लिब्राहन की रिपोर्ट पर कांग्रेस और मुसलमान आमने-सामने
लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट पर कांग्रेस और इस्लामिक जमातें आमने-सामने खड़ी नजर आने लगी हैं. एक ओर जहां इस्लामिक जमातों का कहना है कि मानसून सत्र में ही रिपोर्ट सदन पटल पर रखी जानी चाहिए तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस इससे बचना चाह रही है.
बुधवार को लखनऊ में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक हुई. बैठक में हालांकि रिपोर्ट को लेकर कुछ ठोस तय नहीं किया गया बल्कि लॉ बोर्ड की ओर से संकेत दिया गया कि 12 जुलाई को कोढिकोड में होनेवाली बैठक में ही आखिरी निर्णय लिया जाएगा कि रिपोर्ट के ऊपर मुस्लिम तंजीमें क्या रुख अख्तियार करेंगी. लेकिन पर्सनल लॉ बोर्ड से ही जुड़े कुछ लोगों की मंशा है कि कांग्रेस सरकार मानसून सत्र के दौरान ही रिपोर्ट को सदन पटल पर रख दे.
लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट को सदन पटल पर रखने के सबसे प्रबल पैरोकार हैं जफरयाब जिलानी. जिलानी खुद वकील हैं और चाहते हैं कि 17 साल बाद ही सही अगर रिपोर्ट आ गयी है तो उसे बिना देर किये सदन पटल पर रख देना चाहिए. जिलानी का मानना है कि रिपोर्ट में जो लोग भी दोषी ठहराये गये हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.
उधर कांग्रेस रिपोर्ट को लेकर अभी कुछ तय नहीं कर पा रही है. रिपोर्ट आने के बाद कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा था कि रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद इस पर उचित निर्णय लिया जाएगा लेकिन कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि मानसून सत्र में रेल बजट और आम बजट प्रस्तावित हैं. ऐसे में रिपोर्ट को सदन पटल पर रखकर सरकार विपक्षी भाजपा को कोई बड़ा मुद्दा नहीं देना चाहती जिससे कि सदन का काम-काज ही ठप हो जाए. फिलहाल लॉ बोर्ड ने 12 जुलाई तक रिपोर्ट पर अपना रुख जाहिर करने की बात कहकर कांग्रेस को कुछ हद तक राहत दे दी है. फिर भी लॉ बोर्ड से जुड़े कुछ लोग चाहते हैं कि रिपोर्ट इसी मानसून सत्र में सदन पटल पर रखी जानी चाहिए.
ज्ञात हो कि बाबरी विध्वंस के साजिशों की जांच करने के लिए बने लिब्राहन आयोग ने मंगलवार को गृहमंत्री की मौजूदगी में प्रधानमंत्री को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी. आयोग के काम काज की अवधि केवल तीन महीने निर्धारित हुई थी लेकिन 48 विस्तार लेते हुए आयोग ने 17 साल बाद रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी है.



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