जिनको खिलने से पहले मौत आ गई
खण्डवा जिले के आदिवासी ब्लॉक खलवा में कुपोषण के कारण लम्बे समय से हो रही मासूम बच्चों की मौत की ख़बरों से अख़बार उस दिन भी पटे पड़े थे। कुछ देर तक खण्डवा जिला अस्पताल के बाल शक्ति केन्द्र में रहने के बाद हम करीब 80 किलोमीटर दूर खलवा ब्लॉक के दौरे पर निकल गये।
आशापुर से रौशनी की तरफ जाते हुए रास्ते में फोकटपुरा में कुछ देर रुककर वहां हाल ही में गैर सरकारी पहल पर शुरु की गई एक आंगनवाड़ी में जाकर बच्चों का हालचाल पूछा। फोकटपुरा में भी कुछ समय पूर्व कुपोषण से एक बच्चे के मरने की ख़बर आई थी। कहीं आंकड़ा बढ़ तो नहीं गया? आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शांताबाई बताती हैं कि फिलहाल और बच्चों के मरने की ख़बर नहीं है। यह संतोषजनक बात थी। दिल्ली की संस्था `गूंज´ द्वारा आंगनवाड़ी के बच्चों के लिए कपड़े और खिलौने भेजे गए थे, जिसे पाकर छोटे-छोटे बच्चे बेहद खुश नज़र आ रहे थे, तो कुछ बच्चों ने कपड़े एवं खिलौने नहीं मिलने की शिकायत भी की।
हम आगे चलने के लिए गाड़ी में बैठे तो बच्चों ने जिंदाबाद-जिंदाबाद कह कर हमें विदा किया। रौशनी के पास एक गांव में जाते हुए रास्ते में बैलगाड़ी पर एक दम्पत्ति अपने छोटे से बच्चे को लेकर आता दिखाई दिया। हमने ड्राईवर को गाड़ी रोकने के लिए कहा और बैलगाड़ी चला रहे नवयुवक को आवाज लगाई तो वह रुक गया। पूछने पर बच्चे के पिता ने अपना नाम सरवन कोरकू बताया। सेमल्या गांव के रहने वाले सरवन और उसकी पत्नी मिसरीबाई अपने 13 महीने के बेटे पिन्टू को डॉक्टर को दिखाने के लिए जा रहे थे। बच्चे की आंखे बाहर निकल रही थी। बच्चे के पेट से कपड़ा जब कपड़ा उठाया गया तो वहां पर बहुत से निशान देखने को मिले। पूछने पर धीरे से मिसरीबाई ने बताया कि पिन्टू को बीमारी से ठीक करने के लिए चाचवा लगाया गया था, उसी से पेट पर निशान पड़ गए हैं। दराती को गर्म करके बच्चे के पेट पर चाचवा लगाये जाने की प्रथा स्थानीय आदिवासियों में प्रचलित है।
चाचवा लगाना किसी नवजात बच्चे के लिए मौत से कम नहीं होता। स्थानीय आदिवासी ओझाओं से झाड़ फूंक कराने में भी विश्वास रखते हैं। एक फैक्टर यहां सक्रिय झोलाछाप बंगाली डॉक्टरों का भी है। अज्ञानतावश लोग इनका शिकार बन जाते हैं। लेकिन इन सब परंपरागत अंधविश्वासों एवं झोलाछाप डॉक्टरों की सक्रियता का कारण क्या लोगों के प्रति प्रशासनिक उदासीनता नहीं है? यह सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि प्रशासन मुस्तैद रहा होता तो शायद ऐसे लोगों को अपनी दुकान चलाने का स्पेस मिल ही नहीं सकता था। बहरहाल सरवन, मिसरीबाई और उनके बेटे को हम गाड़ी में बैठाकर रौशनी स्थित स्वास्थ्य केन्द्र ले गए। पिन्टू की जांच करने पर वहां मौजूद डॉक्टर ने पाया कि उसका कुपोषण तीसरे स्तर तक पहुंच चुका था। उस डॉक्टर ने बताया कि यहां हर दिन 3-4 कुपोषित बच्चे हर रोज आ रहे हैं और अधिकतर बच्चों को मिल्टपल इन्फेक्शन है, जिसके चलते इन बच्चों को इंजेक्शन या फिर ड्रिप लगाना मुश्किल हो जाता है। उसने यह भी कहा कि “यहां पर पहले और दूसरे ग्रेड तक कुपोषित बच्चों की ओर तो ध्यान ही नहीं दिया जाता, मामला गंभीर हो जाता है तब ईलाज की पहल होती है।इस तरह की परिस्थितियों को रोकने में स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
लेकिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की लापरवाही का आलम यह है कि वे बच्चों का ग्रोथ चार्ट तक नहीं बनाते हैं। रौशनी चिकित्सा केन्द्र में हमें बताया गया कि गोलखेड़ा में बच्चों के कुपोषित होने की ख़बर आ रही है। बिना समय व्यर्थ किए हम गोलखेड़ा रवाना हो गए। रौशनी से ही हमने एक स्थानीय व्यक्ति को अपने साथ ले लिया था। नाम न छापने की शर्त पर उसने बताया कि प्रशासन कुपोषण की ख़बरों को दबाना चाहता है। इसलिए हाल ही में करीब 15 बच्चों के परिजनों को रौशनी स्वास्थ्य केन्द्र से बैरंग लौटा दिया गया था। रौशनी से करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोलखेड़ा एक वनग्राम है और यहां रहने वाले अधिकतर लोग कोरकू आदिवासी हैं। कालीभीत के जंगलों के बीचोबीच करीब 10 किलोमीटर का कच्चा रास्ता तय करने के बाद हम गोलखेड़ा पहुंच गए। वहां आईसीडीएस की एक टीम पहले से ही बच्चों का वजन लेकर कुपोषण की जांच कर रही थी। उन्होंने रिकार्ड चार्ट में देखकर बताया कि यहां तीसरे ग्रेड में 8 बच्चे, 15 बच्चे ग्रेड-2 में, जबकि एक बच्चा चौथे ग्रेड में है। 
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता संतोष दुबले से जब हमने बच्चों का ग्रोथ चार्ट मांगा तो वह बगलें झांकने लगी। सकुचाते हुए उसने बताया कि ग्रोथ चार्ट बनाया ही नहीं है। आईसीडीएस के प्रतिनिधियों ने बताया कि ग्रोथ चार्ट न होने से बच्चों की सही उम्र का पता नहीं चल पा रहा है। बच्चों के माता पिता को भी ज्ञान नहीं होता कि बच्चे की सही उम्र क्या है। लेकिन कुपोषण की पैमाइश करने के लिए जो मानक उपयोग किए जाते हैं उसमें सही उम्र का पता होना जरूरी होता है, अन्यथा कुपोषण के सही स्तर का पता नहीं लग पाता है। लेकिन यहां तो सब कुछ अंदाजा लगाकर ही तय किया जा रहा था। आंगनवाड़ी के लक्ष्यों में बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण स्तर को बेहतर बनाना, मृत्यु दर, कुपोषण एवं स्कूल ड्रॉप आऊट को रोकना और बच्चों के मानसिक विकास का आधार तैयार करना मुख्य तौर पर शामिल हैं।
संविधान की धारा-45 के मुताबिक 6 साल तक के सभी बच्चों की देखभाल एवं प्रारंभिक शिक्षा की जिम्मेदारी राज्य को सौंपी गई है। धारा-47 के मुताबिक राज्य का यह कर्तव्य है कि वह लोगो के पोषण एवं जीवन स्तर के साथ बेहतर स्वास्थ्य का ख्याल रखे। लापरवाही सिर्फ संतोष दुबले की नहीं है, बल्कि दूरदराज के गांवों में अमूमन यही स्थिति देखने को मिलती है और आंगनवाड़ी केन्द्र महज दलिया वितरण केन्द्र बनकर रह गए हैं। बच्चों की तन्दरुस्ती सिर्फ सरकारी आंकड़ों में दिखाई देती है। उल्लेखनीय है कि कुपोषण के ताजा मामले ऐसे समय में आ रहे हैं जब हाल ही में महिला एवं बाल विकास विभाग ने यूनीसेफ के साथ मिलकर इसकी रोकथाम के लिए पूरे प्रदेश में 12 वें चरण का बाल संजीवनी अभियान चलाया था। सरकार कुपोषण के निवारण के लिए गत वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च करने की बात करती है। इस वर्ष महिला एवं बाल कल्याण के लिए बजट राशिबढ़ाकर 5.9 बिलियन रुपये कर दी गई, जो गत वर्ष की अपेक्षा 1.9 बिलियन अधिक है। इसमें से 3 बिलियन रुपये न्यूनपोषित महिलाओं एवं बच्चों को पोषक आहार उपलब्ध कराने के लिए चिन्हित किए गए थे। वहीं सतना का दौरा करके लौटे राइट टू फूड कैम्पेन के प्रशांत दूबे के मुताबिक आंगनवाडियों में बैठने की व्यवस्था, पीने का पानी, टायलेट एवं पोषण आहार तैयार करने के लिए पृथक स्थान नहीं है।खण्डवा बाल शक्ति केन्द्र के दरवाजे पर जब हम पहुंचे तो बच्चों के लेकर आने वाले परिजनों का तांता लगा हुआ था। दूसरी ओर प्रशासन का पूरा अमला गांव-गांव जाकर कुपोषित बच्चों की पहचान करके उन्हें बाल शक्ति केन्द्र लाने में जुटा था। सितंबर के अंतिम सप्ताह तक बाल शक्ति केन्द्र में करीब डेढ़ सौ बच्चे भर्ती थे। 20 बिस्तरों वाले इस केन्द्र में इतने बच्चों के आने से व्यवस्था भी चरमराने लगी थी। फिलहाल अस्पताल में बच्चों की संख्या कुछ कम हो रहीहै। इस बीच आदिवासियों ने सोयाबीन की कटाई के लिए पलायन आरंभ कर दिया है। ऐसे में उनके बच्चों के बारे में जानकारी जुटा पाना मुश्किल हो रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश इसे ‘विवशतापूर्ण पलायन’ की संज्ञा देते हैं। वे कहते हैं कि पलायन करने वाले लोगों की सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड जाती है। वर्ष 2000 में भी यहां के कोरकू आदिवासियों के बच्चों के कुपोषण के कारण मरने की ख़बर आई थी। प्रदेश सरकार राज्य में 'वर्ल्ड फूड प्रोग्राम' और 'यूनीसेफ' की मदद से बाल शक्ति योजना, शक्तिमान और बाल संजीवनी अभियान जैसे कार्यक्रम चला रही है। इन योजनाओं के अंतर्गत आंशिक रूप से कुपोषित बच्चों का समय पर ईलाज होना चाहिए था। 2001 में बाल संजीवनी अभियान की शुरुआत की गई थी, जिससे आशा की जा रही थी कि कुपोषण से होने वाली मौतें कम हो जाएंगी। लेकिन हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं। प्रशासन कुपोषण से बच्चों के मरने की बात को स्वीकार करने बच रहा है और कहा जा रहा है कि बच्चों की मौत निमोनिया एवं डायरिया जैसी बिमारियों से हुई है। महिला एवं बाल विकास विभाग की निदेशक कल्पना श्रीवास्तव कहती हैं की `समस्या यह है कि राज्य सरकार कुपोषण से निपटने के लिए आईसीडीएस एवं मिड डे मील जैसी विभिन्न योजनाओं के तहत जो भी सहायता प्रदान करती है, वह एक पूरक हो सकती है। लेकिन यदि खाद्य अनुपलब्धता एवं जीवन स्तर की समस्या है तो उसका सामना करना मुश्किल हो जाता है।'
आंकड़ों की हकीकत कुछ और है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश में शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों की कुल जनसंख्या में से 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे एन.एफ.सी.एच. के मुताबिक कम वजन वाले बच्चों की संख्या 1998-99 में 54 प्रतिशत से बढ़कर आज 60.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है और अति कुपोषित बच्चों की संख्या 20 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत हो गई है। जबकि कैग रिपोर्ट कहती है कि 'प्रदेश में 52-62 प्रतिशत बच्चों और गर्भवती एवं बच्चों को स्तनपान कराने वाली 46-59 प्रतिशत महिलाओं तक योजनाएं पहुंच ही नहीं पाती हैं।'एक ओर तो जिला प्रशासन कुपोषण की बात को स्वीकार नहीं कर रहा है, जबकि दूसरी ओर राशन की दुकाने अब हर सप्ताह खोलने और आंगनवाडियों में दोगुना पोषण आहार दिये जाने के आदेश जारी कर दिये गए हैं। राशन का कोटा भी बढ़ा दिया गया है। अजीबोगरीब फैसला तो यह है जिसमें बीपीएल कार्ड पर 20 किलो राशन 3 रुपये की दर से और शेष 15 किलो 7 रुपये की दर से दिये जाने की बात कही गई है। सवाल यह है कि जिन लोगों के पास 3 रुपये भी न होते हों वे 7 रुपये की दर से कैसे राशन खरीद पाएंगे। दूसरी ओर आंगनवाडी केन्द्रों के खुलने का समय भी बढा दिया गया है। सवाल यह उठता है कि प्रशासन जब कुपोषण की बात मानने को तैयार नहीं है तो इस तरह के कदम उठाये जाने का औचित्य क्या हो सकता है?
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Digg
dil ko chooti story aapne likhi hai. lekin dost is dhar ko kam hi log kayam rakh pate hain. samay ke saath ye kund hone lagti hai. ummeed hai ki ye dhar hmesha bani rahegi
bs meena
यदि प्रोत्साहन की कुछ घूंट मिल जाती हैं, तो धार का कुंद होना थोड़ा कठिन हो जाता है। और भी अच्छा लगता यदि आप अपना ईमेल भी साथ में देते़ ---
आपका आभार
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