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मुंबई का जीवित आतंकवादीः आमिर कसाब

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गिरगांव चौपाटी पर पकड़े गये आमिर आजम कासव उर्फ मोहम्मद अजमल उर्फ मोहम्मद आमिर कसाब की उम्र-21 साल है. अकेला जीवित आतंकवादी जो मुंबई हमलों में पाकिस्तान के हाथ का सबसे जीता-जागता सबूत बन गया है. मुंबई पुलिस की जाबांजी और बहादुरी के परिणामस्वरूप पकड़ में आया कसाब अब वह सब बता रहा है जिसे जरदारी साहब चाहकर भी नहीं नकार सकते. थोड़ा कसाब के बारे में विस्तार से जान लेते हैं.

कसाब का जन्म पंजाब प्रांत के ओकारा जिले में दीपलपुर तहसील के फरीदकोट गांव में हुआ था जो कि मुल्तान से 50 किलोमीटर दूर है. कसाब कुरैशी जाति का है. कसाब का बाप मोहम्मद आमिर ईमान दही-पूड़ी की ठेली लगाता है जबकि मां नूरी ताई घरेलू महिला है. आमिर-नूरी के पांच बच्चे हैं. बड़ा बेटा-अफजल (25) लाहौर में मजदूरी करता है और लाहौर में यादगार मीनार के पास रहता है. आमिर की बड़ी बहन रूकैया हुसैन (22) का विवाह गांव में ही हुआ है. इसके बाद मोहम्मद अजमल कसाब (21) है. अजमल से छोटी बहन सुरैया उम्र 14 साल और सबसे छोटा उसका एक और भाई मुनीर है.
 
जाहिर सी बात है इतने बड़े परिवार को आमिर इमाम न तालीम दे सकते थे और न ही अच्छे से परवरिश. उसके बच्चे गांव के प्राईमरी स्कूल में भी पढ़ने के लिए नहीं जाते थे. आमिर ने 13 साल की उम्र में चौथी कक्षा के वक्त ही स्कूल छोड़ दिया. उसके बाप ने उसे अपने बड़े बेटे अफजल के पास भेज दिया जो कि लाहौर में मजदूरी करता था. उस समय अफजल की उम्र मात्र 17 साल थी. लेकिन वह वहां भी रूक नहीं पाया. इसके बाद वह कभी अपने भाई के पास लाहौर जाता तो कभी अपने गांव फरीदकोट आ जाता. ऐसे में ही एक दिन 2005 में उसने यह कहते हुए घर छोड़ दिया कि अब वह लौटकर कभी घर नहीं आयेगा. 

इसके बाद सैयद अली हजवेरी की मजार पर वह रहने लगा. अपने बड़े भाई की तरह वह भी छोटी-मोटी दिहाड़ी मजदूरी करने लगा, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि यह काम उसके स्तर का नहीं है. यहीं से उसने अपराध की दुनिया में कदम रखा. अपने एक दोस्त मुजफ्फरलाल खान के साथ मिलकर उसने हथियारबंद डकैती डालना शुरू कर दिया. 21 अक्टूबर 2007 को बकरीद के दिन दोनों रावलपिण्डी हथियार खरीदने के लिए गये थे. यहीं पर पहली बार वह जमातउद्दवा के संपर्क में आया जो कि लश्कर का राजनीतिक मुखौटा है. दवा के लोगों ने उन दोनों को लश्कर के बारे में जानकारी देनेवाला साहित्य और पैम्पलेट दिया. थोड़ी देर की बातचीत के बाद ही दोनों को लश्कर में ट्रेनिंग के लिए भर्ती कर लिया गया. उनसे कहा गया कि उन्हें उनकी योग्यता के लिए नहीं शामिल किया जा रहा है, बल्कि उन्हें लंबे समय तक प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा. इसके बाद उनको आतंक का आगामी प्रशिक्षण देने के लिए लश्कर के बेस कैम्प मरकज तैयबा पहुंचा दिया गया. 

लश्कर के ट्रेनिंग कैम्प में पहली बार उसे पता चला कि कश्मीर में भारत कितनी ज्यादती कर रहा है और वहां मुसलमानों की हालत कितनी दयनीय है. यहां जो प्रशिक्षक थे वे बताते कि भारत किस तरह से मुसलमानों पर अत्याचार कर रहा है. उन्हें यहां ऐसी फिल्में दिखाई गयी जिनमें कश्मीर में मुसलमानों पर हो रही ज्यादती के बारे में बताया गया था. उन्हें समझाया गया कि इस्लाम की रक्षा में इस तुच्छ जीवन को त्याग देने से भी सम्मान ही प्राप्त होगा. कैंप में उन्हें वह सिखाया गया जिसके बारे में उनके परिवार और समाज में कोई शिक्षा नहीं मिली थी. इसके बाद दो महीने की छुट्टी पर वह अपने गांव आया था. इस बार उसने अनुभव किया कि अचानक ही गांव में उसका सम्मान बढ़ गया है. लोगों उससे अदब से पेश आ रहे हैं. दो महीने की छुट्टियां पूरी करने के बाद अजमल कसाब को लश्कर के विशेष प्रशिक्षण 'दौरा-आम' के लिए चुन लिया गया.

दौरा आम के दौरान उसके बेहतर प्रदर्शन को देखते हुए कसाब को विशेष कमाण्डों प्रशिक्षण दौरा-खास के लिए भेज दिया गया. कसाब के साथ कुल 32 लोगों को दौरा-खास प्रशिक्षण के लिए चुना गया था. मंसेरा के निकट उन्हें यह प्रशिक्षण दिया गया. यहां भी उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया जिसके कारण उसे अत्यंत उच्च मेरीन कमाण्डों प्रशिक्षण के लिए चुन लिया गया. मरीन कमाण्डों ट्रेनिग में उसे मिलाकर 20 लोगों को ट्रेनिंग दी गयी. जिसमें वह 10 लोगों का फिदायीन दस्ता भी शामिल है जिसने 62 घण्टे मुंबई को बंधक बना रखा और कोई दो सौ लोगों की जान ले ली. 

23 नवंबर को करांची से मुंबई के लिए रवाना होते समय सुबह 4.15 बजे सबको एक-47, 200 राउण्ड गोलियां और ग्रेनेड दिये गये. इस फिदायीन दस्ते के कराची से चलने के पहले लश्कर के मिलिट्री कमाण्डर जकी-उर-रहमान ने अजमल से वादा किया था कि इस्लाम के लिए वह जो बलिदान करने जा रहा है इसके ऐवज में उसके परिवार को 1.5 लाख रूपये दे दिये जाएंगे.
 
क्या जनाब जरदारी को और कोई सबूत चाहिए? 

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sanjay bengani on 04 December, 2008 19:23;53
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लाल धागे का रहस्य भी खूल जाता तो पाकिस्तान को शान्ति मिलती.
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visfot .com on 04 December, 2008 21:05;18
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आमतौर पर ऐसे आपरेशन के दौरान भ्रम पैदा करने की कोशिश की जाती है. ताकि लोगों में शक पैदा हो. लाल धागे का यही रहस्य है.
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Abhimanyu on 04 December, 2008 21:34;09
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ye vi ho sakta hai ki Majar se Chalte samay usne liya ho. Fatti pe log kya nahi karte.
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PRASHANT mehrishi on 04 December, 2008 22:12;58
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ek do din main lallu prasad yadav,paswan,mulayam singh amarsingh kah sakte hain ye sadhvi pragya ka bhai tha jo karkareji aur A T S ko khatam karne unse rakhi bandhwa kar aaya tha.
narko test main pragya ji ne bataya tha ibn7,ndtv,starnews ke pas exclusive vidio hai iska jisme rakhi bandhne ka scen bhi hai.
jago hindu jago.pehle inhe nanga karo kahi lallu, mulayam,amar,paswan bhi????
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कमर सिंह on 04 December, 2008 22:17;01
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ये मासूम आतंकवादी है, इसने गोलियां नहीं चलायीं बल्कि हेमंत करकरे और बाकी पुलिसवालों पर पीछे से ही किसी ने गोलियां चलाई थीं- कमर सिंह (समाजवादी पागल पार्टी)
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NISHTHA SRIVASTAVA on 05 December, 2008 00:24;08
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ये तो मासूम है इनकी दिशा भ्रम करा जा रहा है।
इन्हे क्या पता कि आतंक वाद क्या होता है। या ये कैसे फैलाया जाता है।
21 साल कि उम्र काफी छोटी होती है। अउर जब ये आतंकवादी दस्ते में शामिल हुआ था तब इसकी उम्र कच्चे मटके के तरह थी जो जैसे भी ढ़ालना चाहा वो वैसे ही ढ़ाल लिया।

अउर मन में कटुता भर के ये इतने बड़े कारनामे को अंजाम दीया।
देश को लड़ाना कोई बहादुरी का काम नहीं है।
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भारत के पास लंबा और तकलीफदेह रास्ता अपनाने के अलावा कोई चारा नहीं है। वह अपनी सरहदें पूरी तरह सुरक्षित करे और फिर कोशिश करे कि सीमा पार भी आतंकियों को जो मदद मिल रही है, वह रुक सके।
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PAPA on 11 December, 2008 12:25;27
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pragya ka bhai tha jo karkareji aur A T S ko khatam karne unse rakhi bandhwa kar aaya tha.
narko test main pragya ji ne bataya tha ibn7,ndtv,starnews ke pas exclusive vidio hai iska jisme rakhi bandhne ka scen bhi hai HA HA HA LAGDA TO AISA HI HAI
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