Home | बियाबान में शोर | दलदल में दलित राजनीति

दलदल में दलित राजनीति

image

आज के भारत की सबसे बड़ी दलित नेता उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती हैं। जनसंख्या के हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रांत के मुख्यमंत्री पद पर एक दलित महिला का पहुंचना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़ी घटना है। यही नहीं, वे उत्तर प्रदेश की सबसे दबंग मुख्यमंत्री साबित हुई हैं और प्रशासन पर उनकी अच्छी पकड़ है। अफसर उनसे डरते हैं। आपराधिक घटनाओं में लिप्त अपने मंत्रियों, विधायकों और सांसदों पर भी उन्होंने कड़ी कार्रवाई की है।

लेकिन सत्ता के इस मुकाम पर पहुंचने के लिए मायावती को कई समझौते करने पड़े हैं। बहुजन समाज पार्टी की कोई अलग अर्थनीति या विकास नीति तो कभी नहीं रही है, लेकिन सत्ता के इस खेल में अपनी सामाजिक नीति को भी उन्होंने छोड़ दिया है। दलितों-शूद्रों को संगठित करके ब्रान्हमणवादी व्यवस्था का ध्वंस करने का लक्ष्य अब लुप्त हो गया है। इसकी जगह जातियों को अलग-अलग तौर पर गोलबंद करके चुनाव जीतने और सत्ता में आने के समीकरण बनाने की कवायद रह गई है, जिसमें ब्रान्हमण सहित द्विज जातियों से कोई परहेज नहीं है। यह सिलसिला वैसे बिहार-उत्तर प्रदेश के पिछड़ी जातियों के नेताओं ने शुरू किया था, पर मायावती ने भी इसमें महारत हासिल कर ली और उनसे आगे निकल गई हैं। वे इसके माध्यम से सत्ता-राजनीति में सफलता का एक मॉडल दलित-पिछड़े नेता उनकी नकल करने की कोशिश कर रहें हैं।

पिछले दिनों आई एक खबर के मुताबिक पूंजीपतियों, फिल्मी सितारों की तरह सबसे ज्यादा आयकर देने वालों की श्रेणी में मायावती भी हैं। वे इस देश में सबसे ज्यादा आयकर अदा करने वाली नेता हैं। यों तो इसे दूसरे नेताओं की तुलना में मायावती की ईमानदारी के रूप में भी देखा जा सकता है, लेकिन इससे यह तो साबित होता है कि राजनीति को बेशुमार कमाई का जरिया बनाने में वे पीछे नहीं हैं। यही नहीं, उम्मीदवारों से लाखों रूपए जमा करवा कर और अपने जन्मदिन पर लाखों की थेलियां-तोहफे लेकर मायावती ने भारतीय राजनीति में खुले भ्रष्टाचार और अंध नेतापूजा का नया अध्याय शुरू किया है। दलित इस देश के सबसे गरीब, वंचित, कुपोषित और संपत्तिहीन तबकों में से हैं। उनकी नेता करोड़ों की व्यक्तिगत आय और संपत्ति अर्जित करें, यह भारतीय राजनीति की एक नई विडंबना है। मायावती ने पिछले दिनों अपने उत्तराधिकारी के बारे में भी घोषणा ऐसी शैली में की है, जैसे दलित राजनीति मानो राजवंश जैसी वंशानुगत चीज है, जिसका फैसला सामूहिक रूप से न करके महारानी को व्यक्तिगत रूप से करना है।

मुहावरों में कहें, तो मनुवाद-ब्रान्हमणवाद के खिलाफ लड़ाई अगर पूंजीवाद और आधुनिक विकास नीति के खिलाफ संघर्ष से नहीं जुड़ेगी, तो भटक जाएगी और लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगी। इसीलिए मायावती, अठवले या शिबू सोरेन दलितों का उत्थान नहीं कर सकते। जगजीवन राम, बूटा सिंह या रातविलास पासवान जैसे नेताओं से भी काम नहीं चलेगा। जरूरत आज एक नए आंबेडकर की है, जिसमें कुछ अंश गांधी, लोहिया और भगतसिंह का भी हो।लगभग दो साल पहले एक प्रमुख हिंदी अखबार में दलित बुिद्धजीवी चंद्रभान प्रसाद का लेख निकला था। इस लेख में यह प्रतिपादित किया गया था कि जब तक दलितों में भी पूंजीपति नहीं बन सकते। अगर एक या दो फीसद दलित पूंजीपति बन भी गए, तो बाकी अठानवे फीसद दलितों का क्या होगा? बहरहाल, इस लेख से मायावती खेमे के बौिद्धक सोच का पता चलता है और स्वयं मायावती के करोड़पति बनने का औचित्य सिद्ध करने के लिए यह लिखा गया था, ऐसा मालूम पड़ता है। ऐसा नहीं है कि यह गिरावट सिर्फ दलित नेताओं में आई है। पूरी भारतीय राजनीति का तेजी से जो पतन हुआ है, यह उसी का प्रतिबिंब है। अफसोस यह है कि दबे-कुचले लोगों की जिस राजनीति में क्रांतिकारी संभावनाएं हो सकती थीं, उसने वे सारी बुराइयां अपना लीं, जो द्विज राजनीति में व्याप्त हैं। उसने भी शान-शोकत, सामंती तामझाम, व्यक्तिवाद, परिवारवाद, मौकापरस्ती, सत्तालिप्सा, भ्रष्टाचार, अपराधी तत्वों से साठगांठ और यथास्थितिवाद को पूरी तरह अपना लिया। एक नई राजनीति गढ़ने के बजाय उसने प्रचालित राजनीति और उसकी कार्यशैली की ही नकल और उसी से होड़ की।

विडंबना यह भी है कि देश के दलित-आदिवासी जिन सवालों से जूझ रहे हैं, उनसे यह राजनीति तेजी से कटती जा रही है। केरल में पिछले कई महीनों से चेंगारा में भूमि के लिए दलितों का आंदोलन चल रहा है। उन्हें समर्थन की जरूरत है, लेकिन किसी बड़े दलित नेता की फुरसत नहीं है। राजस्थान और मध्यप्रदेश के कई इलाकों में आज भी छुआछूत का प्रचलन है, कई जगह आज भी घोड़ी पर दलित दूल्हे की बरात बैंड-बाजे के साथ गांव में नहीं निकल सकती। हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाì, बिहार आदि में झज्झर, खैरलांजी जैसे दलितों पर अत्याचार के अनेक कांड हो रहे हैं। लेकिन इन पर कोई राष्ट्रीय आंदोलन या अभियान नहीं दिखाई देता। दलितों-पिछड़ों में बेरोजगारी और कंगाली बढ़ती जा रही हैं। वैश्वीकरण के नए दौर में पूरे देश में विस्थापन की बाढ़ आ गई है, जिसके सबसे ज्यादा शिकार आदिवासी और दलित हो रहे हैं। लेकिन इसके खिलाफ झंडा उठाता हुआ और विकास की पूरी दिशा पर प्रश्नचिन्हन लगाता हुआ कोई बड़ा आदिवासी-दलित नेता नहीं दिखाई देता।

आंबेडकर ने दलितों को ऊपर उठाने के लिए िशक्षा पर बहुत जोर दिया था। शायद इसीलिए उनकी अध्यक्षता में बने भारत के संविधान में दस वर्ष के अंदर देश के सारे बच्चों को शिक्षा देने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन आजाद भारत की सरकारों के द्विज-आभिजात्य नेतृत्व और नौकरशाही की इस लक्ष्य को पूरा करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। आज भी देश के आधे से ज्यादा बच्चे कक्षा आठवीं तक भी शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं। अब शिक्षा के निजीकरण, बाजीरीकरण और बहुस्तरीकरण की जो मुहिम चली है और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जिस प्रकार नष्ट किया जा रहा है, उससे तो बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा से वंचित और बहिष्कृत होंगे। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान दलितों का ही है। अचरज की बात है कि किसी भी स्थापित दलित नेतृत्व ने िशक्षा के इस ध्वंस और भेदभावमूलक शिक्षा को बढ़ाने के खिलाफ आवाज नहीं उठाई है। उच्च शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण पर तो उनका ध्यान है, लेकिन इस आरक्षण का पूरा लाभ उठाने के लिए पहले सारे दलित-पिछड़े बच्चो को अच्छी स्कूली शिक्षा मिलनी चाहिए और यह काम समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मातृभाषा में शिक्षा की निशुल्क सरकारी व्यवस्था से ही संभव है, यह बात वे भूल जाते हैं।

भारतीय दलित राजनीति इस मुकाम पर कैसे पहुंची और उसका यह हश्र क्यों हुआ, इसका पूरा विश्लेषण तो राजनीतिशास्त्र के पंडित करेंगे। लेकिन यहां उसकी दो प्रमुख कमजोरियों पर गौर किया जा सकता है। एक, भारत की दलित राजनीति बहुत व्यक्तिपूजक रही है। नेता के उत्कर्ष और उसके सत्ता में पहुंचने को ही दलितों के उत्थान का पर्याय मान लिया जाता है। मजबूत संगठन और सामूहिक नेतृत्व के अंकुश  के अभाव में ऐसे नेताओं का पतन रोकना मुश्किल हो जाता है। दो, दलित नेताओं ने सामाजिक गैरबराबरी पर तो अपना ध्यान केंद्रित किया, लेकिन आर्थिक विषमता और शोषण के खिलाफ नड़ाई से स्वयं को दूर रखा। जबकि भारतीय पूंजीवाद की विशिष्ट वास्तविकता में दोनों प्रकार की विषमताएं एक दूसरे में गुंथी हुई और एक दूसरे को मजबूत करने वाली हैं। दोनों केा अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। अगर इन हालात को बदलना है, तो दोनों लड़ाई अधूरी रह जाती है। इसी एकांगी और अधूरी दृिष्ट के कारण दलित राजनीति ने समाज के अन्य वंचित तबकों के संघर्षशील तत्वों के साथ मोर्चा बनाने की जरूरत नहीं समझी ओर उनके नेतृत्व को भी अमीर-आभिजात्य वर्ग का हिस्सा बनने में संकोच नहीं हुआ। व्यवस्था परिवर्तन की समग्र लड़ाई की रणनीति के अभाव में तबको तक सीमित आंदोलन धीरे-धीरे सत्ता में उनके नेतृत्व के समायोजन के साथ व्यवस्था में ही खप जाते हैं। (जनसत्ता)

Subscribe to comments feed Comments (4 posted):

Vivek Singh on 13 September, 2008 15:25;25
avatar
Absolutely you are cent percent right.Acctually no politician in India want to improve situation and position of Dalit.They just want to keep them as Dumb People to support them blindly.Some of the leading Politicians of who claims themselevs real caretaker of dalit acctually working as "ZaminDaar" of "Pre Independence of India".

We the people of India will have to come forward and try to improve the situation each and evry people of deprieve section or Below poverty line.

Jai Hind
Thumbs Up Thumbs Down
0
munna jha on 13 September, 2008 16:14;05
avatar
maayavati jo kar rahi hai vo dalito ke vikash kee pehli shidhi hai, aur haa samay ke anusar agr brhamano se gathjod karti hai tho eshme koi hairani kee baat nahin hai, raajniti mai yeh bhi ek ushul hai.yehi rashta hai saayad des ke pehli dalit pradhnmantri banane kaa.
Thumbs Up Thumbs Down
0
thakursaab on 13 September, 2008 18:49;31
avatar
mere dost dalit sirf voter hota hai Neta nahi .neta to sarvsamaj ko saath lekar hi ban sakta hai .mayawati ji iska servshrest udharan hai .dalit ka rona band ho unke utthan ke liye ek yojna honi chahiyen.kyoki bechare bahut satai gai hum sabke poorvajo dwara
Thumbs Up Thumbs Down
0
rajkumar singh on 15 September, 2008 10:54;08
avatar
Ab to mayavatee bahen PM bane tabhee kuch ummed hai!baakee bhartiyon kee tarah daliton ka bhram bhee tute ki unka apna "uddhar' kar dega.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 4 | displaying: 1 - 4

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
5.00
More from बियाबान में शोर
Previous
image
सुदर्शन का (कु) दर्शन
जबसे आरएसएस के लोगों की आतंकवादी घटनाओं में संलिप्तता सामने आयी है, तब से आरएसएस के नेता बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में ही शायद संघ के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इसके स्वयंसेवक विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। इसी बौखलाहट में आरएसएस के एक्स चीफ केएस सुदर्शन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और सोनिया गांधी के बारे में ऐसे शब्द बोल दिए, जिन्हें एक विकृत मानसिकता का आदमी ही बोल सकता है।...
image
सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?...
image
रोम रोम में इरोम
कश्मीरी अलगाववादियों की तरह उसने आज तक अपने हाथ में कभी पत्थर नहीं उठाया. हालांकि उसका भी विरोध उसी बात को लेकर है जिसे लेकर कश्मीर में पत्थरबाजों की पूरी फौज सड़कों पर उतार दी गयी. पूर्वोत्तर में सशस्त्र सेना अधिनियम समाप्त किया जाए. इरोम शर्मिला विरोध कर रही है लेकिन उसका हथियार आंदोलन नहीं, आत्मोत्सर्ग है. पिछले दस साल से उसने अन्न त्याग कर रखा है. पुलिस और प्रशासन नाक की नलियों से पौष्टिक पदार्थ पहुंचाकर भले ही उसके शरीर को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन उसे जब भी मौका मिलता है वह राजघाट जाती है और फफककर रोती है. शायद शर्मिला के सत्याग्रह को समझने के लिए देश में दूसरी कोई जगह बची भी नहीं है. ...
image
जिसके दर पर फाइल पहुंची, उसने रात गुजार ली
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो. मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है वह दिल दहला देनेवाली है. जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो वहां एक 31 मंजिला बिल्डिंग अवैध जमीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी. भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था. कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा. ...
image
बहुत बड़ा दुखारी है बुखारी
हाल में ही लखनऊ में एक पत्रकार को पीटकर अहमद बुखारी एक बार फिर चर्चा में आ गये. अहमद बुखारी ने लखनऊ में जिस पत्रकार को पीटा वह न तो किसी बड़े अखबार से जुड़ा था और न ही कोई बड़ा नाम था. लेकिन उस पत्रकार ने सवाल बड़ा किया था जिससे बौखलाकर बुखारी ने उसकी पिटाई कर दी थी. बुखारी का चरित्र यही रहा है कि वे हमेशा छोटे लोगों पर ही हाथ डालते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं....
image
श्रीमान जी, मैं यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया का संपादक और सीईओ हूं!
सेवा में, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली / लखनऊ। श्रीमान, मैं यशवंत सिंह पुत्र श्री लालजी सिंह निवासी ग्राम अलीपुर बनगांवा थाना नंदगंज, जनपद गाजीपुर, उत्तर प्रदेश (हाल पता- ए-1107, जीडी कालोनी, मयूर विहार फेज-3, दिल्ली-96) हूँ. मैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एक वेब मीडिया कंपनी भड़ास4मीडिया में कार्यरत हूं. इस कंपनी के पोर्टल का वेब पता www.bhadas4media.com है. मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर हूं. इससे पहले मैं दैनिक जागरण, अमर उजाला एवं अन्य अखबारों में कार्यरत रहा हूँ. ...
image
कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।...
image
अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...
image
गिलानी साहब, कश्मीर आजाद है!
यह बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि कश्मीरी अवाम जिसे आज़ादी कहता है उसका मातलब भारत में विलय है और गिलानी टाइप पाकिस्तानी पैसे पर पलने वालों को यह हक नहीं है कि वे पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात करें क्योंकि पाकिस्तान ही कश्मीर की आज़ादी का असली दुश्मन है....
image
बुखारी को सबक सिखाना जरूरी
शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
image
अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
image
सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
image
मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
image
आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
image
सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
image
आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
image
एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2