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इंस्पेक्टर शर्मा को किसने किया शहीद?

image इंस्पेक्टर एमसी शर्मा का पार्थिव शरीर

दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में आतंकवादियों से मुटभेड़ के दौरान इंस्पेक्टर एम सी शर्मा की दुखद मौत किसकी गोली से हुई? मुटभेड़ के आज दो दिन बाद यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे आतंकवादियों की गोली से मारे गये? या वे किसी साजिश के शिकार हुए? आज कुछ अखबारों ने एक फोटो प्रकाशित की है. फोटो में दो लोग इंस्पेक्टर शर्मा को संभालते हुए ले जा रहे हैं. जैसा कि पुलिस और मीडिया ने बताया था कि उनके पेट में तीन गोली लगी थी, फोटो में एमसी शर्मा के पेट पर कहीं खून का निशान नहीं है.

खून के निशान बायें कंधे पर दिख रहे हैं. वे आगे नहीं बल्कि पीछे की ओर हल्का सा झुके हुए हैं. अगर पेट में गोली लगी होती तो पेट पर जरूर खून के निशान होते. लेकिन सामने की तरफ खून का एक धब्बा भी नहीं है. यह बड़ा सवाल है कि क्या एमसी शर्मा को पीछे से गोली मारी गयी? या गोलीबारी के दौरान वे झुक गये थे या फिर पीछे मुड़ गये थे कि उन्हें पीठ में गोली लगी. अगर ऐसा नहीं हो तो उनके पेट पर खून के निशान क्यों दिखाई नहीं दे रहे हैं? जैसा कि पुलिस और मीडिया ने दावा किया है कि सबसे पहले एक इंस्पेक्टर ने सेल्समैन के रूप में जाकर दरवाजे पर दस्तक दी. दस्तक देने का मकसद था यह पता लगाना कि अंदर क्या माहौल है? जैसा कि मीडिया के हवाले से पुलिस ने दावा किया कि जब इंस्पेक्टर ने दस्तक दी तो अंदर एक लड़का सोफे पर बैठा हुआ था और दूसरा लेटा हुआ था. इसके तुरंत बाद एमसी शर्मा की अगुवाई में दूसरी टुकड़ी ने हाथ से दरवाजा खोलकर फायरिंग करते हुए अंदर धावा बोल दिया. इस टुकड़ी में हेड कांस्टेबल बलबीर भी शामिल थे जिनके हाथ में गोली लगी और वे आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट के ट्रामा सेन्टर में भर्ती हैं. पुलिस और मीडिया का दावा है कि पुलिस की मौजूदगी का अहसास होते ही अंदर के नौजवान ने पिस्टल से फायर शुरू कर दिया. इसी फायर से निकली गोलियों के शिकार बलबीर और इंस्पेक्टर शर्मा दोनों हुए?

अगर ऐसा था तो गोली पेट में लगती और खून भी बहता. इस बात को फिलहाल छोड़ दीजिए कि वे बुलेटप्रूफ जैकेट में वहां क्यों नहीं गये. ऐसे और भी बहुत सवाल हैं जो इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत पर संदेह पैदा करते हैं. अब तक विस्फोट.कॉम की पड़ताल में जो बात सामने आ रही है उसके लिए सबसे पहले दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के इतिहास को समझना होगा. खुफिया जानकारी यह है कि शर्मा की मौत से खुद स्पेशल सेल को गहरा सदमा लगा है. स्पेशल सेल दो साफ तौर पर दो गुटों में बंटा हुआ है. इस अभियान के दौरान इनमें से एक गुट के मुखिया एक एसीपी कर रहे थे. पुलिस के सूत्र बताते हैं कि एसीपी और इंस्पेक्टर शर्मा के बीच कोई खास मेल-जोल नहीं था. ऐसा माना जाता है कि स्पेशल सेल दो लोगों की बदौलत पहचाना जाता था. इनमें एक राजबीर सिंह की पहले ही संदेहात्मक हत्या हो चुकी है. स्पेशल सेल में एमसी शर्मा दूसरे ऐसे व्यक्ति थे जो पूरे सेल के लिए प्रेरणा का काम करते थे. किसी बड़े अभियान की कल्पना भी बिना शर्मा के नहीं की जा सकती थी.

शर्मा की इस असमय मौत का सदमा पूरे सेल को ऐसा लगा है कि स्पेशल सेल के बंद होने का खतरा पैदा हो गया है. हो सकता है जल्द ही स्पेशल सेल को तोड़कर कोई नया सेल गठित किया जाए जो आतंकवादी गतिविधियों से लड़ने में सक्षम हो. वैसे भी स्पेशल सेल का गठन आतंकवादी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए नहीं बल्कि दिल्ली में बढ़ते संगठित अपराध से निपटने के लिए किया गया था. पिछले कुछ सालों में मुंबई की तर्ज पर दिल्ली में संगठित अपराध, जबरन वसूली बहुत तेजी से बढ़ा है. इससे निपटने के िलए जरूरी था कि इससे निपटने के लिए विशेष शाखा का गठन किया जाए. यही से स्पेशल सेल के काम-काज में अपराधियों के हस्तक्षेप और पैसे लेकर एनकाउण्टर करने जैसे आरोप भी लगने लगे. राजबीर सिंह की एक प्रापर्टी के मसले में दोस्त द्वारा ही मार दिये जाने की बात पर कई तरह के सवाल उठे थे.

स्थानीय इंटेलिजेन्स के लोग भी शर्मा की मौत से बहुत दुखी हैं. वे निडर, जाबांज और साथियों की चिंता करनेवाले इंसान थे. पूरे सेल में उनका दूसरे लोगों के साथ बहुत अच्छे संबंध थे. लेकिन यह भी सच्चाई है कि पिछले दो साल से उनके एसीपी बनने की फाईल गृहमंत्रालय में लटकी हुई है. यह उनकी दिलेरी ही थी कि बीमार बेटे को अस्पताल में छोड़कर वे देश में आतंकवाद की बीमारी से निपटने के लिए जा पहुंचे. लेकिन दुर्भाग्य से वे लौटकर अपने बेटे को देखने नहीं आ सके. इस बात की जानकारी मिलनी ही चाहिए कि अगर इंस्पेक्टर शर्मा के पेट में गोली नहीं लगी थी तो इसे प्रचारित क्यों किया गया? फिलहाल इस बारे में तभी कोई सही तस्वीर उभरेगी जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आयेगी. उसके बाद ही यह पता चलेगा कि उनको लगी गोली किसकी बंदूक से निकली थी? फिलहाल, तब तक तस्वीर साफ नहीं होगी.

यहां एक बात गौर करने लायक है. आजमगढ़ में छानबीन के दौरान जो शुरूआती तथ्य सामने आ रही हैं उसमें यह सवाल उठाना कि जो लोग मारे गये वे आतंकवादी नहीं थे, ठीक नहीं है. आजमगढ़ में मौजूद एक पत्रकार ने बताया कि यह कहना गलत है कि वे आतंकवादी नहीं थे. संयोग से वे खुद एक मुसलमान हैं और आजमगढ़ में अपने अखबार के लिए छानबीन कर रहे हैं. जो लड़के मारे गये हैं वे आतंकवादी गतिविधियों में प्रयोग किये गये. सवाल सिर्फ इतना है कि क्या इस मौके को आतंकवादियों के साथ-साथ शर्मा को भी साफ करने के लिए प्रयोग किया गया या फिर उनकी मौत किसी चूक या लापरवाही की वजह से हुई.

(जिस फोटो का जिक्र किया गया है वह एक दिन पहले अमर उजाला और आज मेट्रो नाऊ में प्रकाशित हुआ है.)        

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अनिल रघुराज on 22 September, 2008 19:56;39
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देश में पुलिस सुधार बहुत ज़रूरी है। पुलिस को मनमर्जी करने की छूट कैसे मिली हुई है? आखिर उस पर अवाम का कोई अंकुश क्यों नहीं है? सालों पहले की बात है। गोंडा के डीएसपी कृष्ण प्रताप सिंह को अर्जुन पासी गिरोह से मुठभेड़ के नाम पर ज़िले के एसपी ने ही मरवा डाला था, इसलिए क्योंकि कृष्ण प्रताप ईमानदार थे और उनके घूस न खाने से ऊपरवालों की कमाई बंद होती जा रही थी।
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Ranjan Rajan on 22 September, 2008 20:22;43
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यह बड़ा सवाल है कि क्या एमसी शर्मा को पीछे से गोली मारी गयी?
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bheem on 22 September, 2008 20:46;10
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aap to pure mamle ko naya mod dekar aatankvadiyo ko bacha rahe hai .police ko aapas me bhida rahe hai.is tarah to puri muthbhed hi farji ho jayegi.aatankvadiyo ko to sidhe goli se uda dena chahie adalat ke chakker me bekar samai kharab hota hai.
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संजय तिवारी on 22 September, 2008 21:12;46
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भीम भाई, ध्यान से पढ़िये, मैं मुटभेड़ को फर्जी नहीं कह रहा हूं.
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sidharth on 22 September, 2008 21:13;06
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secular logo ke chakker me visfot chopat ho raha hai.musalmano ne pahle kashmeer le liya ab 20 sal me pure desh me islami raj ho jayega.aap bhi mare jaoge aur bhagvan parashuram bhi nipat jayenge.hindu ki to bat karna gunah ho gaya hai.
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रजत अमरनाथ on 22 September, 2008 21:16;37
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एक शूटर ओलंपिक में निशाना साधता है तो सरकार उसे २ करोड़ रूपया देती है. और यहां एक जवान आतंकवाद से लड़ते हुए शहीद होता है तो उसे पांच लाख देकर टाल दिया जाता है.
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dhikkar hai on 22 September, 2008 21:41;33
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हो सकता है कि शर्मा को उसके साथियों ने ही मार डाला हो
हो सकता है कि ये बम आतंकवादियों ने न रखे हों, इन्हें रखकर मारे गये लोगों ने खुद आत्महत्या की हो
बेचारा सैफ तो भोला भाला बच्चा है आजमगढ़ तो शबाना आजमी के स्वर्गीय पिता की स्थली है वहां से केवल असली देशभक्त ही निकलते है सैफ समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष का बेटा है वो वेचारा कैसे एसा काम कर सकता है

हिन्दू लोग खुद बम रख कर आत्महत्या कर रहे हैं और इनके नाम पर भोले भाले मासूमों को पकड़ रही है

बल्कि ये भी हो सकता है कि ये सारी आतंकवादी कार्यवाहिया हुई ही न हों क्योंकि जो लाशे अस्पताल से गयी वो अधिकांश साबुत थी जबकि बम की दुर्घटना में तो ये चिथड़े चिथड़े हो जानी चाहिये थीं

इस ब्लाग को पढ़कर एसा लग रहा है कि यहां देशद्रोही अरुन्धती राय या राजदीपक सरदेशाई का ब्लाग पढ़ रहा होऊं

संजय मियां, अगर सामने से कोई गोली चलायेगा तो कोई क्या बचने की कोशिश नहीं करेगा? घूमेगा नहीं?

बुलेट प्रूफ जैकेट हिन्दुस्तान से सिर्फ विदेशों में जारहीं है, यहां की सरकार नहीं खरीदती

अगली बार से किसी को जब आतंकवादी होने की सूचना मिलेगी तो पहले वो आफिस में आकर बुलेट प्रूफ जाकेट इश्यू करायेगा तब जायेगा आतंकवादियों से कह देगा कि जरा ठहरो, मैं जाकेट पहिन कर आता हूं

मानो शर्मा भी हमारा गृहमंत्री है जो कपड़े पहने की पहले सोचेगा
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संजय तिवारी on 22 September, 2008 22:18;58
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बिल्कुल. यह एक संभावना हो सकती है कि बचने की कोशिश में गोली उनकी पीठ में लगी हो. और महोदय हमने एक सवाल भर उठाया है और एक स्वस्थ समाज में सवाल कोई भी पूछ सकता है. इतना हक तो सबको है. संवाद होगा तो अपने आप जवाब मिल सकते हैं.
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bheem on 22 September, 2008 22:59;28
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tum to hindu ke nam per kalank ho .musalmano aise hi raj nahi kiya.rss na hota to chhatisgarh se north east tak isai aur musalmano ke kabje me hota.ek saheed per saval uthane se pahale sochna chahiye tha.sawal morkh uthate hai.
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ummed singh on 22 September, 2008 23:07;16
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kya kutark karta hai aur ek bevkoof police vale ka udaharan de raha hai.aazamgarh desh todane vale musalmano
ka adda ban gaya hai.in aatankvadio ko jail nahi goli chahiye
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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