Home | बियाबान में शोर | हजार करोड़ की हरियाली

हजार करोड़ की हरियाली

image जेपी ग्रीन्स, ग्रेटर नोएडा

"साल २००८ तक दिल्ली से सटे इलाके नये तरह के शहर की बसावट के लिए खासे चर्चित हो चुके होंगे. आज के झड़ौदा कला, झटीकरा, घोड़ी-बछेड़ू और गढ़ी हरसरू जैसे गांव उस समय अंग्रेजीदां नामों और लोगों से शोभायमान हो रहे होंगे. आज भले ही इन गांवों के आस-पास अकूत खेत और चारागाह हों और यहां गाय-भैंसे चरती हों लेकिन उस समय ये चारागाह नये तरह के घास के मैदानों में परिवर्तित हो जाएंगे जिसमें आदमी बड़ी कीमत अदा करके प्रवेश पा सकेगा...

आज चारों ओर जो झाड़ियां उगी हुई हैं वे हमारे लिए भले ही समस्या हों लेकिन साल २००८ में ये झाड़ियां बेशकीमती हो जाएंगी. आज हम अपने पानी के तालाबों की कोई कद्र नहीं करते लेकिन उस समय एक-एक तालाब के आस-पास लंबे-चौड़े घास के मैदान बनाये जाएंगे और उन पर कुछ लोग गुल्ली-डंडा जैसा कोई खेल खेलने के लिए इकट्ठा हुआ करेंगे. आजकल कुछ अंग्रेज साहब यह लोहे का गुल्ली-डंडा खेलते हैं. हमारे और उनके इस खेल में फर्क सिर्फ इतना है कि उनका डंडा लोहे का होता है और गुल्ली की जगह वे लोग गेंद का इस्तेमाल करते हैं. हमारे खेल को तो गांव के अमीर-गरीब, बूढे-बच्चे सब देखते हैं और मजे लेते हैं लेकिन उनका गुल्ली-डंडा देखने के लिए भारी कीमत अदा करनी होगी. 

ऐसे ही घास के हरे-भरे मैदानों के आस पास कुछ घर बनाए जाएंगे जिसमें वे लोग रहेंगे जो इतना पैसा कमा चुके होंगे कि उनके पास लोहेवाला गुल्ली-डंडा खेलने के अलावा औरकोई काम नहीं होगा. ऐसे लोग बड़ी प्रतिष्ठा की नजर से देखें जाएंगे क्योंकि उनके पास बहुत पैसा होगा. वे लोग पैसे के बल पर पहले यहां रहनेवाले लोगों को उजाड़ेगें, चारागाहों कोनष्ट करेंगे, पेड़ों का काटेंगे और तालाबों को पाट देंगे. लेकिन जल्द ही अहसास हो जाएगा कि जीवन के लिए पैसा नहीं बल्कि पानी जरूरी होता है. जैसे ही यह अहसास बढ़ेगा पेड़बेशकीमती हो जाएंगे. घास अनमोल हो जाएगी और नये तरह के बने तालाबों और झीलों के किनारे रहने की कीमत इतनी अधिक होगी कि आम आदमी साफ हवा और तालाब कापानी पाने के लिए तरस कर रह जाएगा. "

मैं आपको डराना नहीं चाहता इसलिए साल 2008 की बात कर रहा हूं. मान लीजिए 1908 में यह किसी ने कल्पना की थी. अगर आज सौ साल बाद वही आदमी आकर देखे तोहकीकत उसकी कल्पना से ज्यादा भयावह हो चुकी है. दिल्ली के आस-पास जमीन अब शायद गज नहीं इंच में बिकना शुरू होगी. आस-पास ५० किलोमीटर के दायरे में बिल्डरों नेजहां जैसे जितनी जमीन मिली कब्जा कर लिया है. जो थोड़ी बहुत कसर थी उसे अंबानी बंधुओं ने पूरा कर दिया है. दिल्ली के दो छोर पर एक ओर मुकेश अंबानी अपना एसईजेडबना रहे हैं तो दूसरी ओर अनिल अंबानी अपनी महत्वाकांक्षी गैस आधारित बिजली घर की परियोजना को पूरा कर रहे है. दो अंबानी बंधुओं के बीच बहुत सारे छोटे बड़े नामी-बेनामीव्यापारी भी हैं जो अनाप-शनाप तरीकों से जमीन हथियाने में लगे हुए हैं. इस "पवित्र कर्म" में सरकारें उनको पूरा मदद कर रही हैं.

दिल्ली के आस-पास तीन बड़े रियल एस्टेट डेवलपर हैं जो हरियाली की सबसे ज्यादा कीमत वसूलते हैं. पहला और सबसे बड़ा रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ है जिसके ऊपर आज भी गुड़गांव के किसानों की जमीन परनाजायज तरीके से कब्जा करने के आरोप सुनाई देते हैं. लेकिन आज जिसे आधुनिक गुड़गांव कहा जाता है वहां सबसे बड़ा रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ ही है. गुड़गांव और नोएडा की दूसरी बड़ी रियल एस्टेट कंपनी है यूनिटेक. इस कंपनी का विकास चौंकानेवाला है. साल 2004 में कंपनी का मुनाफा 7 करोड़ रूपये था जो साल 2008 में बढ़कर 2067 करोड़ हो गया. निश्चित रूप से यूनिटेक के इस आकाशीय विकास में हरियाली का बहुत बड़ा योगदान है. यहां एक और बड़ी रियल एस्टेट कंपनी का जिक्र करना जरूरी है जो उस तरह से चर्चित तो नहीं है लेकिन हरियाली को बेशकीमतीबनाने में उसकी भूमिका बड़ी सराहनीय है. वह है जयप्रकाश एसोसिएट्स. जयप्रकाश एसोसिएट्स ने ग्रेटर नोएडा में 452 एकड़ में एक रियल एस्टेट विकसित किया है जिसकानाम है जेपी ग्रीन्स. जेपी ग्रीन्स का दावा है कि इस 452 एकड़ जमीन में उसने १४ 'वाटर बाडी' विकसित किये हैं. 60 एकड़ जमीन सिर्फ हरियाली के नाम पर कुर्बान कर दी गयीहै. और इस ४५२ एकड़ में चिड़िया भी चहचहाती है और घासों पर तितलियां भी मंडराती हैं. और हां, वह घास का मैदान तो है ही जिसमें पैसा कमाकर बेकार हो चुके लोहे केडंडेवाला गुल्लीडंडा खेलते हैं. आपको जेपी ग्रीन्स के प्रति सहृदय होना ही चाहिए कि इस अंधे बाजारवाद के युग में कोई कंपनी पर्यावरण का इतना ध्यान रख रही है. लेिकन आपसिर्फ सहृदय ही रहिए क्योंकि आप इस जगह में रहने की बात तो दूर इसे देख भी नहीं सकते. चारो ओर चारदीवारी है और वह चारदीवारी इतनी ऊंची है कि आप उचककर तो क्याबस की छत पर बैठकर भी अंदर नहीं झांक सकते. आस-पास दो एक दरवाजे हैं जहां वही लोग दरबान बनाकर खड़े कर दिये गये हैं जो थोड़े समय पहले तक इस इलाके में किसानऔर कारीगर की हैसियत से खुद भी घूमते थे और अपनी भैसों को भी घुमाते थे.

जेपीग्रीन्स ने हाल में ही इस 452 एकड़ में कहीं एक जगह अपार्टमेन्ट बनाने की घोषणा की है. अपार्टमेन्ट का नाम है मूनकोर्ट अपार्टमेन्ट. क्योंकि इस अपार्टमेन्ट के आस-पासपानी की कृतिम झीलें हैं, घास के मैदान हैं और पेड़-पौधे हैं इसलिए यहां दो बेडरूम के एक अपार्टमेन्ट की कीमत 65 लाख और तीन बेडरूम के अपार्टमेन्ट की कीमत ८६ लाखरूपये है. यह मैं सिर्फ अपार्टमेन्ट की कीमत बता रहा हूं. अगर आप विला या बंगला लेना चाहते हैं तो 2 से 8 करोड़ रूपये के बीच कोई कीमत अदा करनी पड़ेगी. आप जानना चाहेंगे कि दो बेडरूम का एक सामान्य अपार्टमेन्ट कितनी जगह घेर सकता है? बहुत जगह लेकर भी बनाया जाए तो 80-90 वर्ग गज से ज्यादा नहीं. आपमान सकते हैं कि अगर बहुत अच्छे मैटेरियल, मंहगे फिटिंग और जकूजी बाथ के साथ भी आपको यह फ्लैट बनाकर दिया जाए तो निर्माण की लागत जमीन सहित किसी भीकीमत पर 8-10 लाख से ज्यादा नहीं जाती. यानी एक फ्लैट पर कम से कम 55 से 75 लाख की कमाई पक्की है. आप सवाल उठा सकते हैं कि यह तो उपभोक्ता के साथज्यादती है. निश्चित रूप से यह किसी भी उपभोक्ता के साथ ज्यादती है लेकिन यह बढ़ी हुई कीमत घर की नहीं बल्कि उस हरियाली की है जिसे खारिज करके हम आप शहर कीकालोनियों के स्वघोषित कैदी हो गये हैं.

साल 2008 में अगर हरियाली लाखों-करोड़ों अदा करने पर मिलती है तो आज से सौ साल बाद की कल्पना करिए. साल 2108 में आपकीअगली से अगली पीढ़ी क्या वह कीमत अदा कर पायेगी कि वह साफ हवा में सांस ले सके? घास पर उड़ती तितली को निहार सके और अपने आस-पास पानी की झील और तालाब से उठती ठंडी हवा को महसूस कर अपने तन-मन की थकान उतार सके? साल 2008 में ही हजारों करोड़ की कीमतवाली हरियाली 2108 तक कितनी बेशकीमती हो सकती है अभीतो सोच पाना भी मुश्किल लग रहा है.

Subscribe to comments feed Comments (4 posted):

अशोक पाण्‍डेय on 22 August, 2008 16:27;44
avatar
सौ साल बाद क्‍या होता है, यह देखने के लिए हम जिंदा तो नहीं रहेंगे। लेकिन मुझे पूरा विश्‍वास है कि दस-बीस साल के अंदर ही बहुत कुछ देखने को मिल जाएगा। हरियाली को खारिज करने की कीमत तो हमें और हमारी आगे की पीढि़यों को अदा करना ही होगा।
..बेहतरीन लेख। धरती व धरतीपुत्रों को लेकर विस्‍फोट की चिंता अत्‍यंत सराहनीय है।
Thumbs Up Thumbs Down
0
anup on 23 August, 2008 14:03;24
avatar
leki kiya kar sakte hai.........jo ho rahaa hai galat hai.....
Thumbs Up Thumbs Down
0
y on 27 August, 2008 01:19;59
avatar
your vision is excellent.but how could we save our lands n greenry from these property giants.
Thumbs Up Thumbs Down
0
lata on 29 August, 2008 11:12;01
avatar
aap sahi kah rahe hain. Is BHAYANAK sach se hum bhi parichit par kuch bhi karne me asamarth hain...kyonki hum AAM ADMI hain. AAM ADMI TERI YAHI KAHANI, AANKHON ME, UN-GINAT NA PURI HO PANE WALI ICHCHAON KA PANI.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 4 | displaying: 1 - 4

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
Rate this article
3.00
More from बियाबान में शोर
Previous
image
सुदर्शन का (कु) दर्शन
जबसे आरएसएस के लोगों की आतंकवादी घटनाओं में संलिप्तता सामने आयी है, तब से आरएसएस के नेता बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में ही शायद संघ के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इसके स्वयंसेवक विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। इसी बौखलाहट में आरएसएस के एक्स चीफ केएस सुदर्शन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और सोनिया गांधी के बारे में ऐसे शब्द बोल दिए, जिन्हें एक विकृत मानसिकता का आदमी ही बोल सकता है।...
image
सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?...
image
रोम रोम में इरोम
कश्मीरी अलगाववादियों की तरह उसने आज तक अपने हाथ में कभी पत्थर नहीं उठाया. हालांकि उसका भी विरोध उसी बात को लेकर है जिसे लेकर कश्मीर में पत्थरबाजों की पूरी फौज सड़कों पर उतार दी गयी. पूर्वोत्तर में सशस्त्र सेना अधिनियम समाप्त किया जाए. इरोम शर्मिला विरोध कर रही है लेकिन उसका हथियार आंदोलन नहीं, आत्मोत्सर्ग है. पिछले दस साल से उसने अन्न त्याग कर रखा है. पुलिस और प्रशासन नाक की नलियों से पौष्टिक पदार्थ पहुंचाकर भले ही उसके शरीर को जिंदा रखे हुए हैं लेकिन उसे जब भी मौका मिलता है वह राजघाट जाती है और फफककर रोती है. शायद शर्मिला के सत्याग्रह को समझने के लिए देश में दूसरी कोई जगह बची भी नहीं है. ...
image
जिसके दर पर फाइल पहुंची, उसने रात गुजार ली
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो. मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है वह दिल दहला देनेवाली है. जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो वहां एक 31 मंजिला बिल्डिंग अवैध जमीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी. भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था. कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा. ...
image
बहुत बड़ा दुखारी है बुखारी
हाल में ही लखनऊ में एक पत्रकार को पीटकर अहमद बुखारी एक बार फिर चर्चा में आ गये. अहमद बुखारी ने लखनऊ में जिस पत्रकार को पीटा वह न तो किसी बड़े अखबार से जुड़ा था और न ही कोई बड़ा नाम था. लेकिन उस पत्रकार ने सवाल बड़ा किया था जिससे बौखलाकर बुखारी ने उसकी पिटाई कर दी थी. बुखारी का चरित्र यही रहा है कि वे हमेशा छोटे लोगों पर ही हाथ डालते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं....
image
श्रीमान जी, मैं यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया का संपादक और सीईओ हूं!
सेवा में, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली / लखनऊ। श्रीमान, मैं यशवंत सिंह पुत्र श्री लालजी सिंह निवासी ग्राम अलीपुर बनगांवा थाना नंदगंज, जनपद गाजीपुर, उत्तर प्रदेश (हाल पता- ए-1107, जीडी कालोनी, मयूर विहार फेज-3, दिल्ली-96) हूँ. मैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एक वेब मीडिया कंपनी भड़ास4मीडिया में कार्यरत हूं. इस कंपनी के पोर्टल का वेब पता www.bhadas4media.com है. मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर हूं. इससे पहले मैं दैनिक जागरण, अमर उजाला एवं अन्य अखबारों में कार्यरत रहा हूँ. ...
image
कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।...
image
अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...
image
गिलानी साहब, कश्मीर आजाद है!
यह बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि कश्मीरी अवाम जिसे आज़ादी कहता है उसका मातलब भारत में विलय है और गिलानी टाइप पाकिस्तानी पैसे पर पलने वालों को यह हक नहीं है कि वे पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात करें क्योंकि पाकिस्तान ही कश्मीर की आज़ादी का असली दुश्मन है....
image
बुखारी को सबक सिखाना जरूरी
शाही इमाम द्वारा यह कृत्य जाहिर करता है कि बाबरी मस्जिद प्रकरण को रंग रोगन देने में वो जो चाह रहें है वो लोगों के गले नही उतर रहा है जिसके चलते वे खुद को आज की तारीख में हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे है ऐसे में बुखारी जी की बौखलाहट बढ़ गई है. वे इस मामले को तूल देकर मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं किन्तु गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले इन धार्मिक आकाओं की बातों पर जनता कोई खास तवज्जो नही दे रही है अलबत्ता लोग यह जरुर कह रहें है कि इस मामले पर अब अवाम राजनीति की और रोटियां नही सिकने देगी। अब वक्त आ गया है कि बुखारी जैसे आकाओं को जनता सबक सिखाए ताकि आगे ये इस तरह की गलती न दोहरा सकें....
image
अभिव्यक्ति की आजादी पर बुखारियों के वंशजों का कब्ज़ा
शाही इमाम सैयद अहमद शाह बुखारी नाराज हैं. उन्होंने वहीद को काफिर कहा और पीट दिया. बस चलता तो उसके सर कलम करने का फतवा जारी कर देते. हो सकता है कि एक दो दिनों में कहीं से कोई उठे और उसके सर पर लाखों के इनाम की घोषणा कर दे. वो मुसलमान था उसे ये पूछने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए थी कि क्यूँ नहीं अयोध्या में विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देते? वैसे मै हिन्दू हूँ और मुझमे भी ये हिम्मत नहीं है कि किसी से पूछूं क्यूँ भाई कोर्ट के आदेश को सर आँखों पर बिठाकर इस मामले को यहीं ख़त्म क्यूँ नहीं कर देते? मैं ऐसा इसलिए नहीं पूछ सकता क्योंकि मै जानता हूँ ऐसे सवालों के अपने खतरे हैं....
image
सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...
image
मुसलमान ही बताएं वे इस देश में कैसे रहेंगे?
बाबरी ढाँचे-राम जन्मभूमि मुकद्दमे के फैसले और कश्मीर में समस्या के समाधान की दिशा में सक्रियता दिखाने की बजाय हिन्दुस्तान में कश्मीर के विलय के सन्दर्भ में अनाप-शनाप बयान जारी करने की ओमर अब्दुल्ला की शेखचिल्ली वृत्ति के चलते एक बार फिर इस देश में पिछले ७ दशकों से जारी हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कारी वृत्ति को हवा मिली है. सनद रहे कि इस उपमहाद्वीप को पिछले कई दशकों को धर्म के आधार पर बुरी तरह से विभाजित किया गया है....
image
आडवाणी जी "कलंकयात्रा'' थी आपकी रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी का यह कहना कि अयोध्या पर हाईकोर्ट के फैसले से उनकी रथ यात्रा सार्थक साबित हुई है, उन हजारों मुसलमानों और हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़का है, जो उनकी रथयात्रा के चलते प्रभावित हुए थे। आडवाणी का यह बयान उन मुसलानों को भी आहत करने वाला है, जो यह सोचते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम मानकर अब अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। ऐसा चाहने वाले मुसलमानों के दिल में यह बात आ सकती है कि नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा जाना चाहिए। पता नहीं कैसे आडवाणी अपनी रथयात्रा को सार्थक बता रहे हैं। सच तो यह है कि आडवाणी की वह रथयात्रा इस देश पर एक कलंक और एक तरह से 'खूनी यात्रा' थी।...
image
सेकुलर बिरादरी के सिर पर न्याय का हथौड़ा
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कल तक जो न्यायालय के फैसले को मानने का उपदेश दे रहे थे अब वे ही न्यायपालिका के फैसले पर छिद्रान्वेषण करने निकल पड़े हैं. इस देश का सबसे बड़ा संकट है कि इसके बुद्धिजीवी उसी को ज्यादा कसौटी पर कसते हैं जिसकी सहिष्णुता को लेकर उन्हें पूरा विश्वास होता है. हिन्दू समाज दुनिया का सबसे सहिष्णु समाज है सो जिसे देखो वही उसके खिलाफ इल्जामों की सूची लिए खडा है. क्या किसी अन्य धर्मावलम्बी से उसकी आस्था के किसी प्रतीक चिह्न के मामले में इस तरह सबूत मांगे जा सकते हैं? जिसे देखो वही पूछ ले रहा है कि कैसे यह साबित किया जा सकता है कि राम अयोध्या में ही जन्मे थे और उसी स्थान पर जिस पर बाबरी ढांचा कभी मौजूद होता था?...
image
आपके गाँव में इसे फैसला कहते होंगे
बाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है . इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है .फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है....
image
एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।...
Next
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2