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गंभीर बांध पर कुछ गंभीर बातें

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गम्भीर बाँध के कैचमेंट इलाके में यानी लगभग बीस वर्ग किलोमीटर के इस उथली मिट्टी वाले इलाके के आसपास लगभग चालीस गाँव बसे हुए हैं। इनमें बसने वाले किसानों की ज़मीनें बाँध के पानी वाले इलाके से लगी हुई हैं। इन ज़मीनों पर ये किसान दोनों मौसमों में सोयाबीन और गेहूं की फ़सलें लेते हैं। लगभग सभी किसानों के खेतों में ट्यूबवेल लगे हुए हैं और बाँध नजदीक होने के कारण वाटर लेवल भी काफ़ी ऊँचा है, लेकिन बाँध के रोके गये पानी से लगातार साल भर पानी चोरी की जाती है।

अभी तक आपने किसानों के बारे में बहुत कुछ बुरा-बुरा ही पढ़ा होगा, किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं, बेहद गरीबी में दिन बिता रहे हैं, उनका शोषण हो रहा है, उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं आदि-आदि, इनमें से लगभग सभी समाचार व रिपोर्टें सही होती हैं। अब मैं आपको बताने जा रहा हूँ किसानों के दूसरे पक्ष का एक समाचार।

उज्जैन शहर को लगभग सभी लोग जानते हैं, बाबा महाकालेश्वर की नगरी जहाँ प्रति बारह वर्षों में कुम्भ का मेला लगता है। उज्जैन शहर का अपना एक विशिष्ट धार्मिक महत्व है, इस कारण देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ आते हैं। सन् 2004 के सिंहस्थ में अप्रैल-मई के दौरान पाँच पवित्र स्नानों के दौरान एक करोड़ से अधिक लोग उज्जैन आये थे। 1992 के सिंहस्थ के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिये और उज्जैन शहर की पेयजल संकट समस्या के समाधान के लिये यहाँ से 16 किमी दूर गम्भीर नदी पर एक छोटा बाँध बनाया गया था, जिसकी कुल संग्रहण क्षमता 2250 MCFT है।

यूँ तो उज्जैन शहर और शिप्रा नदी का जन्म-जन्मान्तर का साथ है, लेकिन हाल के वर्षों में जैसा कि लगभग सभी नदियों का हाल है, शिप्रा भी साल के दो महीने ही सदानीरा रहती है, बाकी के दस महीने विभिन्न जगहों पर बने स्टाप-डेम के सहारे तालाबों और पोखरों में जीवित रहती है, ठीक यही हाल गम्भीर नदी का भी है। जिस वक्त गंभीर पर यह बाँध बनाया गया था तब सरकार ने दावा किया था कि उज्जैन शहर की पेयजल व्यवस्था का अगले पचास वर्षों का इंतजाम हो गया है। मोटे तौर पर देखने से यह बात सच भी लगती थी, क्योंकि उज्जैन शहर की पानी की खपत औसतन 4 MCFT रोज़ाना की है, "वाटर लॉसेस", सदा खुली हुई सार्वजनिक टोंटियाँ और चोरी के बावजूद। इस हिसाब से एक बार बाँध पूरी तरह भर जाने के बाद यदि रोजाना भी पानी दिया जाये तब भी नये वर्षाकाल शुरु होने से पहले बाँध में कम से कम तीन महीने का पानी बचा हुआ होना चाहिये। सितम्बर माह का अन्तिम सप्ताह प्रारम्भ होने वाला है, भादौं का महीना भी समाप्त होने को है, आधिकारिक तौर पर वर्षाकाल 30 सितम्बर तक माना जाता है, लेकिन आज की तारीख में गंभीर बाँध का जलस्तर है सिर्फ़ 350 MCFT, इसमें से भी 200 MCFT पानी ऐसा होता है जिसे बाँध की मोटरों से नहीं खींचा जा सकता। यानी बचा सिर्फ़ 150 MCFT पानी जिसे अक्टूबर से अगली जुलाई तक चलाना है, जो तभी हो सकता है जब कोई चमत्कार हो जाये।

इस वर्ष मध्यप्रदेश के मालवा में औसत से आधी ही बारिश हुई है, इस कारण लगभग सभी मुख्य जलस्रोत आधे-अधूरे ही भरे हैं। बारिश हुई भी है तो धीमी रफ़्तार से, जिससे कुँए और बावड़ियाँ तो पानी से लबालब हैं लेकिन तेज़ बारिश से भरने वाले बाँध, बड़े तालाब और स्टॉप डेम लगभग खाली पड़े हैं। लेकिन पचास साल तक उज्जैन में पेयजल समस्या के निदान का दावा क्या हुआ? और उज्जैन शहर पर यह भीषण संकट कैसे आन पड़ा? कम बारिश होने का तो एक बहाना है, असली बात कुछ और ही है।

गम्भीर बाँध के कैचमेंट इलाके में यानी लगभग बीस वर्ग किलोमीटर के इस उथली मिट्टी वाले इलाके के आसपास लगभग चालीस गाँव बसे हुए हैं। इनमें बसने वाले किसानों की ज़मीनें बाँध के पानी वाले इलाके से लगी हुई हैं। इन ज़मीनों पर ये किसान दोनों मौसमों में सोयाबीन और गेहूं की फ़सलें लेते हैं। लगभग सभी किसानों के खेतों में ट्यूबवेल लगे हुए हैं और बाँध नजदीक होने के कारण वाटर लेवल भी काफ़ी ऊँचा है, लेकिन बाँध के रोके गये पानी से लगातार साल भर पानी चोरी की जाती है। सोयाबीन और गेहूं के अलावा भी कई किसान सब्जियों की एक-दो फ़सलें अतिरिक्त भी ले लेते हैं, ज़मीन बेहद उपजाऊ है और सोयाबीन तथा गेहूं बम्पर मात्रा में पैदा होता है। इस वर्ष अल्पवर्षा के आसार को देखते हुए जिला कलेक्टर ने पहले ही बाँध के पानी के सिंचाई हेतु उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, लेकिन कागजी प्रतिबन्ध लगाने से क्या होता है (ऐसे प्रतिबन्ध तो संघ और सिमी पर भी लगते रहे हैं)। बाँध से पानी की चोरी पूरे साल भर जारी रही। बाँध के पानी की सुरक्षा और संधारण का जिम्मा उज्जैन नगर निगम तथा पीएचई विभाग मिलकर करते हैं।

अब इन सरकारी अधिकारियों की करामात देखिये, बाँध के एक गेट की रबर सील लीकेज हो गई थी जिसके कारण उस गेट से पानी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में निकलता रहा। उस रबर सील की लीकेज को सुधरवाने की फ़ाइल पूरे साल एक विभाग से दूसरे विभाग दौड़ती रही, लेकिन उस पर "खर्च के लिये पैसा नहीं मिला"। उस लीकेज को रोकने में दिलचस्पी किसी भी अधिकारी-कर्मचारी की नहीं थी, क्योंकि जो पानी बाँध से बहकर आगे के गाँवों में जा रहा था, उन किसानों से भी इन अधिकारियों और कर्मचारियों को पैसे मिल रहे थे। ऐसी स्पष्ट खबरें हैं कि बाँध के इस तरफ़ के किसानों और सरकारी अधिकारियों के बीच खेत की उपज की हिस्सेदारी पर सौदा हुआ है, अर्थात किसान पूरे साल बेरोकटोक पानी की चोरी करेंगे और उत्पन्न होने वाली फ़सल का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा नेताओं, अधिकारियों और कर्मचारियों के घरों में पहुँचेगा। किसानों को और क्या चाहिये, मुफ़्त की बिजली, मुफ़्त का पानी, और किसानों के वोट के नाम पर नेता भी जेब में। उज्जैन शहर की 5-7 लाख जनता की परवाह किसे है? इधर किसानों ने फ़र्जी किसान क्रेडिट कार्ड भी भारी संख्या में बनवा रखे हैं, एक भाई की जमीन दूसरे के नाम से दो-दो बार ट्रांसफ़र करके पूरे परिवार में तीन-चार क्रेडिट कार्ड बनवाये गये हैं। सरकार द्वारा दस हजार रुपये तक की ॠण माफ़ी की घोषणा के साथ ही कागजों पर सभी भाई अलग-अलग हो गये, बड़े खेतों को बैंक अफ़सरों की मिलीभगत से "छोटी जोत" दर्शाया गया और बैंकों से मिला हुआ ॠण डकारा गया। पाँच हार्स पावर से कम के पंपों को निशुल्क बिजली की घोषणा मात्र से सभी खुश हो गये, अब होता यह है कि विद्युत मंडल कर्मचारियों और किसान नेताओं की "कृपा" से बहुत कम खेतों में 5 हॉर्स पावर से ऊपर के पंप मिलते हैं।

विभिन्न रिपोर्टों से प्राप्त किसान के बारे में कुछ छवि आपके मन में बनी हो तो उस पर फ़िर से विचार कीजियेगा। उज्जैन इन्दौर फ़ोरलेन सड़क के बनने की खबर मात्र से किसानों ने अपनी ज़मीनों के भाव एकदम से बढ़ा दिये और बेच भी दीं। आज इधर काफ़ी किसानों के घर में ट्रैक्टर, मोटरसायकल आदि आम बात है, अब उनके बच्चे उज्जैन और इन्दौर के इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ते हैं, जहाँ की फ़ीस के बारे में सोचने भर से हम जैसे मध्यमवर्गीय लोगों को पसीना आ जाता है। मध्यम आकार की जोत के किसानों की सोयाबीन और गेहूं की एक-एक फ़सल तीन-तीन लाख में उतरती है। बचे समय में सब्जियाँ उगाकर और गाय-भैंस से घरेलू फ़ुटकर खर्चा निकल जाता है। जब से इन्दौर आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित होने लगा है, आसपास के गाँवों के किसान 5 से 50 करोड़पति बन गये हैं। भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियो-किसानों का ऐसा शानदार त्रिगुट बन गया है कि भू-माफ़िया भी पनाह माँग जायें। ॠण अधिकार पुस्तिका में फ़ेरबदल करना, पटवारी की "मदद" से खसरे में हेरफ़ेर करना, बैंक मैनेजरों से मिलीभगत करके किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़वाना, भू-अधिकार पुस्तक में बंजर ज़मीन को सिंचित दर्शाना जैसे काम अब किसान आसानी से करने लगे हैं… इसलिये जब उज्जैन की जनता पानी के लिये त्राहि-त्राहि करे तो इसमें आश्चर्य कैसा, बाँध का सारा पानी या तो जानबूझकर बहा दिया गया या चोरी हो गया… मजे की बात तो यह है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों इस मुद्दे पर भी राजनीति खेलने से बाज नहीं आ रहे। नगर निगम में बोर्ड कांग्रेस का है, लेकिन भाजपा के पार्षद इस "मौके" को भुनाने में लगे हैं, जबकि दोनों पार्टियों के पार्षदों के शिप्रा नदी के किनारे अवैध ईंट भट्टे चल रहे हैं। नगर निगम और पीएचई के अधिकारियों के दोनों हाथों में लड्डू हैं, ये भ्रष्ट लोग पहले तो किसानों से पानी चोरी करवाकर लाखों कमा चुके हैं अब जलप्रदाय के लिये नौ करोड़ रुपये की आपात योजना के नाम पर लूटने की फ़िराक में हैं। स्थानीय "बाहुबली" भी जनवरी के इन्तज़ार में हैं जब बाँध का पानी खत्म हो और उनके टैंकर चलें क्योंकि एक-एक टैंकर 300-400 रुपये में बिकेगा… यानी सभी का फ़ायदा ही फ़ायदा.

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image सुरेश चिपलूणकर उद्यमी, मुक्त पत्रकार और हिन्दी ब्लागर. उज्जैन के रहनेवाले सुरेश चिपलूणकर धाकड़ लिक्खाड़ हैं. लेखन शोधपूर्ण और तथ्यात्मक हो इसका भरपूर प्रयास करते हैं. अपने बारे में वे खुद कहते हैं कि "मैं सोचता हूँ कि कुछ न करने से बेहतर है कि "कुछ" किया जाये। संपर्क: suresh.chiplunkar@gmail.com
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