तिरुपति की संपत्ति पर तिरछी नजर
तिरुपति में विष्णु अवतार भगवान बालाजी का देवस्थानम एक बार फिर चर्चा है. खबर आयी है कि तिरुपति मंदिर का प्रबंधन करनेवाली संस्था तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने अपने पास मौजूद आभूषणों का बीमा कराने का फैसला किया है लेकिन मंदिर प्रशासन के पास जितना आभूषण मौजूद है उसका बीमा करने की हैसियत ही किसी एक भारतीय बीमा कंपनी में नहीं है. आभूषणों की कीमत का जो आंकलन किया है उसका मूल्य लगभग 52 हजार करोड़ रूपये है. अब इतनी बड़ी रकम की गारंटी भगवान बालाजी भले ही रखें किसी एक भारतीय बीमा कंपनी के वश में हो भी नहीं सकता.
तिरुपति मंदिर अपनी परिसंपत्तियों के लिए पहली बार चर्चा में नहीं आया है. यदा कदा तिरुपति मंदिर में चढ़नेवाले स्वर्णाभूषणों के चढ़ावे या फिर वहां मौजूद संपत्तियों को लेकर देशभर में चर्चा होती है. यह चर्चा अकारण भी नहीं है. तिरुपति मंदिर में व्यवस्थाओं का संचालन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट करता है जिसके तहत करीब एक दर्जन ट्रस्ट, एक विश्वविद्यालय और आधा दर्जन के करीब कल्याणकारी योजनाएं संचालित होती हैं. भगवान बालाजी मंदिर में मौजूद परिसपत्तियों के कारण चित्तूर जिले के तिरुपति में स्थित यह मंदिर परिसर दुिनया का सर्वाधिक व्यस्त हिन्दू मंदिर परिसर है जहां प्रतिदिन औसतन एक से दो लाख दर्शनार्थी भगवान बालाजी का दर्शन करते हैं. कहा जाता है कि तिरुपति स्थित वेंकटेश्वर कलियुग में प्रकट साक्षात विष्णु है. वैष्णव धर्म की मान्यताओं के अनुसार अगर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और संहारकर्ता भगवान शंकर हैं तो पालनकर्ता भगवान विष्णु हैं. वैष्णव धर्म की इस मान्यता के अनुसार साक्षात विष्णु सप्तगिरी पहाड़ियों पर विराजमान हैं. ऐसे में कोई भी वैष्णव श्रद्धावान होकर अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहेगा क्योंकि हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार जो ईश्वर का है उसे ईश्वर को ही अर्पित करने की भावना के साथ उसका उपभोग करना चाहिए.
भगवान विष्णु की साक्षात उपस्थिति वाला यह मंदिर परिसर तेईस सौ साल पहले तब अस्तित्व में आया जब खुद भगवान विष्णु ने वर्तमान कांचीपुरम् के राजा थोंडाइमान को स्वप्न दिया और सप्त पहाड़ियों पर मंदिर स्थापना करने का निर्देश दिया. विभिन्न कन्नड़, तेलुगु और तमिल साहित्य में जो साक्ष्य उपलब्ध होते हैं वे भी मंदिर को करीब तेइस सौ से पच्चीस सौ साल पुराना बताते हैं. करीब ढाई हजार साल पुराने मंदिर में वैष्णव दर्शनार्थी अपना सर्वस्व अर्पित करने की मानसिकता से वहां जाते रहे हैं और अपनी कमाई का एक हिस्सा भगवान वेंकटेश्वर को अर्पित करते रहे हैं. 1932 से पहले तक तिरुमाला मंदिर परिसर मंदिर के पुजारियों की सेवा में ही संचालित होता था लेकिन 1932 में मद्रास सरकार द्वारा एक सात सदस्यीय समिति का गठन करके मंदिर परिसर का कामकाज इस समिति का सौंप दिया गया जिसका प्रधान एक कमिश्नर रैंक के अधिकारी को नियुक्त किया गया. आजादी मिलने के बाद 1952 में उक्त समिति को भंग करके एक प्रशानिक बोर्ड का गठन कर दिया और मंदिर से जुड़ी गतिविधियों का संचालन इसी बोर्ड को सौंप दिया गया. मंदिर के लिए गठित यही बोर्ड मंदिर प्रशासन की सभी व्यवस्थाओं को संभालता है और चढ़ावों का हिसाब रखता था. लेकिन जब आंध्र प्रदेश का गठन किया गया तो एक बार फिर 1969 में इस बोर्ड का पुनर्गठन किया गया और बोर्ड के सदस्यों की संख्या पांच से बढ़ाकर ग्यारह कर दी गयी. इन सात सदस्यों में तीन सदस्य राज्य की विधासभा से निर्धारित किये जाते हैं, एक महिला और एक दलित प्रतिनिधि को भी इस बोर्ड में रखना अनिवार्य है. 1969 में जिस जिस बोर्ड का गठन किया गया उसमें एक ईओ और एक डिपुटी ईवो रखने की व्यवस्था की जो कि प्रशासनिक अधिकारी होता है. दस साल बाद तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड में एक महत्वपूर्ण संशोधन करके ईओ को वित्तीय अधिकारों से भी लैस कर दिया गया. अब ईओ (कार्यकारी अधिकारी) को चीफ एकाउण्ट आफिसर और वित्तीय सलाहकार की शक्तियां भी प्रदान कर दी गयीं. निश्चित रूप से राज्य सरकार की चिंता सीधे तौर पर देवस्थानम के बोर्ड पर नियंत्रण रखना रहा होगा जो किसी अधिकारी के जरिए ही ठीक तरीके से रखा जा सकता था.
कांग्रेस सेकुलर हिन्दू फोरम के आरोप
- 1531 से 1521 के दौरान विजयनगर साम्राज्य के सम्राट कृष्णदेवराय ने जो आभूषण भगवान बालाजी को समर्पित किये गये थे वे गायब हैं.
- इस दौरान उन्होंने चार यात्राएं की और इन चार यात्राओं के दौरान नवरत्न जड़ित सोने के दो मुकुट, सोने का मंदिर, 25 चांदी की आरती प्लेट, मोतियों की मालाएं, 423 हीरे, अन्य जवाहरात और 17 विदूरिया अर्पित किये. फोरम का आरोप है कि ये सारे आभूषण देवस्थानम के रिकार्ड से गायब हैं जबकि हम्पी कन्नड़ा विश्वविद्यालय के रिकार्ड में कृष्णदेवराय के रिकार्ड में इन रत्नों, आभूषणों का वर्णन मिलता है.
- मंदिर की दीवारों पर ऐसे 45 शिलालेख हैं जिनमें कृष्णदेवराय द्वारा दिये गये आभूषणों का वर्णन है लेकिन अब वे आभूषण भगवान बालाजी के खजाने में नहीं है.
- 2008 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि देवस्थानम के पास मौजूद आभूषणों की सूची तैयार करके अदालत को सौंपी जाए लेकिन अभी तक ऐसा नहीं किया गया है.
- वाईएस राजशेखर रेड्डी की शह पर उनके विश्वस्त करुणाकर रेड्डी ने देवस्थानम में वित्तीय भ्रष्टाचार किया और वाईएसआर ने देवस्थानम् के गहनों को पोप को सौंप दिया.
भले ही राज्य सरकार अपने नुमाइंदों के जरिए देवस्थानम की मिल्कियत पर नजर रखती हो लेकिन अभी तक तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड के ऊपर वित्तीय अनियमितता के शायद ही कोई आरोप लगे हों लेकिन 2004 में वाईएस राजशेखर रेड्डी के प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस तरह की अफवाहों को बल मिलना शुरू हो गया कि मुख्यमंत्री तिरुमाला तिरुपति देवस्थान की संपत्तियों को क्षति पहुंचा रहे हैं. आरोप लगानेवालों में भाजपा और अन्य दलों के नेताओं के साथ साथ कांग्रेस के नेता भी शामिल हैं. अन्य दलों के नेता तो आरोप लगाने तक ही सीमित रहे कांग्रेस के इन नेताओं ने भगवान बालाजी के घर में कथित तौर लूट के लिए न सिर्फ वाई एस राजशेखर रेड्डी पर आरोप लगाये बल्कि एक कांग्रेस सेकुलर हिन्दू फोरम का भी गठन किया जो वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद भी इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहा है. 27 अगस्त 2010 को पी चिदम्बरम को लिखी चिट्ठी में कांग्रेस सेकुलर फोरम ने मांग की है कि "पांच सौ साल पहले विजयनगर साम्राज्य के सम्राट कृष्णदेवराय ने भगवान तिरुपति को जो भेंट चढ़ाई थी, वह लापता है. इसी तरह की और वित्तीय गड़बड़ियां देवस्थान बोर्ड में की गयी है जिसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए." कांग्रेस सेकुलर फोरम के महासचिव के रवि कुमार वाइ एस राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में हुई गड़बड़ियों पर अपनी ही सरकार पर हल्ला बोलते हुए बताते हैं कि उस समय देवस्थानम ट्रस्ट में कुछ ऐसे लोगों को शामिल किया गया जो गैर हिन्दू थे. मसलन, खुद वाईएस राजशेखर रेड्डी ईसाई थे. इसी तरह उस वक्त वाईएस राजशेखर रेड्डी ने बी करुणाकर रेड्डी को ट्रस्ट का सदस्य बनाया था जो कि आंध्र प्रदेश में रेडिकल स्टूडेन्ट यूनियन के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं. रेडिकल स्टूडेन्ट यूनियन सीपीआई (माओइस्ट) का छात्र संगठन है. करुणाकर रेड्डी पूरी तरह से नास्तिक हैं लेकिन उन्हें ट्रस्ट में इसलिए रखा गया क्योंकि वे राजशेखर रेड्डी के कट्टर समर्थक थे और वर्तमान में जगनमोहन रेड्डी के राजनीतिक गुरू हैं.
कांग्रेस सेकुलर हिन्दू फोरम का आरोप है कि राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में हजारों करोड़ रुपये के आभूषण मंदिर से गायब करवा दिये गये. फोरम का आरोप है कि राजशेखर रेड्डी के इशारे पर इस काम को करुणाकर रेड्डी ने अंजाम दिया. तिरुपति मंदिर ट्रस्ट में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने न केवल मंदिर के आभूषणों को नुकसान पहुंचाया बल्कि भगवान बालाजी की सप्त पहाड़ियों में से पांच पर क्रिश्चियन गतिविधियों को संचालित करने की भी कोशिश की. कांग्रेस सेकुलर हिन्दू फोरम का कहना है कि जिस दिन राज्य विधानसभा में यह मामला उठाया गया उसके दो दिन बाद ही वाईएस राजशेखर रेड्डी का निधन हो गया. उनके निधन के कुछ दिन तक तो यह मामला शांत रहा लेकिन कृष्णदेवराय द्वारा मंदिर को दान में दिये गये आभूषणों की जांच के लिए फोरम एक बार फिर सक्रिय है. फोरम का आरोप है कि मंदिर प्रांगण से आभूषणों को उठाकर पोप के खजाने में रख दिया गया है. फोरम का आरोप है कि खुद मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में जब करुणाकर रेड्डी के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग ने जोर पकड़ना शुरू किया तो करुणाकर रेड्डी भूख हड़ताल पर बैठ गये थे. अब पिछले ही महीने इस फोरम का एक प्रतिनिधिमंडल कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से मिला है और सीबीआई जांच की मुहिम को आगे बढ़ाया है. फोरम की योजना है कि अगर विजयादशमी से पहले केन्द्र सरकार तिरुपति देवस्थानम में हुई गड़बड़ियों की सीबीआई जांच का आदेश नहीं देती है तो फोरम 17 अक्टूबर विजयदशमी के दिन से एक नब्बे दिवसीय हैन्दव रक्षा यात्रा निकालने जा रही है जिसकी शुरूआत पुरी से होगी जिसका समापन 14 जनवरी 2011 को तिरुपति में होगा.
तिरुपति देवस्थानम में वित्तीय गड़बड़ियों की सीबीआई जांच की मांग न केवल भगवान बालाजी के दरबार से चोरी छिपे वेटिकन पहुंचाए गये आभूषणों की सच्चाई सामने आयेगी बल्कि कांग्रेस के अंदर की राजनीति भी नया करवट लेगी. वित्तीय गड़बड़ियों का आरोप जिस व्यक्ति पर लग रहा है वे वाईएस राजशेखर रेड्डी के करीबी और जगनमोहन रेड्डी के राजनीतिक गुरू करुणाकर रेड्डी हैं. करुणाकर रेड्डी ने अपनी मर्जी से तो कुछ किया नहीं होगा. उस वक्त वाईएस राजशेखर रेड्डी की इच्छाओं का ही पालन किया होगा. अगर केन्द्र सरकार सीबीआई जांच का आदेश दे देती है तो देवस्थानम में हुई गड़बड़ियों की सच्चाई सामने आने के साथ साथ जगनमोहन रेड्डी को भी राजनीतिक धक्का पहुंचेगा. सीबीआई जांच कराने की मुहिम अभी जारी है. वक्त ही बताएगा कि केन्द्रीय कांग्रेसी सरकार क्या निर्णय लेती है.
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""अगर केन्द्र सरकार सीबीआई जांच का आदेश दे देती है तो देवस्थानम में हुई गड़बड़ियों की सच्चाई सामने आने के साथ साथ जगनमोहन रेड्डी को भी राजनीतिक धक्का पहुंचेगा. सीबीआई जांच कराने की मुहिम अभी जारी है. वक्त ही बताएगा कि केन्द्रीय कांग्रेसी सरकार क्या निर्णय लेती है.""
ई साहब,
आप अनुमान तो लगा ही सकते है की केंद्र सरकार क्या निर्णय लेगी... अंदाज लगा लीजिये इनका और उनका दोनों का मिसन एक ही तो है..
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