असाढ़, अशोक और अकाल की आशंका
राजस्थान सरकार बिजली पानी के संकट से जूझते प्रदेश को अभी तक कोई राहत नहीं दे पाई है वही आम किसान को एक बार फिर से आशंकाओं ने घेर लिया है। उसकी चिंता ये है कि कहीं एक बार फिर से पॉच साल पुराना इतिहास न सामने आ जाऐ।वो ऐसे में अकाल की स्थिति का अनुमान प्रदेश के मुखिया अशोक गहलौत से जोड रहा है और उसकी आशंका निर्मूल भी नजर नहीं आ रही है।राजस्थान में जून माह में सामान्तया 72 मिमी बारिश होती है जो इस बार 39 मिमी ही हुई है। बर्षा की कुछ क्षेत्रों में पडी फुहारों ने कुछ राहत अवश्य दी हैं।
दिसंबर 2008 से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार सत्तारूढ है और उसके मुखिया है अशोक गहलौत जो दिसंबर 1999 से 2003 तक भी प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके है।दूसरे कार्यकाल के आरम्भ से ही प्रदेश से बर्षा की फुहारे रूठ सी गई है जिससे किसानों को इस बार रबी की फसल के लिए प्रदेश में सर्दियों के दौरान पक्षिमी विक्षोभ से होने वाली ´मावठ´का भी लाभ नहीं मिल पाया जिससे गेंहू ,सरसों की फसल अनुमान के मुताबिक नहीं हो सकी।
अब जबकि असाढ का पूरा महीना जाने को है प्रदेश में किसानों ने खरीफ की फसल के लिए बीज भी हाथों में नहीं लिया है वही दूसरी ओर पशुओं के लिए चारे की समस्या ने भयावह रूप ले लिया है।आम तौर पर बाजरे की फसल का समय तो किसानों के हाथ से निकल सा चुका है तो अन्य फसलों की बुवाई के लिए भी उसका प्रत्येक निकलते दिन के साथ उसका इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है।प्रदेश के तमाम बडे बाध सूखने के कगार पर पहुंच चुके है जिससे बिजली और बडे शहरों के लिए पीने के पानी की समस्या सामने आती जा रही है।
किसान की आंशकाओं के पीछे की सच्चाई भी कुछ ऐसा ही वयान कर रही है क्योंकि अशोक गहलौत के पहले पॉच बर्ष के कार्यकाल के दौरान भी प्रदेश में अकाल की ही स्थिति बनी रही थी और प्रदेश वासियों ने भाजपा की बसुंधरा राजे के कार्यकाल में राहत की सॉस ली जब बाडमेर, जैसलमेर, जोधपुर जैसे सूखे इलाकों में भी पर्याप्त वर्षा के साथ कवास जैसे गॉव में बाढ की स्थिति बन गई थी।
इस बीच लोग ये कहते सुने जा रहे है कि ´कर्म हीन खेती करै,बैल मरै कि सूखा पडै´ अशोक गहलौत के अभी तक के प्रशासनिक निर्णयों से आम आदमी को कोई नुकसान हुआ हो ऐसा बिल्कुल भी दिखाई नहीं पड रहा लेकिन प्रदेश में बनती दिख रही अकाल की संभावनाओं के बीच लोग बैचेन है साथ ही इसकी जिम्मेदारी अशोक गहलौत के नसीब के साथ जोड कर देख रहे है जिसका खामियाजा आम गरीब किसान को भुगतना पडता दिखाई दे रहा है।
इस तरह की चर्चाएं प्रशासनिक आला अधिकारियों के बीच भी सुनाई पड रही है, वही चौपाल चर्चाएं तो इन दिनों ऐसी ही बातों को कर रही है कि अशोक आया और अकाल लाया। ज्यातिषीय गणित और मान्यताओं के अनुसार भी इस बार बर्षाका गणित सही नहीं बताया जा रहा है।बीते बर्ष 7 विश्वा वर्षा थी जो इस बार 13 विश्वा है ।20 विश्वा के गणित में से अधिक होने पर बर्षा का दौर कम होता है,इसी प्रकार गत बर्ष मेघ का निवास वैश्य के घर था तो इस बार माली के घर बताया जा रहा है जिसके अनुसार भी कम बर्ष का होना प्रमाणित है। इसी प्रकार की मान्यताएं मेघ के सवारी को लेकर है जो पिछले साल अश्व घोडा था जो त्रीव वाहन है वही इस बार मेघ की सवारी हाथी को बताया जा रहा है जो अपनी धीमी और मस्त मौला गति के लिए जाना जाता है।इस प्रकार से ज्योतिष का गणित ओर उसके अनुसार चली आ रही किवदंतिया और मान्यताएं भी इस बार बर्षा के कम होने का संकेत कर रही है।
ऐसे में अब लोगों को भाजपा का शासन याद आ रहा है जिसमें भले ही प्रदेश में बहुत कुछ अच्छा नहीं हुआ हो लेकिन बर्षा से बॉध भरे रहे वही बिजली की भी किल्लत से दो चार नहीं होना पडा।अब यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि कांग्रेस और उसके मुखिया के बारे में लोगों की आशंकाऐ किस हद तक सच साबित होती है या फिर इस बार लोगों को अकाल जैसी स्थितियों ने जूझना नही पडता है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अशोक गहलौत के वर्तमान कार्यकाल में यदि प्रदेश को अकाल का सामना करना पड़ गया तो ये स्थिति कांग्रेस सहित अशोक गहलौत दोनों के ही लिए आगे ठीक रहने वाली नही है।
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उधर आपने विस्फोट में खबर चलाई और इधर बारिश शुरू हो गई। वैस आप लिखने में जरा सी चूक कर गए। राजस्थान में पानी का संकट अवश्य है, पर बिजली का नहीं।
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