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समाजसेवा भी भयानक राजनीति है अरूंधति जी

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आठ दिन पहले रायपुर में गर्मी 43 डिग्री थी और तस्वीरें गवाह है कि ये लोग आठ से पंद्रह साल के बच्चों को पोस्टर पकड़वा कर धरना दिला रहे थे, गिरफ्तारी दिला रहे थे। यह बाल शोषण नहीं है? दूसरे करें तो बवाल मचा देंगे, खुद कर रहे हैं तो ठीक है? कोई शक नहीं कि अरूंधति जी एक (हाईपर) बौद्धिक तबके का प्रतिनिधित्व करती है परंतु ऐसी बौद्धिकता कैसी जो सिर्फ़ एकपक्षीय नज़र आए। नहीं तो उन्हें सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद ही यह क्यों ख्याल आया कि सलवा जुड़ूम के चलते बस्तर में गृह युद्ध के हालात पैदा हो गए हैं।

हाल ही में जानी-मानी लेखिका व एक्टीविस्ट अरूंधति रॉय का इंटरव्यू रविवार डॉट कॉम के माध्यम से पढ़ना हुआ। वे कहती हैं कि कम्यूनिस्ट कैपिटलिज़्म एक भयानक चीज है। संभव है वे सही कहती हों। लेकिन जिस राज्य में बैठकर उन्होंने यह इंटरव्यू दिया है वहां का एक निवासी होने के नाते मैं देख रहा हूं कि यहां तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा की जा रही समाजसेवा  की राजनीति तो उससे भी ज्यादा खतरनाक साबित होते जा रही है। अपने इंटरव्यू में अरूंधति जी एक जगह कहती हैं कि बस्तर के लोग अस्पताल, स्कूल या सड़क भी नहीं मांग रहे थे। तो क्या आपके कथन का यह अर्थ निकाला जाए कि  बिना मांगे तो उन्हें मूलभूत सुविधाएं दी ही न जाएं, भले ही इलाज के अभाव में वे मरें या  उनके बच्चे शिक्षा के अभाव में  नक्सलियों के बाल संघम के सदस्य बनते जाएं? बच्चों से याद आया, खबरें बताती हैं कि नक्सली बच्चों का उपयोग न केवल मैसेंजर के रूप में कर रहे हैं बल्कि अब तो उनका उपयोग वारदातों के लिए भी कर रहे हैं। इस मुद्दे पर भी कभी विरोध करते नहीं दिखते ये एक्टीविस्ट, मानवाधिकार संगठन और बाल शोषण पर आवाज उठाने वाली संस्थाएं। ऐसा क्यों?
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आठ दिन पहले रायपुर में गर्मी 43 डिग्री थी और तस्वीरें गवाह है कि ये लोग आठ से पंद्रह साल के बच्चों को पोस्टर पकड़वा कर धरना दिला रहे थे, गिरफ्तारी दिला रहे थे। यह बाल शोषण नहीं है? दूसरे करें तो बवाल मचा देंगे, खुद कर रहे हैं तो ठीक है? कोई शक नहीं कि अरूंधति जी एक (हाईपर) बौद्धिक तबके का प्रतिनिधित्व करती है परंतु ऐसी बौद्धिकता कैसी जो सिर्फ़ एकपक्षीय नज़र आए। नहीं तो उन्हें सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद ही यह क्यों ख्याल आया  कि सलवा जुड़ूम के चलते बस्तर में गृह युद्ध के हालात पैदा हो गए हैं।

नहीं तो किसी एक व्यक्ति विशेष के मुद्दे पर ही उन्हें छत्तीसगढ़ आने की जरुरत क्यों पड़ती। क्या वे नहीं जानती कि बस्तर में निर्दोष खून सिर्फ़ सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद से नहीं बल्कि पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से बह रहा है। तब से अब तक वे पहले क्यों नहीं आईं?

सवाल वही उठता है कि क्यों अरूंधति रॉय या अन्य समकक्ष बुद्धिजीवियों को पिछले दो-तीन साल में ही छत्तीसगढ़ आने की जरुरत पड़ी? क्या इससे पहले होता खून-खराबा उन्हें दिखाई नहीं पढ़ता था या वे अखबार आदि पर नज़र नहीं डालते थे? आश्चर्य है कि अचानक एक व्यक्ति विशेष के मुद्दे के बाद ही उन्हें यह जानकारी लगी कि यहां छत्तीसगढ़ में बस्तर भी कोई जगह हैं जहां 'कुछ' हो रहा है जिसके लिए छत्तीसगढ़ जाना चाहिए?

सवालात और भी सामने आते हैं। जैसे कि पिछले कई सालों से जब माओवादी आम लोगों की हत्याएं कर रहे हैं,बारूदी सुरंगे लगाकर विस्फोट कर पुलिस जवान समेत आम लोगों की हत्याएं कर रहे। सरकारी संपत्ति का नुकसान कर रहे हैं, ना जाने कितने मासूमों को अनाथ बनाए जा रहे हैं, बस्तर में रहने वाले व्यापारियों को जबरिया उनकी ज़मीन-ज़ायदाद से बेदखल कर बाहर भगा रहे हैं। तब इन लोगों की नज़र इस सब पर क्यों नहीं जाती?

सवाल यह भी है कि क्या मारे जा रहे  आम लोग या पुलिसकर्मी मानव नहीं हैं, क्या जीना उनका मौलिक अधिकार नहीं है?  जब माओवादी ऐसे नरसंहार करते हैं तो उसके विरोध में ये लोग छत्तीसगढ़ या राजधानी रायपुर में क्यों नहीं आते? क्या माओवादी जो कर रहे हैं, सही कर रहे हैं?

और पिछली बार 2007 में इतने बड़े-बड़े नामधारी एक्टीविस्टों के रायपुर से लौटने के बाद माओवादी और भी उग्र होकर जानलेवा गर्मी में समूचे बस्तर में जगह-जगह बिज़ली टावर गिरा रहें थे, बिज़ली सप्लाई लाईन काट  रहे थे,यातायात बाधित कर रहे थे जिसके कारण वहां लोगो को कई दिन खाद्यान्न व सब्जियां ढंग़ से नहीं मिली ना ही बिज़ली। और माओवादी  बस्तर में "ब्लैक-आउट" के हालात पैदा कर रहे थे। तब, तब इन सब माननीय स्वनामधन्य लोगों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया, क्यों नहीं तब ये सब  रायपुर आए विरोध प्रदर्शन करने, प्रेसवार्ताएं लेने व ज्ञापन देने या धरना प्रदर्शन करने?

ये सब बहते निर्दोष खून को देखकर चुप  रह जाते हैं। स्कूलों को तोड़े जाते देखकर भी खामोश रह लेते हैं। जान बचाने के लिए आदिवासियों को अपना गांव-घर-खेत छोड़ते देखकर भी निस्पृह रह लेते हैं। इन मामलों के विरोध में आवाज लगाते तो न ही अरूंधति जी न ही बाकी अन्य, कभी नहीं दिखे छत्तीसगढ़ में ये सब लोग। लेकिन जो मामले अदालत में चल रहे हैं उसके विरोध में आवाज जरुर लगा सकते हैं?

यह कैसा इन लोगों का विरोध और कैसी बौद्धिकता? काश कोई बताए कि इन सब बड़े नामधारियों की बस्तर को लेकर नींद सिर्फ़ दो-तीन साल पहले ही क्यों खुली? इससे पहले यह अविभाजित मध्यप्रदेश के समय या दो-तीन साल से और पहले क्यों नहीं आए? कोई यह भी बताए कि इन सब एनजीओ की फंडिंग आखिर हो कहां से रही है कि किसी एक व्यक्ति विशेष के लिए ऐसा आंदोलन खड़ा किया जा रहा हो और उस आंदोलन को कई देशों के कई संगठनों का सहयोग मिल रहा हो?

क्या अरूंधति जी अपने बस्तर प्रवास के एक-एक पल का ब्यौरा उपलब्ध करवाएंगी कि कहां-कहां किस-किस से मिली?

और एक और खास बात, क्यों ये सब नामधारी इस तरह के सवालों के जवाब देने से कन्नी काट जाते हैं, भई जब आप एक जनांदोलन खड़ा कर रहे हैं तो जन के सवालों का जवाब क्यों नहीं दिया जाता। इन पंक्तियों के लेखक ने ई-मेल ही पर मेधा जी से और हर्षमंदर जी से भी  उपरोक्त सवाल पूछे पर……………कोई जवाब नहीं…………अरूंधति जी के इंटरव्यू का समापन वरिष्ठ पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल ने मुक्तिबोध की प्रसिद्ध लाईन के साथ किया था कि 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है'? तो यहां भी समाप्ति इसी लाईन के साथ हो रही है कि साहिबान आप सबकी पॉलिटिक्स क्या है? माओवादी हिंसा के विरोध में है या समर्थन में?

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आलेख अपने स्थान पर सही है। जो लोग छत्तीसगढ़ आ कर डॉ. बिनायक सेन की रिहाई की मांग कर रहे हैं ये सवाल उन से अवश्य पूछे जाने चाहिए और इन नामधारी सामाजिक कार्यकर्ताओं को इन का उत्तर भी देना चाहिए।

लेकिन मेरा मानना है कि बिनायक सेन पर लगाए गए आरोपों में दम नहीं है। उन्हें साबित कर पाना असंभव प्रतीत होता है। ऐसी अवस्था में छत्तीसगढ़ सरकार को भी इस मामले मे पुनर्विचार करना चाहिए। कथित नक्सल समस्या से बिनायक सेन का मामला पृथक है। यदि छत्तीसगढ़ सरकार इन आरोपों को साबित नहीं कर सकी तो उसे बिनायक सेन के मामले में बहुत नीचा देखना पड़ेगा।

छत्तीसगढ़ की बस्तर के आतंकवाद की समस्या आदिवासियों से जंगल पर निर्भर जीवन छिन जाने और उन्हें वैकल्पिक जीवन के साधन नहीं मिलने से उत्पन्न है। इस का हल भी वहीं से निकलेगा। जो लोग इस आतंकवाद को चला रहे हैं न तो वे नक्सल हैं न माओवादी, वे केवल जंगल की उपज पर कब्जा जमाए अपराधी हैं और वहाँ से अपने धन्धे चला रहे हैं। उन्होंने इन दोनों विचारों का नकाब ओढ़ा है। और आदिवासियों को उकसाया है। उन्हें ही सरकार से लड़ाई के लिए आगे किया है। इधर सलवा जुडूम के जरिए जो संघर्ष छिड़ा है उस में भी आदिवासी सम्मिलित हैं। दोनों तरफ आदिवासी जीवन संकट में है। एक ओर सरकार है और कथित सभ्य दुनिया है दूसरी ओर अपराधी हैं। इन दोनों के बीच नष्ट होते आदिवासी के लिए कोई तो राह निकालनी होगी। आदिवासियों के पक्ष में उन की एकता के पक्ष में छत्तीसगढ़ की जनता का मजबूत आंदोलन ही ऐसी राह निकाल सकता है।

किसी भी समस्या का समाधान समस्याग्रस्त क्षेत्र की जनता ही कर सकती है। बाहरी तत्व केवल मदद कर सकते हैं, उन की इस से अधिक भूमिका नहीं हो सकती। इस समस्या का हल भी छत्तीसगढ़ में ही निकलेगा। बस्तर के लोग और छत्तीसगढ़ के उन के नजदीकी मित्र ही इस काम को कर सकते हैं।

(मेरी यह राय सामान्य अध्ययन के आधार पर है, हो सकता है बहुत सारे तथ्य ऐसे हों जो मेरे ज्ञान में न हों। इस राय का उद्देश्य इस समस्या के हल की ओर कदम उठाने के लिए कोई राह तलाशने का आरंभ करना या उस में योगदान करना मात्र है।)
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Mahesh Sinha on 27 April, 2009 17:30;09
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dinesh ji
itni badi takton ka isme saamil hona hee sabse bada sandeh hai. aap ka kahna sahi hai kee samasya ka hal local level par hi niklta hai. Srilanka ko bhi khud hal dhoondhna pada. aur jab woh apni ladai kee jeet ke kagar par pahunch gaya to antarrashtriya giddh jhoom pade apna presence dikhane ke liye. kahaan the ye jab tak srilanka dikkat mein tha? aur to aur Bharat bhi unme samil ho gaya ! bhool gaye ham Rajiv Gandhi ko.
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संजीत भाई बस्तर के दर्द को स्वर देने का धन्यवाद। अरुंधति राय और इन जैसे तथाकथित हाईप्रोफाईल लोगों की वैचारिक बकवास को झुठलाना आवश्यक है।
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anjeev pandey on 03 May, 2009 19:08;43
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संजीतजी,
इसी को कहते हैं छद्म युद्ध यानी की साई वार। इसी में तो इन कथित बुद्धिजीवियों को महारथ हासिल है। इन कथित मानवाधिकारियों और बुद्धिजीवियों के कारण ही नक्सली हों या कोई अन्य अलगाववादी, दुनिया के सामने हकीकत सही स्वरूप में नहीं पहुंच पाती है। हर समय सफेद-सफेद झूठ के माध्यम से ये लोग वैचारिक धारा की दिशा मोड़ देते हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब हम बड़े-बड़े पत्रकार, लेखक, न्यायविद्, चिकित्सकों, अभियंताओं को इसमें संलग्न पाते हैं। खैर, छत्तीसगढ़ में एक सुकून की बात यह है कि जिस प्रकार करीब १ साल पहले मीडिया का एक बड़ा वर्ग नक्सलियों के पक्ष में प्रचार तंत्र का हिस्सा था, वहीं अब एक बड़ा वर्ग इनके विरोध में खड़ा है। अच्छा संकेत है। इससे जमीनी स्तर पर उनके साथ युद्ध कर रहे पुलिस के जवानों का भी मनोबल बना रहता है। ऐसी बेबाक टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

अंजीव पांडेय, सिटी चीफ, जनसत्ता, रायपुर
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