शबद नहीं शराब में सराबोर
सिख संगत की रिपोर्ट बता रही है कि पंजाब के 78 फीसदी नौजवान नशे के आगोश में हैं. कोढ़ में खाज यह कि इनमें 37 प्रतिशत शुद्धरूप से स्मैक के आदी है. स्मैक थोड़ा मंहगा नशा है. पंजाब में इसकी कीमत छह से सात सौ रूपये ग्राम है. इसलिए नशे में डूबने के लिए पंजाबी नौजवान नाक से पेट्रोल पीते हैं, छिपकली मारकर खाते हैं, गर्दन पर बूट पालिश मलकर धूप में खड़े होते हैं, पेट्रोल की पाईप पर जमनेवाली गर्द को फांकते हैं...
सिगरेट में भांग और चरस भरकर पीते हैं, चोट और मोच में दर्द दूर करनेवाले आयोडेक्स को जैम की तरह ब्रेड पर लगाकर खाते हैं और कुछ नहीं मिलता तो करेक्शन करनेवाले सफेद फ्ल्यूड को एकबार में पूरा पी जाते हैं. उतना नशा भले न होता हो जितना स्मैक से होता है लेकिन काम चल जाता है.
यह पंजाबी नौजवानों की ऐसी दास्तान है जो पंजाब की सबसे विकराल समस्याओं में शुमार हो गया है. वैसे पंजाब में खाओ पीयो मौज करो की जिस जीवनशैली को आदर्श बनाकर बेचा जाता है वही जीवनशैली पंजाब को अंदर से खोखला कर रही है. अकेले अमृतसर में हर रोज एक करोड़ रूपये की शराब बिकती है. ड्रग तस्करों के गोल्डन बेल्ट के रूप में मशहूर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान की कड़ी में अब पंजाब भी शामिल हो गया है. नतीजा अकेले पंजाब में हर साल 1000 करोड़ रूपये का ड्रग कारोबार. और जहां पैसे का इतना बड़ा धंधा हो वहां सरकारी प्रयास और पुनर्वास का क्या आलम होगा इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है. सिख संगत की रिपोर्ट ही बताती है कि पंजाब में नशे से उबारने के कोई भी केन्द्र प्रभावी साबित नहीं हुए है. लोगों को नशा चाहिए और वे इसे हर कीमत पर हासिल करते हैं.
नशे के इस उफान के कारण पंजाब के बार्डर से सटे इलाकों में नशे से उपजी संपन्नता देखिए. उन सरहदी इलाकों के किसानों की संपन्नता में लगातार बढ़त हो रही है जो अघोषित तौर सप्लाई या कोरियर का काम करते हैं. पाकिस्तान बार्डर से सटे अमृतसर, तरन-तारन और गुरूदासपुर जिले के सीमावर्ती किसान अफगानिस्तान की अफीम को पाकिस्तान के रास्ते भारत में दाखिल कराते हैं. वे मोटी रकम कमाते हैं. आज कुरियर या सप्लाई एक किलो अफीम को बार्डर पार कराने के लिए पचास हजार से एक लाख रूपया तक वसूलता है. पुलिस विभाग का दावा है कि पिछले साल उसने 200 करोड़ रूपये की अफीम जब्त की. इस बात का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब जब्ती 200 करोड़ की है तो आयात और खपत का अनुपात क्या होना चाहिए? पुलिस और बीएसएफ दावा भले करते हों कि पंजाब में तस्करों की रीढ़ तोड़ने में उन्होंने कामयाबी पायी है लेकिन ऐसा लगता नहीं है.
उम्मीद की कुछ किरण बाकी है तो वह भटिण्डा के धापली जैसे गांवों में बाकी है जिन्होंने शराब को अपने गांव में आने ही नहीं दिया. आजादी के बाद से कई सरकारों ने यहां शराब की हट्टी खोलने की कोशिश की लेकिन गांववालों और खासकर महिलाओं ने हमेशा विरोध करके शराब के ठेकेदारों को गांव से बाहर खदेड़ दिया. आजादी के पहले आखिरी दुकान यहां 1938 तक थी. 1938 में बंद होने के बाद फिर दोबारा आज तक यहां शराब की दुकान नहीं खुली. ऐसा नहीं है कि सरकारों ने कोशिश नहीं की. 1977, 1983 और फिर 1997 में कांग्रेस और गैर कांग्रेसी सरकारों ने यहां शराब का ठेका शुरू करने की कोशिश की लेकिन वे नाकामयाब ही रहे. काश पंजाब के दूसरे गांव-शहर धापली से कुछ सीखते. पंजाब के नौजवानों को इस नशे से उबारने के लिए बहुत सारे गैर सरकारी प्रयास हो रहे हैं. तरह-तरह के अभियान चलाए जा रहे हैं. विदेशों में रहनेवाले सिख भी इस दिशा में काम कर रहे हैं. लेकिन इसमें कमी का आलम क्या है इसे समझना हो तो पंजाब सरकार को मिलनेवाले टैक्स को देखिए फिर अंदाज लगाईये कि सरकार नशे के खिलाफ क्यों जाए? पंजाब सरकार को कुल टैक्स का 24 प्रतिशत शराब की बिक्री से प्राप्त होता है. पिछले वित्त वर्ष में पंजाब सरकार को 1500 करोड़ से अधिक की आय शराब पर मिले टैक्स से हुई. इसलिए सरकार की ओर से नशाखोरी रोकने के गंभीर प्रयास होंगे यह सोचना ही थोड़ी नादानी होगी. नतीजा सामने है. पटियाला पैग लगातार बड़ा होता जा रहा है. हालांकि अभी केरल सबसे बड़ा शराबी राज्य है जहां प्रति व्यक्ति खपत 8.3 लीटर सालाना है, फिर भी पंजाब उससे थोड़ा ही पीछे रह गया है. पंजाब में प्रति व्यक्ति सालाना शराब की खपत 8.0 लीटर है. पंजाब सरकार को अपने नागरिकों से सबसे ज्यादा टैक्स ही शराब के जरिए मिलता है तो सरकार भला क्यों इसके प्रचार-प्रसार पर रोक लगाएगी. पंजाब के औद्योगिक शहर लुधियाना का हर नागरिक सरकार को नशे के रास्ते 892 रूपये टैक्स भरता है, तो अमृतसर का नागरिक 407 रूपये और जालंधर का बाशिंदा 265 रूपये नशाखोरी करके सरकार को टैक्स भरता है. औसत राज्य का नागरिक नशे की एवज 615 रूपये का टैक्स सरकार को अदा करता है.
शबद के जरिए रामरस पीनेवाला पंजाब सोमरस का आदी हो गया है. इसका सबसे बुरा असर पंजाब की नौजवान पीढ़ी पर पड़ा है. खुलेपन के नाम पर पंजाब की तहजीब, संस्कृति और संस्कार सबको पंज आबो में बहा दिया लगता है. आर्थिक मोर्चे पर संकटग्रस्त पंजाब नशे में धुत है. वह कब कहां किस नाली में गिर पड़ेगा कुछ पता नहीं.
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