पहाड़ से बेकार बहता पानी और जवानी
अपने पहले लेख में नीरज जोशी ने पहाड़ से पलायन की मार्मिक बात उठायी थी. इस दूसरी कड़ी में वे उन कारणों को जानने की कोशिश कर रहे हैं जो पहाड़ से पलायन के जिम्मेदार हैं.
अलग उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जिन लोगों को याद है शायद ही वे यह भूले हों कि इस आंदोलन का मकसद उत्तरप्रदेश से इतर एक अलग भौगोलिक सांस्कृतिक पहचान पाना था। लेकिन आंदोलन का केन्द्र बिन्दु और चिंता पलायन ही थी । पहाड़ और पलायन पर मर्सिया पढने के शुरुआती दिनों में पलायन के जोरदार और तार्किक पोस्टमार्टम किये गये । लब्बो लुआब यह कि पहाड़ में रोजगार के संकट के चलते जबरदस्त पलायन हुआ। पलायन की यह परंपरा कमोबेस आज भी जारी है। इस परंपरा पर प्रकाश डालने से पहले यह बताना समीचीन होगा कि उत्तराखंड की आबादी का जो पलायन महानगरों की और हुआ उसमें गांवों की भूमिका 90 फीसदी से भी अधिक रही । यानि शतप्रतिशत पलायित कृषि, पशुपालन एवं संबंधित अवलंबनों के आधीन थे।
पहाड़ के पानी और जवानी के बेकार बह जाने के कारण सीमांत कृषि का बेड़ा शुरू से ही गर्क होता रहा। यानी हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी पानी के अभाव में खेतों से चार माह का भोजन भी मुश्किल से उपजे। यानि आठ माह का राशन जुटाने की जुगत कैसे भिड़े । वस्तु विनिमय के दौर में लोग नगदी के लिए अंग्रेज साहबों के साथ चले आते थे तो बाद के वर्षों में रोजगार का एक मात्र साधन महानगरों की ओर आजिविका की तलाश हो गया । यह प्रवृति कमोबेस बरकरार है। पर इसका स्वरूप बदल गया है।
उत्तराखंड में पढे लिखों की जमात के पौ बारह होते पलायन की भी शक्ल बदलती रही । यानि 40 के दशक से 70 के दशक तक घरेलू कामगार यूनियनों के मैम्बर रहे उत्तराखंडी भाई 70 से 90 के बीच दिल्ली मुबई जैसे महानगरों में सरकारी आफिसों में चपड़ासी से क्लर्क तक प्रमोशन पा गये । 90 के बाद का दशक किसका रहा यह बताने से पहले यह जानना जरूरी होगा कि अखबारों में आये दिन छपने वाले विज्ञापनों से यह हटा दिया कि घरेलू काम के लिए पहाड़ी गढवाली कुमांउनी को प्राथमिकता दी जायेगी। यानि 90 के बाद का पलायन उत्तराखंड में थोक के भाव खोल दिये गये आम शिक्षण संस्थानों और आईटीआई पौलटैकनिक के बेरोजगारों का रहा । कांग्रेस के शासन में इनमें से अब कई प्राविधिक संस्थान बंद कर दिये गये हैं । राज्य आंदोलन के दिनों में इन्हें बेरोजगार पैदा करने की फैक्टरियां कहा जाता था।
इन बेरोजगार पैदा करने वाली फैक्ट्रियों के उत्पाद के साथ कुछ मात्रा में हाईस्कूल फेल पास ग्रामीणों की जमात भी अभी तक महानगरों की ओर भाग रही है। यह स्वीकार करना होगा कि अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पलायन की रफ्तार और संख्या में थोडा बहुत कमी जरूर दर्ज हुई है, लेकिन इस कमी को उच्च शिक्षित जमात ने पूरा कर दिया है। पलायन के तराजू पर राज्य की सार्थकता को देखा जाय तो राज्य बनने के बाद के आठ वर्ष इस बात की ताकीद नही करते कि इस ओर कोई ठोस प्रयास हुए हैं । शिक्षा के तंत्र में बेरोजगारों को अल्प रोजगार के रूप में ठूंसने के प्रयास राज्य में अब तक बनी सरकारों ने खूब किये हैं। लेकिन असंतोष बरकरार है। आये दिन उत्तराखंड आंदोलनों से गुलजार है तो राजनैतिक दल सत्ता के सूखों की बंदरबाट में इतने व्यस्त हो गये हैं कि पलायितों का मायका बत्तीधारी राजनैतिक महत्वाकांक्षियो का अडडा बन गया है। पिछले 8 सालों में जो परिदृश्य देखने को मिल रहा है उससे यह ढांढस नही बंधता कि राज्य के पास कोई ऐसा जिम्मेदार नेता अभिभावक के रूप में है जो पार्टीगत खींचतान और तुष्टिकरण से बाहर निकल कर राज्य के हित में खड़ा हो. अतीत में गठित हुए नये राज्यों को इस तरह के दृष्टि संपन्न लोग मिले। मसलन हिमाचल के निर्माण में यशवंत परमार और पंजाब में प्रताप सिंह कैरो की भूमिका को कौन भूल सकता है।
उत्तराखंड में जो राजनैतिक माहौल हाल फिलहाल बना दिया गया है। उसमें इस तरह की आशा की किरण दूर तक नही दिखाई दे रही। मुख्यमंत्री के रूप में झांडेवालान और आलाकमान की नौकरी कर रहे भूवन चंद्र खंडूरी भी अपने आंतरिक विरोधियों से निपटने में उर्जा खर्च कर रहे हैं । राज्य की प्रसाशनिक बैटरी परंपरागत तंत्र आंदोलित युवावर्ग कथित विकास के उदघाटन विमोचन और आपसी खींचतान के परे कुछ कर पाने का साहस ही राज्य को पलायन और रोजगार जैसी बिमारियों से निजात पाने का रास्ता दिखा सकता था। इस बात की किसी को आठ साल में फुर्सत नही हुई कि राज्य में पलायन के स्वरूप को जाना जाय। उस पर कोई अध्ययन किया जाय और पता लगाया जाय कि राज्य से पलायन कितना कम हुआ है। राज्य के रहनुमाओं के पास दिखाने को कुछ आंकडे हैं कि राज्य में उद्योग धंधे तेजी से लगे है। इन उद्योगों में राज्य के लोगों को 70 फीसदी रोजगार दिया जा रहा हैं। लेकिन हकीकत इसके उलट है। यूं तो सिडकुल की ज्यादातर कंपनियां उत्पादन से काफी दूर हैं, जो चल भी रही हैं वे तकनिकी एवं अन्य कारणें से स्थानीय लोगों को अयोग्य करार दे रही हैं । कुछ मजदूर अवश्य स्थानीय हो गये है. वैसे भी राज्य में रियल स्टेट की बंदरबाट के इस व्यापार में इससे अधिक की फुर्सत किसे है।
उत्तराखंड के विकास का माडल पंतनगर, सितारगंज, उधमसिंह नगर, देहरानून और हरिद्वार में गुल खिला रहा है। लेकिन पहाड़ यहां भी नदारद हैं । उद्योग या रोजगार विहीन उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र अभी भी बियाबान ही बना हुआ है क्योंकि तराई एवं सिचाई संपन्न मैदानी इलाका जहां अब उद्योग लगाये गये है, हमेशा से लहलहाती फसलों के लिए जाना जाता रहा है। राज्य के रहनुमाओं ने कृषि क्षेत्र में तो आसानी से सेंध लगाली लेकिन दुर्गम की ओर जाने का हौसला अब भी नही जुट पा रहा । थोड़ा सा अतीत की ओर नजर डाली जाय तो उत्तराखंड राज्य आंदोलन इन्हीं पहाड़ी जिलों का आंदोलन था। जहां अब राज्य कृषि, उद्योग को तिरोहित कर बेरोजगारों को सुविधानुसार बगैर वेतन स्कूलों में ठूंस रहा है। कभी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री का इस बात के लिए विरोध करने वाले मुख्यमंत्री खंडूरी के पहाड़ी इलाकों की घोर उपेक्षा की गयी है। उद्योग धंधें से पूरे पर्वतीय इलाके को महरूम रखा गया है। अब सिर्फ इन क्षेत्रों के विकास के नाम पर नहर गुल और पुल बनवा रहे हैं। तय है कि इस तरह के टोटकों से तात्कालिक राहत मिल सकती है। दीर्घकालिक समाधान के लिए राज्य के प्रति समपर्ण और आंतरिक ईमानदारी की दरकार होगी। पर्वतीय इलाकों में उन स्थानों और उन उद्योगों का चयन करना होगा जो सभी तरीके से ठीक हों । नगदी देने वाली फसलों ने राज्य की लघु कृषि बिरादरी को पिछले वर्षों में अच्छा संबल दिया है। इस क्षेत्र की घोर उपेक्षा हुई है। कृषि क्षेत्र में आज भी बेरोजगारी की भीषण समस्या के समाधान तलाशे जा सकते हैं। क्या राज्य में इस तरह से गंभीर माहौल तैयार हो पायेगा।? यह प्रश्न स्वयं से पूछने के साथ-साथ हुक्मरानों के चेहरों में पढा जाना चाहिए । आजीविका और रोटी के लिए महानगरों का मुह ताकते वालों को तो यह मान लेना चाहिए कि राज्य से पलायन करना उनकी मजबूरी के साथ अब नियति बन गयी है।
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Digg
निरज जी आपका लेख पढा।लगा कि कोई तो है जो समाज की समस्याओं को संजीदगी के साथ उठा रहा है। यकिन मानें यदि इसी तरह हम अगर इन मुद्दों को उठाते रहे तो इस ओर सरकार का ध्यान जरुर जाएगा और इस दिशा में सार्थक पहल जरुर होगी।
अभय सिंह
Ram Prasad
what are the reasons that this probme is still the date. are political parties or governments are not doing their job honesty? who is responsible for this???
pl. think.............
I remember my father used to say that one day he will returned to his village but..... he didn't.
I must congratulate your hard work to writing all article. Really you have shown to us real picture of Uttrakhand. That’s true people of Uttrakhand not getting proper work where they live so they move to big cities for searching work. Most of people not get proper work because they are less educated and so they hardly get lower class work. We can see big numbers of Uttrakhand peoples are working in small restaurant, house servants, truck driver and work in private factory. Afcourse some peoples are also work in defense and state government servants but I must say there also most people ding lower rank job.
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