पीआईबी में याद किये गये प्रभाष जोशी
प्रेस इन्फार्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) भारत सरकार का संस्थान है जो कि सरकार से जुड़े मीडिया कार्य को देखता है. संभवत: पीआईबी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि एक पत्रकार के लिए उसने अपनी ओर से पहल करके श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया. निश्चित रूप से वह पत्रकार कोई और नहीं प्रभाष जोशी थे.
जिस दिन प्रभाष जी का निधन हुआ उस दिन पीआईबी की महानिदेशक नीलम कपूर खुद प्रभाष जोशी का अंतिम दर्शन करने आयी थीं और उन्होंने वहीं प्रस्ताव किया था कि पीआईबी भी उनके लिए एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन करना चाहता है. दिल्ली में इससे पहले प्रभाष जी के लिए दो श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जा चुकी है जिसमें एक इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर में तथा दूसरी उनके आवासीय क्षेत्र गाजियाबाद के वसुंधरा में आयोजित की गयी थी.
आज पीआईबी में आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा में बोलते हुए सबसे पहले नीलम कपूर ने कहा कि हमें साथ मिलकर आगे बढ़ना है. इसलिए हमारी पत्रकारिता का भविष्य कैसा हो इस बारे में भी मिलकर सोचना होगा. प्रभाष जोशी को हम उसी कड़ी में याद कर रहे हैं क्योंकि प्रभाष जी जीवन के आखिरी दिनों में भी पत्रकारिता को नयी आफत से बचाने की कोशिश कर रहे थे. इस अवसर पर प्रभाष जोशी के एक भाषण का वह फुटेज भी दिखाया गया जिसमें वे पैकेज पत्रकारिता का विरोध कर रहे थे.
प्रभाष जी को याद करते हुए उनके छोटे बेटे सोपान जोशी ने कहा कि प्रभाष जोशी पत्रकार बनने नहीं निकले थे. वे तो सामाजिक काम करने आये थे. लेकिन राहुल बारपुते जैसे पूर्वजों ने उन्हें पत्रकारिता का रास्ता दिखाया जिस पर प्रभाष जी ने आगे की यात्रा की. सोपान जोशी जो कि डाउन टू अर्थ पत्रिका के प्रबंध संपादक हैं, ने कहा कि प्रभाष जी जिस रास्ते चलकर प्रभाष जोशी हुई वे रास्ते आज भी बंद नहीं हुए हैं. नौजवान पत्रकारों में ऐसे बहुत से लोग मौजूद हैं जिन्हें मौका मिले तो वे भी एक प्रभाष जोशी हो सकते हैं. अपने पिता के लेखन पर उन्होंने कहा कि जिस पत्रकार के लिखे पर इतनी चिट्ठियां आती हों कि बोरों में भरकर रखना पड़ता है, मुझे लगता है कि ऐसे पत्रकार की पत्रकारिता सफल हो जाती है. प्रभाष जी ऐसे ही सफल पत्रकार थे. प्रभाष जोशी को याद करते हुए पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि प्रभाष जी इस बात को शिद्दत से महसूस करते थे कि देश में 10-15 करोड़ लोगों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है इसलिए वे लगातार इस व्यवस्था के खिलाफ लिखते बोलते रहे.
प्रभाष जी को याद करते हुए उनके साथी पत्रकार और सहयोगी रहे रामबहादुर राय ने कहा कि लोगों को लगता है कि प्रभाष जी लोगों के प्रभाव और दबाव में आ जाते थे इसमें सच्चाई नहीं है. प्रभाष जी, किसी के प्रभाव में कभी नहीं आते थे. वे घटनाओं को घटते हुए देखते थे और उस घटना के अनुरूप अपने फर्ज का निर्धारण कर लेते थे और फिर परवाह नहीं करते थे कौन क्या कहेगा. यह वही व्यक्ति कर सकता है जिसने खुद को खोजा हो. प्रभाष जी ऐसे व्यक्तित्व थे.
प्रभाष जी को याद करते हुए रामबहादुर राय ने कहा कि वे हस्तक्षेप करनेवाले व्यक्ति नहीं थे. गैर जरूरी हस्तक्षेप तो बिल्कुल नहीं करते थे. राय साहब ने कहा कि प्रभाष जी अहं और विकार से पूरी तरह अछूते थे. हमने वो दौर भी देखा है जब जनसत्ता का डंका बजता था. उनकी जगह कोई दूसरा होता तो इतराता कि उसने यह कर दिया है लेकिन प्रभाष जी सदैव साधारण ही बने रहे. राय साहब ने कहा कि प्रभाष जी समाज सेवा, राजनीतिक परिवर्तन, व्यवस्था परिवर्तन और आखिरी चरण में लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे. राय साहब ने कहा कि उनका हर काम हमारे लिए प्रेरणादायी है.



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