सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?
दुनिया में पुरातत्व विज्ञान की अपनी सीमाएं हैं.एक काल खंड के पीछे के इतिहास को प्रमाणित करने में वह असमर्थ है,सनातन संस्कृति की मान्यता है कि कालचक्र के हर एक निश्चित परिवर्तन काल में युग बदलते हैं.सतयुग,त्रेता,द्वापर और कलियुग चक्र के हिसाब से परिवर्तित होते हैं.जिन राम को हिन्दू अपना अवतारी पुरुष मानते हैं और जिन्हें अनीश्वरवादी और अन्य धर्मावलम्बी पौराणिक नायक से अधिक कुछ मानने को तैयार नहीं उन राम का कालखंड भिन्न-भिन्न संशोधक ईसा पूर्व ५००० से ६०००० वर्ष पहले का मानते आये हैं. राम अयोध्या में जन्मे थे या अन्यत्र कहीं यह तभी सिद्ध किया जा सकता है जब मानव सभ्यता इस कालखंड के प्रामाणिक और समग्र इतिहास को खोज पाए.कुछ कामचलाऊ तर्कों के आधार पर इस पर कोई आख़िरी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. राम के अगर अयोध्या में जन्म का कोई प्रमाण नहीं है तो इस बात का भी किसी के पास क्या प्रमाण है कि इस देश में राम जन्मे ही नहीं? अयोध्या का राम से किसी प्रकार का कोई समबन्ध नहीं इस बारे में ही कोई ठोस प्रमाण जफरयाब जिलानी या शाहाबुदीन पेश करें. प्रभु राम चन्द्र अयोध्या से लंका तक गए थे,इस सम्बन्ध में हर १००-२०० मील पर कोई न कोई तीर्थ मिल जाएगा. इन तीर्थों के इतिहास हजारों वर्ष पुराने हैं. बिना जन्मे किसी एक व्यक्तित्व के बारे में इतनी समृद्ध संस्कृति दुनिया में क्या कहीं मौजूद है? राम का इतिहास है या नहीं लेकिन राम पूजा का तो जीवित-जागृत इतिहास है. अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर की ही बात की जा रही है. जहां तक श्रद्धा को न्यायपालिका ने मान्यता देनी चाहिए या नहीं का सवाल फिर इस देश में यह हर धर्मावलम्बी पर लागू कर दिया जाए कि अब किसी के धार्मिक श्रद्धा और विश्वास को इस देश के क़ानून मान्यता नहीं देंगे. माना कि इस्लाम के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद साहब का इतिहास है. लेकिन क्या इस्लाम सिर्फ इतिहास को सत्य मान कर चल रहा है?हर मुसलमान मानता है कि उनकी पवित्र पुस्तक कुरानशरीफ पैगम्बर को खुदा ने दी.क्या किसी की हिम्मत है कि मुस्लिमों से इस धारणा के बारे में कोई सबूत मांग ले? फिर क्या कोई यह कह सकता है चूंकि कुरानशरीफ के चमत्कारिक प्राकट्य का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है सो सामान्य किताबों की तरह उसे भी जलाने की अनुमति दी जा सकती है? अगर यही कानून का मापदंड है तो जब अमेरिका के फ्लोरिडा शहर में एक सनकी पास्टर पिछले दिनों कुरान शरीफ जलाने का पाप कर रहा था तब इस देश के गृहमंत्री पी. चिदंबरम को चेतावनी देनी चाहिए थी कि अगर कोई इस देश में फ्लोरिडा की घटना पर प्रतिक्रया स्वरुप कोई प्रदर्शन करेगा तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा. सोनिया गांधी को खुल कर बयान देना चाहिए था कि कुरान शरीफ के कोई चमत्कारिक पुस्तक होने का प्रमाण चूंकि किसी के पास नहीं है सो उसके जलाने पर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रया ठीक नहीं है. इस देश में सिर्फ कुरान शरीफ जलाने की अफवाह फ़ैली और पंजाब में एक चर्च को मुसलामानों ने फूंक डाला.कश्मीर में एक दर्जन से अधिक की जान चली गयी. जिन लोगों की जान गयी उनका इस विवाद से कोई वास्ता तक नहीं था. पैगम्बर मोहम्मद साहब का कोई चित्र या व्यंगचित्र नहीं बनाना चाहिए इसका इतिहास या कानून से क्या लेना-देना? एक डैनिश कार्टूनिस्ट उनका व्यंगचित्र बनाता है तो हिन्दुस्तान में एक दर्जन लोगों की अनायास जान ले ली जाती है. उस समय ये सेकुलरवादी मुसलामानों को क्यों उपदेश नहीं देते कि यार पैगम्बर के कार्टून बना देने से इस्लाम कैसे खतरे में आ जाएगा? वे जानते हैं कि अगर मुसलमानों को इस तरह का उपदेश देने की अगर किसी ने जुर्रत की तो मुसलमान उसका खीमा बना डालेंगे. परिणाम स्वरुप पूरी दुनिया फ्लोरिडा के पास्टर को सनकी करार देती है और उत्तेजित मुस्लिम समुदाय को शांत बनाये रखने की अपील की जाती है. इतिहास और कानून के मापदंड पर तो कुरान जलाने का दुस्साहस करने वाले पास्टर की तुलना में लाशें गिरानेवाले मुसलमानों के पाप ज्यादा संगीन हैं,लेकिन सेकुलरवाद क्या इस सच को स्वीकारने का साहस बटोर सकता है?
अयोध्या की रामजन्मभूमि-बाबरी ढाँचे की जमीन के मालिकाना हक के लिए दशकों से अदालतों की तारीख पर तारीख के कुचक्र के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ द्वारा फैसला क्या सुनाया गया इस देश के सेकुलर राजनेताओं और पत्रकारों -विचारकों का न्यायपालिका से विश्वास ही हट गया है. इन तीनों न्यायमूर्तियों के धिक्कार का समूह -गान शुरू हो गया है. मुस्लिम तुष्टीकरण को अपना राजनीतिक धंधा बना चुके समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने बाकायदा एक पत्रकार सम्मलेन कर लखनऊ खंडपीठ के फैसले की निंदा की,लालू प्रसाद यादाव पहले ही दिन खंडपीठ के फैसले को भ्रामक बता चुके थे. दिलीप पाडगांवकर से सीमा चिश्ती तक जितने भी सेकुलरवाद के पैरोकार पत्रकार हैं वे न्यायपालिका के इस फैसले को बहुसंख्यकवादी करार दे रहे हैं. अधिकाँश का तर्क है कि न्यायालय को अपना फैसला श्रद्धा और आस्था की बजाय ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर करना चाहिए था.कुछ दिन पहले तक जब हिंदूवादी दल कहा करते थे कि रामजन्मभूमि का मामला पूरी तरह से हिन्दुओं की आस्था और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है सो इस मसले का उन्हें अदालत से किया गया फैसला मान्य नहीं होगा तब यही सेकुलर बिरादरी दबाव बनाती थी कि हिन्दूवादियों को रामजन्मभूमि विवाद के बारे में अदालती फैसले को ही मानना चाहिए.
अयोध्या में राम लला के जन्म में वैज्ञानिक सबूत माँगने वाले कृपया बताएं कि क्या उनके वैज्ञानिक ज्ञान से किसी ब्रह्मचारिणी की कोख से कोई बच्चा पैदा हो सकता है? हिन्दू वांग्मय तो इस तरह की घटनाओं से पटा मिलेगा. हम सब मां पार्वती के मैल से जन्मे भगवान् गणेश की प्रथम पूजा करते हैं. कुंती के गर्भ से कर्ण का जन्म कुंवारेपन में होना हमारे समाज में प्रचलित घटना है. लेकिन जो पश्चिम हिंदुत्व को वैज्ञानिक आधार पर कसने को आमादा है वही पश्चिमी ज्ञान मदर मेरी के विषय पर मौन साध जाता है.यह श्रद्धा का ही विषय है कि ब्रह्मचारिणी(विर्जिन)मेरी के गर्भ से ईसा मसीह जन्मे थे,बालक जनने के बाद भी मदर मेरी विर्जिन ही थीं.सो,अयोध्या में प्रभुराम जन्मे थे या नहीं का सबूत माँगने वालों ध्यान रहे कि आपका यह दुस्साहस भी प्रभु राम द्वारा जनित क्षमा और शील की संस्कृति की देन है. दिलीप पाडगांवकर अगर दद्दन खान के घर में जन्मे होते और पैगम्बर के सन्दर्भ में एक सबूत मांग लेते तो मुसलमान उनकी दुर्गति कर देते. उन्हें हिन्दुस्थान छोड़कर अमेरिका या ब्रिटेन में कहीं शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ता.इस देश में इतिहास की दुहाई देनेवालों को यह समझना होगा कि इस देश का इतिहास अत्यंत प्राचीन है ,इस इतिहास का जितना अंश जाना जा सकता है उसकी अपेक्षा जो नहीं जा सकता वह और भी पुराना और महत्वपूर्ण है. मुसलमानों के इस देश में आने के पहले नाना विश्वासों और आचार -विचारों के मतभेद से नाना प्रकार के धर्म-मत परचलित थे. परन्तु जीवन के प्रति उनकी दृष्टि में एक विशेष प्रकार की एकरूपता थी.इस एकरूपता के कारण ही नाना मतों के मानने वाले,नाना स्तरों पर खड़े हुए ,नाना मर्यादाओं से बंधे हुए, अनेक जन्वर्ग एक सर्वसमावेशी नाम से पुकारा जाने लगा,वह नाम था 'हिन्दू'.हिन्दू अर्थात भारतीय. मध्य काल में मुसलामानों का इस देश में बड़े पैमाने पर आगमन हुआ. शासन में उनकी पकड़ के चलते हिदुओं ने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण भी किया. हिन्दू और मुसलमान में मूलभूत अंतर है जीवन के प्रति दोनों के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण. मुसलमान एक संगठित धर्म मत के अनुयायायी हैं इसे ही मजहब कहा जाता है. मजहब में धर्म साधना व्यक्तिगत होने की बजाय समूहगत होती है. यहाँ सामाजिक और धार्मिक विधि-निषेध एक दूसरे से जुड़े होते हैं. हिन्दू कहे जाने वाले जनसमूह में एक जाति दूसरी जाती में तत्काल बदल नहीं सकता. मुस्लिम जनसमूह का मजहब इसके ठीक विपरीत है. मजहब व्यक्ति को समूह का अंग बना सकता है.
हिन्दू समाज की जातियां कई व्यक्तियों का समूह होती हैं,किन्तु मुस्लिम समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक वृहत समूह का अंग होता है. इसका सीधा मतलब यह है कि हिन्दू समाज का व्यक्ति अपनी अलग सत्ता रखता है,किन्तु वह किसी बाहर के आदमी को अपनी जाति का अंग नहीं बना सकता. मुसलमान अपने समाज में कोई अलग सत्ता नहीं रख सकता और कोई भी बाहरी आदमी उसके समाज में सहज शामिल हो सकता है. मुस्लिमों के मजहबी फैसले कौमी फैसले होते हैं सो समुद्दय के भीतर से ऐसे फैसलों के खिलाफ व्यक्तिगत मतभेद नहीं उभर सकते. जबकि हिन्दुओं में इस तरह के मतभेद उभरने स्वाभाविक हैं उनमें सहमति बन पाना कठिन है.हिन्दुओं के इसी सामाजिक ढाँचे का परिणाम है कि रामलला की जन्मभूमि पर सबसे ज्यादा सवाल वे लोग उठा रहे हैं जो खुद हिन्दू जातियों से सम्बद्ध हैं. कोई मुसलमान पैगम्बर के व्यंगचित्र के विरोध पर सवाल नहीं उठाता,वह जानता है कि ऐसा करते ही वह अपने वृहत्तर समाज से कट जाएगा. भारतीय संस्कृत सर्वसमावेशक रही है वह इस्लामी आक्रमण को भी आत्मसात करने की स्थिति में थी. यदि अठारहवीं सदी में मुल्लों और निजाम ने मराठों से दिल्ली की गद्दी खाली कराने के लिए अहमद शाह अब्दाली को नमंत्रण न भेजा होता,यदि सर सय्यद अहमद और आगा खान जैसों को अंग्रेजों ने अलग मुस्लिम पहचान के लिए उकसाया नहीं होता,यदि मोहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजों के इशारे पर इस देश को बांटने ने निकल पडा होता तो इस देश में इस्लाम और हिंदुत्व सचमुच गंगा-जमुना की तरह एकाकार हो जाते. द्रविड़ों और आर्यों के बीच भी किसी समय उसी तरह विवाद था जिस तरह आज हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच है. द्रविड़ों को भेई राम स्वीकार नहीं थे,करूणानिधि आज भी द्रविड़ों की उसी सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन काल के प्रवाह में आर्यों का यज्ञ और द्रविड़ों का तीर्थ प्रसाद एक ही हिन्दू कर्मकांड के अंग बन गए. मध्य युग से ही हिन्दुओं और मुसलामानों को मिलाने का प्रयास चलता रहा है,उन्हें भगवान् की दो प्यारी आँखों की उपमा सैकड़ों वर्षों से दी जा रही है. शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह ने जन्म अ-उल-बहरन लिखी वे इस पुस्तक में हिन्दू-मुस्लिम धर्म की एकता के सूत्रों का विस्तार में वर्णन करते हैं .दारा शिकोह को औरंगजेब ने मार डाला, दारा के साथ ही हिन्दू-मुस्लिम एकता का शाही प्रयास भी मर गया. विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम एकता की उज्जवल परम्परा रही है.मुगलों के हिन्दुतान आने के पहले अरबी में आर्यभट्ट और ब्रह्मा गुप्त आदि के ज्योतिष ग्रंथों का अनुवाद हुआ था. नमाज पढ़ने के लिए मक्का की दिशा और प्रातः और सानी की गोधूली बेला का बड़ा महत्त्व है. इन दोनों बातों का सूक्ष्म विवेचन करने के लिए मुस्लिम ज्योतिषियों ने अक्षांश,देशांतर-संस्कार तथा चार और उदयासत का बड़ा सूक्ष्म और व्यापक अध्ययन किया. इसके लिए मुस्लिम विद्वानों ने हिन्दुओं के मुहूर्त शास्त्र को अपनाया. अरबों के ताजक शास्त्र और रमल विद्या को संस्कृत ने सम्मान के साथ समाहित किया. ऐसे तमाम तत्व हैं जो राम और रहीम को साथ रख सकते हैं.लेकिन अगर रहीम राम की जन्मभूमि मान लेंगे तो रहीम के नाम पर सत्ता की मलाई चाटने वाले कहाँ जायेंगे. यदि राम जन्मभूमि को जवाहरलाल ने १९४९ में मान्यता दे दी होती तो १९८० के दशक से आज दिन तक हजारों निर्दोष साम्प्रदायिक दंगों में क्यों मारे जाते?
राम के साथ बाबर की तुलना का जो सेकुलरवाद चला उसने इस देश में हिन्दुओं और मुसलामानों को लड़ाने का काम किया है. जो लोग अयोध्या मामले में इतिहास की दुहाई दे रहे हैं वे कृपया बताएं कि दुनिया की पहली मस्जिद क्या अन्य धर्म के धर्म स्थल को तोड़ कर नहीं बनी थी? क्या यह ऐतिहासिक सत्य नहीं है कि जनवरी ६३० में जब पैगम्बर मोहम्मद साहब ने पहली बार मक्का जीता था तब उन्होंने काबे की सैकड़ों मूर्तियों को हटा कर पहली मस्जिद के रूप में काबे को परिवर्तित किया था. नागेश ओके जैसे इतिहासकारों ने काबा को भी हिन्दू मंदिर सिद्ध किया है पर क्या कोई हिन्दू मुसलमानों से काबा का ताबा मांग रहा है? हम सब जानते हैं कि अब काबा मुसलमानों के लिए सबसे प्रिय धार्मिक वास्तु है.उस पर इतिहास के नाम पर किसी विवाद को मंजूर नहीं किया जा सकता. काबा इस्लामी श्रद्धा का मामला है उसी तरह वैष्णव सम्प्रदाय समेत सारे हिन्दुओं के लिए अयोध्या की राम जन्मभूमि पवित्र है. मुसलमानों में वहाबी,देवबंदी,अहले हदीस समेत ढेर सारे सम्प्रदाय पैगम्बर मोहम्मद के सामने सिर झुकाने को हराम मानते हैं,लेकिन क्या वे पैगम्बर की पहली मस्जिद किसी विधर्मी के हाथों विध्वंस होते देखने की सहिष्णुता दिखा सकते हैं? क्या उस स्थान को किसी पुरातन विभाग से वैज्ञानिक जांच या कानूनी स्थिति की चुनौती स्वीकारी जा सकती है? कदापि नहीं. रही जिन देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं वहाँ मस्जिदों को हटाने की बात. बुल्गारिया में तो इन दिनों एक मस्जिद के ढाँचे को रेस्तरां बना दिया गया है. रोमानिया के कांस्तानता में एक मस्जिद को नाईटक्लब में बदल दिया गया है और दोनों जगहों पर शराब परोसी जाती है. बुल्गारिया की मस्जिद सोलहवीं सदी में बनायी गयी थी यानी वह बाबरी की समकालीन थी. मुंबई में औकाफ बोर्ड कई मस्जिदों, मदरसों और कब्रिस्तानों की जगह मुस्लिम नेताओं को रिश्वत देकर बिल्डर खरीद चुके हैं, फिर एक बाबरी ढाँचे पर इतनी जिद का क्या औचित्य? जब तीनों जज एक मुख से स्वीकार रहे हैं कि १५२८ के पूर्व अयोध्या की विवादित जगह पर हिन्दू धर्म स्थल था तब इस तरह की जिद दो समुदायों में विवाद बढाने के अलावा कुछ और नहीं है.
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
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बधाई ..
नया लिखेगा प्रेम, बना रहता है इंतज़ार.
इंतज़ार है नई बातका, छोडो कल की बातें.
प्रेम ज़रा सौहार्द बढ़ाओ, नई सुनाओ बातें
साधक प्रेम से हल होते जाते हैं झगडे सारे ही
कितनी कितनी बार सुने हैं तर्क ये सारे ही.
sahiasha.com
आपका निष्पक्ष नजरिया व सच्चाई का बयां काफी प्रभावित करता है.
सगर के पुत्र का नाम असमञ्ज था। असमञ्ज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुये। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुये, इन्हीं भगीरथ ने अपनी तपोबल से गंगा को पृथ्वी पर लाया। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुये। (रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया) रघु के पुत्र प्रवृद्ध के पुत्र शंखण के पुत्र सुदर्शन के पुत्र अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग के पुत्र मरु के पुत्र प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष के पुत्र नहुष के पुत्र ययाति के पुत्र नाभाग के पुत्र अज के पुत्र दशरथ
अब मै पूछता हूँ तुम्हारे बाप के बाप के बाप के बाप के बाप के बाप के बाप के बाप के बाप के बाप के बाप नाम क्या था वो कब पैदा हुआ और कब मरा था ये सब तो शायद ३०० या ४०० साल की बात ही होगी बता सकते हो
भगवान् राम तो लाखो वर्ष पूर्व हुए थे (मै पश्चिमी इतिहासकारों और क्षदम हिन्दू इतिहासकारों की बात नहीं करता जिनकी आँखे इसा पूर्व २ या ४ हजार सालो के पार जाती ही नहीं) तो भाई इसकी सटीक जानकारी तो शायद ही कोई दे पाए
मै कहता हूँ की इस्लाम से गन्दा मजहब कोई नहीं है यदि दुनिया मै इस्लाम नहीं आता तो शायद दुनिया मै कत्लो गारत ही न हुआ होता
५७ मुल्को मै शाशन संभ्लाते हुए भी मुस्लिम सबसे पिछड़ी और दबी हुई कौम है (मै नहीं मुस्लिम हितचिन्तक ही कहते है )
कुरान में कहा गया है {ऐसी मूर्तियों की पूजा भला क्या करनी जो न किसी की पुकार-प्रार्थना सुन सकती हों, न कोई लाभ-हानि पहुंचा सकती हों; सिर्फ़ इसलिए कि बाप-दादा ऐसा ही करते आए हैं? अस्ल में पूरे संसार का प्रभु तो वह (ईश्वर) है जो इन्सान को पैदा करता, मार्गदर्शन करता, खिलाता-पिलाता, बीमार हो जाने पर, स्वास्थ्य देता, और मौत देता है और फिर दोबारा (पारलौकिक) जीवन वही प्रदान करेगा। (सार, 26:72-81)} अल्लाह को यह कैसे मालूम की मूर्ति की पूजा की जाती है , यानि हिन्दू धर्म को अल्लाह भी जानते थे , सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है की अल्लाह के अस्तित्व से पहले भी सनातन धर्म का अस्तित्व इस संसार में था
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