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20,000 तमिलों के नरसंहार का जिम्मेदार कौन?

image राजपक्षे के साथ एम के नारायणन

राजीव गांधी इस देश के प्रधानमंत्री थे और एक आतंकवादी संगठन द्वारा उनकी हत्या कायरतापूर्ण कृत्य थी। इस हत्याकांड में शामिल लोगों को यह राष्ट्र माफ नहीं कर सकता, इसलिए सोनिया गांधी के इस प्रतिशोध का विरोध नहीं किया जा सकता। सोनिया गांधी और उनकी पुत्री ने इस हत्याकांड में शामिल नलिनी को जिस तरह माफ किया था उससे उनकी दयालुता पर अंतरात्मा भी द्रवित हुई थी। पर लिट्टे के खात्मे के लिए सोनिया गांधी की सहमति से जिस तरह की सैन्य कार्रवाई हुई, उसमें जिस अंदाज में हजारों निर्दोष तमिलों को बर्बरतापूर्वक मारा गया, उसके छींटे से 10, जनपथ की समग्र शुभ्रता खून से रंगी नजर आती है। दयालु सोनिया का चेहरा पाषाणवत सख्त नजर आता है।

26/11 के आतंकवादी हमलों के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव और केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील को अपने पदों से इस्तीफा देने का निर्देश भेज दिया था। सुरक्षा मामलों का मामूली जानकार भी बता देगा कि 26/11 के हमलों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री से कहीं ज्यादा अगर कोई व्यक्ति विफल हुआ था तो वह थे केंद्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन। खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक श्रीमान नारायणन ने प्रधानमंत्री से मिलकर अपने पद से इस्तीफा देने की पेशकश भी की, किंतु उनकी पेशकश को साभार वापस कर दिया गया। क्यों? दरअसल, उस समय एम.के. नारायणन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेहद व्यक्तिगत प्रतिशोध से प्रेरित एक ऑपरेशन को अंजाम दे रहे थे। यह प्रतिशोध था उनके स्वर्गीय पति राजीव गांधी के हत्यारे संगठन लिबरेशन तमिल टाइगर्स ईलम (लिट्टे) और उसके प्रमुख वेलुपल्ली प्रभाकरन के खिलाफ।

सोनिया गांधी ने 26/11 की घटना के बाद एम.के. नारायणन को पद पर सिर्फ इसलिए बने रहने दिया क्योंकि वे लिट्टे और प्रभाकरण के सफाये के लिए बनी उच्चाधिकार समिति के समन्वयक थे जिसका नेतृत्व श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्र राजपक्षे थे। इस समिति में दोनों देशों के तीन-तीन सदस्य शामिल थे। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इस समिति में अपने दो भाइयों बासिल राजपक्षे (श्रीलंका सरकार के वरिष्ठ सलाहकार) और गोतबाया राजपक्षे (रक्षा सचिव) के अलावा अपने सचिव ललित वीरतुंग को नियुक्त किया था। भारत की ओर से इस समिति में एम.के. नारायणन के अलावा विदेश सचिव शिवशंकर मेनन और रक्षा सचिव विजय सिंह को स्थान दिया गया था। भारत सरकार को श्रीलंका में मारे जा रहे निर्दोष नागरिकों के बारे में हर दिन जानकारी प्राप्त हो रही थी, बावजूद इसके सरकार चुप्पी साधे बैठे रही। लंदन की पत्रिका `टाइम्स´ का दावा है कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून के पास भी यह जानकारी थी कि श्रीलंका सेना ने कम-से-कम 20 हजार निर्दोष नागरिकों का नरसंहार किया है। भारत सरकार तब भी चुप है, क्यों? क्योंकि भारत सरकार का रिमोट कंट्रोल जिन सोनिया गांधी के पास है वे अपने पति के हत्यारों वी. प्रभाकरन और पोट्टू अम्मान की मौत से खुश हैं। 21 मई को राजीव गांधी की शहादत हुई थी। यह दिन पिछले 18 वर्षों से गांधी परिवार के लिए शोकपूर्ण होता है। इस वर्ष आपने अगर राजीव गांधी की समाधि`वीरभूमि´से लौटते हुए गांधी परिवार की तस्वीरें न देखीं हों तो एक बार जरूर देख लें। राहुल गांधी, प्रियंका वाडरा और रॉबर्ट वाडरा के चेहरे आपको हंसते हुए नजर आएंगे। सोनिया गांधी के चेहरे पर भी संतोष का भाव साफ नजर आएगा। यह स्मित हास्य गांधी परिवार के चेहरे पर चुनावी जीत से नहीं आया है क्योंकि वे सत्ता में पिछले 5 वर्षों से हैं और उतनी ही में अब भी रहने वाले हैं। उनका संतोष 19 मई को प्राप्त प्रभाकरन की मौत की खबर से है।

प्रभाकरन की मौत पर जब उनके `मित्र´ एम. करुणानिधि नहीं रोए और अपने परिवार को सत्ता में बैठाने का जश्न मनाते रहे तो और किसी का स्यापा करने का कोई औचित्य नहीं। दुख बस इस बात का है कि श्रीलंका ने चीन-पाकिस्तान की मदद से भारतीय मूल के तमिलों का जमकर कत्लेआम किया, लाखों परिवारों को बेघर कर दिया और हम मौन साधकर सिर्फ इसलिए तमाशा देखते रहे कि उन निर्दोष तमिलों के बीच एक हत्यारा छिपा था जिसने हमारे सत्तातंत्र के मुखिया परिवार के प्रमुख की हत्या करवा दी थी। जून 2004 में जब सोनिया गांधी के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने भारत की सत्ता संभाली थी, उस समय वी. प्रभाकरन आराम से श्रीलंका में बैठा था, उसके पास एक चौथाई श्रीलंका की सत्ता थी। वह तमिलनाडु की राजनीति को प्रभावित करने का माद्दा रखता था। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के कुछ घटक दल खुलकर प्रभाकरन की जयकार करते थे। जब एमडीएमके प्रमुख वाइको पर एआईईएडीएमके प्रमुख जे. जयललिता ने प्रभाकरन समर्थक वक्तव्य देने के लिए `पोटा´ लगाया था, उस समय राजग के संयोजक और तत्कालीन प्रतिरक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस स्वयं उससे मिलने जेल गए थे। 2004 तक भारत की राजनीति में प्रभाकरन से संपर्क रखना गलत नहीं माना जाता था। श्रीलंका सरकार पर प्रभाकरन की हनक थी। लिट्टे के पास श्रीलंका में 15 हजार वर्ग किलोमीटर का अपना साम्राज्य था। लिट्टे बैंक संचालित करता था, उसकी अपनी राज्य संचालन की स्वायत्त इकाई थी। श्रीलंका सरकार से लिट्टे `सीजफायर´ कर चुका था। नवंबर 2005 में श्रीलंका की सरकार बदली, वहां महिंद राजपक्ष राष्ट्रपति बने। लगभग नौ महीनों तक राजपक्ष ने भी लिट्टे से `सीजफायर´ का पूरा सम्मान किया। अगस्त 2006 में दक्षिण त्रिंकोमाली में मविलारू में आत्मघाती हमला हुआ। श्रीलंका सरकार तो जैसे इस हमले का इंतजार ही कर रही थी। 2002 से जारी `सीजफायर´ के दौरान लिट्टे में बगावत हो चुकी थी। उसके चार शीर्ष कमांडरों में से तीन को प्रभाकरन खो चुका था। कर्नल करुणा, सिवनेसथुराई चंद्रकांतन उर्फ पिलैयन और डगलस देवनंद लिट्टे से अलग हो गए। राजपक्ष ने इन तीनों को अपनी सरकार में शामिल कर लिया। इनके साथ लट्टे के लगभग 5000 प्रशिक्षित कमांडो अलग हो गए। पिलैयन इस समय पूर्वी प्रांत का मुख्यमंत्री है तथा कर्नल करुणा और डगलस देवनंद केंद्रीय कैबिनेट के सदस्य। दरअसल प्रभाकरन से जुलाई में 5000 प्रशिक्षित कमांडो अलग हो गए। पिलैयन इस समय पूर्वी प्रांत का मुख्यमंत्री है तथा कर्नल करुणा और डगलस देवनंद केंद्रीय कैबिनेट के सदस्य। प्रभकरन जुलाई 2001 में हवाई हमले की अपनी सफलता और स्कैंडिनेवियाई देशों की मध्यस्थता से हुए `सीजफायर´ से खुद को अजेय मानने की गलती कर बैठा। सनद रहे कि जुलाई 2001 में प्रभाकरन ने पूरी दुनिया को चौंकाते हुए श्रीलंका पर एक भीषण हमला किया था। इस हमले में श्रीलंका की वायुसेना बेस और कोलंबो के भंडारनायके अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे समेत देश की लगभग आधी उड्डयन क्षमता नष्ट हो गई थी। दो दशक से जारी लड़ाई के चलते श्रीलंकाई थल सेना और नौ सेना पहले से ही सीमित क्षमता में थी। इस हमले के बाद प्रभाकरन इतना निर्भय हो गया कि अप्रैल 2002 में लिट्टे के किलिनोच्चि स्थित मुख्यालय में उसने अपने जीवन की पहली और एकमात्र प्रेस कांफ्रेंस की।

श्रीलंका सरकार ने सितंबर 2002 से मार्च 2003 तक चार देशों में छह चरणों में लिट्टे से शांतिवार्ता की। प्रभाकरन का यह आत्मविश्वास बेजा भी नहीं था। वह श्रीलंका सरकार को बारंबार नीचा दिखा चुका था। उसने इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (आईपीकेएफ) को तमिलों के बीच इटालियन-पारसी किलिंग फोर्स की संज्ञा दी थी। कर्नल करुणा द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन के अनुसार 1980 के दशक में इस आईपीकेएफ ने लिट्टे का पूरा सफाया कर दिया था। उस समय श्रीलंका के राष्ट्रपति प्रेमदासा ने लिट्टे को किस कदर जिंदा किया इसका अनुमान कर्नल करुणा के इस बयान से आप सहज लगा सकते हैं कि `जब लिट्टे के पास केवल 250 लड़के शेष बचे थे तब प्रेमदासा ने उन्हें 5000 टी 56 रायफलों का जखीरा भिजवाया था। प्रभाकरन ने क्रमश: आईपीकेएफ भेजनेवाले राजीव गांधी और उसके खिलाफ मदद पहुंचानेवाले प्रेमदासा दोनों की हत्या करा दी। प्रभाकरन का नेटवर्क कितना तगड़ा था इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि 1993 में जब भारतीय उपमहाद्वीप में आम आदमी ने वेब प्रौद्योगिकी का नाम भी नहीं सुना था तब लिट्टे अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी के सर्वर पर अपनी वेबसाइट चला रहा था। दुनिया में पहली बार सायबर हमले का श्रेय भी लिट्टे की ही एक इकाई `इंटरनेट ब्लैक टाइगर्स´ के नाम दर्ज है। 1997 में ब्लैक टाइगर्स के इस हमले में श्रीलंकाई दूतावासों का नेटवर्क 15 दिनों तक डाउन रहा। इसलिए शांतिवार्ता के दौरान कर्नल करुणा, पिलैयन और डगलस देवनंद की बगावत को प्रभाकरन ने नजरअंदाज किया।

आईपीकेएफ के साथ युद्ध में लिट्टे का जमीनी नेतृत्व महाथाया ने किया था। इसके चलते उसका तमिलों में सम्मान बढ़ा था। युद्ध के बाद प्रभाकरन ने महाथाया को नजरअंदाज करना शुरू किया। महाथाया प्रभाकरन से नाराज हुआ तो उसे समझौते के नाम पर फांसकर लंबे समय तक कैद में रखकर उसे यातना दी और अंतत: 1994 में उसकी हत्या कर दी थी। महाथाया के अधिकांश लड़ाकों की शिनाख्त कर उन्हें भी मार डाला गया था। प्रभाकरन ने कर्नल करुणा को भी आधिकारिक कामकाज के बहाने बुलाया था। कर्नल करुणा उर्फ विनयगमूर्ति मुरलीधरन ने महाथाया कांड से सबक लेकर उसका निमंत्राण अस्वीकार कर दिया। लिट्टे के लगभग 5000 प्रशिक्षित कैडर को लेकर उसने श्रीलंका सरकार से हाथ मिला लिया और पूर्वी श्रीलंका को लिट्टे के कब्जे से निकाल लिया। कुछ ही महीनों बाद सुनामी ने उत्तर-पूर्वी में लिट्टे की शक्ति को नष्ट कर दिया। इन घटनाओं के कुछ दिनों बाद ही श्रीलंका में चुनाव हुए। प्रभाकरन ने तमिलों को वोट देने से रोका, यहीं उसने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी चूक की। तमिलों की अनुपस्थिति में महिंद राजपक्ष चुनाव जीत गए जिन्होंने प्रभाकरन विरोधी तमिलों को साथ लेकर लिट्टे की खुफिया जानकारियां जमा कीं और श्रीलंकाई सेना को तैयार किया। राजपक्ष ने भारत में 10, जनपथ का विश्वास एम.के. नारायणन के माध्यम से जीता जिसने उसे रूस, चीन, पाकिस्तान और इसरायल से हथियार खरीदने की छूट दी। अकेले वर्ष 2008 में श्रीलंका सेना में 40 हजार सैनिक भर्ती किए गए जिसमें 47 इनफैंट्री बटालियन, 13 बिग्रेड्स और 4 टास्कफोर्स शामिल थे। श्रीलंका की कुल आबादी 2 करोड़ की है, वहां सैनिकों की संख्या है 2 लाख। सैनिक भर्ती का काम 2006 में श्रीलंका सेना के कमांडर जनरल सारथ फोंसेका पर हुए आत्मघाती हमलों के बाद तेज हुआ। फोंसेका के बाद राष्ट्रपति के भाई गोटबाया राजपक्ष भी हमले से बच निकले। नवंबर 2007 में लिट्टे का बागी और श्रीलंका सरकार का डगलस देवनंद आत्मघाती हमले से बचा। ये सब क्यों संभव हुआ? क्योंकि लिट्टे की कार्यप्रणाली जाननेवाले श्रीलंका सरकार के साथ थे। यदि श्रीलंका और भारत सरकार चाहती तो तमिलों का नरसंहार किए बिना भी लिट्टे को पराजित किया जा सकता था। यदि प्रभाकरन को किसी भी कीमत पर मारना ही सोनिया गांधी और महिंद राजपक्षे का टारगेट न होता तो हजारों निर्दोष तमिल बच सकते थे। लिट्टे की बड़ी सेना बगावत कर सरकार के साथ थी। श्रीलंका ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा युद्धक्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति के एनजीओ कार्यकर्ताओं को काम करने की भी अनुमति नहीं दी। तब भी भारत मौन रहा, क्यों?

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ravi on 05 June, 2009 02:32;52
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Apki rai me kya Prabhakaran ko marnoparant BHARAT RATNA diya jai?
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baba on 05 June, 2009 03:58;18
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hahaha ha ha aha Ravi ne Bilkul Sahi kaha... Vaise bhi Shri Prem Shukl Shivsena se prerit hai... Congress Virodhi kuchh bhi likhe... Ghum-Firkar Gandhi Pariwar ke khilaf aa jata hai... main kisi bhi Party ka nahi hoon. blog par kuchh Patrakar Aise hi hai... jaise Shri Chiplunkar...
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vicky g on 05 June, 2009 05:30;32
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bahut achha article hai. fact based. shukla ji ki jaankaari ko salam. rahi baat oopar ke 2 comments ki, to un dono ko article 1 baar fir padna chahiye. article me shukla ji ne kahi bhi prabhakaran ka samarthan nahi kiya hai balki unhone to prabhakaran ki kroorta aur moorkhta ki kahani batai hai. aur rahi baat sonia gandhi ki, to koi bhi bataa dega ki bharat sarkaar sonia parivaar ki anumato ke bagair kuchh bhi nahi karti.
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हर्षवर्धन on 05 June, 2009 07:13;54
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ये अजीब तरह की कपोल कल्पना पर आधारित लेख लग रहा है
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r.kumar on 05 June, 2009 07:38;55
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baba or ravi ne bilkul sahi kaha hei..shukla ji, aakhir ek aatankvadi ki mout ka aap kyon gam mana rahe ho.use to aaj nahi to kal marna hi tha..uski mout ke liye sonia ko dosh dena thik nahi hei..aapka lekh prabhakaran or ltte ke prati hamdardi wala hei..sonia,rahul agar khush hei to thik bhi hei..prabhakaran ne jab rajiv gandhi ko marvaya tab vo kya dukhi hua tha...? bilkul nahi....behtar hota aap is mudde ko rajniti se na hi jode...
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ravi on 05 June, 2009 10:23;58
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Agar nirdosh tamilon ko bachane ka prayas hota to Prabhakran kabhi na mara jata,Theek usi tarah jaise kandhar me viman yatrion ke badle jo khunkhar Atankwadi chode gaye aur we abtak viman yatrion ki sankhya se kai sau guna nirdosh logo ki jan le chuke hain
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D.john on 05 June, 2009 10:41;59
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Prem Shukla lagta hai RSS ka hai,jo chahta hai samasya hamesha bani rahe,taki Rss usks fayda uthata rahe.Ravi,Baba,r.kumaraur harshvardhan ki tippadi theek hai.
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RAJKUMAR SINGH on 06 June, 2009 06:25;13
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प्रभाकरन को तो मरना ही था .ऐसे दानव को तो बहुत पहले ख़त्म होना था . उसके हांथों पर राजीव के ही नहीं भारतीय सेना के भी खून लगे थे . अफसोस है की निर्दोष तमिल नागरिकों को बचाया जा सकता था .

इस पूरे प्रकरण में जो नाटक उभर कर आया और ' राजनीती' का जो चेहरा दीखता है वह चौकाने वाला है.सोनिया और प्रियंका के माफ़ करने के ' नाटक ' के पीछे सिर्फ तमिल वोटों की चाह थी .ek ran niti .जिस तरह मीडिया में उछाला गया सबूत है .उससे भी बड़ा ' नाटक ' करुना निधि ने निभाया .वोटों के लिए लंकन तमिलों की रक्षा के लिए अनसन तक पर बैठे . तमिलों के सब से बड़े हितैषी जताते हुए . जानते थे की सोनिया ही उनके सफाए के लिए बनाई जा रही योजना का हिस्सा हैं ,और योजना तैयार है , जिनके साथ उनका गढ़बंधन है . इन दोनों तमिल ' शत्रुओं ' ने , तमिलों को ही बेवकूफ बना वोट झटक लिए . फिर चुनाव के तुंरत बाद ही तमिलों का सफाया भी .

नाटक तेरी ......जय हो !
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
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सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
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आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
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एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
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