Home | बियाबान में शोर | हत्या, आत्महत्या या मौत

हत्या, आत्महत्या या मौत

image कृष्ण कुमार सिंह के अनाथ बच्चे

नोएडा में किसी लड़की की दुखदायी हत्या हो जाए तो पूरा मीडिया गुत्थी सुलझने तक परत-दर-परत उसका पीछा करता है. लेकिन बुन्देलखण्ड में आये दिन हो रही मौतों पर

देश का जागरूक मीडिया कोई ट्रायल नहीं करता. ऐसे हादसों को कवर करने के लिए जो शब्दावली विकसित की गयी है उन क्राईम रिपोर्टरों की तरह मैं क्राईम के शब्दों का विशेषज्ञ भी नहीं हूं इसलिए बुन्देलखण्ड जैसी विपदाओं पर लिखते समय दर्जनों बार करेक्शन और एडीट का सहारा लेता हूं. फिर भी मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे सुधार करने का मौका मिलता है और मैं अपने लिखे को की टूटी कड़ियों को फिर से जोड़ सकता हूं. लेकिन कृष्ण कुमार को ऐसा कोई मौका नहीं मिला कि वे अपने जीवन की पिछली इबारतों में थोड़ा बहुत भी कांट-छांट कर पाते. उनकी मौत पर चार लाईन की एक खबर छप गयी. यह खबर भी कितनी एडिट हुई पता नहीं लेकिन न कृष्णकुमार सिंह की जिंदगी चार लाईन में समेटी जा सकती है और न बुंदेलखण्ड की दास्तान.

कृष्णकुमार की लंबी चौड़ी जिंदगी थी. उनके ऊपर सात बच्चों की जिम्मेदारी थी. इस जिम्मेदारी का सामाजिक निर्वहन करते हुए उन्होंने अपनी तीन बेटियों की शादी भी कर दी थी. चौथी बेटी के हाथ पीले करने की तैयारी थी लेकिन उसके पहले ही वे पीले पड़ गये. तीन बेटियों की शादी करते हुए उनके सिर पर डेढ़ लाख रूपये का कर्ज हो गया था. इसमें कुछ कर्ज वह भी शामिल है जो बच्चों का पेट पालने के लिए उन्होंने लिया था. 

यह सब सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी भी वे शायद निभा ले जाते अगर पांच साल से सूखा न पड़ा होता. सूखे ने घर के अन्न भण्डारों को पूरी तरह से सोख लिया था. तीन एकड़ जमीन तीन दाना भी पैदा करने को राजी नहीं थी. तब ऐसे में दिल की धड़कनों का रूक जाना खबर बनती भी तो क्यों? मौत तो यहां रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा है. इंसान भी मर रहे हैं और जानवर भी. अब कृष्णकुमार सिंह का लड़का सुबह-सुबह वही अखबार बेचकर परिवार का भरण पोषण कर रहा है जो असल में मौत की खबरों का पुलिंदा होकर रह गये हैं. 

बांदा जिले के नरैनी तहसील का बड़ोखर बुजुर्ग गांव कृष्ण कुमार सिंह का गांव है. कृष्णकुमार सिंह यहीं के मूल निवासी थे. सन 1980 में साईकिल से गिर जाने के कारण जो चोट लगी उससे तो वे शायद उबर भी जाते लेकिन उस चोट ने उन्हें गैंग्रीन जैसा भयावह रोग दे दिया. अपनी दवा, बेटियों की शादी और सूखे में सात बच्चों के लालन-पालन के लिए उन्होंने त्रिवेणी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक, गिरवां क्षेत्रीय ग्रामीण विकास बैंक से तो कर्ज लिया ही. साहूकार राजा (27000) रामदास (19250) राम आसरे (6500) श्रीराम (3500) व बेटाराम से 1000 रूपये का कर्ज भी उनके सिर पर चढ़ गया. इन कर्जों को उतारने और परिवार चलाने के लिए उनके पास जो कमाई का जरिया था वह केवल इतना ही कि साल में विकलांग पेंशन के नाम पर 1800 रूपये और राशनविहीन अन्त्योदय कार्ड मिला था. अन्त्योदय कार्ड भी दिसबंर 2006 में निरस्त कर दिया गया और नरेगा के तहत जो कार्ड बना था उस पर एक दिन का भी काम मिला नहीं. अपाहिज थे तो वे और लोगों की तरह शहर भी नहीं भाग सकते थे क्योंकि किसी अपाहिज के लिए शहर में सिर्फ एक ही मौका होता है और वह होता भीख मांगना.

इन विपदाओं ने धीरे-धीरे कृष्णकुमार को पड़ोसियों और रिश्तेदारों पर आश्रित कर दिया. लेकिन यह सब भला कितने दिन चलता? सूखे की मार, विकलांग होने की टीस, बैंकों का बढ़ता सूद और ऊपर से कर्जवापसी के लिए शाहूकारों का दबाव. सबने मिलकर मानों कृष्णकुमार को दबोच लिया था. पता नहीं क्यों सरकारी व्यवस्था से इतना झटका खाने के बाद भी उन्हें सरकार से ही कुछ मदद पाने की उम्मीद थी. इसलिए 17 फरवरी 2006 को उन्होंने देश के प्रथम नागरिक को पत्र लिखा. उन दिनों विजन-2020 के स्वप्नद्रष्टा कलाम साहब राष्ट्रपति थे. उन्होंने पत्र लिखकर मांग कि उनकी असहाय स्थिति को देखते हुए सरकार उन्हें कुछ मदद करे. विकलांग कोटे से नौकरी दे या फिर आर्थिक मदद करे ताकि वह अपने बच्चों का लालन पालन कर सके. यही चिट्ठी प्रधानमंत्री के कार्यालय में भी भेजी गयी. राष्ट्रपति जी ने क्या किया यह तो आज तक पता नहीं लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय में जो चिट्ठी पहुंची थी उसके जवाब में राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश देते हुए एक पत्र आया. तीन महीने बाद बांदा के जिलाधिकारी को आदेश मिला कि वे उक्त मामले में जांच-पड़ताल करके उचित कार्यवाही करें.

अब यहां से कृष्ण कुमार सरकार के फंदे में फंसते हैं. सरकार होगी तो जांच होगी, कार्यवाही होगी, समीक्षा होगी फिर फाईल बनेगी फिर फाईलों के पैर लगेंगे और वे एक जगह से दूसरे जगह की यात्रा करेंगी. यह सब सरकारी काम-काज का अनिवार्य हिस्सा होता है. यही सब कृष्णकुमार के साथ भी शुरू हुआ. लेकिन महीनों की मेहनत के बाद आखिरकार सरकार ने पाया कि कृष्णकुमार वाकई मदद की दरकार है इसलिए उनके नाम पर 6480 रूपये का चेक जारी हुआ. यह चेक उन्होंने त्रिवेणी सरकारी बैंक में जमा करा दिया. लेकिन जब वे पैसा निकालने पहुंचे तो उनके पैर के नीचे की जमीन खिसक गयी. बैंक मैनेजर ने कहा कि यह पैसा किसान क्रेडिट कार्ड में मुजरा कर लिया गया है. जब कृष्णकुमार ने कहा कि माईबाप पैसा नहीं मिला तो खाये बगैर मर जाएंगे तो बैंक मैनेजर ने कहा कि पैसा तो मैं दिला दूंगा बताओ मुझे क्या मिलेगा? एक बार फिर कृष्णकुमार ने प्रधानमंत्री वगैरह को पत्र लिखने का काम शुरू कर दिया. आखिरकार इसके अलावा वे और कुछ कर भी नहीं सकते थे. 

मौत से तीन दिन पहले भी वे लखनऊ सचिवालय के चक्कर लगा रहे थे. लेकिन सरकारी चक्करों में उनकी जिन्दगी के दिन पूरे हो गये फिर भी उन्हें वह सरकारी मदद नहीं मिली जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक को पत्र लिखा था. समाज इस लायक शायद बचा नहीं है जो ऐसे विपदा के समय आपस में मिलजुलकर समस्याओं का सामना कर सके. जिनके पास पैसा है उनकी जरूरतें इतनी अनंत हैं कि वे ऐसे लोगों के लिए सोच भी नहीं सकते और जिनके पास नहीं है वे दो वक्त की रोटी के बगैर तड़फड़ाकर विदा हो जाते हैं. अब कृष्णकुमार की बेवा शिवकुमारी रोती हैं कि "यह तो थोड़ी बहुत रिश्तेदारों और पड़ोसियों की मदद से दो वक्त खाना खा ले रहे हैं नहीं तो मौत कब किसको दबोच लेगी कुछ पता नहीं." समय रहते सरकारें चेतेगी इसके लिए पूरी तरह से नाउम्मीद होने में कोई बुराई नहीं है. सवाल तो उस समाज से है जो ऐसी कहानियों के बाद भी चुपचाप तमाशाई बना रहता है. 

आप कृष्णकुमार सिंह के परिवार को इस आपदा में मदद करना चाहें तो उनकी वेवा के नाम से अपनी मदद इस पते पर भेज दें.

श्रीमती शिवकुमारी

पत्नी स्वर्गीय कृष्णकुमार सिंह

ग्राम-पोष्टः बड़ोखर बुजुर्ग

नरैनी रोड

बांदा, उत्तर प्रदेश 

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
5.00
More from बियाबान में शोर
Previous
image
सुदर्शन का (कु) दर्शन
जबसे आरएसएस के लोगों की आतंकवादी घटनाओं में संलिप्तता सामने आयी है, तब से आरएसएस के नेता बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में ही शायद संघ के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इसके स्वयंसेवक विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। इसी बौखलाहट में आरएसएस के एक्स चीफ केएस सुदर्शन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और सोनिया गांधी के बारे में ऐसे शब्द बोल दिए, जिन्हें एक विकृत मानसिकता का आदमी ही बोल सकता है।...
image
सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?...
image
रोम रोम में इरोम
कश्मीरी अलगाववादियों की तरह उसने आज तक अपने हाथ में कभी पत्थर नहीं उठाया. हालांकि उसका भी विरोध उसी बात को लेकर है जिसे लेकर कश्मीर में पत्थरबाजों की पूरी फौज सड़कों पर उतार दी गयी. पूर्वोत्तर में सशस्त्र सेना अधिनियम समाप्त किया जाए. इरोम शर्मिला विरोध कर रही है लेकिन उसका हथियार आंदोलन नहीं, आत्मोत्सर्ग है. पिछले दस साल से उसने अन्न त्याग कर रखा है. पुलिस और प्रशासन नाक की नलियों से पौष्टिक पदार्थ पहुंचाकर भले ही उसके शरीर को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन उसे जब भी मौका मिलता है वह राजघाट जाती है और फफककर रोती है. शायद शर्मिला के सत्याग्रह को समझने के लिए देश में दूसरी कोई जगह बची भी नहीं है. ...
image
जिसके दर पर फाइल पहुंची, उसने रात गुजार ली
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो. मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है वह दिल दहला देनेवाली है. जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो वहां एक 31 मंजिला बिल्डिंग अवैध जमीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी. भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था. कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा. ...
image
बहुत बड़ा दुखारी है बुखारी
हाल में ही लखनऊ में एक पत्रकार को पीटकर अहमद बुखारी एक बार फिर चर्चा में आ गये. अहमद बुखारी ने लखनऊ में जिस पत्रकार को पीटा वह न तो किसी बड़े अखबार से जुड़ा था और न ही कोई बड़ा नाम था. लेकिन उस पत्रकार ने सवाल बड़ा किया था जिससे बौखलाकर बुखारी ने उसकी पिटाई कर दी थी. बुखारी का चरित्र यही रहा है कि वे हमेशा छोटे लोगों पर ही हाथ डालते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं....
image
श्रीमान जी, मैं यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया का संपादक और सीईओ हूं!
सेवा में, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली / लखनऊ। श्रीमान, मैं यशवंत सिंह पुत्र श्री लालजी सिंह निवासी ग्राम अलीपुर बनगांवा थाना नंदगंज, जनपद गाजीपुर, उत्तर प्रदेश (हाल पता- ए-1107, जीडी कालोनी, मयूर विहार फेज-3, दिल्ली-96) हूँ. मैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एक वेब मीडिया कंपनी भड़ास4मीडिया में कार्यरत हूं. इस कंपनी के पोर्टल का वेब पता www.bhadas4media.com है. मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर हूं. इससे पहले मैं दैनिक जागरण, अमर उजाला एवं अन्य अखबारों में कार्यरत रहा हूँ. ...
image
कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।...
image
अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...
image
गिलानी साहब, कश्मीर आजाद है!
यह बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि कश्मीरी अवाम जिसे आज़ादी कहता है उसका मातलब भारत में विलय है और गिलानी टाइप पाकिस्तानी पैसे पर पलने वालों को यह हक नहीं है कि वे पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात करें क्योंकि पाकिस्तान ही कश्मीर की आज़ादी का असली दुश्मन है....
image
बुखारी को सबक सिखाना जरूरी
शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
image
अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
image
सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
image
मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
image
आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
image
सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
image
आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
image
एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
Next
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2