन उभरते हैं और पसर जाते हैं. उनका कोई मतलब इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि वे जमीन की नहीं बल्कि पैसे की लालच में किसान आंदोलन खड़ा करते हैं. पैसा मिलते ही किसान आंदोलन हवा हो जाता है.

भले ही मायावती प्रशासन अभी टप्पल के किसानों के साथ शह मात का खेल खेल रहा हो लेकिन लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में श्रेय लेने का एक अलग ही खेल चल पड़ा है. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी राहुल राग गा रही हैं और "किसानों के इस आंदोलन" को राहुल गांधी का बोनस बताकर अपना राजनीतिक बैंक बैलेंश बढ़ाने में जुट गयी हैं. कांग्रेस के बाद मुलायम सिंह यादव भी कह रहे हैं कि सबसे पहले उनकी पार्टी ने ही लोकसभा में यह सवाल उठाया था. भाजपा भला क्यों पीछे रहे? भाजपा के "किसान नेता" राजनाथ सिंह अपने प्रदेश अध्यक्ष के साथ आगरा जानेवाले हैं. वे दावा कर रहे हैं कि भाजपा किसानों को उसका पूरा हक दिलाकर रहेगी. खुद मायावती की पार्टी भी पीछे नहीं है. प्रशासन अगर प्रसासनिक छल का प्रयोग कर रहा है तो पार्टी कह रही है बहन मायावती जी किसानों का ख्याल रखती हैं. मायावती भी कह रही हैं कि उनकी सरकार हमेशा से किसानों की हितैषी रही है इसलिए उन्होंने ऐसा प्रस्ताव किया है जिससे प्रदेश के किसानों को इसका फायदा पहुंचेगा.

अब इस पूरे प्रकरण को किस तरह से देखना चाहिए? क्या आगरा-अलीगढ़ के किसानों की जीत हुई है या फिर मायावती प्रशासन जीता है? अभी तक के जो हालात हैं उससे इतना साफ नजर आ रहा है कि मायावती प्रशासन भी निश्चिंत हो गया कि उनके ही प्रस्ताव पर अगर जमीन नहीं मिलती है तो टाउनशिप को थोड़ा आगे पीछे कर दिया जाएगा. ऐसी स्थिति में किसानों का और अधिक नुकसान होगा और स्थानीय किसान पूरा जोर लगाकर इस टाउनशिप को बचाने की कोशिश करेंगे. किसान नेताओं ने जमीन के अधिकतम मुआवजे का जो दांव चला था वह कामयाब नहीं हुआ इसलिए अब वे समझौता करने की कोशिश करेंगे. पूरी पूरी संभावना इस बात की है कि टप्पल में उसी दर पर जमीन अधिग्रहण पूरा हो जिनका निर्धारण मायावती प्रशासन ने किया है. अगर किसान भी एक शहर ही बसाना चाहते हैं तो फिर राजनीतिक दल श्रेय किस बात का ले रहे हैं? वे एक ऐसे किसान आंदोलन को सफल बताकर उसका श्रेय ले रहे हैं जो अपने होने को ही कोस रहा है. मुलायम, अजीत, रीता बहुगुणा, राहुल और राजनाथ सिंह की राजनीतिक गोटिंयां कहां फिट होंगी? किसानों ने राज्य सरकार को यह ज्ञापन तो भेज ही दिया है कि किसी भी सूरत में टप्पल परियोजना रद्द नहीं होनी चाहिए. अब इसे क्या कहेंगे? किसानों के नाम पर चला राजनीतिक ड्रामा? किसान आंदोलन के नाम पर होनेवाली मुआवजे की राजनीति? किसान आंदोलन? या फिर कुछ नहीं. लोग चाहे जैसे इस आंदोलन को रेखांकित करें, तय करना सचमुच मुश्किल है कि यह एक किसान आंदोलन का सुखान्त है या फिर दुखांत?

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सुरेश चिपलूनकर on 07 September, 2010 12:25;42
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एकदम सटीक विश्लेषण किया है आपने…
किसानों के नाम पर जितनी और जैसी सब्सिडी और राजनीति इस देश में चलती है और किसान किस तरह से सरकारी योजनाओं को चूस रहे हैं इसका व्यापक अध्ययन किया जाना चाहिए…। मुफ़्त बिजली, मुफ़्त पानी, उर्वरकों पर सबसिडी, खासी दरों पर भूमि अधिग्रहण, फ़सल बरबाद हुई तो मुआवज़ा, नही हुई तो सरकारी खरीद होना जरूरी है, कोई इनकम टैक्स नहीं… और यह सब नहीं मिला तो धरना-प्रदर्शन-आंदोलन होगा…। सिर्फ़ नौकरीपेशा वर्ग और छोटे-मझोले व्यापारियों का ही मरण है… बाकी तो सब मौज में लगते हैं…।

एक सवाल और है कि करोड़ों रुपया भूमि अधिग्रहण में बाँटने वाली योजनाएं विदर्भ के किसानों को कब मिलेंगी?
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prashant mehrishi on 08 September, 2010 00:18;32
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बिलकुल नासमझ जैसा लेख और उस पर nasamjhi का कमेन्ट .
kisan की गरीबी का मजाक mat udao . भारत का किसान mar raha hai . पैसा lekar जमीं छोड़ रहा है आन्दोलन केवल पैसे ke liye tha इस जमीं से तो ये थक चुके hain . कब तक पूरी दुनिया का पेट भरने का ठेका लेंगे . ठीक पैसा mil jaye तो शहर मैं जाकर dukan कर लेंगे ,किसी ब्रांडेड कंपनी की showroom khol कर air condition मैं baith कर moj लेंगे .
ऐसी फ्री बिजली पानी भगवन tumhe भी दे जो एक दिन छोड़ कर अगले दिन ४ घंटे आती हो और बिल १५०० प्रति महिना .अगर फाल्ट हो जाये तो ५-६ दिन भी लग सकते हैं.
fertilizer subsidy किसान को नहीं मिलती फैक्ट्री को मिलती है जो बिना fertilizer बनाए ले लेते है और किसान को fertilizer मिलता नहीं है लाइन लगती है .
फसल अगर पुरे जिले की barbad हो(जो अमूमन hota नहीं ) tab मुआवजा मिलता है ५०० rupye .सरकारी खरीद hamare फायदे के लिए नहीं होती vote bank को 2-3 rupey kilo dene के लिए sarkar karti है . jab income hi नहीं है तो tax kis पर lagega .
2-3 दिन किसी किसान के ghar reh कर aao tab pata chalega aate dal का bhav .
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prashant mehrishi on 08 September, 2010 00:18;32
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बिलकुल नासमझ जैसा लेख और उस पर nasamjhi का कमेन्ट .
kisan की गरीबी का मजाक mat udao . भारत का किसान mar raha hai . पैसा lekar जमीं छोड़ रहा है आन्दोलन केवल पैसे ke liye tha इस जमीं से तो ये थक चुके hain . कब तक पूरी दुनिया का पेट भरने का ठेका लेंगे . ठीक पैसा mil jaye तो शहर मैं जाकर dukan कर लेंगे ,किसी ब्रांडेड कंपनी की showroom khol कर air condition मैं baith कर moj लेंगे .
ऐसी फ्री बिजली पानी भगवन tumhe भी दे जो एक दिन छोड़ कर अगले दिन ४ घंटे आती हो और बिल १५०० प्रति महिना .अगर फाल्ट हो जाये तो ५-६ दिन भी लग सकते हैं.
fertilizer subsidy किसान को नहीं मिलती फैक्ट्री को मिलती है जो बिना fertilizer बनाए ले लेते है और किसान को fertilizer मिलता नहीं है लाइन लगती है .
फसल अगर पुरे जिले की barbad हो(जो अमूमन hota नहीं ) tab मुआवजा मिलता है ५०० rupye .सरकारी खरीद hamare फायदे के लिए नहीं होती vote bank को 2-3 rupey kilo dene के लिए sarkar karti है . jab income hi नहीं है तो tax kis पर lagega .
2-3 दिन किसी किसान के ghar reh कर aao tab pata chalega aate dal का bhav .
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on 08 September, 2010 00:37;45
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प्रशांत जी आप जिस किसान की बात कर रहे हैं, यह आंदोलन उन किसानों का नहीं था. जिन किसानों का आप जिक्र कर रहे हैं उनकी स्थिति सचमुच वैसी ही है लेकिन जिन किसानों को मायावती प्रशासन ने धत्ता बताया है वे तो अपनी माटी बेचने के लिए तैयार बैठे थे, बस पैसा थोड़ा अधिक चाहिए था. हमने यही भेद स्पष्ट करने की कोशिश भी की है.

फिर भी लेखक आपको नासमझ लगा तो उसे आगे भी लिखने पढ़ने का अभयदान दीजिए.
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prashant mehrishi on 08 September, 2010 16:46;45
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ये बात सबको पता hai ki आन्दोलन पैसे बढ़ाने को था फिर इसे इस रूप मैं क्यों पेश करते hain की किसान जमीं नहीं देना चाहता ,देना चाहता है पर पैसा पूरा लेकर .. अब देना क्यों चाहता है ये पुरे देश को स्पष्ट रूप से पता है किसान की जमीं ek karood की भी हो तो उसकी वो इज्ज़त नहीं है जो एक लाख का सामान लेकर किराये की दुकान मैं बैठा है .
अन्यथा सुरेश chiplunkar जी ऐसे अभद्र शब्दों का प्रयोग नहीं करते . कहते हैं जमीनी पत्रकार हैं पर आसमान मैं उड़ने का प्रयास कर रहे haih .
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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