जनसत्ता से जुड़े लोगों ने प्रभाष जी को याद किया
जनसत्ता से जुड़े लोगों ने आज प्रभाष जी को याद किया. प्रभाष जी को श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली के निकट वसुंधरा के मेवाड़ संस्थान में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था जिसमें जनसत्ता से जुड़े पुराने लोग, प्रभाष जोशी के परिवार के सदस्य और शुभचिंतक उपस्थित थे.
श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन मेवाड़ संस्थान की ओर से किया गया था. अपने जीवन के आखिरी वर्षों में प्रभाष जोशी मेवाड़ संस्थान से गहराई से जुड़े थे और उसकी कई गतिविधियों में हिस्सा लेते रहे थे.
श्रद्धांजलि समारोह में बोलते हुए उनके कई पुराने साथियों ने उनके साथ काम किये गये क्षणों को याद किया. प्रभाष जी को याद करते हुए उनके साथ लंबे समय तक संपादकीय पृष्ठ पर काम कर चुके जवाहर लाल कौल ने कहा कि प्रभाष जी एक जिद्दी व्यक्ति थे लेकिन उनकी यह जिद्द एक बच्चे की जिद्द थी. उन्होंने कहा कि लेकिन प्रभाष जोशी बनने के लिए उनकी यह जिद्द जरूरी थी. विलक्षण व्यक्तित्व ऐसे ही असाधारण गुणों से बनता है. जवाहर लाल कौल ने कहा कि वे कई दफा कठोर और क्रुद्ध जरूर दिखते थे लेकिन अंदर से उनका स्वभाव बिल्कुल बच्चे जैसा था. जवाहर लाल कौल ने बताया कि प्रभाष जी ने जीवनभर नहीं माना कि उनका तन कमजोर भी हो सकता है. आखिरी के सालों में जब उनका शरीर कमजोर हो गया तब भी उनकी जिद्द बनी रही और उन्होंने मजबूत मन के सामने कमजोर शरीर को कभी आड़े नहीं आने दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि समय से बहुत पहले ही वे हमारे बीच से चले गये.
प्रभाष जी को याद करते हुए पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि हमने उनके संपादन में तो कभी काम नहीं किया लेकिन हर वक्त वे मेरे संपादक बने रहे. पुण्य प्रसून ने कहा कि "एक टीवी कार्यक्रम के ब्रेक में मैं उनसे बात कर रहा था तो पूछा कि प्रभाष जी अगर आप हमारी उम्र में होते तो क्या करते? प्रभाष जी ने तपाक से जवाब दिया कि- मैं तुम्हारी उम्र में होता तो आंदोलन चलाता और वह आंदोलन पत्रकारिता का आंदोलन होता." इंडिया टुडे के कार्यकारी संपादक जगदीश उपासने ने कहा कि प्रभाष जी मेरे गुरु और मार्गदर्शक थे. वे न होते तो मैं दिल्ली नहीं आता. प्रभाष जोशी को याद करते हुए अरुण त्रिपाठी ने कहा कि प्रभाष जी ऐसे द्रोणाचार्य थे जो पांडवों की ओर से जीवनभर लड़ते रहे. प्रभाष जी जिधर होते थे सच उधर ही होता था. पत्रकार अरुण पाण्डेय ने कहा कि अपने आखिर के दिनों में एक तरह का आंदोलन करना चाहते थे. वह आंदोलन पत्रकारिता का था.
प्रभाष जोशी की शुरूआती जनसत्ता टीम के हिस्सा रहे अरविन्द मोहन ने कहा कि वे ऐसे पत्रकार थे जो एजेण्डा सेट करते थे. आज इतने सालों बाद काम करने के बाद अब समझ में आता है कि वे जब कहते थे कि खबर वही होगी जो जनसत्ता प्रकाशित करेगा. अरविन्द मोहन ने कहा कि परंपरा और पत्रकािरता के मूल्य में उनके नजदीक कोई नहीं ठहर सकता.
प्रभाष जी को याद करते हुए प्रदीप सिंह ने कहा कि वे असाधारण रूप से साधारण थे. प्रदीप सिंह ने कहा कि वे हमको सिखा गये हैं कि सच के लिए अड़ो और लड़ो. अब सच के लिए लड़ाई ही उनको सही श्रद्धांजलि होगी. प्रियदर्शन ने कहा कि वे हमारे ऊपर एक तने हुए आसमान थे, उनके जाने के बाद वह आसमान हमारे सिर से हट गया है. इस अवसर पर मस्तराम कपूर ने कहा कि वे नियति से ठिठोली करते थे. वे ऐसे पत्रकार थे जो परंपरा में आधुनिकता के बीच खोजते थे. उनके अंदर यह विलक्षण प्रतिभा थी जो वे आधुनिकता को परंपरा से जोड़ सकते थे.
इस मौके पर उनके छोटे भाई सुभाष जोशी, गोपाल जोशी, बेटे सोपान और संदीप जोशी, श्रीमति उषा प्रभाष जोशी तथा परिवार के अन्य सदस्य भी उपस्थित थे. श्रद्धांजलि कार्यक्रम में कालूराम बोमानिया ने निर्गुण गायन किया और कार्यक्रम का संचालन जनसत्ता के चीफ रिपोर्टर मनोज मिश्र ने किया. आखिर में संस्थान के अध्यक्ष अशोक गादिया ने सबका धन्यवाद ज्ञापन किया.



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