विस्फोट पर अस्थाई कार्य विराम
विस्फोट.कॉम जरूर मेरा अपना निजी प्रयास है लेकिन इसको आगे ले जाने में हमारे साथियों, खासकर ब्लाग जगत से जुड़े साथियों का बहुत अहम योगदान रहा है. उन्होंने न केवल इसको प्रचारित किया बल्कि अपने ही बीच का एक काम मानकर इसको बढ़ाने का भी काम किया. देखते ही देखते एक साल के अंदर विस्फोट देश की सबसे चर्चित साईट हो गयी. लेकिन किसी को काम को बढ़ने के लिए सिर्फ जब्जे के अलावा भी दूसरे सहयोग चाहिए होते हैं.
विस्फोट के कारण बहुत सारे ऐसे लोगों से मिलना हुआ जो मानते हैं कि यह अच्छा और निष्पक्ष प्रयोग है और किसी भी कीमत पर यह बंद नहीं होना चाहिए. उनकी इच्छा और सद्भावना भी सिर आखों पर. लेकिन केवल सद्भावना से अच्छे काम चल जाते तो आज देश समाज की हालत ऐसी नहीं होती.
अच्छे कामों को चलने के िलए भी धन की जरूरत होती है. साधन की जरूरत होती है. आज विस्फोट जितना काम कर रहा है यह हमारे पास मौजूद साधन का अधिकतम उपयोग है. लेकिन अब मैं भी छीज गया हूं. कुछ बचा नहीं है. महीने दर महीने का संघर्ष अब रोज-ब-रोज के संघर्ष में बदल गया है. हालांकि चतुर खिलाड़ी की तरह इतना खोलकर हमें बात नहीं करनी चाहिए लेकिन आप हकीकत को कब तक छिपा सकते हैं? किसी न किसी दिन सच्चाई को स्वीकार करना ही होता है. और हमारी सच्चाई यह है कि अब हम इस काम को स्तरीय और सम्मानजनक तरीके से चलाये रखने में असमर्थ हैं.
यह सहानुभूति बटोरने के लिए नहीं बल्कि अपने समर्पित पाठकों के सामने अपनी वास्तविक स्थिित बयान कर रहा हूं. मैं थक चुका हूं. इसलिए इस काम को फिलहाल अस्थाई तौर पर रोक रहा हूं. अगर कोई व्यवस्था बनती है तो निश्चित रूप से इसे दोबारा शुरू करूंगा. दोगुने उत्साह से शुरू करूंगा. लेकिन अभी जो परिस्थिति है उसमें मैं इस काम को खींच रहा हूं. खींचकर कोई काम बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकता. इसीलिए मैं यह तो नहीं कह रहा कि इस काम को मैं बंद कर रहा हूं लेकिन इस तरह से लंबी यात्रा करना भी मुश्किल है. मैं अगर अमेरिका में होता वेंचर केपिटलिस्ट के पास जाता और कहता कि देखो यह काम कर रहा हूं पैसा लगाओ. अगर यूरोप में होता तो ग्रीनपीस की तर्ज पर लोग मदद करते. लेकिन मैं जानता हूं कि न तो मैं अमेरिका में हूं और न ही यूरोप में. मैं भारत में हूं और मेरे जैसे न जाने कितने जज्बे वाले लोगों को यहां हर रोज कुचल दिया जाता है. इसके कारण बहुत गहरे हैं इसलिए विस्तार से उसमें जाने की जरूरत नहीं है.
विस्फोट पर यह विराम मेरे अपने लिए बहुत बड़ा नुकसान होगा. लेकिन अब मेरे पास और कोई रास्ता बचा नहीं है. अगर कोई व्यवस्था बनी तो हम जरूर आपके लिए फिर से काम करेंगे. नहीं बन पायी तो जितना काम कर आये हैं, उसे ही मेरी सेवा मानकर मुझे माफ कर सकें तो कर दीजिएगा.
सादर,
संजय तिवारी
विस्फोट.कॉम
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मेरे लायक कोई काम हो तो जरूर बताइयेगा
राजीव जैन
mr.rajeevjain@gmail.com
विस्फोट बंद नहीं होगा.
ये बात सही है कि हमारा सामाज अमरीकी या यूरोपही नहीं है. लेकिन हम हिन्दुस्तानी है........
नेक काम , सामाज हित में काम , तो हो कर ही रहेगा....
निराश होने कि जरुरत नहीं है.......
आने वाले समय में विस्फोट बहुत आगे जाएगा.....
अनूप
फिर मिलते हैं, एक छोटे से ब्रेक के बाद
श्री पवनपुत्र जी, मैं आपसे इतना ही कह सकता हूं कि संजय के बारे में आपकी धारणा एकदम गलत है
iske baat ka buraa maanne ki koi jarurat nahi hai....
ak ajnabi
हम सब संघर्ष ही कर रहें है....हारना या थकना नहीं है. विराम दुगने जोश के लिए जरूरी है.
विश्वास है, नए जोश नए अंदाज में पूनरागमन होगा.
संजय जी के फिर से सक्रिय होने का हम सभी को इंतजार रहेगा।
आभार के साथ
यशवंत सिंह
"hoie wahi jo Ram rachee rakha". Wish you good luck and awaiting for the next issue of VISFOT;
SACHI
net par bloging karne wale aur dusre kae portal par wah chich publish hoti hain jo print me kahi nahi chap saki, quality ka matter nahi hota hain . par visfot par quality mentain rahi. esaki kami hamesa kahlegi.
mujhe lagta hain visfot se jude mitro keo aage aakar vaicharik vimarsh ke es karwa ko age badhana chahiye.
sanjay swadesh
sanjayinmedia@rediffmail.com
आपका निर्णय कटु लेकिन व्यवहारिक है. हमारा सोच और आचरण निहायत फ़ोकट कल्चर में जीता है. क्या आप यक़ीन करेंगे कि मेरे शहर इन्दौर में तक़रीबन हर हफ़्ते संगीत और नाटक के जल्से होते हैं और सभी फ़्री. जहाँ पच्चीस पचास रूपये का टिकिट लगाइये तो वहाँ एक्साइज़ के लफ़ड़े या संस्थागत हिसाब किताब के झगड़े.इन्हीं आयोजनों में फ़ोकट के श्रोता/दर्शक पन्द्रह रूपये वाहन पार्किंग का चुकाने को तैयार हो जाते हैं. यह स्थिति हिन्दी भाषी लोगों की है जबकि मेरे शहर में ही मराठीभाषियों की एक संस्था प्रतिमाह एक मराठी नाटक दिखाती है और दर्शक बाक़ायदा अग्रिम सदस्यता शुल्क प्रदान करते हैं.यहाँ यह बात इसलिये कह गया कि हम हिन्दी वाले फ़्री का माल उड़ाने के बेहतरीन खिलाड़ी हैं. विस्फ़ोट का विराम अल्प-विराम ही ऐसी कामना करता हूँ. आपने वाक़ई अल्प समय में हिन्दी मे गुणवत्तापरक कंटेंट उपलब्ध करवाया संजय भाई. मैं ख़ुद बहुत तो नहीं लिख पाया विस्फ़ोट पर लेकिन म्युज़िक के रियलटी शोज़ पर मेरी एक ही स्टोरी पर मुझे पूरे देश से प्रतिसाद मिला था जो विस्फ़ोट की ताक़त और आपनी मेहनत की पावती है. हम हिन्दी वाले जब अच्छी चीज़ों का मोल चुकान सीख जाएंगे तब निश्चित ही हिन्दी के अच्छे दिन शुरू हो जाएंगे.
भारी मन से अपनी बात को विराम देता हूँ.
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