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मार्च में प्रवेश मई में परीक्षा और हो गये अध्यापक

image ऐसे तैयार हो रहे हैं अध्यापक

शिक्षक बनाने के प्रशिक्षण और उनके अधीन चल रही व्यवस्थाओं की तस्वीर साफ करती हैं कि राजस्थान में शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था कितनी लचर और दयनीय है, जैसा प्रशिक्षण और संस्कार हमारी व्यवस्था उन्हें उपलब्ध कर रही है वैसा ही परिणाम निकल रहा हैं। किसी तरह काम चल रहा है और कोई विरोध का स्वर भी सुनाई नहीं दे रहा है इसलिए सरकार परवाह भी किसकी करे? किन्तु इसका ये भी मतलब नहीं है कि इस बदहाली को दूर करने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है। सरकारें यदि चाहती हैं कि शिक्षा को पूरी तरह से निजी क्षेत्र को दे दिया जाएं तो उसे ऐसी कठिन आचार सहिंता बनानी होगी जिससे निजी निवेशकों को खुली लूट करने की छूट न मिले और वो मानवीय संसाधनों का अपने तरीके से शोषण और अनादर न कर सके.

प्रदेश में न केवल तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में विकास हुआ है बल्कि अकादमिक और शिक्षक प्रशिक्षण शिक्षा (बीएड) ने तो सभी क्षेत्रों को पीछे छोड़ दिया है। इससे पहले प्रदेश में गिने चुने शिक्षक प्रशिक्षण के संस्थान थे, और विगत पॉच वर्षों के भाजपा शासनकाल में इनकी संख्या बढ़कर हजारों में हो गई है। शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय खोलने के लिए राज्य सरकार की अनुमति के बाद राष्ट्रीय अघ्यापक शिक्षा परिषद के कठोर मापदंडों की पूर्ति कराना भी जरूरी माना जाता रहा है,लेकिन मान्यता प्राप्त संस्थाएं धरातल पर उनकी पूर्ति कर भी रही है या फिर पूरा खेल कागजों की खानापूर्ति में ही चल रहा है,इस सवाल का जबाब किसी के भी पास नहीं है. गत दिनों प्रदेश के शिक्षामंत्री शांतिधारीवाल ने यह कह कर खलबली मचा दी थी कि प्रदेश के 90 प्रतिशत शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय फर्जी हैं, उनके इस बयान के राजनैतिक अर्थ इस दृष्टि से लगाये जा सकते है कि उन्होंने अधिकांश कॉलेजों को खोलने के लिए गत भाजपा सरकार को दोषी ठहराया है जबकि उससे पहले कांग्रेस की सरकार ने भी इस तरह के महाविद्यालयों को अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रदान किये थे. हां इतना जरूर है कि अधिकांश ऐसे शिक्षण संस्थान भाजपा सरकार के समय में ही अस्तित्व में आऐ हैं। प्रदेश के राज्यपाल ने भी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों के लिए एक नियामक आयोग बनाने की बात कहकर सरकार को इस दिशा में सोचने की ओर इशारा किया हैं।

प्रदेश में लगभग 900 शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय है जिनमें आधा दर्जन ही सरकारी है और शेष सभी निजी क्षेत्र के है। 2008-09 में 300 कालेजों को नई मान्यता दी गई, उसमें से 56 महाविद्यालयों को दिसंबर 08 के अन्तिम सप्ताह में खोलने की अनुमति जारी की गई हैं। इन कॉलेजों में भविष्य के लाखों शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। शिक्षा मंत्री ने जो सवाल उठाया है वह बहुत महत्वपूर्ण है. सरकारी कॉलेज क्यों नहीं? अकेले जयपुर जिले में 135 शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज है जिनमें एक भी सरकारी नहीं है। उधर इन दिनों रोजाना शिक्षकों के खिलाफ उठने वाली शिकायतों ने इस दिशा में बुद्विजीवियों, समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों व शिक्षाशास्त्रियों को सोचने को मजबूर कर दिया है। प्रदेश के सबसे पुराने विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर के खिलाफ एक छात्रा ने पी एच डी कराने के बदले रिश्वत और अश्मत मॉगने का आरोप लगाया तो भीलवाडा के एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक ने छात्र के साथ पिता की भी पिटाई कर दी. बांरा के एक विद्यालय में ग्रामीणों ने नशे में धुत शिक्षकों को बच्चों से मिड डे मील के साथ स्वंय के लिए मुर्गा पकवाते धर दवोचा तो वही करौली के एक विद्यालय में वेलेन्टाईन डे के दिन कमरे में बैठी कक्षा 5 की दो छात्राओं के साथ एक शिक्षक ने अभद्रता की जिसे शिकायत पर जिला कलक्टर ने निलंबित कर दिया है. गंगापुरसिटी में शिक्षकों के लिए सिगरेट, गुटखा लेने गये एक कक्षा 6 के छात्र की जीप से टक्कर हो जाने से मौके पर ही मौत हो गई तो शिक्षकों ने आनन फानन में छात्र को अनुपस्थित दिखा दिया. राजधानी जयपुर में एक शिक्षक को प्रायोगिक परीक्षा में अधिक नम्बर देने के नाम पर स्कूल प्रबंधन से 14 हजार की राशि लेते हुए पुलिस ने धर दबोचा. विधार्थियों ने विलम्ब से आने वाले शिक्षकों के लिए विद्यालय के प्रवेश द्वार पर ताला ही जड़ दिया। ये कुछ किस्से हैं जो निजी शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र से निकले गुरूदेवों की असली दास्तान बयान करते हैं.

प्रदेश में प्राथमिक से उच्च माध्यमिक तक शिक्षण के लिए शिक्षा स्नातक की डिग्री अनिवार्य है,जिसके लिए आयोजित प्री परीक्षा जिसे पी टी ई टी कहा जाता है ,जिसका आयोजन प्रदेश में किसी भी एक विश्वविधालय के द्वारा प्रतिवर्, किया जाता हैं। गत वर्ष की प्रवेश परीक्षा और विधार्थियों के महाविधालयों में प्रवेश की तिथियों और बार्शिक परीक्षा के आयोजन को ही दृिश्टगत रखते हुऐ, मामले को समझने की कोशिश करते है।जुलाई 08 को प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया गया ,उसके बाद परिणाम और प्रवेश की प्रकिया 15  अक्टूबर 08 से 15 फरवरी 09 तक चली है जबकि कुछ क्षेत्रों के 600 विधार्थी अब भी अपने प्रवेश के लिए आन्दोलन रत है,जिन्हें मार्च 09 में प्रवेश की अनुमति हॉल ही में दे दी गई हैं वही आगामी प्रवेश परीक्षा की तिथि 13 अप्रेल 09 घोषित हो चुकी है। मई 09 में वार्षिक परीक्षा का आयोजन अन्य वर्षों की भॉति नियत है। शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नौ माह का समय निर्धारित है जिसमें 180 दिनों के  शिक्षण कांलाश अनिवार्य का नियम भी लागू है तो एक छात्र अध्यापक को 40 मैक्रो लैसन भी विभिन्न कक्षाओं के विधार्थियों के समक्ष देने होते है, साथ ही कुछ महत्वपूर्ण लैसन छात्र अध्यापक अपने सहपाठियों के समक्ष प्रस्तुत करता है जिनके द्वारा उसे शिक्षण के विभिन्न आवश्यक कौशलों का विकास करना होता हैं। एक दिन में एक ही पाठांश का प्रर्दशन किया जा सकता हैं। इन सबके अलावा आधा दर्जन अनिवार्य और ऐच्छिक विषयों के साथ कम्प्यूटर का ज्ञान और शिक्षण भी उसे पूरा करना होता है, तो क्या ये संभव है कि फरवरी या मार्च या उससे कुछ पहले प्रवेश लेने वाले प्रशिक्षणार्थी द्वारा व्यवस्थित तरीके से आवश्यक शिक्षण और प्रशिक्षण प्राप्त किया जा सकता हैं? 
कागजों पर किराये के शिक्षक

शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में शिक्षण के लिए अनुभव के साथ एम.एड. की डिग्री होना जरूरी हैं , वहीं प्राचार्य के लिए शिक्षा में डाक्टरेट की डिग्री अनिवार्य कर रखी हैं। यह चौकाने वाला तथ्य हो सकता है कि इतने कॉलेजों के लिए प्रदेश में योग्यताधारी प्राचार्य और शिक्षक उपलब्ध ही नहीं हैं,और प्रबंधन पूरा वेतन देता नहीं हैं। ऐसे में कागजों में अन्य प्रदेशों के योग्यताधारियों के कागज किराये पर लेकर अधिकाश कॉलेजों ने लगा रखे है, जबकि जमीन पर 2 से 5 हजार के अयोग्य शिक्षक प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। योग्य शिक्षकों के प्रमाणीकरण के लिए चेक से वेतन को भी बडी ही चालाकी से दिया जा रहा है। योग्यताधारी शिक्षकों के ही नामों से बैक में खाते खोले गये है जबकि वहॉ फोटो प्रबंधकों ने अपनों के लगाये हुए हैं, जो जमा राशि को स्वंय ही निकाल लेते हैं।

सरकार देती है पूरी फीस और छात्रों से होती है अवैध वसूली भी

शिक्षा स्नातक के लिए प्रदेश में 22 हजार 400 रूपये की फीस निर्धारित कर रखी है जिसमें से न्यूतम राशि की कटौती के बाद पूरी फीस महाविद्यालयों को दे दी जाती है। सौ सीटों वाले महाविद्यालयों को 21 लाख से अधिक राशि विश्वविद्यालय द्वारा विद्यार्थियों की फीस में से दी जाती हैं, जो शिक्षकों के वेतन और व्यवस्थाओं के लिए ही होती हैं। ऐसे महाविद्यालयों में भवन,योग्य शिक्षक, पुस्तकालय और अन्य सुविधाएं भले ही न हों, लेकिन विद्यार्थियों से अवैध वसूली अनिवार्य रूप से किसी न किसी बहाने से की जाती हैं। जिसमें शिक्षण किट, ड्रेस, प्रायोगिक परीक्षा और सबसे अधिक शैक्षणिक भ्रमण जिसे कागजों में ही पूरा कर दिया जाता हैं। इस सब के अलावा यदि विद्यार्थी महाविद्यालय आने और प्रशिक्षण के अन्य कार्यो से पूरी तरह ही बचना चाहता है तो मोटी रकम के साथ ऐसा भी सौदा आसानी से ये महाविद्यालय कर लेते हैं

शिक्षक प्रशिक्षण की व्यवस्था का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि महाविधालय स्तर की इस व्यवस्था की निगरानी के लिए पृथक से कोई विभाग नहीं हैं। इसकी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी लाखों शिक्षकों और हजारों विद्यालयों की जिम्मेदारी से जूझ रहे माध्यमिक शिक्षा विभाग के पास हैं। जिसके पास खुद के अधीन संचालित निजी संस्थाओं की सूची तक नहीं हैं ।

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komal on 11 March, 2009 21:09;52
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wah re rajasthan tu phle aesa n tha
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rakesh on 11 March, 2009 21:35;26
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राजस्थान में शिक्षा रामभरोसे है यहॉ कुछ भी सही नहीं है निजीकरण के नाम पर सरकारों ने यहॉ के विधार्थियों और भविश्य के साथ खिलवाड किया जा रहा है चारों तरफ ‘शोशण है सरकारें भी घडियाली ऑसू बहाती हैं ‘शांति धारीवाल ने कुछ कहा तो अब उनका मंत्रालय ही बदल दिया गया है और गृहमंत्री बन चुके धारीबाल एक वयान देकर ‘शांत हो गऐ है। शिक्षा को निजी क्षेत्र के पास रहने दिया जाऐ लेकिन सरकारी नियंत्रण का बढना जरूरी है नही तो वो दिन दूर नही जब यहॉ यू पी की तरह डिग्री बिकेंगी।
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पूरी रिपोर्ट में राजस्थान के स्थान पर उत्तर प्रदेश लिख दिया जाय तो भी यह शत प्रतिशत सही होगी। बस यहाँ इन प्रशिक्षण महाविद्यालयों का नियन्त्रण उच्च शिक्षा निदेशालय और सम्बन्धित विश्वविद्यालयों के पास होता है। माध्यमिक शिक्षा विभाग के पास नहीं।

बिल्कुल सच्ची रिपोर्ट जो देश के भावी कर्णधारों को अयोग्य हाथों में सौंपे जाने की कहानी बयान करती है।
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arpit agrawal on 12 March, 2009 11:58;59
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overall its good analysis. you have done well.keep it up
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avinash gupta on 12 March, 2009 15:52;34
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the condition of vocational education in Rajasthan especially in the field of education, is really miserable.Now colleges and schools have become such type of shops where education is sold.The report by Rajiv Sharma clears the condition of vocational education like a mirror.The government must make efforts to prevent this commercialisation of education.
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निशा on 13 March, 2009 15:38;02
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शिक्षक बनाने के लिए जिस प्रकार की व्यवस्थाऐं राजस्थान में कर रखी है उनसे ऐसा लगता है कि सरकार को प्रदेश के भविश्य की कोई भी चिंता नही है।यही कारण राजस्थान में युवा पीढी दिशाहीन होती नजर आ रही है।जिसके लिए पुलिस को भी मशक्कत करनी पड रही है ।शिक्षकों का प्रशिक्षण ही नही प्रशिक्षण पूर्व चयन भी कठोर होना चाहिए ।एक वर्ष में जो प्रदेश एक लाख शिखक तैयार कर रहा है क्या उसके पास उनके रोजगार की इतनी व्यवस्था उपलव्ध है।शायद नही है तो फिर इतने शिक्षकों को तैयार क्यों किया जा रहा हैं।प्रशिक्षण की इन निजी व्यवस्थाओं ने जिसे कुछ नहीं अवसर मिल रहा वह शिक्षक बनने की ओर चला आ रहा है।जिससे इस तरफ न्यूनताऐं दिखाई पड़ रही है।अच्छा हो सरकार इस दिशा में कारगर कदम उठाऐ जिससे बच्चों का भविश्य सही हाथों में जा सके ।
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग. rsmediaraj@gmail.com
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