वी पी सिंह की सात कविताएं
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह अब हमारे बीच नहीं है. अपने आधे तन लेकिन पूरे मन से वे आखिरी सांस तक आम आदमी के लिए लड़ते रहे. राजनेता के साथ-साथ वे एक उम्दा चित्रकार भी थे. बीमारी के बावजूद वे अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाते थे और विधिवत उन चित्रों के मर्म को लोगों को समझाते थे. वे बहुत संवेदनशील कवि भी थे. उनकी आत्मा को श्रद्धांजलि देते हुए हम यहां उनकी ग्यारह कविताएं प्रकाशित कर रहे हैं जो उस वी पी सिंह से हमारा परिचय करवाती है जिसे हम शायद नहीं जानते.
एक
मैं और वक्त
दोनों काफिले के आगे-आगे चले
चौराहे पर
मैं एक ओर मुड़ा
बाकी वक्त के साथ आगे चले गये
दो
एक दिन मेरा नाम
मुझसे अलग जा खड़ा हुआ
जग ने पूछा- "इन दोनों में तुम कौन हो?"
अपने नाम को ही सच बता, मैं अपने को नकार गया
तब से इस जग में
मैं अपरिचित गुमनाम हूं
तीन
उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वह चिपका है फटे इश्तहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता
चार
पैगाम तुम्हारा
और पता उसका
दोनों के बीच
मैं ही
फाड़ा जाऊंगा
पांच
अपनी ही पहचान बनाने में
जब सब अपनी जान लगाए हों
तो बताओ यहां
जान-पहचान कैसे हो?
छः
कुर्सी के हाथ होते हैं, पैर और पीठ भी
पर
सिर नहीं होता
यह सर आये कैसे?
चिन्ता न करो
कुर्सी का अ-सर इतना
कि सर के पुजारी
घेरा डाल देते हैं
और सर सर के मंत्र जाप से
बैठनेवालों को सर चढ़ा देते हैं
कुर्सी पर बैठनेवाले के सर की
इस बलि से
कुर्सी का एक सर उग आता है
सत्ता का एक गणेश पैदा हो जाता है
फिर कुर्सी का ही सर बोलता है
बैठनेवाला तो कुर्सी के पेट में समा जाता है
सात
मेरा एक तरफ चमकदार है
उसमें चेहरों की चहल-पहल है
उसे दुनिया देखती है
दूसरी ओर
कोई नहीं
मैं भी नहीं
इसे मैं ही अकेले देखता हूं
Title :
Body
- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
- टाटा-बिड़ला-अंबानी, पीयेंगे मध्य प्रदेश का पानी
- प्रेस क्लब ने खाना नहीं खिलाया, नोटिस थमा दिया
- पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना



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"सुबह से बेहोश पड़ा है,
उसे शराव नहीं,
प्याज चढ़ गई है।"
विश्वनाथ प्रताप सिंह अनंत विरोधाभासों वाले व्यक्तित्व थे और जब भी उनके जीवन का सभी आयामों से आकलन किया जाएगा तो ये विरोधाभास सबसे पहले सामने आएंगे। इंदिरा गांधी की छाया में वे अपने सांसद भाई संतबख्श सिंह की कृपा से आए थे और बहुत दिनों तक जिसे मुहावरे में पार्टी का अनुशासित सिपाही कहते हैं, बने रहे और राजनैतिक इनाम पाते रहे। केंद्र में वित्त मंत्री बने और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री भी रहे। इंदिरा गांधी के रहते उन्हें मिस्टर क्लीन की उपाधि मिली और बहुत बाद में वित्त मंत्री के नाते मनमोहन सिंह को जिस खगोलीकरण और आर्थिक उदारीकरण के लिए जाना गया उसकी नीव भी श्री सिंह ने ही रखी थी। यह जरूर है कि उन्होंने कांग्रेस के करीबी अंबानी घराने को आर्थिक जांचों के जरिए बहुत सताया और राजीव गांधी के दोस्त अमिताभ बच्चन के घर तो छापा ही पड़वा दिया।
इंदिरा जी के बाद राजीव गांधी सरकार में भी विश्वनाथ प्रताप सिंह सबसे वरिष्ठ मंत्रियों में से एक थे। पहले वे वाणिज्य मंत्री बने और फिर उन्हें वित्त मंत्री बना दिया गया। उस दौरान उन्होंने एक कमाल का कारनामा यह भी किया कि भारतीय औद्योगिक घरानों में भ्रष्टाचार और बेइमानी की जांच के लिए अमेरिका की जासूसी संस्था फेयर फैक्स को अनुबंधित किया और इस पर खासा विवाद हुआ। वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने रक्षा मंत्रालय की बोफर्स सौदे की फाइले यह कह कर वापस कर दी कि इस सौदे में उन्हें दलाली दिए जाने के सबूत मिले है। खुद अपने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर भी उन्होंने यह जिद नहीं छोड़ी। राजीव गांधी ने अरूण नेहरू और अरूण सिंह जैसे दोस्तों की सलाह पर विश्वनाथ प्रताप सिंह को खुद रक्षा मंत्री बना दिया और बोफर्स सौदा आखिरकार रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के दस्तखतों से ही अस्तित्व में आया।
लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह समझ गए थे कि उनका इस्तेमाल किया गया है। बोफर्स का राजनैतिक ताबीज ले कर वे पहले कांग्रेस के भीतर साफ साफ मुखर विरोध करने लगे और फिर समाजवादी नेता रामधन ने जो एक गैर राजनैतिक मोर्चा-जनमोर्चा बनाया था, उस पर कब्जा कर के जल्दी ही उसे जनता दल में बदल दिया और कांग्रेस के विरोधी सभी दलों को साथ जमा कर लिया। चुनाव हुए और उनमें हर चुनाव सभा में विश्वनाथ प्रताप सिंह बहुत नाटकीय अंदाज में कहते थे कि उनकी जेब में एक कागज पर स्विस बैंक का वह दस्तावेज है जिसमें राजीव गांधी के खाते में बोफर्स की दलाली के पैसे जमा किए गए हैं। मतदान हुआ और विश्वनाथ प्रताप सिंह को बहुमत तो नहीं मिला मगर एक चमत्कार उन्होंने यह जरूर किया कि भाजपा और वाम मोर्चा दोनों के बाहरी समर्थन से अपनी सरकार ग्यारह महीने चलाई। ये दोनों दल इसके बाद या इसके पहले भी कभी साथ नहीं आए थे।
उसी समय भाजपा ने लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में और नरेंद्र मोदी तथा स्वर्गीय प्रमोद महाजन के प्रबंध में अयोध्या के लिए राम रथ यात्रा निकाली। उस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह की अनिच्छा के बावजूद मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। लालू यादव चंद्रशेखर की कृपा से बिहार सरकार चला रहे थे। आडवाणी की यात्रा गुजरात के सोमनाथ से महाराष्ट्र, उड़ीसा, बंगाल और लगभग पूरे बिहार को पार कर के समस्तीपुर शहर तक पहुंच गई। कही कोई उपद्रव या दंगा नहीं हुआ लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह के निर्देश पर लालू यादव ने श्री आडवाणी को समस्तीपुर में आधी रात पकड़ कर सुबह हेलीकॉप्टर से दुमका में एक गेस्ट हाउस में गिरफ्तार कर के रख दिया। आडवाणी पार्टी के अध्यक्ष थे और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सारे भाजपा सांसद राष्ट्रपति भवन गए और सरकार से समर्थन वापस लेने का पत्र दे दिया।
मुहावरो की राजनीति करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह कुछ ही दिन पहले अपने उपप्रधानमंत्री देवीलाल का आकार छांटने के प्रयास में मंडल आयोग की वे सिफारिशे लागू कर चुके थे जिनका कई बार वे खुद संसद में विरोध कर चुके थे। भाजपा की समर्थन वापसी को उन्होंने अपने आपको परम धर्म निरपेक्ष होने की छवि देने का असवर माना और संसद में विश्वासमत पर बहस करवाई। इसी बहस में कई पुराने भेद खुले। चंद्रशेखर ने बताया कि उनके प्रधानमंत्री बनाए जाने पर सहमति हुई थी लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देवीलाल का नाम प्रस्तावित किया और पहले से लिखी हुई पटकथा के आधार पर देवीलाल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को ही देश का नेता बना दिया। चंद्रशेखर इस बैठक का बहिष्कार कर के चले आए थे। संसद में बहस के दौरान उन्हाेंने कहा कि उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह को कभी अपना नेता नहीं माना। दिलचस्प बात तो यह है कि समाजवादी जॉर्ज फर्नाडींज आधी रात तक विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनकी सरकार का जोरदार समर्थन कर रहे थे और सरकार का गिरना तय था। अगली सरकार कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर की बनी और जॉर्ज उसमें भी मंत्री थे।
विश्वनाथ प्रताप सिंह जब बीमार हुए तो पहले संदेह किया गया कि उन्हें केंसर हैं। अमेरिका के एक अस्पताल में जांच होने पर पता चला कि उनके दोनों गुर्दे खराब हो चुके हैं और उन्हें अब जीवन भर सप्ताह में दो बार रक्त शुद्व करवाने के लिए डायलिसिस करवाना होगा। उन्होंने राजनीति से सन्यास लेने का फैसला किया और इसके बावजूद राजनीति में बने रहे। वे किंग मेकर की भूमिका में आना चाहते थे और दिलचस्प बात यह है कि अपने अंतिम वर्षों में कांग्रेस से उनकी दूरियां लगभग खत्म हो गई थी और वे कहने लगे थे कि धर्म निरपेक्ष सरकार तो कांग्रेस के नेतृत्व में ही बन सकती है। बीच बीच में उन्होंने किसानों और गरीबों के कुछ आंदोलन भी चलाए और अपने आपको प्रासंगिक बनाए रखने की पूरी कोशिश की।
अंत का आभास विश्वनाथ प्रताप सिंह को शायद हो गया था और इसीलिए उन्होंने अपने पुत्र अजेय सिंह को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया था। कसम खाने के मामले में उस्ताद विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक प्रसिद्व कसम वह थी जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर कहा था कि अगर वे डाकू समस्या का उन्मूलन नहीं कर पाए तो कुर्सी छोड़ देंगे। इसी बीच डाकुओं ने उनके बड़े भाई की भी हत्या कर दी और विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
बाद में वीपी सिंह गूंगे बन गये उन्होंने झूठ बोलकर या अपराधी को बचाकर देश के प्रति अपराध किया.
किसी आदमी के मरने के बाद उसकी बुराई नहीं करनी चाहिये इसलिये चुप हूं
Jaise mai khud jis Chandsekharji ko janta hu, wo jis Chandsekhar ko duniya janti hai usse ek dam alag hai.
Kabhi kabhi mujhe lagta hai ki ye log ache aur sayad imandar the, suruat dil se ki thi, lekin dhire dhire smajhota karte gaye kursi ke liye, apne pocket ke liye, apne pariwar ke liye aur fir.......... isme ek name aur hai waiting list pe, lag raha hai uspe vi jaldi hi charcha hogi Visfot ke plateform pe; Atal Bihari Vajpayeeji
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