Home | अर्थ-अनर्थ | विदर्भ का काला सच

विदर्भ का काला सच

Font size: Decrease font Enlarge font 23051
image विदर्भ में आत्महत्या कर चुके एक किसान के बच्चे

विदर्भ का काला सच महज तीन कहानियों का नहीं है. जिस जमीन को लेकर किसान आत्महत्या तक कर रहे हैं सरकार वही जमीन उद्योगपतियों के लिए निगलना चाहती है.

9 फरवरी 2008. नागपुर से करीब 200 किलोमीटर दूर चंद्रपुर जिले के वैनगंगा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के सूचना पटल पर आठ किसानों की तस्वीर लगी है. ये वो किसान हैं जिन्होंने कर्ज लिया और अभी तक लौटाया नहीं है. ये सभी किसान राजूरा तहसील के कोरपना गांव के हैं. इन किसानों में धनराज बाबूराव जीवने पर 1,25,709 रूपये, विश्वनाथ सदाशिव बोंडे पर 1,06073 रूपये, सुमनबाई हरिभाई बहरे पर 95523 रूपये, शालिग्राम रामचंद्र पर 51046, सावित्री बाई पर 39324, सुमनबाई उरकुण्डे पर 32678 और निर्मल धनराज जीवने पर 10978 रूपये का कर्ज है. इस नोटिस में कर्ज के साथ ही वकील की फीस भी चुकाने के लिए पंद्रह दिन की मोहलत दी गयी है.

24 फरवरी 2008. सूचना चिपकाने के पंद्रह दिन बाद यही नोटिस अब कोरपना गांव के किसानों के घर पर चिपका है. नोटिस में लिखा है कि बैंक का कर्ज और वकील का ढाई हजार रूपये फीस न चुकाने के कारण मामला अदालत में भी भेजा जा सकता है. इस बार किसानों को दस दिन का आखिरी वक्त दिया गया. लेकिन दस दिन पूरा होते इसके पहले ही छठे दिन बैंक का एक कर्मचारी वकील के साथ कोरपना गांव पहुंचता है और ऐलान करवाता है कि बैंक ने पिछले साल के कर्ज को माफ करने का निर्णय लिया है. लेकिन उसके पहले का कर्ज और साल 2007 में लिये कर्ज पर आये टैक्स को किसानों को भरना होगा. पंचायत में सरेआम उन 16 किसानों का पूरा खाका रखा जाता है जिन्होने कर्ज लिया है. एक बार फिर पंद्रह दिन की मोहलत देकर कहा जाता है कि कर्ज न चुकाने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

26 मार्च 2008. इस आखिरी मोहलत के पंद्रह दिन बाद. वैनगंगा ग्रामीण बैंक के दफ्तर पर एक कर्मचारी मेज कुर्सी लगाकर बैठा दिया जाता है. किसानों के घर यह सूचना भेज दी जाती है कि कर्जदार किसानों के घर या जमीन से कर्ज चुकता किया जा सकता है और वकील की फीस को फसलों के जरिए चुकता कर दिया जाएगा. यह आखिरी हिदायत है. बैंक उनके पास सूचना भेजता है कि अब किसान तय करें कि वे कर्ज कैसे चुकता करना चाहते हैं.

दूसरी कहानी

नागपुर से करीब 200 किलोमीटर दूर बुल्ढाणा जिला. यहां के कांग्रेसी विधायक हैं दिलीप सानंदा. वे खामगांव से लगातार जीतते आ रहे हैं. सानंदा परिवार की पैठ किसानों के बीच काफी है. यह पैठ पीढ़ियों की है. विधायक के पिता गोकुलचंद्र की पहचान किसान प्रेमी कृषि मंत्री से ज्यादा रही है. इसकी वजह कुछ और नहीं बल्कि सानंदा परिवार द्वारा किसानों को कर्ज देना है. उपज की सही कीमत मिल जाए इसके लिए भले ही किसान कभी एकजुट नहीं हो पाये लेकिन सानंदा परिवार का बेटा विधायक बन जाए इसके लिए 2004 में खामगांव के किसान एकजुट जरूर हुए. इलाके में सानंदा परिवार एक समानांतर व्यवस्था की तरह काम करता है. इस इलाके के अस्सी फीसदी किसान सानंदा परिवार के ही कर्जदार हैं. 

लेकिन इलाके के एक किसान महादेव ठाकरे ने आत्महत्या कर ली तो प्रशासनिक हलकों में अचानक ही तूफान खड़ा हो गया. ऐसा इसलिए नहीं कि प्रशासन किसानों के प्रति बहुत संवेदनशील हो चुका है बल्कि इसलिए कि उसने अपने सुसाईड नोट में सानंदा परिवार को अपनी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया है. ठाकरे ने लिखा था कि किस तरह सानंदा परिवार की बदौलत उसके जीने के सारे रास्ते बंद से हो गये थे. जो कमाओ कर्ज चुका दो. फिर जीवन कैसे चलता. महादेव की आत्महत्या के बाद उसकी मां गंगूबाई दगड़ू ठाकरे ने पिपलगांव पुलिस स्टेशन से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री सबके सामने गुहार लगाई लेकिन इसी घटनाक्रम में यह खुलकर सामने आ गया कि किस तरह विधायक, प्रशासनिक अधिकारी और पार्टी मिलजुलकर आत्महत्याओं को अपने विकास के अवसर में बदल रहे हैं.

एक तीसरी कहानी भी है

बुल्ढाणा जिले का ही चिंचोली. प्रधानमंत्री राहत पैकेज का पैसा चिंचोली पहुंचा. किसान खुश हुए लेकिन जितना किसान खुश हुए उससे ज्यादा खुश हुए बैंककर्मी, कल्याण विभाग के कर्मचारी, आला अधिकारी और जिले के प्रभारी मंत्री. पैकेज का पैसा कई खेप में बंटना शुरू हुआ. शुरूआत पांच-पांच हजार रूपये से हुई. उसके बाद साढ़े सात हजार फिर दस हजार रूपये फिर साढ़े बारह हजार रूपये प्रति परिवार बंटना था. पैसा बांटने के दौरान किसान के क्रेडिट नंबर का जिक्र होना जरूरी है. लेकिन प्रधानमंत्री पैकेज का पैसा बांटने का एलान जब विशेष कार्यकारी अधिकारी ने किया तो हंगामा मच गया. चिंचोली के पचहत्तर किसानों ने इस राहत पैकेज का पोल खोलकर रख दिया.     

चंपाबाई कुरे मिले 16,000 रूपये लेकिन अंगूठा लगवाया 26000 पर. बाबूराव तुकाराम नागरे मिले 3700 लेकिन अंगूठा लगवाया 14700 रूपये पर. माणिकराव मिले 2000 रूपये लेकिन अंगूठा लगवाया 12500 रूपये पर. यह केवल इत्तेफाक नहीं था कि जब यह राहत का पैकेज बंट रहा था उसी समय इस इलाके में 17 किसानों ने आत्महत्या की.

और यह हकीकत कहानी नहीं बनती

विदर्भ का काला सच महज ये तीन कहानियां नहीं कह रही हैं. बीते दस साल में विदर्भ में 22 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है और इसी दस साल के दौरान विदर्भ में उद्योगपतियों की लिस्ट में 100 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. इसकी सबसे बड़ी वजह यहां उद्योगपतियों का दिवालिया होना है. नागपुर शहर से महज 18 किलोमीटर दूर हिंगना में अस्सी के दशक में एमआईडीसी(MIDC) बनाया गया था. छोटे-बड़े करीब 200 उद्योगपतियों को सस्ते में जमीन और बुनियादी सुविधाएं भी दी गयी थीं. लेकिन नब्बे के दशक के अंत आते आते करीब 90 फीसदी उद्योगपति दिवालिया हो गये. बैंकों ने मुहर लगा दी कि हां ये दिवालिया हैं इसलिए इनसे कर्ज की वसूली नहीं की जा सकती. इस तरह करोड़ों के वारे-न्यारे हो गये.

दिवालिया होने का ऐलान करनेवाले किसी उद्योगपति ने आत्महत्या नहीं की. उल्टे सभी की चमक में तेजी आयी और सरकार ने भी उनकी मदद की. एक बार फिर नागपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर एक नये एमआईडीसी की घोषणा हो गयी. बुटीबोरी नाम की इस जगह पर इस बार करीब साढ़े चार सौ उद्योगपतियों को जगह दी गयी. हिंगना की जमीन पर अब बिल्डरों का कब्जा है. चालीस फीसदी उद्योगपति अब बिल्डर हो गये हैं. बाकी ने भी जमीन का हर तरह से व्यावसायिक उपयोग किया. चंद्रपुर में भले ही 50 हजार का कर्ज लेनेवाले किसान द्वारा कर्ज न लौटाने पर बैंक फोटो चिपका देता है और कानूनी कार्रवाई करने की नोटिस भेज देता है लेकिन हिंगना में उद्योगों के करोड़ो रूपये रूपये झटके में माफ कर दिये जाते हैं.

रिजर्व बैंक कहता है कि उद्योगों के लिए कर्ज लेकर दिवालिया होनेवालों के कारण सिर्फ राष्ट्रीयकृत बैंको को ही 10 लाख करोड़ से अधिक का चूना लग चुका है. इसमें सबसे ज्यादा हिस्सा महाराष्ट्र का ही है जहां के उद्योगपति देश के राष्ट्रीय बैंकों को अब तक 90 हजार करोड़ रूपये चूना लगा चुके हैं. लेकिन किसी भी उद्योगपति ने उस एक दशक में आत्महत्या नहीं की जब महाराष्ट्र में 22000 किसानों ने इहलोक का त्याग कर दिया. क्या कोई बताएगा कि यह किस देश की अर्थव्यवस्था है?

Subscribe to comments feed Comments (3 posted):

Cyril Gupta on 28 March, 2008 20:39;49
avatar
यह लेख पढ़ कर गुस्सा भी आया, और दुख भी हुआ. अगर मीडिया इन मुद्दों को उठायें तो समाज में सजगता फैल सकती है. शुक्र है कि ब्लाग हैं तो कुछ लोगों को तो पता चल रहा है.

आज एक दूसरा लेख भी मीडिया के बारे में पढ़ा, ऐसे में लगता है कि सोशल मीडिया के जरिये एक वैकल्पिक माध्यम ही सही जानकारी लोगों तक पहुंचा सकता है.

ऐसा ही होना चाहिये.
Thumbs Up Thumbs Down
0
anuj on 28 February, 2009 21:50;04
avatar
thx for eyes opener story
Thumbs Up Thumbs Down
0
aniruddha yadav on 29 May, 2009 06:24;30
avatar
prasson ji dukh isi baat ka hai. is desh me kisaanon-ghareebon ki sunne wala koi nahi. Ameer log apne mafik neetyan banaate hain. Ghareebon ko unke haal par chhod diya jata hai. kisaan aur kheti sarkaar ke ajende me uper nahi hai. mushkil ye hai ki agar aap kisaanon-ghareebon ki baat karen to aapko leftist-socilist ya jatiwaadi karaar diya jata hai. Badaa sawaal ye hai ki aakhir kaun unki awaaz banega aur kaun unko niyay dilayega. Aapne bada kaam kiya hai. kaash satta me baithe log is per ghaur karte.........!
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 3 | displaying: 1 - 3

Post your comment comment

Please enter the code you see in the image:

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
4.33
More from अर्थ-अनर्थ
Previous
image
शेयर बाजार में ठगी का कारोबार
क्या आप अपनी पूंजी दोगुनी करना चाहते है? वो भी एक माह से कम समय में! आपको लग रहा होगा कि लेखक के पास कौन सी जादू की छड़ी आ गयी है कि यह एक माह से कम समय में पूंजी को दुगनी कर रहा है वो भी ऐसे मंदी के माहौल में जब दुनिया की बड़ी-बड़ी आर्थिक संस्थाएं दिवालिया हो रही हैं. लेकिन यकीन मानिये यह सच है बाम्बे स्टाक एक्सचेंज में लिस्टेड एक कंपनी जिसका नाम “ओड़िसा मिनरल डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड” है....
image
मंदी के रास्ते आई मंहगाई बनी हरजाई
सन २००८ में आयी आर्थिक मंदी के बाद से विश्व भर में तमाम देशों की आर्थिक सेहत खराब बनी हुई है। कभी ऐसा लगता है कि अब हालत ठीक है तो कभी स्तिथि खराब लगने लगती है। इस बड़े आर्थिक प्रहार के बाद से दो वित्तीय वर्ष पूर्ण होने के उपरांत भी आर्थिक मंदी से अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी है और ये आर्थिक मंदी सीधे –सीधे बढती महंगाई के लिये जिम्मेदार है।...
image
स्विस बैंक में सेंध और भारत की भूमिका
भारत के करोड़ों ईमानदार टैक्सदाताओं और नागरिकों के लिये यह एक खुशखबरी है कि फ़्रांस के HSBC बैंक के दो कर्मचारियों हर्व फ़ेल्सियानी और जॉर्जीना मिखाइल ने दावा किया है कि उनके पास स्विस बैंकों में से एक बैंक में स्थित 180 देशों के कर चोरों की पूरी डीटेल्स मौजूद हैं। 2 साल से इन्होंने लगातार यूरोपीय देशों की सरकारों को ईमेल भेजकर "टैक्स चोरों" को पकड़वाने में मदद की पेशकश कर रखी है। जर्मनी की गुप्तचर सेवा को भेजे अपने ईमेल में इन्होंने कहा था कि ये लोग स्विटज़रलैण्ड स्थित एक निजी बैंक के महत्वपूर्ण डाटा और उस कम्प्यूटर तक पुलिस की पहुँच बना सकते हैं।...
image
तेल के नाम पर खतरनाक खेल
हम सभी को समझना होगा कि भारत में एक लीटर पेट्रोल की कींमत ५३ रूपये है ऐसा क्यों? और सरकार लगातार पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोत्तरी करती जा रही है. आखिर तेल के नाम पर अपने देश के हुक्मरान कौन सा खतरनाक खेल खेल रहे हैं?...
image
चीनी आर्थिक चमत्कार के पैबंद
चीन से आ रही मजदूरों के आत्महत्या करने की खबरों से चीनी आर्थिक चमत्कार के ‘रहस्य‘ खुलने लगे हैं। क्या इस साम्यवादी राष्ट्र के विकास की बुनियाद निर्धन मजदूरों के शोषण पर टिकी है? क्या सस्ते उत्पादन के पीछे चीन में मजदूरों का अंतहीन शोषण है जो आत्महत्या के रूप में सामने आ रहा है?...
image
भारत के लिए जरूरी है व्यापक आर्थिक परिदृश्य
भले ही हमारे देश में आर्थिक महाशक्ति बनने की संभावना है लेकिन हम इससे आत्मसंतोष नहीं कर सकते. हमें सफलता प्राप्त करने केलिए हर स्तर पर पूरी दृढ़ता के साथ सही कदम उठाने होंगे. सफलता केलिए हमें कुछ बातों पर ध्यान देने की जरूरत है. ...
image
मंहगाई की मनमोहनी मार
मंहगाई-मंहगाई के इस खेल में फायदे में रहेंगे मनमोहन और उनकी तिकड़ी तथा वे ताकतें ( बहुराष्ट्रीय निगम) जिनके लिए मंहगाई बढ़ाई जा रही है और घाटे में रहेगी इस देश की आम जनता, यूंपीए गठबंधन और गठबंधन की प्रमुख घटक कांग्रेस क्योंकि मनमोहन और उनकी तिकड़ी के नीतियों की वजह से कांग्रेस का हाथ बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ है, देश के आम आदमी के नहीं । इसका हिसाब आम आदमी चुनाव में जरूर लेगा किन्तु हिसाब लेने में अभी चार साल बाकी है सो मंहगाई फ़िलहाल कम होगी यह उम्मीद करना दिवास्वप्न ही है । ...
image
शेयर बाजार को ले डूबेंगी डब्बा कंपनियां
शेयर बाजार की नियामक संस्था सेबी ( सेक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) के ठीक नाक के नीचे काले धन को सफेद करने का कारोबार धड़ल्ले से जारी है । डब्बा कंपनियों के माध्यम से इसे अंजाम दे रहे हैं डब्बा ट्रेडर्स। दरअसल डब्बा ट्रेडर्स एक ऐसे कुख्यात कारोबारी तरीके का नाम है जो काले धन को सफेद करने का कारोबार धड़ल्ले से कर रहे हैं । ...
image
आइये समझें अर्थ का शास्त्र
बहुत सारे लोग अनिल सिंह को अनिल रघुराज के नाम से जानते हैं. किसी दौर में आर्थिक पत्रकार के तौर पर दिल्ली में झंडा गाड़नेवाले अनिल सिंह मुंबई गये तो अनिल रघुराज के रूप में ब्लागिंग शुरू की. मुस्कुराते हुए बात करतें हैं और बात करते हुए बीच बीच में खांसते हैं. उन्हें खांसने का कोई रोग नहीं है लेकिन ऐसा लगता है कि यह उनका स्टाइल है. बोलते बहुत धीरे हैं लेकिन जो बोलते हैं वह समझा हुआ सा लगता है इसलिए मन में बहुत सारे सवाल जवाब नहीं आते हैं. ऐसे ही अनिल सिंह उर्फ अनिल रघुराज ने अपनी एक वेबसाइट शुरू की है- अर्थकाम. ...
image
मंहगाई को रोकना है तो...
रिज़र्व बैंक ने एक बार फिर ब्याज दरें बढ़ा दीं हैं। उनकी सोच है कि बाज़ार में रुपये की कमी से खर्च पर लगाम लगेगी और उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद कम होगी। रिज़र्व बैंक के प्रबंधन में देश के चोटी के विद्वान लगे हैं। अर्थशास्त्र के एक प्रकांड पंडित इस देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए यह कहना कि ब्याज़ दर बढ़ा कर मंहगाई पर काबू पाना नामुमकिन है, शायद छोटे मुंह बड़ी बात होगी लेकिन सच्चाई यह है कि बैंकों से पैसा लेकर फालतू की चीज़ें नहीं खरीदी जातीं।...
image
आईपीएल में कैसे और कहां से बरस रहा है पैसा?
कभी सोचा है आपने कि आखिर आठ-दस टीमों के खेलने-खिलाने से आईपीएल में कैसे और कहां से ऐसा पैसा बरस रहा है? आखिर क्यों तमाम घृणित किस्म की राजनीतिक जोड़तोड़ से, जाने कहां-कहां से करोड़ों जुगाड़कर बड़े-बड़े दिग्गज इस पर दांव लगा रहे हैं? ...
image
बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के चंगुल में बिहार
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने एक बार फिर सात वर्षो के बाद बिहार के किसानों को अपने चंगुल में ले ही लिया और बिहार के किसानों को मक्के की ऐसी बीज बेचकर चम्पत हो गए जिसमें अंकुरण तक नहीं आया। इनसे उपजी मक्के की फसल में दाने नहीं आए और लाखों हेक्टेयर की फसल बिहार में बर्बाद हो गई। सात साल पहले भी बिहार में मोन्सेन्टो कम्पनी के कारगिल बीज ने ऐसा ही गुल खिलाया था।...
image
पटना निगल जाता है आधा बिहार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से यह कहते हुए केंद्र पर अनदेखी का आरोप लगाते रहे हैं कि बिहार का विकास किए बगैर देश विकसित नहीं हो सकता, मगर जब बात उनके अपने राज्य की आती है तो संभवत: यह तर्क वे भूल जाते हैं और विकास की बड़ी राशि पटना में ही खर्च कर डालते हैं, भले भागलपुर, पूर्णिया या सुपौल जैसे जिले पिछड़े ही रह जाएं।...
image
लीजिए, एक और किसान हितैषी बजट
वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के भाषण का आखिरी वाक्य देखिए. वे कहते हैं- "यह बजट आम आदमी से जुड़ा है. यह किसानों, कृषि कारोबारियों, उद्यमियों और निवेशकों से जुड़ा हुआ है." अरे, एक और किसान हितैषी बजट आ गया. पिछले दस सालों के बजट बाद के संपादकीय पढ़िये. आपको हर संपादकीय में एक बात जरूर दिखाई देगी कि किसानों और कृषि के उत्थान के लिए सरकार ने नये सिरे से प्रयास किये हैं. हमारी मीडिया के लिहाज से हर बार बजट में वित्त मंत्री किसानों के लिए अच्छी अच्छी खबरें लेकर आते हैं. ...
image
भविष्य के भारत की ओर पहला बजट
वित्त वर्ष 2010-11 बजट प्रस्तुत होने से पहले आम आदमी की परिभाषा दाल रोटी से जोड़ी जा रही थी. लेकिन बजट आया तो आम आदमी की जगह शहर के वे लोग आ गये जो एक घर और गाड़ी का सपना देखते हैं. अपने बजटीय प्रावधान में प्रणव मुखर्जी ने जो घोषणाएं की हैं वह उस आम आदमी को सचमुच राहत देनेवाली हैं जिनका रोना अब तक विपक्षी दल और मीडिया का एक हिस्सा रो रहा था. फिर अचानक ही प्रणव मुखर्जी का बजट आम आदमी का विरोधी कैसे हो गया?...
image
बजट में किसान और कृषक अलग अलग क्यों हैं दद्दू?
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट भाषण के अंत में कहा है कि यह बजट आम आदमी का है। यह किसानों, कृषकों, उद्यमियों और निवेशकों का है। इसमें बाकी सब तो ठीक है, लेकिन किसान और कृषक का फर्क समझ में नहीं आया। असल में वित्त मंत्री ने अपने मूल अंग्रेजी भाषण में फार्मर और एग्रीकल्चरिस्ट शब्द का इस्तेमाल किया है।...
image
बजट में करदाताओं को मिला उम्मीद से बढ़कर
जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी, वित्त मंत्री ने बजट 2010-11 में वह काम कर दिखाया। सभी को यही लग रहा था कि क्योंकि प्रत्यक्ष कर संहिता (डायरेक्ट टैक्स कोड) लागू होनी है, इसलिए शायद प्रणब मुखर्जी इस बार व्यक्तिगत आयकर की दरों या स्लैब में कोई तब्दीली नहीं करेंगे।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम कॉपीराइट के सभी प्रकार के दावों और दायरों से मुक्त है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2