किसे करें वकील किससे मुंसिफी चाहें
लगभग उन्नीस महीने से डॉ. विनायक सेन रायपुर, छत्तीसगढ़, केंद्रीय कारागार की काल कोठरी में सांस ले रहे हैं। 14 मई 2007 से डॉ. विनायक सेन को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया है। डॉ. सेन मानवाधिकार संगठन लोक स्वातंत्र्य संगठन यानी पीयूसीएस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और छत्तीसगढ़ राज्य संगठन के महासचिव हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा स्थापित इस संगठन से वे लंबे समय से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।
आखिर किस अपराध में डॉ. सेन को गिरफ्तार किया गया है? पेशे से चिकित्सक डॉ. सेन छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बहुत पहले से अविभाजित मध्यप्रदेश में मानवाधिकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ, खास तौर से आदिवासियों के अधिकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ संगठन की ओर से अनवरत संघर्ष करते रहे। राज्य विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में वे सतत संघर्षरत रहे। आदिवासियों के अधिकारों के लिए उन्होंने अपने जीवन को समर्पित कर दिया। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ।।माओवादी।। का प्रभाव है। इस पार्टी की अन्य गतिविधियों के अतिरिक्त इसका सशस्त्र संघर्ष भी जारी रहता है, जिससे आए दिन पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों से भी सशस्त्र संघर्ष चलता रहता है।
इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्देश पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में सलवा जुडूम ।।आदिवासियों को जोड़ो।। आंदोलन चलाया गया। इसके चलते आदिवासियों के लगभग 640 गांव उजाड़ दिए गए। उनको कैंपों में अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया है और हथियारबंद कर नक्सलियों से संघर्ष हेतु संगठित किया गया है। आदिवासी विस्थापित होते जा रहे हैं और उनके गांव खाली। इस मानवद्रोही योजना का पीयूसीएल की ओर से डॉ. विनायक सेन ने आरंभ से ही रिपोर्ट निकालकर विरोध किया और सप्रमाण बताया कि आदिवासियों द्वारा खाली गांवों को पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने के लिए यह मुहिम चलाई जा रही है। तभी से डॉ. सेन सरकार की आंख की किरकिरी बन गए।
यही मूल अपराध है डॉ. सेन का। पुलिस का आरोप है कि वे न केवल माओवादियों को प्रश्रय देते हैं, बल्कि स्वत: भी माओवादी हैं। पुलिस अपने आरोप में प्रमाण दे रही है कि पश्चिम बंगाल के व्यापारी और माओवादी पीयूष गुहा को डॉ. सेन ने माओवादी शीर्ष नेता नारायण सान्याल द्वारा लिखित तीन पत्र दिए, जिन्हें सान्याल ने सेन को जेल में मुलाकात के समय दिए थे। डॉ. सेन पर आरोप है कि वे माओवादी नारायण सान्याल से रायपुर केंद्रीय जेल में तैंतीस बार मिले। इसके अतिरिक्त अन्य साक्ष्य भी पुलिस ने डॉ. सेन के विरुद्ध जुटाए हैं।
डॉ. सेन जब भी जेल में सान्याल से मिले, बाकायदा जेल अधिकारियों से अनुमति लेकर मिले और गंभीर रूप से बीमार सान्याल को चिकित्सकीय सलाह देते रहे, जो उनका डॉक्टर होने के कारण दायित्व था। उक्त आरोप के आधार पर पुलिस ने उन्हें 14 मई 2007 को विलासपुर में गिरफ्तार कर लिया। डॉ. सेन पर छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून 2005 की धारा 2बी, डी, 8/1/2/3 और 5, गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम-संशोधित अधिनियम 2004 की धारा 3, 10/ए, 20, 21, 38 और 39, भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 121ए और 124ए के तहत आरोप पत्र फास्ट ट्रैक अदालत में दाखिल किया है। अब तक की अदालती कार्रवाई के तहत पुलिस अपना आरोप सिद्ध नहीं कर सकी है और अभी कुछ दिनों पूर्व 285 पेज का एक और आरोप पत्र अदालत में पुलिस ने दाखिल किया है.
डॉ. सेन की गिरफ्तारी के बाद से उनकी जमानत के सभी प्रयास विफल साबित हुए हैं। हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया है। यही नहीं, पीयूसीएल की ओर से जब सर्वोच्च न्यायालय में छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून 2005 को दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और संगठन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र सच्चर ने चुनौती दी तो अदालत ने सुनने से ही इनकार कर दिया और संबंधित राज्य के हाईकोर्ट में जाने को कहा। अभी पिछले एक दिसंबर 2008 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने डॉ. सेन के एक और जमानत के प्रयास को नाकाम करते हुए जमानत देने से मना कर दिया।
गौरतलब है कि माओवाद के दमन को आधार बनाते हुए जो छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून 2005 लगाया गया है, उसके अंतर्गत कुल 54 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। दिलचस्प है कि जब उक्त कानून बनने की प्रक्रिया में था, तभी से पीयूसीएल ने अभियान चलाकर आशंका जाहिर की थी कि इस कानून के बन जाने से मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ उठने वाली हर उस आवाज को बंद कर दिया जाएगा जो इस कानून की निरंकुशता के खिलाफ होगी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिए जाने की आशंका इस कानून के बन जाने के बाद सच साबित हो रही है।डॉ. सेन ने `केवल अपने और अपने परिवार के लिए जीओ´ वाले सिद्धांत के इस भयंकर युग में अपने कैरियर को कोई अहमियत नहीं दी। उन्होंने छत्तीसगढ़ के मजदूरों, किसानों के लिए संघर्षरत शंकर गुहा नियोगी द्वारा स्थापित `छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा´ के प्रयास से स्थापित `शहीद अस्पताल´ को न केवल स्थापित करने में मदद की, अपितु अपनी सक्रियता से अस्पताल को जीवंत बना दिया, जिसमें गरीब आदिवासी किसानों मजदूरों की आज भी चिकित्सा होती है। यही नहीं, 140 देशों की अंतर्राष्ट्रीय ज्यूरी ने स्वास्थ्य व मानवाधिकारों के लिए `जोनथम मन अवार्ड 2008´ के लिए चुना।
14 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने डॉ. सेन की रिहाई की मांग की। डॉ. सेन की गिरफ्तारी के बाद से लगातार पूरे देश में धरना, जुलूस, प्रदर्शन, हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। देश के जाने-माने बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार, रंगकर्मी बराबर उनकी रिहाई के लिए आवाज उठा रहे हैं, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इससे यह आशंका सच साबित हो रही है कि आमतौर पर पूरे देश में और खास कर छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े पूंजीपतियों द्वारा लूटने का एक निरंकुश अभियान चलाया जा रहा है, जिससे भारी पैमाने पर गरीब किसान, आदिवासी विस्थापित किए जा रहे हैं। डॉ. सेन की गिरफ्तारी से संदेश दिया जा रहा है कि भूमंडलीकरण की नीतियों को चुनौती देने वाली प्रत्येक आवाज को कुचल दिया जाएगा।
हाल ही में हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में माओवाद से सर्वाधिक प्रभावित बस्तर संभाग की 13 विधानसभा सीटों में से 11 पर भाजपा प्रत्याशी विजयी रहे हैं। सलवा जुडूम चलाने वाले कांग्रेस प्रत्याशी महेन्द्र कर्मा दंतेवाड़ा से तो हारे ही, जीत का दावा करने वाले माकपा प्रत्याशी की भी हार हुई। भाजपा प्रत्याशी विजयी हुआ। तो क्या समझा जाए कि सरकार द्वारा लागू काले कानून को जन समर्थन है? फिलहाल द्वारा निर्णय पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
(चितरंजन सिंह पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) के राष्ट्रीय महासचिव हैं.)
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क्या हमारी न्यायव्यवस्था है नहीं या आप न्याय व्यवस्था पर विश्वास नहीं करते? हाईकोर्ट या सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत देने से इन्कार क्यों कर दिया? क्या सारे कोर्ट गलत थे या सरकार द्वारा प्रस्तुत विनायक सेन के विरुद्द प्रमाण पर्याप्त हैं?
आपके अनुसार सलवक़ जुडूम में गांववालों को उजाड दिया गया, उन्हें अमानवीय परिस्थिति में रखा गया तो उन्होंने उस इलाके से विनायक सेन के गुट के विरोध में वोट क्यों दिया? उन्होंने माओवादी हत्यारे नक्सलवादियों का साथ क्यों नहीं दिया?
क्या माओवादी हत्यारों के जुल्म सहते सहते गांव वालों को सलमा जुडुम के द्वारा अपनी रक्षा करने का हक नहीं है? या मानवीय हक सिर्फ माओवादियों के होते हैं, आम जनता के नहीँ?
पीयूसीएल की आवाज किसी आम आदमी के लिये क्यों नहीं उठती? सिर्फ देशद्रोह के अपराधियों के प्रति आपकी चीख पुकार अधिक क्यों सुनायी पड़ती है?
अपके ये नोबल प्राइज विनर यूएसए पैट्रियट एक्ट के बारे में अपनी जुबान सिल कर क्यों बैठ गये हैं? क्या उन्होंने इस एक्ट को नहीं पढ़ा ?
अरुन्धती छाप मानवाधिकारवादियों की बात न कीजिये, ये तो विदेशी पैसा या सम्मान पाकर कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे. हमारे देश मे जयचन्दों, मीरजाफरों का बड़ा इतिहास है.
जाने दीजिये, मैंने तो यूंही पूछ लिया, आपका काम तो बजाना है सो बजाते रहो
Anaam ji aapse Poori tarah se sahamt hoon. PUCL kya...kisi bhi deshdrohi ke paas koi jawab nahi hoga.
Vinayak sen ya PUCL se hamara bhale koi lena dena na ho parantu in prashno ka jawab hame khojna hoga..
Kya yah sahi nahi he ki satta ke charitra me dhanbal ke chalte aisa ghun laga hua he jo prakritik sansadhano ko bhi audyogik gharano ko besharm tarike se bech dalti he..?
yehi chhattisgarh me ek puri nadi ko sarkar ne bech dala tha... Kya ham madhy yug ki taraf badh rahe hein jaha sare sansadhano ka adhikar aur upbhog kuchh abhijaty vargo ke hatho me hota tha?
Aur aakhiri baat ye ki kya bina vichardhara ka thappa lagaye julm ya shoshan ki baat kehna bhi nagawar guzarane laga he hame?
विनायक को इंतजार करना चाहिय किसी मेगसस या दुसरे पुरुस्कार का.
यह आदमी न केवल माओवादी है बल्कि देश द्रोही भी है. इस व्येक्ती ने देश तोड़ने और भोले भाले आदिवासियो को अपनी शिक्षा से प्रभावित करके देश के खिलाफ षड़यंत्र रचा ही. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल सही निर्णय लिया है. इस को तो फासी पर चढा देना चाहिय था और एक देश द्रोही के मित्र चितरंजन देश की समानित वेबसाइट पर डॉ. विनायक के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं.
अफज़ल गुरु के लिया भी डॉ. विनायक के समर्थक प्रचार कर रहे है.
ये प्रगतिशील लोग आज डॉ. विनायक को कोई ने कोई अन्तेर्र्राष्ट्रीय सम्मान दिला कर ही रहंगे.
हिंदुस्तान मैं रहते हैं इसी की रोट्टी तोड़ते हैं अरुन्धिती भी येही करती हैं और हिंदुस्तान के न्याय तंत्र मैं भरोसा नही तो फिर देश छोड़ कर मंगल ग्रह पर क्यों नही बस जाते. कम से कम हिंदुस्तान पर से तो इन कीडे मकोडों का बोझ कम होगा. यह सलाह चितरंजन जो इस लेख के लेखक हैं उन को भी हैं. कम से कम किसी अच्छी बात के लिया लेख लिखा होता इस देशद्रोही के लिया तो समय काला नही किया करो. नही तो सुनने मैं आया हैं विदेशो से पैसा भी मिलता हैं डॉ. विनायक के लिया हिंदुस्तान के देशवासियो को भड़काने के लिया. कहीं कहानी ये ही तो नही. क्यों चितरंजन जी चिंता स्वाभिक तो नही.
सबसे पहले, इस देश के सर्वोच्च न्यायलय ने उनकी जमानत रद्द की. मुझे लगता है की सर्वोच्च न्यायालय पर तो संदेह नहीं किया जा सकता. दूसरे, बीजेपी और कांग्रेस दोनों के नेताओं ने मिल के सलवा जुडूम को बनाया, हैरानी की बात है की सेकुलर (??) और सांप्रदायिक (??) शक्तियों ने इसे बनाया. यदि इन लोगों को जनता का भी समर्थन हासिल है तो मुझे गलती कहीं और ही लगती है.
"डॉ. सेन जब भी जेल में सान्याल से मिले, बाकायदा जेल अधिकारियों से अनुमति लेकर मिले और गंभीर रूप से बीमार सान्याल को चिकित्सकीय सलाह देते रहे, जो उनका डॉक्टर होने के कारण दायित्व था", ये तर्क भी पुलिस के आरोप को ग़लत साबित नहीं करता. रही बात की आदिवासियों की ज़मीन पूंजीपतियों को देने की तो पश्चिम बंगाल की सरकार ने सिंगूर में यही करने की कोशिश की थी. इस मुद्दे पर तो राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए.
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