यह बच्चा खूंखार नक्सली है और वह नक्सली महिला जानवर
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18 अप्रैल 2001 को बांग्लादेश राइफल्स ने भारतीय जवानों पर हमला करके बीएसएफ के 15 जवानों को कत्ल कर दिया था. उसके बाद जानवरों की तरह उनकी लाश को ढोकर भारतीय सुरक्षा एजंसियों के हवाले किया गया था. उस वक्त उस चित्र को देखकर दोनों देशों के बीच आपसी तनाव बहुत बढ़ गया था. लेकिन नौ साल बाद नक्सलवादियों से लड़ाई के बाद भारतीय सुरक्षा दस्ता भी वैसा ही व्यवहार कर रहा है.
गुरुवार को देशभर के अखबारों में एक खबर छपी है कि लालगढ़ में सुरक्षा बलों ने नक्सलवादियों से लड़ाई में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. सुरक्षा बलों ने 12 नक्सलियों को मार गिराया है. निश्चित रूप से नक्सलवाद से लड़ाई में सुरक्षा बलों को यह अच्छी सफलता है लेकिन खबरों के साथ जो चित्र छपे हैं वह भारतीय सुरक्षा बलों के ऊपर सवालिया निशान लगाता है.
एक ओर हमारे गृहमंत्री नक्सलवाद से निर्णायक लड़ाई की बात करते हुए भी नक्सलियों और माओवादियों से बातचीत का रास्ता खुला रखने की वकालत करते हैं. सत्ता प्रतिष्ठान में शीर्ष पर बैठे लोग भी मानते हैं कि नक्सलियों से आप उस तरह से नहीं निपट सकते जिस प्रकार से आतंकवादियों से. लेकिन बुधवार को सुरक्षा बलों ने जिस प्रकार से मृत "नक्सलियों" की लाशों के साथ व्यवहार किया उससे भारतीय सुरक्षा बलों के व्यवहार पर सवालिया निशान खड़ा होता है. न केवल पुरुष नक्सलियों की लाशों के साथ ऐसा व्यवहार किया गया बल्कि तथाकथित तीन महिला नक्सलियों की लाशों को भी जानवर की तरह ढोकर वहां से ले जाया गया.
पुलिस का कहना है कि ये नक्सली लालगढ़ के जंगलों में प्रशिक्षण शिविर चला रहे थे और मुटभेड़ के बाद घटनास्थल से दो एके-47, दो मैग्जीन, दो इंसास, दो कारबाइन, एक पिस्टल, एक डबल बोर का पिस्टल, चार लैंडमाइंस, पांच 12 बोर की राइफल और डेटोनेटर बरामद हुए हैं. और हां, एक घायल नक्सली को पकड़ा भी गया है. आप भी चित्र देखकर उस 'घायल नक्सली' के खूंखारपने का अंदाजा लगा लीजिए. दिल्ली में बैठे नौकरशाह और नेता चाहे जो दावा करें लेकिन ये चित्र कुछ और ही चित्र सामने प्रस्तुत कर रहे हैं. यह चित्र देखकर कारगिल का युद्ध याद आता है जब भारतीय सेना ने दुश्मनों की लाशों को भी सम्मान के साथ दफन किया था.



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जिन्दा लोगों की तलाश!
आपको उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की इस तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को हो सकता है कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।
आपको उक्त टिप्पणी प्रासंगिक लगे या न लगे, लेकिन हमारा आग्रह है कि बूंद से सागर की राह में आपको सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी आपके अनुमोदन के बाद प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप को सारथी बनना होगा। इच्छा आपकी, आग्रह हमारा है। हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी जिनमें हो, क्योंकि भगत ने यही नासमझी की थी, जिसका दुःख आने वाली पढियों को सदैव सताता रहेगा। हमें सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह और चन्द्र शेखर आजाद जैसे आजादी के दीवानों की भांति आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने वाले जिन्दादिल लोगों की तलाश है। आपको सहयोग केवल इतना भी मिल सके कि यह टिप्पणी आपके ब्लॉग पर प्रदर्शित होती रहे तो कम नहीं होगा। आशा है कि आप उचित निर्णय लेंगे।
समाज सेवा या जागरूकता या किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को जानना बेहद जरूरी है कि इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम होता जा है, बल्कि हो ही चुका है। सरकार द्वारा जनता से हजारों तरीकों से टेक्स (कर) वूसला जाता है, देश का विकास एवं समाज का उत्थान करने के साथ-साथ जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों द्वारा इस देश को और देश के लोकतन्त्र को हर तरह से पंगु बना दिया गया है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, व्यवहार में लोक स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को भ्रष्टाचार के जरिये डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने अपना कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। ऐसे में, मैं प्रत्येक बुद्धिजीवी, संवेदनशील, सृजनशील, खुद्दार, देशभक्त और देश तथा अपने एवं भावी पीढियों के वर्तमान व भविष्य के प्रति संजीदा लोगों से पूछना चाहता हँू कि केवल दिखावटी बातें करके और अच्छी-अच्छी बातें लिखकर क्या हम हमारे मकसद में कामयाब हो सकते हैं? हमें समझना होगा कि आज देश में तानाशाही, जासूसी, नक्सलवाद, लूट, आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका एक बडा कारण है, भारतीय प्रशासनिक सेवा के भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरों द्वारा सत्ता मनमाना दुरुपयोग करना और कानून के शिकंजे बच निकलना।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)- के सत्रह राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से मैं दूसरा सवाल आपके समक्ष यह भी प्रस्तुत कर रहा हूँ कि-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! क्या हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवक से लोक स्वामी बन बैठे अफसरों) को यों हीं सहते रहेंगे?
जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहे उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्त करने के लिये निम्न पते पर लिखें या फोन पर बात करें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666, E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
दुश्मनी जिंदा इंसान से होती है, लाश को सूअर की तरह बेईज्ज़त करना हमारी संस्कृति नहीं है. और देशभक्त होने का यह मतलब नहीं है की हम सुरक्षा बालों की ज्यादतियों को नज़रंदाज़ करें और उनकी हिमायत करें.
भूल गए गुजरात, कौन भूलेगा गुजरात !?
कथनी और करनी में फर्क समझना है और बचाल के सिद्धांत पर शोध आदि करना है तो इनकी संस्कृति को समझने से बढिया और दूसरी कोई सामग्री दुनिया में मौजूद नहीं है.
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