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नागरिक ज्ञानेन्द्र के लिए मुश्किल दौर

image नारायणहिति का सूरज अस्त हुआ

नेपाल नरेश ने नारायणहिती से बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं. उनकी संपत्ति, अधिकार, सुरक्षा और माओवादियों से "गुप्त समझौते" को लेकर काठमांडू अफवाहों का शहर हो गया है.

ज्ञानेंद्र की परिसंपत्तियों के बारे में हमेशा से अनुमान लगाए जाते रहे हैं. माना जाता है कि जब देश में उनके भाई बीरेंद्र शाह का शासन था तो उस दौरान वो कई व्यापारिक गतिविधियां चला रहे थे. सोआलटी होटल में उनका 40 फीसदी हिस्सा है. सूर्या नेपाल, जिसका भारतीय कंपनी आईटीसी के साथ संयुक्त उपक्रम है, में उनकी हिस्सेदारी 10 फीसदी है. हिमाल गुडरिक में 56 फीसदी हिस्सा उनका है. ज्ञानेंद्र कई जमीनों और चायबागानों के भी मालिक हैं और काठमांडू के महाराजगंज इलाके में भी उनका एक मकान है. वे राजा महेंद्र संरक्षण ट्रस्ट के भी अध्यक्ष थे. हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके शासन के दौरान इस ट्रस्ट में खूब धांधलियां हुई हैं. अफवाहें ये भी हैं कि ज्ञानेंद्र के पास विदेशों में भी अच्छी खासी संपत्ति है. कुछ लोग मानते हैं कि व्यापार के मामले में ज्ञानेंद्र बेहद चतुर खिलाड़ी थे.

उधर, ज्ञानेंद्र के साथ उनके वित्तीय मामलों पर चर्चा करने वाले कई लोग ये भी कहते हैं कि ज्ञानेंद्र के पास व्यापारिक बुद्धि नहीं थी. एक सूत्र के मुताबिक व्यापार के मामले में ज्ञानेंद्र हमेशा अनाड़ी रहे और उनकी योग्यता बस यही थी कि उनके बड़े भाई राजा थे तो उनके काम बस एक फोन से ही हो जाते थे. राजा के करीबी रहे एक पूर्व नौकरशाह बताते हैं,“व्यापार, वित्त और प्रबंधन के मामले में ज्ञानेंद्र कुशल नहीं थे. वो पैसा कमाने के लिए सिर्फ राज्य की शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहते थे.” दरअसल 2001 में सिंहासन संभालते वक्त ज्ञानेंद्र पर काफी कर्ज हो गया था. सूत्र बताते हैं कि ज्ञानेंद्र की आय के बारे में वास्तविकता से कहीं ज्यादा बढ़ाचढ़ाकर वर्णन किया गया-सोआलटी घाटे में चलने वाला प्रतिष्ठान रहा है जबकि कई महलों का राष्ट्रीयकरण किया जा चुका है. उधर, पूर्व राजा बीरेंद्र की संपत्तियां एक ट्रस्ट के अधीन हैं. पिछले साल काठमांडू पोस्ट में छपी एक खबर के मुताबिक 2006-07 में ज्ञानेंद्र को सिर्फ सूर्या नेपाल से आय हुई थी. बजट में महल के लिए एक निश्चित धनराशि आवंटित होती है और पिछले साल इसे औपचारिक ऐलान के 48 घंटों में ही ले लिया गया था.

इसलिए ज्ञानेंद्र के लिए ये अहम है कि उनकी परिसंपत्तियां न केवल सुरक्षित रहें बल्कि खर्च के लिए उन्हें मिलने वाली सरकारी राशि भी जारी रहे. कहा जा रहा है कि माओवादी इस मामले में लचीला दृष्टिकोण दिखा रहे हैं. ज्ञानेंद्र के लिए चिंता का एक मुद्दा उनकी सुरक्षा भी है. उन्हें कट्टरपंथी वाम विचारधारा से ही नहीं बल्कि अपने परिवार से भी खतरा महसूस हो रहा है. अफवाहें गर्म हैं कि उनका अपने कुख्यात पुत्र पारस के साथ तीखा विवाद चल रहा है. बताया जाता है कि पारस अपने पिता पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने पर्याप्त आक्रामक रवैया नहीं दिखाया जिससे राजशाही खत्म हो गई. महल में सेना की एक बटालियन तैनात रहती है और संभव है कि राजा को न्यूनतम आवश्यक सुरक्षा दी जाती रहेगी.

हालांकि ज्ञानेंद्र की सभी तरकीबें अब तक एक-एक कर नाकाम हो चुकी हैं. भारत में मौजूद अपने संपर्कों का फायदा उठाने की उनकी कोशिशों का भी कोई नतीजा नहीं निकला. महल के समर्थक और हिंदुत्ववादियों जैसे गोरखपुर के योगी आदित्यनाथ और विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल ने उनके समर्थन में काफी आवाज़ें उठाईं पर नतीजा सिफर ही रहा. ज्ञानेंद्र को उम्मीद थी कि सेना उनका साथ देगी मगर सेना के आला अधिकारियों ने सुरक्षित विकल्प चुनते हुए शांति प्रक्रिया के साथ चलने का फैसला किया.

इसके बाद राजा को लगा कि उनके बचने का एक ही रास्ता है. या तो शांति प्रक्रिया बीच में ही खत्म हो जाए या फिर चुनाव हो ही नहीं. उन्होंने कुछ मधेशी कट्टरपंथियों को हवा देकर तराई में अस्थिरता पैदा कर दी. चुनाव से पहले हिंसा करवाने के लिए उन्होंने कथित रूप से नेपाल डिफेंस आर्मी जैसे गुटों को भी वित्तीय मदद दी. इसके साथ ही उन्होंने नेपाली कांग्रेस के पुरातनवादी नेताओं के साथ संबंध विकसित किए और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी-नेपाल को समर्थन दिया जिसकी अगुवाई जाने-माने दक्षिणपंथी कमल थापा कर रहे थे. ज्ञानेंद्र को लग रहा था कि इस तरह चुनाव में वोटों का अधिकतर हिस्सा उनके पाले में आ जाएगा और माओवादियों का प्रदर्शन खराब रहेगा.

मगर उनका दुर्भाग्य कि जनादेश राजशाही के खिलाफ रहा. राजशाही की पारंपरिक वैधता तो 2001 में महल में हुए नरसंहार के साथ ही ढह गई थी. इसकी राजनीतिक वैधता भी तब चली गई जब राजा ने अपनी संवैधानिक सीमाओं से आगे जाते हुए सत्ता हथिया ली. संविधान सभा तो राजशाही के खात्मे के उस फैसले पर सिर्फ औपचारिक मुहर ही लगाएगी जो जनता पहले ही दे चुकी है. हालांकि सार्वजनिक जगहों पर ज्ञानेंद्र अब भी आत्मविश्वास से भरपूर नजर आते हैं. हाल ही में वो दक्षिणकाली मंदिर गए और देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि दी. वो प्रसन्नचित्त नजर आ रहे थे और उन्होंने हाथ हिलाते हुए लोगों का अभिवादन भी स्वीकार किया. बताया जा रहा है कि निजी वार्ताओं में वो अपने समर्थकों से बेफिक्र रहने को कह रहे हैं.

बताया जा रहा है कि ज्ञानेंद्र ने पिछले दरवाजे से माओवादी नेताओं के साथ बातचीत भी शुरू कर दी है. इसमें प्रचंड और वो दूसरे कट्टरपंथी नेता शामिल हैं जिन्होंने कभी राजा के साथ भारत के खिलाफ एक गठबंधन बनाने का समर्थन किया था. ज्ञानेंद्र कथित रूप से अपने लिए थोड़ी सी जगह मांग रहे हैं. कुछ माओवादी कह भी चुके हैं कि उन्हें राजा को एक सम्मानजनक विदाई देने में खुशी होगी. बाबूराम भट्टाराई ने तो ज्ञानेंद्र को कुछ सांस्कृतिक अधिकार देने की भी बात कह डाली. इसे देखते हुए काठमांडू में अफवाह गर्म है कि राजा और माओवादियों के बीच सौदा हो चुका है.(तहलका से) 

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