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तालिबान के देसी संस्करण

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कुछ दिन पहले किसी अखबार में पढ़ा था कि तालिबान ने पेशावर की बसों मे म्यूज़िक न चलाने की धमकी दी थी. कहा था कि अगर कोई बस मे म्यूज़िक सुनता हुआ पकड़ा गया तो अंजाम बुरा होगा. इस्लामी कट्टरपंथियो की ऐसी कितनी ही ख़बरे आम बात है, लेकिन अचरज तब हुआ जब सुना की तालिबान ने मंगलूर मे किसी क्लब मे वहाँ उपस्थित लड़के लड़कियो को दौड़ादौड़ा कर मारा.

दरअसल ये भी कोई नयी बात नही थी क्योंकि हर वेलेन्टाईन डे या ऐसे ही किसी दिन ये ख़बरे सुनने को आम मिल जाती है. फ़र्क़ इतना होता है हर बार ये तालिबान किसी नये नाम से आते है. मंगलूर मे जिस देशी तालिबानी दल ने ये आतंकवाद फैलाया उसने अपना नाम श्रीराम सेना बताया. इस सेना के सेनापति प्रोमद मुतालिक और उप-सेनापति प्रसाद अटावर को गिरफ्तार कर लिया गया. दल के अन्यसदस्य सुभास पाटिल, किशोर और गणेश भी पोलीस हिरासत मे है.
 
पहली नज़र मे बात उतनी बड़ी नज़र नही आती लेकिन सच तो ये है के ये देशी तालिबानी देश के लिए सबसे बड़े ख़तरो मे से एक है. बात गंभीर और हो जाती है जब इन संकीर्ण सोच के दलों की सत्ता मेभागीदारी हो जाती है. सारी दुनिया मे इस्लामी कट्टरपंथियो ने जो आतंकवाद फैलाया हुआ है वो एक बड़ा सवाल है. पर देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा देश के अंदर कट्टरपंथियो द्वारा चलायागया ये धर्म और संस्कृति के नाम पर फैलाया गया आतंकवाद है जो अब महाराष्ट्र से निकल कर समूचे भारत मे फैल गया है. शिव सेना द्वारा शुरू किया गया ये कट्टर अभियान पूरे देश मे अलग अलग नामो से अपनीजड़े फैला चुका है. शिवसेना आज महाराष्ट्र का प्रमुख राजनैतिक दल है और नॅशनल डेमॉक्रेटिक दल का एक प्रमुख घटक दल है. बजरंग दल, शिव सेना, श्रीराम सेना, दुर्गावाहिनी आदि कितने पवित्र नामो वाले दलधर्म और संस्कृति के नाम पर समाज को अपवित्र करने पर तुले है और ये हैरत की बात है के उन पर लगाम लगाने के लिए ना ही तो केंद्र और ना ही राज्य सरकार कुछ कर रही है. आज देश मे अपने कोसांस्कृतिक दल कहने वाले ऐसे करीब 200 से ज़्यादा दल है और किसी ना किसी रूप मे ये सभी एक दूसरे से जुड़े हैं. समाज मे आतंक फैलाने का जो रास्ता इन्होने चुना है उसका रास्ता राजनीति से होकर जाता है.दो दिन पहले मुंबई मे शहीदो के एक श्रधांजलि समारोह मे राज ठाकरे के गुडो ने जो गुंडागर्दी की वो बड़ी ही वीभत्स थी. अब ऐसे आतंक के पीछे कौन सी परिभाषा है ये या तो राज ठाकरे को पता है या उसकेआकाओ को. लेकिन इतना तय है के किसी भी तरह इसको जायज़ नही ठहराया जा सकता. ये सब करके वो कौन से मराठी मानुष की साहयता करना चाहते है ये वो ही जाने.
 
शिव सेना ने जो रास्ता दिखाया उस पर चल कर बहुत सारे छोटे छोटे दलों की राजनीति की दुकान चल निकली है. इन दलों का किसी भी रूप मे किसी भी धर्म से कोई संबंध नही है क्यों की अगर ऐसा होता तोमंगलूर मे बैठे युवक युवतियो को इस तरह नही पीटा जाता. पीटने का कोई कारण भी नही था. कारण था तो सिर्फ़ इतना की शायद सबसे शॉर्टकट है ये रास्ता अपने होने का अहसास दिलाने के लिए. ये बात ग़लतनही होगी अगर ये कहा जाए के इस तरह के ज़्यादातर दलों का जन्म विश्वा हिंदू परिषद की छाया तले हुआ. (मैं जानता हूँ की इस वाक़या पर पाठको की तीखी प्रितिक्रिया आ सकती है, लेकिन सच को झुठलाया नही जा सकता और कहीं ना कहीं सभी इससे सहमत होंगे). पर विश्व हिंदू परिषद का अब इन पर कंट्रोल है कहना ज़रा मुश्किल है. कोई भी सरकार इन पर लगाम लगाने मे नाकाम रही चाहे वो केंद्र की कोई भी सरकार हो या कोई भी राज्य सरकार. कहना ग़लत नही होगा की किसी भी सरकार ने इन पर लगाम लगाने की इच्छाशक्ति ही नही दिखाई. कारण साफ है. ऐसे सभी दल हिंदू धर्म (जिनका वास्तव मे हिंदू धर्म से कोई लेना देना नही) और भारतीय संस्कृति की आड़ मे ऐसा घिनौना खेल खेल रहे हैं और हम भोले भाले भारतीय उनका निशाना बन रहे हैं. देश मे क़ानून है लेकिन ऐसे तालिबानी सोच के लोगों के लिए शायद कोई क़ानून नही है. आश्चर्य की बात ये है के प्रमोद को मार पीट नही बल्कि एक भड़काउ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. अब ये आरोप मुतालिक को कितने दिनों के लिए अंदर रख पाएगा ये समय ही बताएगा, लेकिन इतना सच है की राज्य सरकार ने वैसा ही ढील ढाल वाला रवैया अपनाया जैसा कुच्छ दिन पहले राज ठाकरे के लिए महाराष्ट्र सरकार ने अपनाया था. अब जो बेशर्मी की एक परंपरा महाराष्ट्र सरकार ने शुरूकी है उसका अनुसरण कर्नाटक सरकार भी कर रही है. ये प्रमोद मुतालिक वही प्रमोद मुतालिक है जिसका ज़िक्र मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी पुरोहित ने किया है.
 
आज हम पाषान युग को बहुत पीछे छोड़ चुके है और एक सभ्या समाज का अंग है. 21वी सदी का भारत दुनिया के नक्शे पर अपने वजूद की दस्तक दे चुका है. भारत से निकल कर भारतवासी दुनिया के कोने कोनेमे फैल चुका है इसलिए संस्कृतीयो की अदला बदली स्वाभाविक है. अब ये संस्कृति के ठेकेदार देश को कहाँ ले जाना चाहते है ये वोही जाने. कब तक ये चन्द लोग हमे कभी धर्म, कभी संस्कृति, कभी दलित, कभीउत्तर भारतीय और कभी दक्षिण भारतीय की दीवारो से बाँटते रहेंगे? कब तक हम एक आज़ाद भारतीय होकर भी कुछ चन्द लोगो द्वारा खींची हुई रेखाओं पर चलते रहेंगे? हर दिन एक नयाराज ठाकरे और एक नयी सेना का जन्म हो रहा है और हम भारतीय लोग इन देशी तालिबानों के हाथों रोज़ पिट रहे हैं इन तालिबानो के हाथो. तालिबान तो वहाँ अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान मे है और उनका इलाज़अमेरिका कर रहा है पर इन देशी तालिबानो पर लगाम कौन लगाए? क्यों हर रोज़ ये लोग कभी धर्म और कभी संस्कृति के नाम पर अड़ंगा अटकाते हैं? 

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KS on 28 January, 2009 17:08;59
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यही हाल महाराष्ट्र के तालिबानी नेता यानि राज ठाकरे का भी है.

SK की बजाए अब KS नाम से.
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parshuram on 28 January, 2009 17:20;59
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इरफान जी काफी मजा आरहा होगा/ अपनी कुंठा से संघ परिवार और तालिबान की तुलना करने पर/ राज ठाकरे गलत है मैं उसको इस में घसिटना नही चाहता/ परन्तु ठाकरे को नाजायज कह कर आपने अपने दिमागी दिवलेपन का ही सबूत दिया है/ शायद वामपंथी रुझान के व्यक्ति इसी प्रकार चरित्र हत्या करते हो/
तालिबान ने संगीत सुन ने पर पाबन्दी लगाई थी यह पर श्री राम सेना ने पब (आपके घरवाले भी पसंद नही करेंगे की घर की बहु बेटी जाए) को रोकने के लिया कुछ पर्दर्शन किया और लगे हाथ आपने अपनी फ्रस्ट्रेशन का संघ परिवार पर मुझायारा कर दिया/ उस तालिबान से तुलना कर रहे है जिसने १०० देशो से उपर मैं अपना ठिकाना बना रखा है/ जो आज की सुपर पॉवर अमेरिका से टक्कर ले रहा है/ अफगानिस्तान और पाकिस्तान को अपनी उंगलियो पर नचाता है/ उस तालिबान से अपने संघ परिवार की तुलना की जहमत उठाई है/ इरफान जी क्षमा करे मुझे परन्तु प्रश्न ये हे की क्या आप अपनी बहिन ये बेटी के साथ पब जाना पसंद करेंगे या कभी आप गए हैं/ यदि नही तो क्यो नही और नही जाना पसंद करेंगे तो फिर आपने इसको बंद कराने को क्या किया/ जब आप अपनी बहिन भेजना पसंद नही करते तब तो आप भी तालिबानी हो गए फिर संघी भी हो गए तब लेख लिखने का क्या मतलब (क्षमा करे पर्सनल न ले)
धन्य प्रभु आप और आपके विचार/
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KS on 28 January, 2009 18:12;08
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PARSHURAMAN JI
यह सवाल आप बाल ठाकरे से क्यों नहीं पूछते कि वह मुंबई में माईकल जैक्सन के शो में क्या कर रहे थे ?

जो काम सरे आम होतें है, वह संघ के लोग पीठ पीछे क्यों करते हैं.
पिछले साल संघ के युवा नेता का अश्लील वीडियो इसका उदहारण भर है.
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parshuram on 28 January, 2009 18:33;29
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KS जी पहली बात तो मैं किसी की गलत बात को डिफेंड नही कर रहा दूसरा आपने अश्लील विडियो की बात की तो विडियो तो किसी की कभी भीं बन सकती है. आपको मालूम नही हमारे राहुल भईया (गाँधी जी) अमठी मैं क्या गुल खिला चुके जिस पर की कांग्रेस प्रवक्ता सिंघवी जी ने अमरीका मैं ऍफ़ आई आर करा रखी है. रही बात माइकल जाक्सन के शो की तो बिज़नस हैं ठाकरे जी चला रहे थे पर जानकारी के लिया बता दू आप की बदुआ से फ्लोफ रह बिज़नस में घटा रहा और फिर कभी नही किया और आप बात कर रहे हैं आज से १५ साल पुराणी. शुक्र हैं महात्मा गाँधी के साथ दो कुवारी कन्याओ की और नेहरू के साथ लेडी मोंट बटन की बात नही कर दी. और तो और आपने स्वामी जी की किताब सोनिया गाँधी पर का भी जिक्र नही किया. नही तो नेतिकता का कोई सहारा न बचता.
संघ परिवार की लाख मैं से किसी इक आदमी के चरित्र से पुरे संघ परिवार की चरित्र हत्या अच्छे न्याय का परिचायक है/ एसा न्याय और एअसा विश्लाशन आपको ही मुबारक.
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नाम ज़रूरी नहीं है on 28 January, 2009 19:38;57
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जहाँ तक सीडी बनने की बात है वह आपकी भी बन सकती है आज के समय में (अपनी धर्मपत्नी के साथ ही सही), किसी के भी साथ. आपकी बेटी या बेटे की भी बन सकती है, किसी की भी बने जा सकती है, कोई कठिन काम नहीं है. अंतर्वस्त्रों के भीतर सभी नग्न होते हैं, आपके बेटे की किसी ने हस्तमैथुन करते किसी ने सीडी बना ली और उसके दम पर आपके सारे खानदान पर अंगुली उठाए तो कैसा महसूस होगा? जबकि शत-प्रतिशत व्यस्क मनुष्यों को इसका अनुभव है, मुझे भी, आपको भी, आपके बेटे, भाई, बहन, पत्नी, बेटी, बुजुर्गों को भी. सिर्फ़ इसीलिए किसी को अपराधी मत ठहराइए क्योंकि वह सेक्स करता है, हर कोई करता है, कांग्रेसी और कम्यूनिस्ट भी. और अधिकतर कई औरतों/सोसाइटी गर्ल्स के साथ यौन संपर्क रखते हैं.
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KS on 28 January, 2009 20:02;17
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PARSHURAMAN JI
देश का हर राहुल भईया (गाँधी जी)आज कीचड़ में जा रहा है. लेकिन चोरी से. तब मैंने इशारा किया था अब साफ़ कर दू कि हमारी सभ्यता पाखण्ड की सभ्यता है. हम जिसे गुरूजी कहते हैं उसे मार देते हैं. जिसे राष्ट पिता कहते हैं, उसकी हत्या कर देते हैं. महात्मा गाँधी के साथ दो कुवारी कन्याओ पर मेरी नज़र नहीं गई, आपकी गई मुबारक हो. सोनिया गाँधी के चरित्र पर तो आपने निशाना साधा था. रही बात देश के आर्थिक दशा की तो उदारीकरण का जो दौर १९९१ में मनमोहन सिंह ने चालू किया था, उसे ही तो अटल जी कि सरकार ने आगे बढाया था. आज की दशा बीते १५ सालो के कारनामो का नतीजा है. इसमें सभी दल हिस्स्तेदार है. आप माने चाहे न माने संघ भी जिम्मेदार है. संघ की मिलावट और कट्टरता ही उसका असली चरित्र है.
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इरफ़ान on 28 January, 2009 21:59;59
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परशुराम भाई, यकीन मानिए मेरा इरादा संघ या किसी और दल पर फ्रस्ट्रेशन निकालने के बिल्कुल नही था. रही बात श्रीराम सेना द्वारा प्रदर्शन करने की, तो ये सिर्फ़ प्रदर्शन नही था. और वैसे भी श्रीराम सेना या शिवसेना जैसे दल क्या संस्कृति के ठेकेदार है? पब या क्लब जाना क़ानूनन कोई गुनाह नही है पर वहाँ जाने की कोई बाध्यता भी नही है. एक सवाल मैं आपसे पूछता हूँ, क्या हमे जीने के तरीके श्रीराम सेना जैसे दल सिखाएँगे? हमे क्या करना है, कहाँ जाना है ये सब हमे इनसे सीखने की ज़रूरत नही है. इन संकीर्ण विचारो की दुनिया से बाहर निकले परशुराम भाई और इतिहास मे झाँकने के बजे भविष्या की सोचिए. क्यों हम अपनी आने वाली पीढ़ी पर अपनी मानसिकता की सोच की फटी हुई चादर थोपना चाहते हैं? बदलाव प्रकृति का एक नियम है और ये निश्चित है.
वैसे मेरी समझ मे एक बात बिल्कुल नही आई की क्या आप इन दलों से सहमत है या मेरे लेख पर आपको एतराज़ है? कुच्छ भी हो आप ऐसी तुछ हरक़तो को किसी भी रूप मे जस्टिफाइ नही कर सकते. ये बात भी सच है की सिर्फ़ हमारी मानसिकता के कारण ही ऐसे तालिबानी दलों की संख्या मे हर दिन बढ़ोतरी होती जा रही है. पर ये सवाल है के किस दिशा मे ले जाना चाहते है ये लोग हमे? सवालो का जवाब सबको पता है पर कोई जवाब देना नही चाहता. काश ऐसा हो की हम कभी खुदको इन सवालो के जवाब दे पाएँ तो ये कुकुरमुत्ते की खेती बंद हो जाए
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Vivek on 28 January, 2009 23:30;11
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भारत में एक नहीं कई चीज़ें ग़लत हो रही हैं. मोरल पोलीसिंग उनमें से एक है. शिव सेना दूसरी. और भद्दी राजनीति और भ्रष्टाचार तीसरी और चौथी..कब तब गिन सकते हैं. इन सब मुद्दों पर ऐसी चर्चाओं से कोई फ़ायदा नहीं जब तक आप इस गंदगी में उतार कर इसे सुधारने की मंशा ना रखते हों. ऐसी चर्चायें पहले भी हुई हैं और आयेज भी होती रहेंगी और इन सबसे कोई कुछ नहीं बदल सकता, अगर आपको मैं पेसिमिस्ट लगता हून तो ज़रा रियलिस्टिक हो कर सोचें. जवाब खुद मिल जाएगा.
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abhishek on 28 January, 2009 23:40;54
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agar ye log, hindu sanskriti ko bachane ki kosis kar rahe hai to , ye aur kai kaam kar sakte hai, jaise:-
1. Mumbai main dawood ke dandhe kyo nai bandh karate.
2. sharab bandi ki kosis kyo nai karte.
3. corruption ka virodh kyo nai karte.
4. etc.
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Dinesh Krishna on 28 January, 2009 23:45;59
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When a female journalist called Soumya Vishwanathan was killed in India'a national capital, the Chief Minister of Delhi Smt Sheila Dixit blamed the dead female journalist for her own tragedy by saying that she was too adventurous. The Media wholeheartedly supported Mrs Dixit and went gaga over her shortly afterwards, when she won the Delhi Assembly elections.

When Scarlett Keeling was raped and killed in Goa and the needle of suspicion pointed to a strong nexus between the Goan Ministers, the drug mafia and the sex racketeers, the media played it very safe by conveniently choosing not to pursue the leads from the investigation.

When a 14-year-old German girl was raped by Rohit Monserrate, the 21-year-old son of Goa Education Minister Atanasio Monserrate who is also a powerful political figure in Goa, and the girl's mother was repeatedly harassed and their lawyer was grievously injured in order to coerce him to withdraw from the case, the Media didn't find anything extraordinary in that.

When Taslima Nasreen's press conference was rudely disrupted and chairs and all sorts of dangerous objects were thrown at her in full glare of the cameras by the "secular" muslim jihadis of Hyderabad lead by the MLAs of Majlis Ittehadul Muslimeen (MIM), the Media didnt at all find anything amiss in that.

When Laxmi Oraon, an Adivasi woman was brutally thrashed and paraded naked through the streets of Guwahati, Assam, with the whole police paraphernalia and official state machinery in tow, the Media chose to downplay the episode since, the victim was a hapless adivasi woman from the lower strata of society.

The Media felt that since all the above unsavoury incidents had occured in the states lead by Madam Sonia Antonia Maino's puppets, it is all perfectly legitimate and absolutely secular and progressive.

Kudos to the Media who are the Real Talibans of India.
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image इरफ़ान अली एन बी सी समूह न्यूयॉर्क, अमेरिका मे कार्यरत एक स्वतंत्र भारतीय. वे अपने आप को एक ऐसा युवा मानते हैं जो देश को जोड़ने और विकास की राह पर ले जाने के लिए देश की जनता के सोच मे बदलाव की कामना करते है. इरफ़ान देश के भविष्य के लिए उम्मीदवान है और आशा करते है देश की खुशहाली और विकास के लिए.
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सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
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आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
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एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
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