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आलोक तोमर की आपबीती

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ये मामला है २००६ के फरवरी महीने का जब एक संपादक पर इल्जाम लगाया गया था कि उसने डेनिश कार्टून के बारे में भारत में लिखकर सांप्रदायिक अशांति फैलाने की कोशिश की थी. लेकिन उसी मामले में जब चार्जशीट लगाने की बात आयी तो पुलिस को 2 साल 4 महीनें और पांच दिन लग गये. वो भी ऐसे मामले में जहां अभियुक्त ने हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने के लिए अर्जी लगाए हुए है लेकिन पुलिस का तर्क है कि अगर अभियुक्त आजाद रहा तो यह न केवल जांच और कानूनी प्रक्रिया में बाधा पहुंचा सकता है बल्कि भारत की सुरक्षा के लिए भी भारी खतरा हो सकता है.

उस समय फरवरी 2006 में जब यह कार्टून मेरी पत्रिका में छपे थे तो पुलिस ने आरोप लगाया कि ये कार्टून किसी खास धार्मिक समुदाय की भावनाओं को भड़काते हैं और जिसने यह कार्टून बनाया वह डैनिश कार्टूनिस्ट भी भूमिगत हुआ पड़ा है. पुलिस को मौका मिला या सचमुच आरोप इतने संगीन थे इसे मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं. मुझे किसी अदालत में प्रस्तुत होने और अपनी बात का मौका दिये बिना सीधे तिहाड़ जेल ले जाया गया. मुझे उच्च सुरक्षा वाले इलाके में रखने का निर्देश हुआ और वहां रखा गया जहां कश्मीरी आतंकवादियों को रखा जाता है. बिना बात 12 दिन उच्च सुरक्षा व्यवस्था के तहत तिहाड़ जेल में रखा गया. 12 दिन बाद जमानत तो हो गयी लेकिन उस दिन से मेरे अपने लिए इस बात की एक लंबी जद्दोजहद शुरू हो गयी कि कब चार्जशीट दाखिल होगी जिसके बाद मुकदमें की प्रक्रिया शुरू हो सके और मैं अपना पक्ष माननीय अदालत के सामने रख सकूं. यह होने में कोई सवा दो साल लग गये.

इस बीच पत्रकार बिरादरी से अधिकांश लोगों ने अपने-अपने तईं अपील की, चिट्ठियां लिखीं और प्रभाष जोशी से लेकर दिवंगत कमलेश्वर तक सबने कहा कि संपादक का स्वभाव ऐसा नहीं है. खुद जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए मजिस्ट्रेट ने पुलिस के आरोपों की धज्जियां उड़ा दी थीं. लेकिन दिल्ली पुलिस जो सदैव आम आदमी के साथ रहने की दावा करती है मेरे खिलाफ ही खड़ी रही. किसी भी तर्क, चीख-पुकार, प्रमाण का दिल्ली पुलिस पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा था. दो साल के दौरान 17 जांच अधिकारी बदले गये. तीन थानेदार और तीन डीसीपी बदल गये. फिर भी न चार्जशीट प्रस्तुत होना था न हुई. हारकर मैंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि या तो दिल्ली पुलिस मुकदमा चलाने के लिए चार्जशीट दायर करे या फिर एफआईआर ही खारिज करे. हाईकोर्ट के संज्ञान लेने के बाद आखिर पांच जून को पुलिस ने चार्जशीट तैयार कर दी. अब मुकदमें की तैयारी है. 

मेरी गिरफ्तारी खबर थी. और कोई एक कालम या फिलर नहीं, हेडलाईन और ब्रेकिंग न्यूज. लेकिन जैसा पत्रकार समाज और घटनाओं के साथ करता है मेरे साथ भी वही हुआ. फ्रण्ट पेज तक सबको चिंता रही लेकिन नेपथ्य की खोज-खबर किसी ने नहीं ली. खबर बनी तो बात बाहर फैली. बात बाहर फैली तो पूरी फैली. घटना और खबर के बीच का फासला इस मामले में भी दिखा. जो खबर गयी वह सपाट थी. उस सपाट नजरिये का रियेक्शन तो देश में होना ही था. वह हुआ भी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी गृहमंत्री से अपील कर रहे थे कि पत्रकार निर्दोष हैं तो उन्हीं की पार्टी के एक नेता झारखण्ड में फतवा जारी करवा रहे थे कि कोई उस पत्रकार का सिर काटकर लाये तो करोड़ों के इनाम दिये जाएंगे.

यहां मैं एक काबिल पुलिस अफसर केके पौल का जिक्र जरूर करूंगा. वे जब तक रहे, जितना बिगाड़ सकते थे उतना बिगाड़ा और परेशान किया. ये आरोप नहीं बल्कि मैंने यह अनुभव किया है. शासन-प्रशासन के किसी शीर्ष व्यक्ति में निजी कुण्ठा और द्वेष जब कुण्डली मारकर बैठ जाता है तो कानून और कानून रक्षक इकाईयों का कैसे दुरूपयोग करता है, मेरे घटना से कम से कम मुझे तो इसका पूरा सबक मिल गया. उन्होंने जैसे चाहा वैसे दिल्ली पुलिस को मेरे खिलाफ उपयोग किया. अब वे संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं और दिल्ली पुलिस के एक इस्पेक्टर से जान का खतरा बताकर जेड केटेगरी की सुरक्षा में सुरक्षित हैं. बेटा वकालत कर रहा है और पत्नी ने समाजसेवा के वशीभूत एक एनजीओ बना लिया है.साथ में विदेश मंत्री के लिए सलाह-मशविरा का भी काम कर रही हैं. काम धड़ल्ले से चल निकला है. डीएलएफ सिटी गुड़गांव में एक करोड़ की लागत से तीन मंजिला कोठी तैयार हो चुकी है और हरियाणा की कांग्रेसी सरकार की मेहरबानी से करोड़ों की जमीन एनजीओ के नाम भी नज्र हो गयी है. लेकिन वे क्या कोठी-महल बनवाते हैं इसमें अपनी कोई दिलचस्पी नहीं है. 

लेकिन पौल तरक्की करते रहें और एक पत्रकार लिखना-पढ़ना छोड़कर अदालतों के चक्कर लगाता रहे क्या यह आपको युक्तिसंगत लगता है? नहीं, यह मैं आपसे अपने बारे में नहीं कह रहा. किसी भी पत्रकार या लेखक के बारे में ऐसा सोचिए और निर्णय करिए. मेरा यह सब लिखने का मकसद यह भी नहीं है कि मुझे मुकदमा लड़ने के लिए चंदा चाहिए या फिर आप लोग हमारे झंडा-जुलुस निकालें. अब तो जो होगा वह अदालत के द्वारा होगा. फिर भी मेरा एक सवाल जरूर है कि जब आपके बीच से ही कोई एक साथी काठ की तलवार से ही सही लड़ने का फैसला कर लेता है तो आप सिर्फ तमाशाई क्यों बन जाते हैं?

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NIDHI SINGH on 30 June, 2008 13:40;05
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में स्तब्ध हूँ. क्या पुलिस इतने बड़े पत्रकार के साथ के भी पुलिस ये हरकत कर सकती है? वे तो बहुत दिन से नज़र भी नही आ रहे थे.सुना था की वे विदेश चले गए. क्या कोई मुझे उनका संपर्क देगा? में कालेज के दिनों से उनकी प्रशंशक हूँ, बावजूद इसके की सुनते हैं की वे एक समय पत्रकारिता छोड़ कर टीवी सीरियल की दुनिया में चले गए थे. उन्हें याद नहीं होगा, में जनसत्ता में उनकी ट्रेनी भी रह चुकी हूँ.
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Amar Kant Shukla on 30 June, 2008 14:21;19
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आलोक तोमर तो अर्जुन सिंह के खास हैं. अटल विहारी वाजपेयी के भी खूब करीब माने जाते हैं. इतने बड़े महारथी जब आलोक तोमर को नहीं बचा सके तो कुछ तो गलती उनकी भी होगी.के के पाल क्या इन दोनों नेताओं से भी ताकतवर हैं? वैसे लगे हाथ मुझे कोई ये भी बता दे कि बषों से कोई नौकरी नहीं कर रहे आलोक जी अक्सर जहाज़ में नज़र आते हैं, विदेश भी घूमते हैं, और दक्षिण दिल्ली के एक शानदार घर में रहते हैं. कैसे? कर भी शानदार चलते हैं. हर कमरे में ऐ सी है. कहाँ से?
आलोक तोमर की कलम की सब इज्ज़त करते हैं मगर वो शायद दारू पी कर बहक गए होंगे. फिर भी एक पुलिस वाले को उनके ख़िलाफ़ इतनी बड़ी कार्रवाई करने की हिम्मत हो जाना और सरे पत्रकारों का छोद्दी पहन कर बैठे रहना समझ में नहीं आता. भाईसाहब, आप पहले तय तो कर लें कि किस और हैं आप?????????
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shaz ali on 30 June, 2008 14:32;15
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I AM FULLY WITH ALOK TOMAR. MOST FEARLESS AND BRAVE INDIAN JOURNALIST, I HAVE EVER KNOWN. THIS IS A SHAME ON ALL JOURNALISTS THAT THEY DID NOT EVEN PRITEST WHEN THIS ALL WAS HAPPENING. SEARCH WEB AND YOU WILL FIND WORLD WIDE PROTESTS, BUT NONE FROM INDIA. SHAM...BIG SHAME
SHAZ AGRA
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Girijesh Vashisth on 30 June, 2008 16:02;40
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मैंने आलोक तोमर की उस पीड़ा और हालात को नज़दीक से देखा है । और आगे की लाइनों में बताने वाला हूं कि खुन्नसी के के पाल के लपेटे में आलोक जी कैसे आ गए । इस पूरे मामले के तीन हिस्से हैं । एक-ये कि कैसे केके पाल को मौका मिला । दो- ये कि केके पाल की खुन्नस की वजह क्या थी और तीन - कैसे आलोक तोमर का अपना संस्थान सबसे पहले धोती लोटा लेकर भागा ।
उन दिनों में उसी संस्थान के चैनल में इनपुट का कार्यकारी प्रोड्यूसर होता था । इसलिए गवाही दे सकता हूं कि उस दिन जो हुआ उसमें आलोग तोमर न तो दारू पिए हुए थे न बेहोश थे । दर असल मामले की शुरूआत इसी पत्रिका में छपी उस स्टोरी से हुई थी जिसमें केके पाल के बेटे की वकालत की सफलता का जिक्र था । इसमें लिखा हुआ था कि जो मुकदमा के के पाल के बेटे के पास जाता है उसे दिल्ली पुलिस हार जाती है । कई मुकदमों की नजीरें दी गईं। यही पंगा था जो आलोक जी ने उन दिनों दिल्ली पुलिस के मुखिया से लिया था । इसके बाद मोहम्मद के कार्टून वाला विवाद हुआ और विवाद के बीच टाइम्स ऑफ इंडिया ने वो चारों कार्टून छापे जो विवाद की जड़ थे । सीनियर इंडिया में जो कार्टून छपा वो इसी टाइम्स ऑफ इंडिया से उठाया गया था । इस पत्रिका को जिसन देखा है वो अच्छी तरह समझ सकता है कि वो कार्टून जानबूछ कर नहीं छापा गया था । कार्टून डबल स्प्रेड पेज पर छपी आठ टिप्पणियों में से आखिरी में लगा था छोटा सा किसी पासपोर्ट फोटो के आकार का । टिप्पणी भी उस कार्टून की आलोचना करती हुई थी । दारू के नशे में कोई अगर अपनी मेगजीन में उटपटांग सामग्री डालना चाहेगा तो उसे इनता अंडरप्ले नहीं करेगा। वो उसे या तो किसी अहम जगह पर छापेगा या कवर स्टोरी बनाएगा । इतना ही नहीं इसे दुनिया में गाता फिरेगा । किसी को इल्म तक नहीं था कि इस मैगजीन में बम छिपा है । मैगजीन बिकी और करीब करीब अगला अंक आने तक न तो कोई विरोथ हुआ न किसी ने मैगजीन को नोटिस लिया । अचानक एक दिन आलोक तोमर गिरफ्तार कर लिए गए । मैं उस दिन दफ्तर में नहीं था बाद में दफ्तर में मंत्रणा हुई और तय किया गया कि संस्थान के चेयरमेन को इस मामले से हाथ झाड़ लेना चाहिये । हुआ भी यही चैनल पर बयान जारी हूआ । बयान का मतलब था जो कुछ हुआ आलोक तोमर ने किया । कंपनी आलोक तोमर को निकाल रही है । आलोक तोमर जेल में थे और उनकी पत्नी अकेली परेशान हो रही थीं और यहां वहां सहायता के लिए चक्कर लगा रही थीं । इस कमजोरी ने केस और कमजोर कर दिया और सभी को लगा आलोक तोमर ही कसूरवार हैं । पुलिस का भी हौसल बढ़ा और उसने चेयरमेन साहब को भी को भी जेल की कोठरी में डाल दिया ।
ये है कहानी आलोक तोमर की जिंदगी के इस काले अध्याय की ।
एक साथी ने यहां लिखा है कि आलोक तोमर कुछ नहीं करते और शान से रहते हैं । उन्होंने उनके ईमानदार न होने की तरफ सवाल उठाए हैं । मुझे नहीं पता कि आलोक तोमर बेईमान हैं या ईमानदार । पर इतना जरू कहूंगा कि दिस दौरान उनके नौकरी न करने की बात कही गई है उस दौरान उन्होंने दक्षिणी दिल्ली की उसी इमारत से एक एजेंसी चलाई ।उड़ीसा के अकाल पर एक बेहतरीन किताब 'एक हरा भरा अकाल' लिखी और कई जगह नौकरियां कीं और छोड़ीं । ज्यादा मुझे नहीं पता पर सरकारी विमान में घूमने की वजह आलोक जी ही बता सकते हैं । दूसरा सभी पत्रकार चूड़ियां पहन कर नहीं बैठे थे । प्रभाष जोशी से लेकर कई बड़े पत्रकार हर सुनवाई में अदालत जाते थे और एक जुटता दिखाते थे । यहां तक कि उन्होंने अदालत से बातें भी की हैं और आलोक जी की गैर मौजूदगी में परिवार का खयाल भी रखा है । साथ अगर नहीं दिया तो उस तंत्र ने जो अखबारों को चलाता है और उससे किसी पत्रकार का साथ देने की कोई उम्मीद न करे तो अच्छा है ।
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आलोक तोमर on 30 June, 2008 20:48;50
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अब चाहें तो वो लेख (मूल हिन्दी के इंग्लिश अनुवाद का हिन्दी अनुवाद ) पढ़ लें जिस पर सारा बवाल कटा है---

'पिछले दिनों इस्लाम धर्म की स्थापना करने वाले पवित्र हजरत मोहम्मद के एक कार्टून पर, जो डेनमार्क में छपा है, काफ़ी प्रदर्शन हुए, और अब भी चल रहे हैं। हजरत मोहम्मद के कार्टून छापने वाली पत्रिका वाही है जिसने च्रिस्ट के कार्टून छपने से इनकार कर दिया था। अब जॉर्ज बुश भी कहते हैं कि मुस्लिमों में परिहास बोध नहीं होता और इसी से उनके धर्म के मूल आधार का पता चलता है। अमेरिका की इन मूर्खता भरी टिप्पणियों से आतिशबाजी उठनी स्वाभाविक हैं। आप किसी भी धर्म की मूल आधार को चुनौती दे कर बच नहीं सकते।

माना कि किसी भी धर्मं की महानता का पैमाना उसकी सहिष्णुता है और यह तथ्य भी कि वह अपने पर की गयी टिप्पणियों को कितना सहन कर सकता है। किंतु अगर कोई धर्म अगर अपने पर मजाक का बुरा मानता हो तो उसे अपने पथ का संधान करने के लिए ख़ुद छोड़ देना चाहिए।'

कुछ ग़लत लिखा था?
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Kumar Rakesh on 30 June, 2008 22:20;08
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Alok Tomar Bhartiya Patrikarita ka ek aisa nam hai,jiske yogdan ko koi bhi samvedanshil prani bhoola nahi sakta..maine Alokji ko jo bhi jana hai,samjha hai..uskae adhar par kah sakta hoo ki wah waise nahi hai,jitna galat batane ki koshishe ho rahi hai...positive & negative sabhi me hoti hai,,,kisi me jyada,kisi me kam..koi hame ye to bataye ki,az ki tarikh me SACCHA aur IMANDAR INSAN kaun hai...jo bhi batayega,uski mai jindgi bhar gulami karne ko taiyar hoo....kya kuchh builders mafia media baron bankar hame nasihat ka path padheyenge...kya sarkar,kya businessmen,kya rajneta,kya jurists,enme jaydatar bike hue hai,jo nahi bik sake hai,we bikne ke liye taiyar baithe hai...az bhi ek PATRAKARITA ki biradari hi aisi bachi hai,jahan sabse kam buraiya hai...media me malikan raj kar rahe hai,patrakar to BECHARA hai aur rahenga....fir bhi mai ashanwit hu ki patkarita hi samaj ko nai disha pradan karta rahenga...chahe koi kuchh bhi bole....
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प्रथ्वी पाल on 30 June, 2008 23:15;18
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एक बात समझ में नही आ रही. के के पाल और उनकी पत्नी ओमिता प्रणब मुखर्जी के टुकडों पर पलते हैं. ओमिता तो अब भी प्रणब जी के अद्विसेर हैं. उधर आलोक तोमर केपी सबने प्रणब जी की बेटी शर्मिस्था के साथ बहुत अन्तरंग अंदाज़ में घुमते और बीयर पीते देखा है. क्या ये घर की लडाई बाहर आ गयी है? या शर्मिष्ठा से आलोक जी की दोस्ती टूट गयी? हाल में ही शर्मिष्ठा के कत्थक की कविता भी आलोक जी ने ही लिखी थी और मंच से उसका एलन भी हुआ था, प्रणब जी की उपस्थिति में.
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आलोक तोमर on 30 June, 2008 23:41;51
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शर्मिष्ठा मेरी मित्र हैं और इसका इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं है की वह किंकी बेटी है. दोस्तों, आप अगर मेरे निजी रिश्तों को इस सरोकार की लडाई में नहीं लायेंगे तो आप की कृपा होगी. प्रणब बाबू भी मेरे आदरणीय हैं और पाल और ओमिता कोई उनके टुकडों पर नहीं पलते. वे उनके करीब जरूर हैं. मगर में अपनी जंग उनके जरिये क्यों लडूं? तही शर्मिष्ठा की बात तो उसका रिश्ता, उस से दोस्ती मेरे लिए बहुत कीमती है. उसे प्लीज़ बीच में नहीं लायें. उसका इस मामले से कोई रिश्ता नहीं है. वो एक कलाकार है-और उसे उसकी दुनिया में रहने दें
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bharat sagar on 01 July, 2008 06:28;27
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Visfot.com ko dhanyavad , ham-ne yahin se Alok ji pata-thikana paya. Unhe alag se patra likhunga.
Alok ji ne jo bhi kam kiya , vo kabile tareef hi nahi , balki har patrakar ke liye garva karne ki baat hai .
Tomar ji per SENIOR INDIA ne ek aarop lagaya tha , Kosh ke gaban ka ,
Jo mukhya-dhara ( yani jo kisi patra se sambaddha nahin rahta ), usper aarop lagna to mamuli baat hai , is muqadmen men kahin bhi GABAN ki charcha tak nahin hain ,
Alok ji ham sharminda hain ki ek patrakar hone ke nate , dakshin se aapke liye koi jhhanda nahin utha sake,
Visfot.com ko ek baar fir dhanyavad !
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प्रथ्वी पाल on 01 July, 2008 10:10;34
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bharat ji, gaban ka vo farzee mukadma pahlee sunvayee mein hee FIR sahit khaariz ho chuka hai.
prathvi
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image आलोक तोमर हिन्दी पत्रकारिता में कालाहांडी के भूख की रिपोर्टिंग से चर्चा में आये आलोक तोमर आरोपों से घिरे रहनेवाले पत्रकार हैं. फिर भी सक्रियता में कोई कमी नहीं. लेखन के अलावा टीवी पत्रकारिता में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित. डेटनालाइन इंडिया और शब्दार्थ के संपादक.
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आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
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सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
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आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
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एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
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