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समझौते को सार्वजनिक करें मोदी

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टाटा मोटर्स और गुजरात सरकार के बीच नैनो कार बनाने के लिए हुए समझौते का केवल विरोध के लिए विरोध करना उचित नहीं है। लेकिन गुजरात और देश की जनता को ये जानने का हक है कि ये समझौता क्या है। यानी लखटकिया कार बनाने के लिए गुजरात की जनता को क्या कीमत चुकानी होगी। वैसे रतन टाटा नैनो को बंगाल से बाहर करने के लिए ममता बनर्जी को चाहे जितना गाली दे लें लेकिन ये तय है कि नैनो परियोजना के बंगाल से बाहर चले जाने से बंगाल के खजाने को करोड़ों रुपए का चूना लगने से बच गया है।

साफ है टाटा गुजरात की जनता का भला करने के उद्देश्य से तो सानंद में फैक्टरी लगाने गए नहीं है इसके लिए उन्होंने गुजरात सरकार से कई ऐसी सहूलियतें मनवाई होंगी जिसका भुगतान गुजरात की जनता को सालों तक अपनी जेब से करना होगा।

ये कोरा आरोप नहीं है। बंगाल सरकार के साथ नैनो परियोजना के लिए टाटा समूह के साथ समझौते को ध्यान से देखें तो ये परियोजना बंगाल के हित में हरगिज नहीं था। वैसे इस समझौते का पूरा प्रारूप सामने नहीं आ पाया है क्योंकि टाटा समूह नहीं चाहता है कि उसके और बंगाल सरकार के बीच हुआ समझौता जनता के सामने आए। दरअसल जब सूचना के अधिकार के तहत जब समझौते की शर्तों के बारे में जानकारी मांगी गई तो खुद टाटा समूह ने कोलकाता हाईकोर्ट से पश्चिम बंगाल सूचना आयोग के खिलाफ इस समझौते को सार्वजनिक न करने का स्टे ले लिया। सवाल ये है कि आखिर टाटा समूह क्यों नहीं चाहता था कि उसके और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच हुए समझौते को सार्वजनिक किया जाए। इस सप्ताह जब मोदी और रतन टाटा ने पूरे तामझाम के साथ देश को बताया कि नैनो अब गुजरात में बनेगी और इसके लिए राज्य सरकार और टाटा के बीच बाकायदा एक समझौते पर हस्ताक्षर किया गया है। लेकिन मजेदार बात ये है कि इस समझौते के बारे में विस्तार से किसी ने कुछ नहीं बताया। आखिर क्यों ? समझौते के प्रारूप के बारे में इस खामोशी का राज क्या है ?

इसका जवाब आपको मिलेगा पश्चिम बंगाल सरकार और टाटा के बीच हुए समझौते की शर्तों से जिसके सार्वजनिक होने से रोकने के लिए टाटा हाईकोर्ट का स्टे आर्डर ले आए थे। पश्चिम बंगाल सरकार के साथ समझौते का जो सच बाहर आ पाया है वो काफी चौंकानेवाला है। समझौते अनुसार इस परियोजना को शुरू करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने टाटा समूह को 200 करोड़ रूपए का ऋण दिया वो भी एक प्रतिशत के ब्याज दर पर। इस ब्याजदर पर तो पश्चिम बंगाल सरकार किसानों और भूमिहीन मजदूरों को भी ऋण नहीं देती है। मजेदार बात ये है कि टाटा मोटर्स इस ऋण की पहली किस्त 21 साल बाद राज्य सरकार को वापस करेगी। यदि टाटा मोटर्स इस 200 करोड़ रुपए को फिक्स्ड डिपोजिट कर दे तो भी 21वें साल तक वो इसके ब्याज के रूप में ही 2000 करोड़ रुपए कमा लेगा। जरा सोचिए ब्रिटेन की स्टील कंपनी कोरस को 35,000 करोड़ रुपए में खरीदने वाले टाटा समूह को ये रियायत क्यों दी गयी?

आगे बढिए। टाटा समूह को सिंगूर में राज्य सरकार ने 647 एकड़ जमीन 90 साल की लीज पर दिया, लेकिन शुरूआती तीस साल के लिए लीज की रकम के रुप में बंगाल सरकार ने लिया केवल एक करोड़ रुपए। यानी कोलकाता से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर 1300 रुपए प्रति एकड़ से कम कीमत में टाटा को जमीन दे दी गई थी। ये तो खैर एक बार का खर्च है। यदि नैनो बंगाल में लग जाता तो राज्य सरकार को करोड़ रुपए टाटा को देने पड़ते। दरअसल बंगाल सरकार ने टाटा मोटर्स को मात्र तीन रुपए प्रति यूनिट की दर बिजली सप्लाई करने का वादा किया था, जबकि बंगाल में बिजली की वर्तमान दर 4.15 रुपए है। इसके अलावे ये भी कि यदि अगले पांच सालों में बिजली की दर में 25 पैसे से ज्यादा की बढ़ोतरी होती है तो उसकी भरपाई बंगाल सरकार अपने खजाने से करेगी। इसके साथ है बंगाल सरकार ने टाटा समूह से ये भी बायदा किया था कि राज्य में बिकने वाले नैनो पर जो सेल्स टैक्स या वैट वसूला जाएगा उसे राज्य सरकार टाटा समूह को वापस कर देगी। जाहिर इन्हीं तरह की शर्तों के कारण टाटा समूह नहीं चाहता था कि पश्चिम बंगाल सरकार के साथ हुआ उसका समझौता सार्वजनिक है।

जाहिर है गुजरात सरकार के साथ भी टाटा मोटर्स का समझौता कुछ इसी तरह का रहा होगा। अपने लिए विकास पुरूष शब्द पसंद करनेवाले और गुजराती अस्मिता के रक्षक कहलाने वाले नरेंद्र मोदी पर जिम्मेदारी बनती है कि वो इस समझौते को सार्वजनिक करें और जनता को बताएं कि नैनो कार गुजरात में  बनने से राज्य की जनता को क्या लाभ होगा? यदि मोदी और टाटा इस समझौते को सार्वजनिक करने से कतराते हैं तो क्या गुजरात की जनता को सचेत नहीं हो जाना चाहिए?   

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rajkumar singh on 10 October, 2008 20:20;11
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bilkul.pooree pardarshita jarooree hai.anivarya bhee.
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नकुल on 10 October, 2008 20:20;16
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एक सुन्दर सी इमारत बनी और वहां से एक चींटीं गुजरी. वह चींटीं उस सुन्दर इमारत में दरार खोजने लगी.

कुछ लोग तो हमेशा हर जगह दरार ही खोजते रहते हैं

खोजते रहिये. शायद ये समझौता गोविन्दाचार्य को पसन्द नहीं आया है
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sanjay tiwari on 10 October, 2008 20:31;56
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जेएनयू में मेस में खाना ठीक नहीं बनता तो प्रगतिशील लोग नारा लगाते हैं जार्ज बुश मुर्दाबाद, इम्पेरिलिज्म डाउन-डाउन. आपका भी कमेन्ट जेएनयू के आंदोलनकारी जैसा है.
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अमित on 10 October, 2008 22:14;57
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मैं आपसे ही पूछता हूं कि क्यों भारत का हर राज्य टाटा को, लगभग इन्हीं शर्तों पर बुलाने को लालायित था? क्या आप कह रहे हैं कि टाटा इन मुख्यमंत्रियों को घूस दे रहा है? या फिर कि इन सभी नेताओं को पागलपन का दौरा पड़ा है?
या फिर हो सकता है कि टाटा के आने से जो रोज़गार के अवसर बनेंगे, वो इन रियायतों के बाद भी राज्य को फायदा करायेंगे? एक संभावना पैदा होगी कि टाटा के पीछे पीछे दूसरी कार कंपनियां भी खिंची आयें, बगैर किसी रियायत के? टाटा गुजरात में सिर्फ नैनो ही न लगायें, बल्कि आगे और भी निवेश करें, शिक्षा संस्थायें शुरु करें?

समझौता सामने आना चाहिये, ठीक बात है। लेकिन आप सिर्फ बुरा ही क्यों देख रहे हैं? उपरोक्त प्रश्नों पर भी तो विचार करें।
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Bhavana on 11 October, 2008 09:49;33
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mujhe lagta hai ki janta ka bhala koi nahi chahta chahe woh Ratan Tata ho ya Modi dono ke apne apne faayede hain...
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parshuram on 11 October, 2008 11:00;42
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Dear writer
Will all the answer TATA give to you. Why TATA why not Ambani in Dadari, Vedera (Sonia's son in law) in haryana, M&M in Mharashtra, etc.
Actully the communist writers are not able to digest that Modi ji win the NANO project for gunjrat.
Every thing is fine when TATA is in WB but in gujrat, govt. and TATA has to give answer for communist payroll writers.
Disgusting.
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tulsisinghbisht@gmail.com on 11 October, 2008 18:32;10
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टाटा की नैनो धीरे-धीरे काफी चर्चा का विषय बनती जा रही है। जहां अमरीका का शेयर बाजार डूब रहा है तो वही टाटा की नैनो ने भारत में धमाल कर रखा है। बंगाल से टाटा को निराशा हुई तो फिर मीडिया वाले रतन टाटा के पीछे ही पड़ गए कि अब कहां से नैनो निकलेगी। ममता ने बंगाल से टाटा को बाहर निकाला तो मेरे हिसाब से बिल्कुल ठीक किया। वहां के किसानों को लगा कि रतन टाटा द्वारा उनकी जमीन का पूरा मुआवजा मिलेगा या नहीं और कुछ किसान अपनी जमीन बेचने को तैयार नहीं थे। शायद कोई न कोई बात बंगाल में जरूर होगी, जिससे वहां के किसान रतन टाटा से खुश नहीं थे। अब नरेन्द्र मोदी द्वारा गुजरात में रतन टाटा को आमंत्रित करना और जमीन देना। इन सबका पूरा खुल्लासा होना चाहिए। अब इस लेख में नीलू जी द्वारा रतन टाटा का चिठ्ठा खोला गया है जो काबले तारीफ है और उन्होंने लिखा है कि गुजरात सरकार ने जो ये समझौता किया है उसका पूरा ब्यौरा जनता को दें।
माना हर सरकार अपने क्षेत्र में उद्योगिक घरानों को जगह देती है ताकि उनके क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न हो और उस सरकार का वोट बैंक भी बढ़े। अब रतन टाटा कितने लोगों को नैनो प्रोजेक्ट में काम देते है या कितने किसानों का भला करते है ये तो नरेन्द्र मोदी जी को बताना ही होगा।
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amarnath on 12 October, 2008 21:40;45
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yeh to apko tai karana hi hoga ki aapko kitani car chahiye aur kitana anaj? car ko chalane ke liye phir petrol chahiye aur arab desho se petrol kharidane ke liye jitane rupaye ki jaroorat hogi woh bhi to usi anaj ki paidwar se ani hai. yad rakhe ki hamare kheto me upajane wali anaj ke har dane se desh ki buniyady sampada me badhotari hoti hai, car ka utpadan hone se TaTa amir hota hai aur desh ke khajane per adhik petrol kharidne ka dabav badhata hai. faisala to kare aap? mahaj Govindacharya Thahara dene ya phir comunist kahane se Bharatmeta ke bhabhav-haran ke abhiyan kab tak apana sarvasv gavate rahenge aap?
amarnath
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satyajeet on 16 October, 2008 23:20;29
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समझदारी की बात है, पश्चिम बंगाल सरकार ने जितना लोभ दिया, उससे ज्यादा लालच मोदी ने दिया होगा. वैसे आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र की सरकारों ने इससे भी ज्यादा देने की कोशिश की, लेकिन टाटा गुजरात चले गए, तभी तो मोदी की बात में दम लगता है कि टाटा पैसों के पीछे नहीं भागते बल्कि विश्वास देखते हैं और गुजरात ने उन्हें यह भरोसा दिया.
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Ratan singh on 19 October, 2008 23:13;13
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हो सकता विस्फोट के आरोप ग़लत हों लेकिन समझोता सार्वजनिक करने में क्या बुराई है आख़िर देश की जनता को उद्योगपतियों ओर नेताओं के बीच हुए समझोते के बारे में जानने का पुरा हक़ है |
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