हजार करोड़ की हरियाली
"साल २००८ तक दिल्ली से सटे इलाके नये तरह के शहर की बसावट के लिए खासे चर्चित हो चुके होंगे. आज के झड़ौदा कला, झटीकरा, घोड़ी-बछेड़ू और गढ़ी हरसरू जैसे गांव उस समय अंग्रेजीदां नामों और लोगों से शोभायमान हो रहे होंगे. आज भले ही इन गांवों के आस-पास अकूत खेत और चारागाह हों और यहां गाय-भैंसे चरती हों लेकिन उस समय ये चारागाह नये तरह के घास के मैदानों में परिवर्तित हो जाएंगे जिसमें आदमी बड़ी कीमत अदा करके प्रवेश पा सकेगा...
आज चारों ओर जो झाड़ियां उगी हुई हैं वे हमारे लिए भले ही समस्या हों लेकिन साल २००८ में ये झाड़ियां बेशकीमती हो जाएंगी. आज हम अपने पानी के तालाबों की कोई कद्र नहीं करते लेकिन उस समय एक-एक तालाब के आस-पास लंबे-चौड़े घास के मैदान बनाये जाएंगे और उन पर कुछ लोग गुल्ली-डंडा जैसा कोई खेल खेलने के लिए इकट्ठा हुआ करेंगे. आजकल कुछ अंग्रेज साहब यह लोहे का गुल्ली-डंडा खेलते हैं. हमारे और उनके इस खेल में फर्क सिर्फ इतना है कि उनका डंडा लोहे का होता है और गुल्ली की जगह वे लोग गेंद का इस्तेमाल करते हैं. हमारे खेल को तो गांव के अमीर-गरीब, बूढे-बच्चे सब देखते हैं और मजे लेते हैं लेकिन उनका गुल्ली-डंडा देखने के लिए भारी कीमत अदा करनी होगी.ऐसे ही घास के हरे-भरे मैदानों के आस पास कुछ घर बनाए जाएंगे जिसमें वे लोग रहेंगे जो इतना पैसा कमा चुके होंगे कि उनके पास लोहेवाला गुल्ली-डंडा खेलने के अलावा औरकोई काम नहीं होगा. ऐसे लोग बड़ी प्रतिष्ठा की नजर से देखें जाएंगे क्योंकि उनके पास बहुत पैसा होगा. वे लोग पैसे के बल पर पहले यहां रहनेवाले लोगों को उजाड़ेगें, चारागाहों कोनष्ट करेंगे, पेड़ों का काटेंगे और तालाबों को पाट देंगे. लेकिन जल्द ही अहसास हो जाएगा कि जीवन के लिए पैसा नहीं बल्कि पानी जरूरी होता है. जैसे ही यह अहसास बढ़ेगा पेड़बेशकीमती हो जाएंगे. घास अनमोल हो जाएगी और नये तरह के बने तालाबों और झीलों के किनारे रहने की कीमत इतनी अधिक होगी कि आम आदमी साफ हवा और तालाब कापानी पाने के लिए तरस कर रह जाएगा. "
मैं आपको डराना नहीं चाहता इसलिए साल 2008 की बात कर रहा हूं. मान लीजिए 1908 में यह किसी ने कल्पना की थी. अगर आज सौ साल बाद वही आदमी आकर देखे तोहकीकत उसकी कल्पना से ज्यादा भयावह हो चुकी है. दिल्ली के आस-पास जमीन अब शायद गज नहीं इंच में बिकना शुरू होगी. आस-पास ५० किलोमीटर के दायरे में बिल्डरों नेजहां जैसे जितनी जमीन मिली कब्जा कर लिया है. जो थोड़ी बहुत कसर थी उसे अंबानी बंधुओं ने पूरा कर दिया है. दिल्ली के दो छोर पर एक ओर मुकेश अंबानी अपना एसईजेडबना रहे हैं तो दूसरी ओर अनिल अंबानी अपनी महत्वाकांक्षी गैस आधारित बिजली घर की परियोजना को पूरा कर रहे है. दो अंबानी बंधुओं के बीच बहुत सारे छोटे बड़े नामी-बेनामीव्यापारी भी हैं जो अनाप-शनाप तरीकों से जमीन हथियाने में लगे हुए हैं. इस "पवित्र कर्म" में सरकारें उनको पूरा मदद कर रही हैं.
दिल्ली के आस-पास तीन बड़े रियल एस्टेट डेवलपर हैं जो हरियाली की सबसे ज्यादा कीमत वसूलते हैं. पहला और सबसे बड़ा रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ है जिसके ऊपर आज भी गुड़गांव के किसानों की जमीन परनाजायज तरीके से कब्जा करने के आरोप सुनाई देते हैं. लेकिन आज जिसे आधुनिक गुड़गांव कहा जाता है वहां सबसे बड़ा रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ ही है. गुड़गांव और नोएडा की दूसरी बड़ी रियल एस्टेट कंपनी है यूनिटेक. इस कंपनी का विकास चौंकानेवाला है. साल 2004 में कंपनी का मुनाफा 7 करोड़ रूपये था जो साल 2008 में बढ़कर 2067 करोड़ हो गया. निश्चित रूप से यूनिटेक के इस आकाशीय विकास में हरियाली का बहुत बड़ा योगदान है. यहां एक और बड़ी रियल एस्टेट कंपनी का जिक्र करना जरूरी है जो उस तरह से चर्चित तो नहीं है लेकिन हरियाली को बेशकीमतीबनाने में उसकी भूमिका बड़ी सराहनीय है. वह है जयप्रकाश एसोसिएट्स. जयप्रकाश एसोसिएट्स ने ग्रेटर नोएडा में 452 एकड़ में एक रियल एस्टेट विकसित किया है जिसकानाम है जेपी ग्रीन्स. जेपी ग्रीन्स का दावा है कि इस 452 एकड़ जमीन में उसने १४ 'वाटर बाडी' विकसित किये हैं. 60 एकड़ जमीन सिर्फ हरियाली के नाम पर कुर्बान कर दी गयीहै. और इस ४५२ एकड़ में चिड़िया भी चहचहाती है और घासों पर तितलियां भी मंडराती हैं. और हां, वह घास का मैदान तो है ही जिसमें पैसा कमाकर बेकार हो चुके लोहे केडंडेवाला गुल्लीडंडा खेलते हैं. आपको जेपी ग्रीन्स के प्रति सहृदय होना ही चाहिए कि इस अंधे बाजारवाद के युग में कोई कंपनी पर्यावरण का इतना ध्यान रख रही है. लेिकन आपसिर्फ सहृदय ही रहिए क्योंकि आप इस जगह में रहने की बात तो दूर इसे देख भी नहीं सकते. चारो ओर चारदीवारी है और वह चारदीवारी इतनी ऊंची है कि आप उचककर तो क्याबस की छत पर बैठकर भी अंदर नहीं झांक सकते. आस-पास दो एक दरवाजे हैं जहां वही लोग दरबान बनाकर खड़े कर दिये गये हैं जो थोड़े समय पहले तक इस इलाके में किसानऔर कारीगर की हैसियत से खुद भी घूमते थे और अपनी भैसों को भी घुमाते थे.
जेपीग्रीन्स ने हाल में ही इस 452 एकड़ में कहीं एक जगह अपार्टमेन्ट बनाने की घोषणा की है. अपार्टमेन्ट का नाम है मूनकोर्ट अपार्टमेन्ट. क्योंकि इस अपार्टमेन्ट के आस-पासपानी की कृतिम झीलें हैं, घास के मैदान हैं और पेड़-पौधे हैं इसलिए यहां दो बेडरूम के एक अपार्टमेन्ट की कीमत 65 लाख और तीन बेडरूम के अपार्टमेन्ट की कीमत ८६ लाखरूपये है. यह मैं सिर्फ अपार्टमेन्ट की कीमत बता रहा हूं. अगर आप विला या बंगला लेना चाहते हैं तो 2 से 8 करोड़ रूपये के बीच कोई कीमत अदा करनी पड़ेगी. आप जानना चाहेंगे कि दो बेडरूम का एक सामान्य अपार्टमेन्ट कितनी जगह घेर सकता है? बहुत जगह लेकर भी बनाया जाए तो 80-90 वर्ग गज से ज्यादा नहीं. आपमान सकते हैं कि अगर बहुत अच्छे मैटेरियल, मंहगे फिटिंग और जकूजी बाथ के साथ भी आपको यह फ्लैट बनाकर दिया जाए तो निर्माण की लागत जमीन सहित किसी भीकीमत पर 8-10 लाख से ज्यादा नहीं जाती. यानी एक फ्लैट पर कम से कम 55 से 75 लाख की कमाई पक्की है. आप सवाल उठा सकते हैं कि यह तो उपभोक्ता के साथज्यादती है. निश्चित रूप से यह किसी भी उपभोक्ता के साथ ज्यादती है लेकिन यह बढ़ी हुई कीमत घर की नहीं बल्कि उस हरियाली की है जिसे खारिज करके हम आप शहर कीकालोनियों के स्वघोषित कैदी हो गये हैं.
साल 2008 में अगर हरियाली लाखों-करोड़ों अदा करने पर मिलती है तो आज से सौ साल बाद की कल्पना करिए. साल 2108 में आपकीअगली से अगली पीढ़ी क्या वह कीमत अदा कर पायेगी कि वह साफ हवा में सांस ले सके? घास पर उड़ती तितली को निहार सके और अपने आस-पास पानी की झील और तालाब से उठती ठंडी हवा को महसूस कर अपने तन-मन की थकान उतार सके? साल 2008 में ही हजारों करोड़ की कीमतवाली हरियाली 2108 तक कितनी बेशकीमती हो सकती है अभीतो सोच पाना भी मुश्किल लग रहा है.
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Digg
..बेहतरीन लेख। धरती व धरतीपुत्रों को लेकर विस्फोट की चिंता अत्यंत सराहनीय है।
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