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उधर दौलत की बेटी के घर जश्न, इधर दलित की बेटी पर सितम

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प्रशासन का एक साथ दो चेहरा देखिए। नोटों की माला पहनकर इतरा रही उत्तर प्रदेश की दलित मुख्यमंत्री मायावती के कारिंदे दलितों की ही इज्जत को सरेआम नंगा कर रहे हैं। दलितों का उत्पीडन और शोषण सारी हदें पार कर रहा है। मानवाधिकार आहत और खून से लथपथ है। लालती को लाठियों डंडों से इतना पीटा गया कि वो बेहोश हो गयी। उसके पूर्व जब वो हाँथ जोड़कर अपने पति और बच्चों को छोड़े जाने की भीख मांग रही थी सैकड़ों की भीड़ के बीच उसके गुप्तांगों में लाठी डालने की कोशिश की गयी। रामनरेश, बुद्धिनारायण और श्यामलाल चलने फिरने के काबिल नहीं रहे। बुद्धिनारायण का पैर लाठियों से मार मार कर तोड़ डाला गया। कुछ अरसे पहले तक जो गाँव आबाद था अब वहां चारों और शमशान सी ख़ामोशी है।

नक्सलवाद की भट्टी में निरंतर तप रहे सोनभद्र के कोन थाना अंतर्गत मगरदह  गाँव के इन दलित आदिवासियों का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने अपने बाप दादा की जमीन से वन विभाग द्वारा बार-बार खदेड़े जाने के बावजूद अपनी जमीन की हकदारी नहीं छोड़ी थी, और लगातार वन अधिकार अधिनियम के तहत उक्त जमीन पर न्यायिक हक़ देने  की मांग कर रहे थे। समाचार भेजे जाने तक मगरदाहा में आदिवासियों पर वन विभाग के द्वारा किया गए हमले और बर्बर पिटाई के खिलाफ सोनभद्र के हजारों आदिवासियों ने जिलाधिकारी कार्यालय को घेर लिया था वहीँ वन विभाग ने घायलों के साथ साथ अन्य  सैकड़ों लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा पंजीकृत दर्ज कर उनमे से कुछ को जेल भेज दिया था, जज ने ललिता समेत अन्य घायलों की चिकित्सीय जांच के आदेश दिए हैं, उधर लखनऊ  में कैमूर क्षेत्र महिला मजदूर किसान संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिव'गृह" को पत्र लिखकर इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है|

उत्तर प्रदेश में मायावती  सरकार के परदे के पीछे का सच बयां करती ये घटना सिर्फ एक घटना नहीं है बल्कि प्रदेश में दलितों के खिलाफ सरकार प्रायोजित मानवाधिकार हनन का जीता जागता नमूना है। मगरदहा के आदिवासियों को पिछले साल अगस्त  माह में पुलिस और वन विभाग ने संयुक्त  कार्यवाही कर लगभग एक हजार आदिवासियों को उनके  घरों से खदेड़ दिया था और उनके झोपड़ियों  में आग लगाकर उसे तहस नहस कर डाला था उस दौरान वनकर्मी आदिवासियों के घरों का सारा सामान भी लूट ले गए थे। उस दौरान  जिन्होंने विरोध किया उनके खिलाफ फर्जी मुक़दमे भी दर्ज कर दिए गए थे। ये सभी परिवार लगभग आठ माह तक इधर उधर भटक रहे थे। पिछले ३० नवम्बर को लगभग ४ हजार लोगों ने इसी मुद्दे पर कोन थाने का घेराव भी कर दिया था। इस बीच लगभग एक सप्ताह पूर्व ये आदिवासी जैसे तैसे छुपते छिपाते वापस अपने गाँव लौट आये और अपनी झोपड़ियाँ फिर से बनाने लगे।

मंगलवार की शाम ओबरा वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी आर. के. चौरसिया ने आदिवासियों द्वारा फिर से झोपड़ियाँ बनाये जाने की खबर मिलते ही सैकड़ों की संख्या में वन सुरक्षा बल की टीम वहां भेज दी गयी। वनकर्मियों ने वहां पहुँचते ही निहत्थे आदिवासी दलितों की बर्बर पिटाई शुरू कर दी. पुरुषों को लाठियों से पीट पीट कर बेदम कर दिया गया वहीँ महिलाओं को बाल पकड़ कर घसीट कर जबरन निकला गया। मौके पर मौजूद गाँव के बंशी ने बिलखते हुए बताया की जब ये सब हो रहा था आदिवासियों के निरीह बच्चों की चीत्कार से पूरा जंगल गूँज रहा था पर वनकर्मियों को दया नहीं आई। सब कुछ तहस नहस करने के बाद वनकर्मी लालती और तीन पुरुषों को रात में ही उठा कर ले गए। बुरी तरह से घायल होने के बाद भी किसी का चिकित्सीय परिक्षण नहीं कराया गया।

इस पूरे मामले पर प्रभागीय वनाधिकारी का कहना था कि वो जंगल भूमि पर जबरन कब्ज़ा कर रहे थे। उनके पास वन अधिकार को लेकर कोई कागज़ नहीं था, वहीँ जिलाधिकारी सोनभद्र पंधारी यादव का कहना था कि वो झारखंड और बिहार के आदिवासी थे। उनके खिलाफ न्यायसंगत कार्यवाही की गयी है। इस मुद्दे पर राष्ट्रीय वन श्रमजीवी मंच के संयोजक अशोक चौधरी ने कहा की उत्तर प्रदेश में वनाधिकार कानून के क्रियान्वन को लेकर प्रदेश सरकार गंभीर नहीं है। इस पूरे मामले में हम राजनैतिक और कानूनी दोनों तरह की लड़ाई  लड़ेंगे। समाचार भेजे जाने तक पुरे जनपद में इस पूरे  मामले को लेकर आदिवासियों का आक्रोश चरम पर था, वन क्षेत्र में अवैध खनन को लेकर सुर्ख़ियों में आये ड़ीऍफ़ओ के साथ साथ जिलाधिकारी के स्थानान्तरण को लेकर तमाम संगठनों ने आवाज बुलंद की थी।

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Priya Ranjan on 18 March, 2010 16:39;17
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ज़रा यह लेख मायावती के समर्थक भांडों (सॉरी पत्रकारों), जिनमे से कुछ विस्फोट पर भी हैं, को भी पड़ा दीजिये. बहुत दुःख और क्रोध होता यह सब देख कर.
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shikha varshney on 18 March, 2010 18:12;17
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क्यों पढ़ाते हैं ये सब आवेश ? ! अपने आप से घृणा सी होने लगती है ...क्या करेंगे हम ? यही लिखेंगे न यहाँ ...उफ्फ्फ्फ़, ..बहुत त्रासद है ये सब...या कब ख़तम होंगी ये नाइंसाफियां , ये अत्याचार? क्या होगा ये सब लिखकर?क्या सुधरने वाला है कुछ ?
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शहरोज़ on 18 March, 2010 22:46;34
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शिखा जी ने सही कहा और प्रिय रंजन से भी सहमत!!
साथी भले हम कुछ नहीं कर सकते उनके साथ खड़े तो हो ही सकते हैं जो दमित हैं पीड़ित हैं...
चाहे धर्म के नाम पर हो या जाति के नाम पर ये सभी दल बाज़ार के हाथ खिलौने हैं...
इनका कोई न सिद्धांत है न विचार..

मैं इन्हें हमेशा ही प्रतिक्रियावादी कहता हूँ.......
अगर ये सब किसी गैर बसपाई शासन में हुआ होता तब देखते इनकी क्रिया प्रति क्रिया
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Ajit on 19 March, 2010 01:26;38
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सिर्फ यही कहूँगा, मालामूर्ति का क्या होगा ये तो आप सब देखेंगे, जिस तरह सद्दाम हुसैन का दुनिया ने देखा लेकिन जिस तरह एनी लोग भी शांत है इस प्रकरण पर सारे समाजसेवी राजनेता और तथाकथि पत्रकार (जिनमे से कुछ विस्फोर पर भी है ) उसे देखकर बस यही याद आता है..

"समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध "

जलते घरो को देखने वालो, फूस का छप्पर आपका है
आग के पीछे तेज हवा है और मुकद्दर आपका है
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ravishankar vedoriya on 20 March, 2010 16:47;35
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leke se ye to saaf nazar atta hai ki is ko likhkar u p sarkar ki kamiya ujagar hoti hai lekin keval lek dene se samasya hal nahi hoti iskliya to hame sarkar ke alawa bhi aage aana hoga
sakare to hoti hai keval satta sambhalne ke liya wahi ham apne se kitna is ko hal kar sake
vande matram
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rakesh agrahari on 24 April, 2010 12:58;29
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aweshji aapki khabar ka asar kab hoga.shikhaji aawesh sir ne jo likha ushe sochte to bhut log hai.per likhny ki takat hona kbhi to kranti jarur layegi.next time meri dhamakedar khabre ..
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image awesh tiwari मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है | विगत २ वर्षों से लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित 'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट ' में ब्यूरो प्रमुख। awesh29@gmail.com
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