हिन्दू होने का 'अ'धर्म
जिस कानपुर में दंगा करके सिमी इस्लामिक छात्र आंदोलन से जेहाद के रास्ते पर चल पड़ा था उसी कानपुर में अगस्त के महीने में हुए एक विस्फोट के बाद शक किया गया कि ऐसा करनेवाले बजरंग दल के लोग थे. यह छोटी सी घटना बताती है कि एक प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व आकार ले रहा है जो तीर कमान नहीं बल्कि बम और डेटोनेटर पर हाथ साफ कर रहा है.
राजनीतिक हिन्दुत्व के पुरोधा संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी अनेक सहयोगी संस्थाओं में व्यर्थ की लाठी भाजने से लेकर जूडो कराटे तक सिखाये जाते हैं. तर्क यह दिया जाता है कि शास्त्र के साथ शस्त्र पूजा हिन्दू धर्म की अनिवार्य शिक्षा है. २०-२२ दिन के इन कैम्पों में संघ के प्रचारक संभावित स्वयंसेवकों को बहुत भोड़ें और अधकचरे तरीके से तथाकथित शस्त्र शिक्षा देते हैं. संघ के स्वयंसेवकों को अनुशासित स्वयंसेवक मानने के लिए एक अनिवार्य ड्रेस कोड होता है जिसमें खाकी की हाफपैण्ट और काली टोपी के साथ एक डंडा भी विशेष अंदाज में हाथ से लपेटकर पीठ से चिपकाकर रखना होता है. संघ के प्रचारकों की माने तो यह "दंड" स्वयंसेवकों को शस्त्र से 'सुरक्षा का सनातन बोध' कराता है.
इक्कीसवी सदी के इस पूर्वार्ध में जब इस्लामिक आतंकवादी परमाणु हथियारों पर हाथ साफ करने की मंशा रखते हों तब भी दंडे से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में हिन्दुओं की रक्षा करने की मंशा रखना थोड़ा पिछड़ापन तो माना ही जाएगा. इसलिए संघ समर्थित बजरंग दल के लोग थोड़ा बम-गोले के साथ प्रयोग करने की मंशा रखें तो इससे उनकी प्रगतिशील सोच की झलक मिलती है. भारत में अक्सर " शास्त्रों" के हवाले से लोग कहते भी हैं कि सठे साठ्यम् समाचरेत. बात इससे भी समझ में न आती हो तो "तुलसीदास" के हवाले से यह बात भी जोड़ दी जाती है कि खग समुझहिं खगहिं करि भाषा. ये शास्त्र और ऐसे तुलसीदास जिस नये हिन्दुत्व की प्रेरणा हैं, उसका विस्तार बहुत व्यापक है. संघ के लोग बहुत गर्व से बताते हैं कि उनके संस्थापक "परमपूज्य हेडगेवार" की दूरदृष्टि ने बहुत पहले यह भांप लिया था कि देश के आजाद होने के बाद हिन्दू समाज पर संकट आयेंगे. इसलिए उन्होंने नागपुर में दशहरे के दिन १९२५ में ही एक ऐसे संगठन की नींव रख दी जिसके पहले पांच सदस्य बच्चे थे. विशाल हिन्दू समाज की रक्षावाली दूरदृष्टि के साथ हेडगेवार ने उन बच्चों के साथ जो शुरूआत की आज उसके साथ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कोई दो करोड़ लोग जुड़े हुए हैं. कोई ४०-४२ (इसमें कम ज्यादा भी हो सकते हैं) सहयोगी संगठन संघ की "दंड" वाली ट्रेनिंग लेकर समाज में तरह-तरह से काम कर रहे हैं. हर हिन्दूवादी आम तौर एक तर्क जरूर देता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि जिस भूभाग से हिन्दू अल्पसंख्यक हुए वह हिस्सा भारत से अलग हो गया या अलग होने की तैयारी में हैं. निश्चित रूप से यह बोलती बंद कर देनेवाला तर्क है. लेकिन यहां लोग यह बात याद नहीं कर पाते कि ऐसा भारत में कब से शुरू होता है? आप देखेंगे तो पायेंगे कि प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व का विस्तार और इस्लामी या ईसाई प्रभुत्व दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में आगे बढ़ रहे हैं.
लेकिन नये तरह के इस हिन्दुत्व की परिभाषा को स्थापित करनेवाला संघ अकेला संगठन नहीं है. बहुत सारे साधु-सन्यासी भी इस बात के पक्षधर हैं कि हिन्दुओं को इस्लामिक आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए. केवल केश-वेश से ही सन्यासी लगनेवाले ऐसी साधु जमात अर्धशिक्षित सन्यासी भले ही हो लेकिन वे स्वभाव से पूर्णशिक्षित राजनीतिज्ञ होते हैं. बहुत सारे इस्लामिक संगठन यह आरोप लगाते हैं कि विहिप के प्रभाव के कारण साधु समाज में ऐसी भावनाएं आयी हैं. लेकिन यह अकेले विहिप या संघ का प्रभाव नहीं है. इसमें संपत्ति और राजनीति की भूमिका ज्यादा है. चित्रकूट और अयोध्या भारत के दो महत्वपूर्ण तीर्थ हैं लेकिन यहां के अधिकांश सन्यासी बंदूकों के बिना आश्रम से बाहर नहीं निकलते. निश्चित रूप से ये बंदूके इस्लामिक आतंकवाद से हिन्दुत्व के बचाव में नहीं रखी गयी है बल्कि ऐसे विरोधियों से सुरक्षा के लिए रखी गयी हैं जो उनकी मठ "माया" पर नजर गड़ाये बैठे है.
इन बातों का मतलब यह नहीं है कि हिन्दुत्व प्रतिक्रिया नहीं करता. प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व का जन्म ठीक-ठीक कहां से होता है यह कहना तो मुश्किल है लेकिन आर्य समाज के जन्म और विस्तार को आज के प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व की शुरूआत मान सकते हैं. आर्य समाज के पहले भारतीय समाज ने मुगल आक्रमणकारियों से इस देश के धर्म और दर्शन को बचाया था लेकिन वह प्रतिक्रियावादी तरीका नहीं था. संभवतः भक्ति आंदोलन वह सनातन भारतीय समाज की वह आखिरी कड़ी थी जो आक्रमण और अतिक्रमण को अपने तरीके से अंगीकार करने की क्षमता रखता है.इसके बाद देश के अंदर भारतीय समाज ने भारतीय तरीके से जवाब देना शायद छोड़ दिया. भक्ति आंदोलन की आखिरी छाप उड़ीसा में महिमा स्वामी के रूप में दिखाई देती है. अठारहवीं सदी में महिमा स्वामी ने चर्च के बढ़ते प्रभुत्व को भांप लिया था. उन्होंने यह भी भांप लिया था कि भारतीय समाज में ब्राह्मणवादी मानसिकता इतनी तीव्र हो रही है कि अपने ही समाज के कामकाजी वर्ग को धर्मच्युत होने पर मजबूर किया जा रहा है. उन्होंने शून्य धर्म की शुरूआत की जिसने न केवल ब्राह्मणवादी मानसकिता को जवाब दिया जो कि कामकाजी वर्ग को जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने से रोक रहा था, बल्कि ईसाई मिशनरियों को भी इससे अच्छी-खासी चुनौती मिली. महिमा सन्यासी दावा करते हैं कि कामकाजी समाज में धर्म परिवर्तन इतना कम हो गया कि घबराकर ब्रिटेन की महारानी ने महिमास्वामी को मारने के लिए दूत भेजा था, वह स्वामी जी तक पहुंचता इसके पहले ही उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया.
इसके बाद एक तरफ भारत में आर्य समाज, आरएसएस और हिन्दू महासभा जैसे संगठन प्रभावी होते हैं तो दूसरी ओर आक्रमण और अतिक्रमण का विशुद्ध भारतीय शैली में हल निकाल लेने वाला मानस गुप्त होने लगता है. आश्चर्य है कि यह मानस भारत से ज्यादा अमेरिका और यूरोपीयन देशों में सक्रिय हो जाता है. पूरी बीसवी सदी भारत से संतों के एक्सपोर्ट की सदी कही जाएगी जिन्होंने सनातन जीवन दर्शन को हिन्दुत्व से अलग उसके वास्तविक स्वरूप में परिभाषित किया. यहां भारत में, जिस चरमपंथी हिन्दुत्व का उदय होता है वह पूरी तरह से अभारतीय, सनातन धर्म विरोधी और प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व है. इस हिन्दुत्व का राजनीतिक उद्येश्य है और यह मानता है कि सत्ता और शस्त्र के बिना हिन्दू धर्म को बचाया नहीं जा सकता. अपनी बात के पक्ष में ऐसा हर हिन्दूवादी आम तौर एक तर्क जरूर देता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि जिस भूभाग से हिन्दू अल्पसंख्यक हुए वे भारत से अलग हो गये या अलग होने की तैयारी में हैं. निश्चित रूप से यह बोलती बंद कर देनेवाला तर्क है. लेकिन यहां लोग यह बात याद नहीं कर पाते कि ऐसा भारत में कब से शुरू होता है? आप देखेंगे तो पायेंगे कि प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व का विस्तार और इस्लामी या ईसाई प्रभुत्व दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में आगे बढ़ रहे हैं.
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है. भारत में जिस संवैधानिक गणतंत्र की स्थापना की गयी वह राजनीतिक हिन्दुत्व और इस्लामिक चरमपंथियों दोनों को मजबूत करती है. भारत में धर्म-निर्पेक्ष जैसे शब्द ही एक आम आदमी को विचलित करते हैं. फिर उसकी जैसी मनमानी परिभाषाएं गढ़ी जाती हैं उससे पहले से छीजन के कगार पर खड़े भारतीय मानस पर यह असर होता ही है कि अगर उन्हें सुरक्षित रहना है तो उग्र तरीकों को अपनाना जरूरी है. इसकी झलक देखनी हो तो आप दिल्ली में पाकिस्तान से भागकर आये हिन्दुओं और सिखों को देखिए. ऐसे लोग जिन्होंने बंटवारे का वह कत्लेआम देखा है वे इस बात के कट्टर समर्थक हैं कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं और उनको दो अलग राष्ट्रों में ही रहना चाहिए.
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत भी है?
"प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व का विस्तार और इस्लामी या ईसाई प्रभुत्व दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में आगे बढ़ रहे हैं."
जब रोग का काक्रमण होता है, प्रतिरोधक शक्ति भी सक्रिय होती है.
भारत में धर्म-निर्पेक्ष जैसे शब्द ही एक आम आदमी को विचलित करते हैं. फिर उसकी जैसी मनमानी परिभाषाएं गढ़ी जाती हैं उससे पहले से छीजन के कगार पर खड़े भारतीय मानस पर यह असर होता ही है कि अगर उन्हें सुरक्षित रहना है तो उग्र तरीकों को अपनाना जरूरी है. इसकी झलक देखनी हो तो आप दिल्ली में पाकिस्तान से भागकर आये हिन्दुओं और सिखों को देखिए. ऐसे लोग जिन्होंने बंटवारे का वह कत्लेआम देखा है वे इस बात के कट्टर समर्थक हैं कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं और उनको दो अलग राष्ट्रों में ही रहना चाहिए.
केवल भक्ति आंदोलन से कुछ नहीं होगा। याद करिए सन् 1024 में मुहम्मद गजनी ने सोमनाथ के मन्दिर पर आक्रमण कर मन्दिर को नष्ट किया। वहाँ शिवलिंग को खंडित कर दिया और करीब 50,000 से ज्यादा हिन्दुओ का कत्ल किया। सोमनाथ के मन्दिर पर उसने इस प्रकार से 17 बार आक्रमण किया। सन् 1528 में बाबर ने अयोध्या का राम मन्दिर तोड़ कर वहाँ बाबरी मस्जिद बनाईं। सन् 1658 में औरंगजेब ने जबरन हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर करा। जिन्होंने इस्लाम कबूल नहीं करा उन पर ज़ुल्म किए गए और मार दिया गया। सन् 1688 में औरंगजेब ने मथुरा और आस पास के करीब 1000 मन्दिर तुड़वा दिए। मुगलों के कुल शासनकाल में करीब 60,000 मन्दिर तोडे गए। सन् 1761 में अहमद शाह दुर्रानी ने उत्तर भारत में 2,00,000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया।
और हम हर मौके पर राम-राम जपते रहे किसी अवतारी महापुरूष की प्रतीक्षा में।
आपने तुलसीदास को उद्धृत किया है। तुलसी बाबा ने यह भी कहा है, बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।
Ad jal gagar chalkat jay.
Take the good knowlege of the subject before writ a writ up like this.
मैं नीतिगत तौर पर संघ के कई सिद्धांतों को सही मानता हूं। भारत पर इस्लामिक आक्रांताओं ने अत्याचार किये; ईसाई मिशनरियां छल कपट से धर्मांतरण कर रही हैं, ये सब सही है। इनका घोर विरोध भी आवश्यक है। लेकिन हिंसा के रास्ते विरोध सिर्फ हिंदुओं को ही हानि पहुंचायेगा।
हिंदुओं केे पैरोकारों की सबसे बडी नाकामी यही रही है कि वे विरोध/प्रतिरोध का कोई प्रभावी और सकारात्मक तरीका ढूंढने मे असफल रहे हैं। अब गुजरात मे गोधरा का जघन्य कांड हुआ। लेकिन इसके विरोध मे गरीब असहाय लोगों को मारकर बजरंग दल पता नहीं कौन सी बहादुरी दिखा रहा था। अगर इतना ही खून खौल रहा था, तो जाते गोधरा मे सिग्नल फालिया की बस्ती मे, और ढूंढ निकालते असल अपराधियों को। लेकिन ऐसा करने के लिये वाकई हिम्मत चाहिये, जो गर्भवती औरतों का पेट चीरने मे नहीं लगती।
अगर मान भी लें, कि मुसलमान स्वभाव से उग्र और धर्मांध हैं, तो भी इसका इलाज क्या है? दंगा मचाकर १-२००० को मार डालना? या मेहनत करके सद्भाव पैदा करना और मुसलमानों मे जागृति पैदा करना।
इसी तरह से धर्मांतरण को लीजिये। दस पादरियों को पीटकर क्या हासिल होगा? मिशनरियों ने जिस तरह से अपने धर्म की मार्केटिंग की है, शायद उस पर आईआईएम वाले सैंकडों केस स्टडीज बना सकते हैं। एक मूलतः कट्टर और असहिष्णु संप्रदाय को किस खूबी से उन्होंने दान दया और अहिंसा का जामा पहनाया है! किसी भी ईसाई से पूछिये, वो कहेगा कि सिर्फ ईसा को मानने वाले ही स्वर्ग मे जायेंगे, बाकी सब नर्क में। कोई भी ईसाई ये नहीं मानेगा कि उसके प्रभु के सिवाय कोई दूसरा भगवान है। क्या हिंदू संगठनों ने कभी कोशिश की, इस सोच को कटघरे मे खड़ा करने की?
असली भारतीय सोच तो धर्मांतरण की अवधारणा को ही बेहद हास्यास्पद समझती। धर्मांतरण, यानि कि एक पूजा पद्धति, एक अध्यात्मिक सोच को पूर्णतया नकार कर दूसरे को अंगीकार करना। क्या जरूरत है इसकी? दोनों तरीके साथ साथ क्यों नहीं रह सकते? सत्य, ईश्वर, ये सब कोई एक धर्म की बपौती थोड़े ही हैं। इसीलिये भारत मे कभी धर्मांतरण, और विभिन्न धर्मों का कोई फंडा था ही नहीं।
इतिहास का जो थोड़ा मैंने अध्ययन किया है, उससे मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि लोगोँ की भावनायें भड़काना, और एक दूसरे से लड़वाना बहुत सरल है, शायद ये मनुष्य का सहज स्वभाव है। लेकिन ये रास्ता देर सवेर अराजकता और अनाचार की तरफ ही जाता है।
दूसरा रास्ता है लोगों को किसी बुराई के खिलाफ जागृत करना, बगैर नफरत पैदा किये, बगैर विरोधी का राक्षसीकरण किये। भारतीय परंपरा ने सदैव इसी मार्ग का पालन किया है। तभी तो श्री राम लक्ष्मण जी को मरणासन्न रावण से राजनीति का ज्ञान लेने भेजते हैं। इसीलिये भारत मे कर्ण का सम्मान होता है, और दुर्योधन और शकुनि जैसे "विलेनों" मे भी अच्छाई देखी जाती है। और आप अगर राम/कृष्ण के नाम पर हिंसक आंदोलन करते हैं, तो ये भी देखिये, कि ये दो महानायक युद्ध रोकने के लिये किस हद तक गये थे। रावण के इतने नीच अपराध के बाद भी राम ने दो दो बार दूत भेजे शांति प्रस्ताव लेकर। कृष्ण स्वयं दूत बनकर गये थे महाभारत रोकने के लिये।
मेरे मत मे हिंसक विरोध का अधिकार उसी को है, जो हिंसा रोकने के लिये इतने प्रयास करने की नैतिक शक्ति रखता हो।
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