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बचपन बचाओ तो हम बचें

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यह भी इस देश की एक त्रासद हकीकत है कि हर 155 वें मिनट में किसी न किसी बच्चे के साथ यौन दुराचार होता है.

फिर से हमारा सिर शर्म से झुका देने वाली गंभीर जानकारी, एक सरकारी रिपोर्ट के माध्यम से जग जाहिर हुई है। दुर्भाग्य से मीडिया के लिए यह कोई बड़ी खबर नहीं बनी, किंतु बच्चों के यौन उत्पीड़न के बारे में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट हमारे आर्थिक विकास तथा सभ्यता व संस्कृति की डींगों की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। नारी रक्षा की महान परंपराओं की दुहाई देने वाले भारत में हर 155वें मिनट में किसी न किसी नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म होता है। सरकारी रिपोर्ट यह भी बता रही है कि दुनिया में सबसे ज्यादा यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे हमारे देश में ही बसते हैं।

विगत 1 मई को लोकसभा में जब सरकार इस रिपोर्ट का जिक्र कर रही थी तब संसद भवन से चंद मील दूर चौथी कक्षा में पढ़ने वाली 9 साल की एक बच्ची के साथ उसी का योग प्रिशक्षक मुंह काला करने में जुटा था। ठीक एक दिन पहले यानि 30 अप्रैल को इसी प्रकार के तीन मामले दिल्ली पुलिस ने दर्ज किये। राजधानी के स्वरुप नगर इलाके में पांच वर्षीय बालक के साथ उसके पड़ोसी ने जबर्दस्ती की, जब वह अपने घर के बाहर नगर निगम के पार्क में खेल रहा था। इसी क्षेत्र में एक चौदह साल की बच्ची के साथ उसी के 24 वर्षीय पड़ोसी ने बलात्कार किया। तीसरी घटना तो और भी ज्यादा घृणित है जब लोगों की जान माल और इज्जत की सुरक्षा में तैनात एक 40 वर्षीय पुलिसकर्मी ने प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्रियों, न्यायाधीशों आदि के घरों से चंद कदमों की दूरी पर तुगलक रोड पर एक बच्ची के साथ दिन दहाड़े मुंह काला किया। रोज ब रोज घटने वाले ऐसे शर्मनाक हादसों की कोई कमी नहीं है। जब यह स्थिति दिल्ली की है तो देश के दूर दराज इलाकों में तो हमारे बच्चे कितनी असुरक्षापूर्ण जिन्दगी जी रहे हैं, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

हर रोज कहीं न कहीं से स्कूल, पड़ोस, अस्पतालों, मनोरंजन केन्द्रों, धर्मस्थलों, पुलिस अथवा दूसरे सरकारी महकमों द्वारा, अपने कोमल शरीर, पवित्र आत्मा और निष्कलंक सम्मान को मिट्टी में मिलाकर, खून का घूंट पीकर या सिसकते सुबकते अनगिनत बच्चे घर लौटते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनको यह भी नसीब नहीं है कि वे जीवित लौट सकें। फैक्ट्रियों, खदानों, ईंट के भट्ठों में कोमल अंग गलाते-गलाते कभी नि:शब्द, कभी करुण क्रंदन करते वहीं अपना दम तोड़ने के लिए अभिशप्त हैं। बहुत से कुपोषण, भूख और बीमारी की वजह से मौत के मुंह में पहुंच जाते हैं। कईयों को सड़कों पर ही ट्रक, बसें, कारें कुचल डालती हैं, तो दूसरे कई खटारा बसों या नशाखोर अथवा नौसिखिए ड्राइवरों की कृपा से दुर्घटनाओं में चल बसते हैं। स्पष्ट तौर पर हमारे समाज में बच्चों की हिफाजत करने के बोध, तैयारी और ईमानदार कोशिशों का घोर अभाव है। बचपन के प्रति उदासीनता भरी सामाजिक मानसिकता, गैर जिम्मेदाराना रवैया तथा चारों ओर पसरी संवेदनशून्यता इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के बडे़ कारण हैं। इसलिए यह लाजमी है कि बच्चों के प्रति व्याप्त किसी भी प्रकार की हिंसा, असुरक्षा व उनकी जिन्दगी के जोखिमों को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये साथ ही सर्वांगीण समाधान भी ढूंढा जाय।

दरअसल हमारे समाज का ताना बाना वयस्कों, खासकर मर्दों की सुख-सुविधाओं, जरुरतों, रुचियों और अधिकारों को ध्यान में रखकर बना है। इसी के इर्द गिर्द घूमती है, हमारी राजनीति, कानून, पढ़ाई, चिकित्सा और यहां तक कि आमदनी और स्रोतों के बंटवारे भी। स्वाभाविक तौर पर न तो हम बच्चों के अधिकारों के बारे में जानना चाहते हैं और न ही उनकी सुरक्षा और सम्मान के बारे में पर्याप्त उपक्रम करते हैं। हां उन्हें नासमझ, कमजोर, लाचार आदि मानकर करुणा या दया का भाव जरुर रखते हैं। आवागमन के साधनों, वाहनों, सार्वजनिक शौचालयों, रेस्टोरेन्टों, सभागृहों, सड़कों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और यहां तक कि स्कूलों व अस्पतालों, का निर्माण बच्चों की सुविधा और सुरक्षाओं को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता क्योंकि हम बच्चों का अपना कोई वजूद नहीं समझते।

कथित किशोर सुधारगृहों की भी पूरी दुर्गति है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे गृहों के शत प्रतिशत बच्चे उसे बच्चों की जेल ही मानते है। वहां भी आधे बच्चे वयस्कों द्वारा होने वाली किसी न किसी प्रकार की हिंसा के शिकार होकर दीवारें तक फांदकर भागने के लिए विवश हैं। वहां के 80 प्रतिशत कर्मचारियों और अधिकारियों को बाल अधिकारों की कभी कोई जानकारी ही नही दी गई। नतीजा साफ है कि दूर दराज की बात छोड़िये देश की राजधानी दिल्ली में ही पिछले 10 महीनों में सरकार द्वारा चलाये जा रहे इन कथित सुधारगृहों में कम से कम 12 बच्चों की मौत हो गई। इससे पहले दो वर्षों में क्रमश: 16 और 21 बच्चे मौत का शिकार हुए थे। बाल श्रम को रोकने के लिए नियुक्त किये गये श्रम निरीक्षकों और अफसरों की बच्चों के प्रति संवेदनशीलता व उनके अधिकारों और सम्मान को ध्यान में रखते हुए पूछताछ करने के तरीकों पर कोई प्रशिक्षण हमारे देश में नहीं होता। पुलिस की हालत तो इससे भी बुरी है, किसी भी जुल्म से पीड़ित बच्चों से पुलिसिया पूछताछ का तरीका निहायत ही भद्दा, अपमानजनक और अक्सर बचपन विरोधी होता है। सिपाहियों और थानेदारों को इस तरह बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करना सिखाने के लिए कोई सरकारी प्रिशक्षण नहीं होता। दुर्भाग्य से न्यायालयों तक की भी यही स्थिति है।

हमारा समाज और सरकार जब तक बच्चों की कही-अनकही जरुरतों, उनके हकों तथा उनकी शारीरिक या मानसिक उम्र का ख्याल रखते हुए उनको विशेष सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराता, बच्चों से संबंधित कानूनों, न्यायालयों के निर्देशों, योजनाओं आदि के क्रियान्वयन के लिए नियुक्त किये गये व्यक्तियों को कानूनी तौर पर जवाबदेह नहीं ठहराता, जब तक हम बच्चों से दोस्ताना व्यवहार की एक संस्कृति विकसित नहीं कर लेते और जब तक हम उनकी हिफाजत के लिए एक व्यापक सामाजिक व मानसिक सुरक्षा कवच निर्मित नही करते, तब तक इस तरह के बचपन विरोधी गम्भीर अपराधों को महज हादसा या रोजमर्रा की घटनायें ही माना जाता रहेगा. कभी न्याय अथवा राहत में देरी तो कभी चन्द लोगों की दरिन्दगी के बहाने बनाकर आखिर कब तक, हम हमारे बच्चों को मरने, जलने, अपाहिज होने और बलात्कार व हिंसा का शिकार होने के लिए अभिशप्त रखेंगे?

(कैलाश सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक हैं.) 

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Rashmi saurana on 14 June, 2008 15:57;43
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aapne bilkul sahi likha hai.me aapki bat se sahamat hu.
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वाकई इस मामले में स्थिति विकराल है और इस ओर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा जितना दिया जाना चाहिए।
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Durga sharma on 14 June, 2008 23:43;00
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aapne bilkul sahi likha.
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tulsi singh bisht on 17 June, 2008 12:47;36
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आपका लेख काफी काबलियत तारीफ है लेकिन मैं जहां तक समझता हूं इन सबमें, सबसे बड़ा दोष हमारा अपना समाज ही है जहां हर कोई अपनी रोजी-रोटी कमाने के जुगाड़ में लगा हुआ है और अपने बच्चों पर थोड़ा भी ध्यान नहीं दे पाता। फिर हमारी सरकार भी यौन दुराचार करने वालों पर कोई कठोर कदम भी नहीं अपनाती है। अत: मैं सभी मीडिया वालों से अनुरोध करता हूं कि वे व्यक्ति को आधुनिक युग के साथ-साथ अपने बच्चों को इन दारिन्दों से कैसे बचाये इसका समाधान भी समय-समय पर पेश करें और सरकार का फर्ज बनता है इसके लिए एक जोरदार अभियान चलाना चाहिए ताकि देश को इस त्रासदी से दूर किया जा सके।
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