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जमाखोर कौन?

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पी साईंनाथ बता रहे हैं कि अनाज और भूख दोनों की जमाखोरी में इजाफा हुआ है. एक तरफ अनाज के भंडार बढ़ें हैं तो दूसरी ओर भूख की जमाखोरी भी बढ़ी है.

कंपनियो के नेतृत्व में चल रहे भूमंडलीकरण के हिमायती जिन तीन सिद्धांतों की कसम खाते नहीं थकते उनको आस्टिन स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेम्स गालब्रेथ जूनियर ने बहुत सुंदर तरीके से विश्लेषित किया है. वे कहते हैं " तीन आधारों पर यह आंकलन हो सकता है. एक, सारी सफलताएं वैश्विक हैं. दो, सारी विफलताएं राष्ट्रीय हैं. तीन बाजार निंदा की सीमा से परे है. अब एक दशक से भी ज्यादा समय हो चुका है इतने दिनों से हमें यह भरोसा दिलाया जा रहा था कि जो भी अच्छा हो रहा है वह केवल वैश्वीकरण के रास्ते पर चलने का नतीजा है. जबकि जो बुरे हालात हैं उसके मूल में हमारा राष्ट्रीय निकम्मापन और भ्रष्टाचार है. आशा बधाई गयी कि बाजार की जादुई छड़ी सारे घाव भर देगी. हां, इसके लिए सरकार की भूमिका रखने जैसी बातें ईशनिंदा से कम नहीं थी. लेकिन आश्चर्यजनक तो यह है कि जो लोग हमें बाजार के रास्ते मोक्ष का मार्ग दिखा रहे हैं वे खुद अपने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर रहे है और कारखानों को बंद होने से बचाने के लिए अंधाधुंध पैसा फेंक रहे हैं. 

यह बहुत बेतुका है कि हम मंहगाई के लिए वैश्विक कारणों को जिम्मेदार ठहराएं. तो क्या यह घरेलू विफलता है? यह भी नहीं है. यह कहना ही बेमतलब की दलील है. फिलहाल तो ऐसी दलीलों से दूर रहना ही बेहतर होगा. चुनाव सिर पर हैं. लिहाजा एक बाद दूसरा मंत्री लगातार हमें यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि मंहगाई के लिए वैश्विक कारक जिम्मेदार हैं. ऐसी दलील देनेवालों ने साफ ऐलान कर दिया है कि मंहगाई हमारी करतूतों का नतीजा नहीं है. और भी कमाल की बात यह है कि विश्व बैंक और मुद्राकोष हमें चेतावनी दे रहे हैं कि भुखमरी और दंगे दरवाजे तक आ पहुंचे हैं. यह बात दीगर है कि भुखमरी और दंगों की चेतावनी देनेवाली ये दो संस्थाएं ही दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी और दंगों के लिए जिम्मेदार रही हैं. 

फिर भी वित्तमंत्री मानते हैं कि मंहगाई के लिए वैश्विक कारण ही जिम्मेदार हैं. वे इससे निपटने के लिए वैश्विक सहमति बनाने पर जोर दे रहे हैं. कुछ हद तक वे भी उन दो संस्थाओं की कथनी से अपनी सहमति दिखाते हैं कि यह सामाजिक असंतोष वैश्विक महारोग की शक्ल ले सकता है. बस हमारे केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ही हैं जो इस मंहगाई के लिए वैश्विक कारणों को जिम्मेदार नहीं ठहराते. शरद पवार इसे खालिस देशी समस्या बता रहे हैं. उनका कहना है कि दक्षिण भारत के लोग इतनी चपाती खाने लगे हैं कि देश में गेहूं का अकाल पड़ गया है. मनोरंजन के लिए निसंदेह यह तर्क बहुत उम्दा है लेकिन इसमें एक परेशानी है. खाने-पीने की आदतों में होनेवाले बदलाव में दशकों लगते हैं. पिछले छह महीने के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह कहा जा सके कि दक्षिण के लोग गेहूं खा-खा कर फट पड़े हैं.

बहरहाल कोई न कोई तो है जो अनाज की जमाखोरी कर रहा है. लेकिन यह आम जनता की कारस्तानी नहीं है. न दक्षिण की, न उत्तर की. बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित विशालकाय व्यापारी और व्यवसायी पिछले कुछ सालों से बेहिसाब अनाज खरीद रहे हैं. सरकार ने कृषि विपणन उपज समिति अधिनियम में संशोधन करके इस काम को पूरी मदद की है. ठेका खेती और कंपनियों को खेती के काम में शामिल किया है. न्यूनतम समर्थन मूल्य के हक में जमानी जमा खर्च खूब हुआ लेकिन किया कुछ खास नहीं. ये सारे संकेत इस बात के हैं कि उत्पादकों को निजी व्यापार की ओर धकेला जा रहा है. सरकारी खरीद लगातार घटती जा रही है और कोढ़ में खाज यह कि जो खरीद होती भी है उसका समय पर भुगतान नहीं किया जाता. और जब सरकारी खरीद का ग्राफ नीचे दिखता है तो हम चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि किसानों की तो ऐसी चांदी है कि वे सरकार को अनाज बेचना ही नहीं चाहते. जब कृषि उपज का बाजार मूल्य सरकारी रेट से ज्यादा हो तो सरकारी खरीदारी में गिरावट दिखना स्वाभाविक बात लगती है. लेकिन जब सरकारी रेट बढ़ जाएं फिर भी यही स्थिति बनी रहे तो? फिर भी सरकार की यह झूठी कहानी सुपरहिट साबित हुई कि अनाज के भण्डार भरे पड़े हैं. रखने की जगह नहीं है. इसलिए देश के लोगों को भूखा रखकर भी हमने अपना अनाज यूरोप के मवेशियों को खिला दिया.

ऐसे न जाने कितने मामले सामने आ चुके हैं कि जहां व्यापारियों ने कर्ज से दबे किसानों की उपज कब्जे में ले लिया और उसे ऊंची कीमतों पर बेचकर अपनी जेब भर ली. जाहिर है छोटे किसान संकट में हैं. जो बड़े खिलाड़ी मैदान में उतर रहे हैं वे ज्यादा बड़े खेल करने में सक्षम हैं. अनाज पर बड़े व्यापारी अपना ठप्पा रखेंगे तो वैसे भी दीन हीन व्यक्ति के पास इतनी ताकत नहीं है कि वह बाजार में जाकर अनाज खरीद सके. ऐसे में जब केन्द्र राज्यों को निर्देश देती है कि वह जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई करे तो समस्या के बारे में बताने की जरूरत नहीं रह जाती. लेकिन अभी तक एक भी ऐसा बड़ा वाकया सामने नहीं आया है जहां बड़े जमाखोरों और सट्टेबाजों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई हो. इनमें बहुत सारी भीमकाय कंपनियां भी शामिल हैं जिनके एजंट चारों ओर फैले हुए हैं.

सुधारों के नाम पर हमनें करोड़ों किसानों को मजबूर किया कि वे खाद्यान्न की बजाय नकदी फसलों की खेती करें. यही वह दौर है जब जोत लगातार कम होती गयी है और आश्चर्यजनक रूप से महाशक्ति का सपना पाले यह देश अनाज का निर्यात भी धड़ल्ले से करता है. यह चमत्कार कैसे हो गया? एक ओर खाद्यान्न की खेती घटी तो दूसरी ओर खाद्यान्न का निर्यात बढ़ा. इस चमत्कार के मूल में एक छोटा सा तथ्य यह है कि केवल अनाज के भण्डार ही नहीं भरे बल्कि भूख के भण्डार उससे तेजी से खाली हुए हैं.

बहरहाल भले ही बुनियाद चरमरा रही हो फिर भी बाजार के कुछ कट्टर समर्थक नयी भोर की किरण खोज रहे हैं. एक संपादकीय हमें जानकारी देता है कि "मूल्य वृद्धि का मतलब है कि चीजें कम हैं और मुक्त व्यापार का कल्याणकारी चेहरा अच्छा तभी दिखाई देता है जब वह चीजों की कमी को रातों-रात दूर कर देता है." लेकिन अचंभे की बात यह है कि सरकार "मुक्त व्यापारियों को यह भूमिका निभाने का मौका ही नहीं दे रही है." (प्रप्र)   

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visfot .com on 27 June, 2008 22:21;38
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पाठकों से एक निवेदन है कि वे अपनी राय व्यक्त करने में कोताही न करें. स्पैम का हमला इतना बढ़ गया है कि मजबूरन इमेज कोड लगाना पड़ा, यह वेबसाईट और पाठक के कम्प्यूटर दोनों के लिए जरूरी था. आशा है सहयोग करेंगे.
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