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पलायन का ग्रोथ रेट

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आदमी अपनी इच्छा से घूमता आया है और घूमता रहेगा. लेकिन यह घुमंतू स्वभाव वह नहीं है जिसे हम पिछले कुछ सदियों से प्रवास कहकर परिभाषित कर रहे हैं. आज जो पलायन हो रहा है उसमें निज इच्छा का लोप हो चुका है. निजी जरूरतों के साथ जिस एक तत्व ने प्रवास को पलायन बना दिया है वह है मनुष्य के एक वर्ग की असीमित इच्छाएं जो कुण्ठा की शक्ल में मानव जाति के ही दूसरे वर्ग को पीड़ा के अथाह सागर में धकेलती आ रही हैं. इस संघर्ष से जो निकला है वही आज और भविष्य की बड़ी समस्या पलायन और विस्थापन है.

थोड़ा गौर से देखेंगे तो साफ हो जाता है कि मनुष्य हमेशा से ही पैर के रास्ते पेट को नापता रहा है. जीवनयापन के साधन जैसे होते हैं मनुष्य अपनी गति वैसी ही बना लेता है. कोई दो सौ साल पहले तक भारत में जो परिभ्रमण या प्रवास होता था उसकी परिधि या दूरी सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर होती थी. इसका कारण यह था कि बिना भाषा-भूषा और सामाजिक सरोकारों को बदले पेट की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस दायरे से बाहर जाने की जरूरत नहीं होती थी. जैसे-जैसे साधन बढ़े तो मनुष्य के पैरों ने लंबी दूरी नापनी शुरू कर दी. इसमें औद्योगीकरण और आर्थिक केन्द्रीयकरण की नीतियों ने बडी भूमिका निभाई है.  पेट तो पलता रहा लेकिन सामाजिक सरोकारों का पहलू बुरी तरह प्रभावित हुआ. इस बात की ओर शायद उनका ध्यान नहीं गया जो आर्थिक नीतियां बनाते हैं कि उनकी नीतियों से अर्थ की नयी परिभाषा भले ही स्थापित हो गयी हो लेकिन समाज की परिभाषा में स्थाई बिगाड़ आ गया.
 
भारत में गांवों की संकल्पना ऐसी आर्थिक इकाई है जो सामाजिक सरोकारों के रास्ते जीवन यात्रा करती है. लेकिन नये तरह की औद्योगिक समझ ने न केवल पूंजी का केन्द्रीयकरण किया बल्कि उस जीवनशैली को ही खारिज कर दिया जिसे मानवीय जीवन शैली कहा जा सकता है. विस्थापन और पलायन के मूल में यही वह सबसे महत्वपूर्ण बात है जिसकी ओर हम जानबूझकर ध्यान नहीं देते. यह कहना थोड़ा आसान है कि ऐसा पश्चिम के औद्योगिक प्रभाव के कारण हुआ लेकिन इतने से बात पूरी नहीं होती. भारत के नीति निर्माताओं ने आर्थिक योजना बनाते समय मान लिया कि मनुष्य एक मशीन की तरह होता है और उसकी जरूरतों को पूरा करना ही चाहिए. यहां तक भी बात रहती तो कोई खास आपत्ति नहीं होती. लेकिन मानवजाति का ही एक वर्ग ऐसा है जो अपने व्यावसायिक हित के लिए जरूरतों को पैदा करता है. उस व्यावसायिक हित को साधने के लिए सरकारों का इस्तेमाल करता है, विकास का नारा लगाता है आखिरकार अपने क्षुद्र स्वार्थ को पूरा करके निर्मम हत्यारे की तरह वहां से निकल जाता है. 
 
पिछली एक शताब्दी से तकनीकि के बढ़ते प्रभाव के कारण बड़े उद्योगों को विकास का इंजन मान लिया गया है. इसी एक शताब्दी में चिमनी के धुएं को उद्योग के रूप में परिभाषित किया गया और जबरी स्थापित किया गया. जिन इलाकों में चिमनी से धुंवा नहीं निकलता उसे अपने आप पिछड़ा हुआ मान लिया जाता है. जितनी बड़ी चिमनी उतना अधिक औद्योगिक अगड़ा होने का अहंकार. पिछली सदी में पूरी दुनिया इस संकट से जूझती रही है. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है. लेकिन इसका सबसे तार्किक और जिम्मेदार विरोध भी भारत से ही पैदा होता है. सबसे पहले महात्मा गांधी ने मैनेचेस्टर की मिलों के सामने चरखे को रखकर दुनिया में बनायी जा रही औद्योगिक समझ को चुनौती दिया था. उन्होंने विदेशी कपड़ों की होलियां जलवायी. आज महात्मा गांधी होते तो शायद कपड़ों पर इतना जोर शायद नहीं देते. लेकिन उस समय दुनिया भर में भारी उद्योगों का एकमात्र बड़ा जरिया कपड़ा मिलें ही होती थीं. संभवतः महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों के जरिए उस मानसिकता को चुनौती दी थी जिसे औद्योगीकरण के रूप में स्थापित किया जा रहा था. लेकिन महात्मा का वह नजरिया उनके साथ ही चला गया. जो बचा वह मठी गांधीवादियों के कर्मकाण्ड के रूप में परिणित होकर रह गया. 
 
नये भारत में उसे ही उद्योग समझा गया जिससे लड़ते हुए भारत ने ब्रिटिश हुक्मरानों से सत्ता पायी थी. तकनीकि और बड़े उद्योगों के रास्ते जो समृद्धि आती है उसका आखिरी फायदा उन देशों को ही पहुंचता है जहां से इनकी पैदाईश हुई है. इसलिए ब्रिटिश उपनिवेशवाद हटने के बाद भी वह भारत की लूटपाट बंद नहीं हुई. उल्टे वह ज्यादा सूक्ष्म और गहरी हो गयी. जो बात आमने-सामने की थी, जिसके लिए उपनिवेशवाद का लंबा दौर चला था अब वही काम उसी देश के सत्ताधारियों के जरिए किया जाने लगा जहां कभी अपनिवेशवाद का दौर चला था. अपने उद्योग को तो हमने ग्रामीण उद्योग और तकनीकि विपन्न कहकर खारिज कर दिया. साथ में उस पर यह तोहमत भी लगा दिया कि उसकी नये जमाने में कोई प्रासंगिकता नहीं बची है. इसलिए नये जमाने में नये तरह के उद्योग और अर्थव्यवस्था की स्थापना करनी है, और हमारे नीति-निर्माताओं ने उधार की बुद्धि से वह सब किया भी.
 
अपनी बुद्धि हमने कब कहां गिरवी रख दी हमें खुद भी पता नहीं. हमारी स्मृति से भले ही वह सब मिटने लगा हो लेकिन प्रकृति की स्मृति से कभी कुछ नहीं मिटता. पुराने और गैर-व्यवाहारिक करार दिये गये उद्योग के खात्मे के साथ ही प्रकृति का भी खात्मा शुरू हो गया. परंपरागत तरीके के उद्योग प्रकृति के साथ कदमताल करते हुए चलते हैं लेकिन वर्तमान उद्योग पर्यावरण को चरते-कुचलते हुए आगे बढ़ता है. असर यह हो रहा है कि जिस यूरोप ने दुनिया को नये तरह का उद्योग दिया वही अब नये तरह का पर्यावरण आंदोलन और विस्थापन के खिलाफ मंत्र दे रहा है. यह जानते हुए कि इन सबके मूल में उद्योग और अर्थव्यवस्था की वही समझ है जिसे मिनटभर के लिए भी स्वीकार नहीं किया जा सकता फिर भी कोई सदी डेढ़ सदी तक वह अच्छे और निर्दोष लोगों को कुचलता रहा. इस उद्योग ने हिंसा पैदा किया, विस्थापन पैदा किया और प्रकृति का सिरे से दोहन किया. फिर भी आज जब हम विस्थापन और हिंसा की बात करते हैं तो उन कारणों को जाने-अनजाने नजरअंदाज कर जाते हैं जो इस संकट के मूल में हैं. 
 
पिछली सदी ने जो कुछ देखा, झेला वह इस सदी में और तेज होगा. स्वतंत्रता और लोकतंत्र आदि की बातें खूब होंगी लेकिन वास्तविकता में यह सदी लोकतांत्रिक तरीकों से पैदा हुए तानाशाहों की सदी होगी. यह सदी ऐसे व्यापारियों की सदी होगी जो आखिरी सिरे तक मनुष्य तथा पर्यावरण का शोषण और दोहन करेंगे. विस्थापन इतना तेज होगा जिसकी हम आज कल्पना भी नहीं कर पा रहे हैं. भारत सरकार के वित्तमंत्री का सपना है कि 80 प्रतिशत आबादी शहरों में रहनी चाहिए. यह किसी वित्तमंत्री की बात नहीं है. यह उस प्रणाली से निकली सोच है जो इस सदी में हावी रहनेवाली है. प्राकृतिक साधनों का शोषण करते हुए व्यापारी वर्ग वहां आ पहुंचा है जहां जीवन ही व्यापार हो गया है, इसलिए इस सदी में विस्थापन का स्वरूप बहुत वीभत्स होगा. लोग बड़ी संख्या में जमीन से उठाकर शेल्टरों में भर दिये जाएंगे, फिर भी जिनके साथ यह सब किया जाएगा वे शायद ही इसका विरोध करें. क्योंकि उनकी समझ तब तक यह बन चुकी होगी कि उनके हिस्से में यही है. बाकी भूमि उन अपराधियों के हाथ में होगी जो व्यापारी कहकर परिभाषित किये जाएंगे. परिस्थितियां जो संकेत कर रही हैं उससे साफ है कि समझदार और संपन्न लोग रैंच या फार्म बनाकर गांवों में रहेंगे और खेती करेंगे, जबकि विपन्न और मूर्खों को शहरी कालोनियों में मजदूर बनाकर ठूंस दिया जाएगा.  
 
सरकार की योजना सफल हुई तो अगले बीस-पच्चीस सालों में ही शहर और गांव की आबादी बराबर हो जाएगी. तब शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर गांवों का दोहरा शोषण होगा. गांवों से बेदखल कर दिये गये लोग शहर की कालोनियों के बाशिंदे हो जाएंगे और उन गांवों पर ऐसे पूंजीपतियों का कब्जा होगा जो इस भूमि का उपयोग खेती-बाड़ी के लिए करेंगे. इस खेती बाड़ी से जो कुछ पैदा होगा वह शहर की कालोनियों के पेट भरने के काम आयेगा. आज जो नमकीन चिप्स बनाते हैं कल वे आपके पूरे भोजन चक्र पर कब्जा करके बैठनेवाले हैं. शहर के पूंजीपति गांव के मािलक होंगे और गांव के लोग शहरी नर्क के कीड़े. निश्चित रूप से इस पलायन की शुरूआत हो चुकी है जो भयावह तेजी का रूप धारण करती जा रही है.
(यह लेख सोपानस्टेप में प्रकाशित हुआ है)

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अफ़लातून on 23 August, 2008 12:56;39
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" संभवतः महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों के जरिए उस मानसिकता को चुनौती दी थी जिसे औद्योगीकरण के रूप में स्थापित किया जा रहा था. "
- आप कहना चाहते होंगे -'विदेशी कपड़ों के खादी का विकल्प दे कर विरोध के जरिए'।
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visfot .com on 23 August, 2008 13:34;51
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बिल्कुल. वाक्य थोड़ा अधूरा रह गया . गांधी जी ने विदेशी कपड़ों का विरोध करके उस मानसिकता को चुनौती दी थी जिसे औद्योगीकरण के रूप में स्थापित किया जा रहा था. इस प्रक्रिया में उन्होंने खादी को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया.
सुझाव के लिए धन्यवाद.
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Anup on 24 August, 2008 11:12;32
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सन्जय् जी,
आप् ने बहुत् अच्च्छा लिखा है?
हमे ये भी सोचना होगा कि इस् देश् को क्य्से बचाया जाये......
हुम् लोगो को कोइ सघट्न् बानाके काम् करना होगा....
क्या विचार् है आप् का........

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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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