हत्या, आत्महत्या या मौत
नोएडा में किसी लड़की की दुखदायी हत्या हो जाए तो पूरा मीडिया गुत्थी सुलझने तक परत-दर-परत उसका पीछा करता है. लेकिन बुन्देलखण्ड में आये दिन हो रही मौतों पर
देश का जागरूक मीडिया कोई ट्रायल नहीं करता. ऐसे हादसों को कवर करने के लिए जो शब्दावली विकसित की गयी है उन क्राईम रिपोर्टरों की तरह मैं क्राईम के शब्दों का विशेषज्ञ भी नहीं हूं इसलिए बुन्देलखण्ड जैसी विपदाओं पर लिखते समय दर्जनों बार करेक्शन और एडीट का सहारा लेता हूं. फिर भी मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे सुधार करने का मौका मिलता है और मैं अपने लिखे को की टूटी कड़ियों को फिर से जोड़ सकता हूं. लेकिन कृष्ण कुमार को ऐसा कोई मौका नहीं मिला कि वे अपने जीवन की पिछली इबारतों में थोड़ा बहुत भी कांट-छांट कर पाते. उनकी मौत पर चार लाईन की एक खबर छप गयी. यह खबर भी कितनी एडिट हुई पता नहीं लेकिन न कृष्णकुमार सिंह की जिंदगी चार लाईन में समेटी जा सकती है और न बुंदेलखण्ड की दास्तान.
कृष्णकुमार की लंबी चौड़ी जिंदगी थी. उनके ऊपर सात बच्चों की जिम्मेदारी थी. इस जिम्मेदारी का सामाजिक निर्वहन करते हुए उन्होंने अपनी तीन बेटियों की शादी भी कर दी थी. चौथी बेटी के हाथ पीले करने की तैयारी थी लेकिन उसके पहले ही वे पीले पड़ गये. तीन बेटियों की शादी करते हुए उनके सिर पर डेढ़ लाख रूपये का कर्ज हो गया था. इसमें कुछ कर्ज वह भी शामिल है जो बच्चों का पेट पालने के लिए उन्होंने लिया था.
यह सब सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी भी वे शायद निभा ले जाते अगर पांच साल से सूखा न पड़ा होता. सूखे ने घर के अन्न भण्डारों को पूरी तरह से सोख लिया था. तीन एकड़ जमीन तीन दाना भी पैदा करने को राजी नहीं थी. तब ऐसे में दिल की धड़कनों का रूक जाना खबर बनती भी तो क्यों? मौत तो यहां रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा है. इंसान भी मर रहे हैं और जानवर भी. अब कृष्णकुमार सिंह का लड़का सुबह-सुबह वही अखबार बेचकर परिवार का भरण पोषण कर रहा है जो असल में मौत की खबरों का पुलिंदा होकर रह गये हैं.
बांदा जिले के नरैनी तहसील का बड़ोखर बुजुर्ग गांव कृष्ण कुमार सिंह का गांव है. कृष्णकुमार सिंह यहीं के मूल निवासी थे. सन 1980 में साईकिल से गिर जाने के कारण जो चोट लगी उससे तो वे शायद उबर भी जाते लेकिन उस चोट ने उन्हें गैंग्रीन जैसा भयावह रोग दे दिया. अपनी दवा, बेटियों की शादी और सूखे में सात बच्चों के लालन-पालन के लिए उन्होंने त्रिवेणी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक, गिरवां क्षेत्रीय ग्रामीण विकास बैंक से तो कर्ज लिया ही. साहूकार राजा (27000) रामदास (19250) राम आसरे (6500) श्रीराम (3500) व बेटाराम से 1000 रूपये का कर्ज भी उनके सिर पर चढ़ गया. इन कर्जों को उतारने और परिवार चलाने के लिए उनके पास जो कमाई का जरिया था वह केवल इतना ही कि साल में विकलांग पेंशन के नाम पर 1800 रूपये और राशनविहीन अन्त्योदय कार्ड मिला था. अन्त्योदय कार्ड भी दिसबंर 2006 में निरस्त कर दिया गया और नरेगा के तहत जो कार्ड बना था उस पर एक दिन का भी काम मिला नहीं. अपाहिज थे तो वे और लोगों की तरह शहर भी नहीं भाग सकते थे क्योंकि किसी अपाहिज के लिए शहर में सिर्फ एक ही मौका होता है और वह होता भीख मांगना.
इन विपदाओं ने धीरे-धीरे कृष्णकुमार को पड़ोसियों और रिश्तेदारों पर आश्रित कर दिया. लेकिन यह सब भला कितने दिन चलता? सूखे की मार, विकलांग होने की टीस, बैंकों का बढ़ता सूद और ऊपर से कर्जवापसी के लिए शाहूकारों का दबाव. सबने मिलकर मानों कृष्णकुमार को दबोच लिया था. पता नहीं क्यों सरकारी व्यवस्था से इतना झटका खाने के बाद भी उन्हें सरकार से ही कुछ मदद पाने की उम्मीद थी. इसलिए 17 फरवरी 2006 को उन्होंने देश के प्रथम नागरिक को पत्र लिखा. उन दिनों विजन-2020 के स्वप्नद्रष्टा कलाम साहब राष्ट्रपति थे. उन्होंने पत्र लिखकर मांग कि उनकी असहाय स्थिति को देखते हुए सरकार उन्हें कुछ मदद करे. विकलांग कोटे से नौकरी दे या फिर आर्थिक मदद करे ताकि वह अपने बच्चों का लालन पालन कर सके. यही चिट्ठी प्रधानमंत्री के कार्यालय में भी भेजी गयी. राष्ट्रपति जी ने क्या किया यह तो आज तक पता नहीं लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय में जो चिट्ठी पहुंची थी उसके जवाब में राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश देते हुए एक पत्र आया. तीन महीने बाद बांदा के जिलाधिकारी को आदेश मिला कि वे उक्त मामले में जांच-पड़ताल करके उचित कार्यवाही करें.
अब यहां से कृष्ण कुमार सरकार के फंदे में फंसते हैं. सरकार होगी तो जांच होगी, कार्यवाही होगी, समीक्षा होगी फिर फाईल बनेगी फिर फाईलों के पैर लगेंगे और वे एक जगह से दूसरे जगह की यात्रा करेंगी. यह सब सरकारी काम-काज का अनिवार्य हिस्सा होता है. यही सब कृष्णकुमार के साथ भी शुरू हुआ. लेकिन महीनों की मेहनत के बाद आखिरकार सरकार ने पाया कि कृष्णकुमार वाकई मदद की दरकार है इसलिए उनके नाम पर 6480 रूपये का चेक जारी हुआ. यह चेक उन्होंने त्रिवेणी सरकारी बैंक में जमा करा दिया. लेकिन जब वे पैसा निकालने पहुंचे तो उनके पैर के नीचे की जमीन खिसक गयी. बैंक मैनेजर ने कहा कि यह पैसा किसान क्रेडिट कार्ड में मुजरा कर लिया गया है. जब कृष्णकुमार ने कहा कि माईबाप पैसा नहीं मिला तो खाये बगैर मर जाएंगे तो बैंक मैनेजर ने कहा कि पैसा तो मैं दिला दूंगा बताओ मुझे क्या मिलेगा? एक बार फिर कृष्णकुमार ने प्रधानमंत्री वगैरह को पत्र लिखने का काम शुरू कर दिया. आखिरकार इसके अलावा वे और कुछ कर भी नहीं सकते थे.
मौत से तीन दिन पहले भी वे लखनऊ सचिवालय के चक्कर लगा रहे थे. लेकिन सरकारी चक्करों में उनकी जिन्दगी के दिन पूरे हो गये फिर भी उन्हें वह सरकारी मदद नहीं मिली जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक को पत्र लिखा था. समाज इस लायक शायद बचा नहीं है जो ऐसे विपदा के समय आपस में मिलजुलकर समस्याओं का सामना कर सके. जिनके पास पैसा है उनकी जरूरतें इतनी अनंत हैं कि वे ऐसे लोगों के लिए सोच भी नहीं सकते और जिनके पास नहीं है वे दो वक्त की रोटी के बगैर तड़फड़ाकर विदा हो जाते हैं. अब कृष्णकुमार की बेवा शिवकुमारी रोती हैं कि "यह तो थोड़ी बहुत रिश्तेदारों और पड़ोसियों की मदद से दो वक्त खाना खा ले रहे हैं नहीं तो मौत कब किसको दबोच लेगी कुछ पता नहीं." समय रहते सरकारें चेतेगी इसके लिए पूरी तरह से नाउम्मीद होने में कोई बुराई नहीं है. सवाल तो उस समाज से है जो ऐसी कहानियों के बाद भी चुपचाप तमाशाई बना रहता है.
आप कृष्णकुमार सिंह के परिवार को इस आपदा में मदद करना चाहें तो उनकी वेवा के नाम से अपनी मदद इस पते पर भेज दें.
श्रीमती शिवकुमारी
पत्नी स्वर्गीय कृष्णकुमार सिंह
ग्राम-पोष्टः बड़ोखर बुजुर्ग
नरैनी रोड
बांदा, उत्तर प्रदेश
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