कमजोर लोकतंत्र, मजबूत आतंक
इन विस्फोटों और मौत के तांडव के बाद मंत्रियों की जबानी जुगाली, विपक्षी नेताओं के रटे-रटाये हताशा भरे बयान, पुलिस और जांच अधिकारियों का हवाई लट्ठभाजन, खबरिया चैनलों की उकतानेवाली सनसनी, सुरक्षा विशेषज्ञों का एकांगी विश्लेषण, खुफिया एजंसियों के खोखले एलर्ट और पुलिस का थकाऊ बंदोबस्त और नाकाबंदी. गृहमंत्रालय में दो-पांच दिनों तक बैठकों का सिलसिला चलेगा
कुछ मुस्लिम मोहल्लों में कंबिंग आपरेशन चलेंगे और फिर कुछ मोहरों पर हाथ फेर दिया जाएगा. मामला थोड़ा शांत होते ही मुस्लिम और मानवाधिकारवादी संगठन पुलिस या जांच एजंसियों द्वारा गिरफ्तार आतंकियों के निर्दोष होने का ब्यूहबद्ध प्रचार शुरू कर देंगे. तथाकथित निर्दोषों को संबंधित शहर के मुस्लिम अगुओं का पूरा समर्थन मिलेगा. मामले के गर्म रहने तक मारे गये लोगों से सहानुभूति दिखाई जाएगी. मरहम पट्टी के लिए उन्हें कुछ पैसा भी मिलेगा लेकिन थोड़े ही दिनों में यह सब नेपथ्य में चला जाएगा. फिर, सहानुभूति और मदद की दरकार वाले भुक्तभोगी सरकारी दफ्तरों में चप्पल घिसेंगे. फिर उनके लिए न समाज से कोई आगे आता है, न मीडिया से, न राजनीति से, न कानून से और सरकार तो कब का भूल चुकी होती है. वहीं दूसरी ओर आतंकी कार्रवाईयों के लिए जिम्मेदार लोगों के लिए शिकारपुर से मक्का-मदीना तक चंदा इकट्ठा होगा और इन 'मजलूमों' को बचाने के लिए तरह-तरह की आवाजें मुखर होगीं. फिर यह एक चक्रीय प्रणाली में तब्दील हो जाता है.
आतंक के दो साल, बुरा हाल
बीस साल की बात छोड़िये हम दो सालों का ही रिकार्ड देखते हैं. 11 जुलाई 2006 से 26 जुलाई 2008. 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में ऋंखलाबद्ध धमाके हुए. इन विस्फोटो के बाद मुंबई पुलिस तुरंत हरकत में आयी और कोई हफ्तेभर में 300 लोगों को हिरासत में ले लिया. घटना के तीन दिन बाद लश्करे तोयबा ने एक ईमेल भेजकर विस्फोटों की जिम्मेदारी स्वीकारी और दावा किया कि इन विस्फोटों को कुल 16 लोगों ने अंजाम दिया था. अंततः जांच एजंसियों ने सिमी से जुड़े 15 लोगों और लश्करे तोयबा से जुड़े एक कमाण्डर को जिम्मेदार माना. फिर भी अपनी धर्मनिर्पेक्ष मजबूरियों के चलते जांच एजंसियों के काम में बार-बार अडंगा लगाया गया. अभियुक्तों ने विशेष जज मृदुला भाटकर के खिलाफ अभियुक्तों ने अविश्वास व्यक्ति किया. उनके पति मराठी अभिनेता रमेश भाटकर को एक झूठे मामले में फंसाने का प्रयास किया गया. सारे के सारे अभियुक्त अदालत में अपने इकबालिया बयान से पलट गये. अभियुक्तों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि उन्हें अमानवीय तरीके से टार्चर किया गया. काण्ड का मुख्य सूत्रधार अब भी फरार है.
आखिर क्या कारण है 2006 में मुंबई में बम विस्फोटों को अंजाम देनेवाले आपरेटरों तक हमारी सुरक्षा एजंसियां नहीं पहुंच पाती? बमकाण्ड करनेवाले फाइनेंसरों को क्यों नहीं धरा जाता? प्रवर्तन निदेशालय, आर्थिक खुफिया विभाग, राजस्व खुफिया निदेशालय, आयकर विभाग, पुलिस और सीबीआई सैकड़ों संदिग्ध कंपनियों की सूची बनाए बैठी हैं लेकिन पिछले चार वर्षों से वित्त, विदेश और गृह मंत्रालय की नौकरशाही ने उसे दबा रखा है. उन कंपनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्योंकि वे राजनीतिक दलों को मोटा चंदा देते हैं.
अभी तक का रिकार्ड यही बताता है कि आतंकवाद से निपटने में हमारी सरकारें पिलपिली और डरपोक व्यवहार करती हैं. उनके रास्ते में कभी वोटबैंक खड़ा होता है तो कभी मजबूत इच्छाशक्ति का अभाव बड़ी रूकावट बन जाती है. एक बात तय है जब तक हम आंतरिक सुरक्षा के मामले में भी राजनीति करते रहेंगे आतंकवादी खून की होली खेलते रहेंगे.दो महीने बाद मालेगांव की मस्जिद में बम फटा. तमाम तरह की अटकलों और हिन्दू आतंकवाद पनपाने की अटकलों के बाद आखिर में इस घटना में भी सिमी को जिम्मेदार पाया गया. अभियुक्तों ने अपने खिलाफ लगाये गये मकोका के मामलों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है. जब तक सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में अपना फैसला नहीं सुनाता तब तक मकोका अदालत में भी इस मामले की कार्रवाई में कोई प्रगति नहीं होगी. महाराष्ट्र से बहुत बेहतर कार्रवाई उत्तर प्रदेश में हुई जहां मार्च 2006 में संकटमोचन मंदिर में बम विस्फोट हुआ था. विस्फोटों के पांच घण्टे के अंदर ही लश्करे तोयबा के एक आतंकवादी को पुलिस ने मुटभेड़ में ढेर कर दिया था. बाद में खुफिया एजंसियों ने इस मामले में हूजी का भी हाथ होने का दावा किया था. वलीमुल्ला को मुख्य अभियुक्त के रूप में गिरफ्तार किया गया और वलीमुल्ला सहित 6 और लोगों पर अदालत में मामला विचाराधीन है.
मई 2007 में हूजी आतंकवादियों ने हैदराबाद की मक्का मस्जिद में धमाका किया. इस मामले में जांच एजंसियों ने शाहिद बिलाल नाम के आदमी की मुख्य षण्यंत्रकारी के रूप में पहचान की. हैदराबाद पुलिस पर भारी दबाव डाला गया और वह मामले में ठीक से जांच नहीं कर पायी. अंततः इसे सीबीआई को सुपुर्द कर दिया गया. अब तक सीबीआई इस मामले की गुत्थी नहीं सुलझा पायी है. हालात सुधरते इसके पहले ही हैदराबाद के गोकुल चाट और लुंबिनी पार्क में विस्फोट हुए. इस मामले का एक अभियुक्त रियाजुद्दीन नासिर नार्को टेस्ट में इन विस्फोटों की जिम्मेदारी स्वीकार कर चुका है बावजूद इसके इस मामले में सीबीआई किसी को पकड़ नहीं पायी है.
12 अक्टूबर 2007 को अजमेर की गरीब नवाज मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह को अपना निशाना बनाया. यहां भी विस्फोट उसी तरह से किये गये जैसे हैदराबाद में हुए थे. फिर भी दो राज्यों की पुलिस और सीबीआई मिलकर भी कुछ खास हासिल नहीं कर सकी. उन्हें बस इतना ही पता चला कि इन दोनों काण्डों के लिए आतंकियों ने जो सिम खरीदा वह नोएडा की एक ही दुकान से लिया था. दिसंबर 2007 में एक बार फिर उत्तर प्रदेश के फैजाबाद, लखनऊ और बनारस में विस्फोट हुए. हालांकि उत्तर प्रदेश पुलिस दावा करती है कि उसने जिम्मेदार दो सिमी संदिग्धों को गिरफ्तार कर मामला सुलझा लिया है लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ इस दावे को खोखला करार देते हैं.
इस साल मई में जयपुर में नौ विस्फोट हुए जिसमें 60 लोग मारे गये. इस बमकाण्ड के सूत्रधार भी सिमी और हूजी थे. जांच एजंसियां कहती है कि इंदौर में अपने नौ साथियों समेत गिरफ्तार होने से पहले शिबली ने इस घटना को अंजाम दिया था. अब बंगलौर और अहमदाबाद में धमाके हुए हैं. धमाकों के कुछ मिनट पहले आतंकी संगठन धमकी भरे ईमेल भेजते हैं कि बच सको तो बचो. हो सकता है आतंकी हमारी कमजोरियों को हर स्तर पर समझते हों इसलिए ऐसा दुस्साहस करते हैं.
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