मानसून की मार से याद आयी परंपरागत खेती
मानसून में देरी से हिली सरकार ने तमाम तरह के राहत इंतजामात का ऐलान किया है। लेकिन हकीकत ये है कि ये इंतजाम ना सिर्फ फौरी हैं, बल्कि लोकलुभावन ज्यादा हैं। किसी का ध्यान अपनी पारंपरिक और सतत विकास वाली खेती की ओर नहीं है।
उत्तर भारत में मानसूनी दस्तक की देर ने प्रधानमंत्री कार्यालय तक को हिलाकर रख दिया है। इसकी वजह भी है। उदारीकरण की तमाम घोषणाओं के बावजूद आज भी करीब सत्तर करोड़ लोगों की जीविका खेती पर ही निर्भर है, यानी देश की आधी से ज्यादा आबादी का आसरा एक मात्र खेती ही है। लेकिन इस हायतौबा के बीच ये बात कहीं छुप सी गई है कि साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति वाली खेती पर सबसे ज्यादा असर पड़ने वाला है। अधिक अन्न उपजाओ और हरित क्रांति तब की जरूरत थी, लेकिन उसने जिस तरह से प्रकृति से खिलवाड़ किया और स्वाभाविकता के खिलाफ जाकर खेती-किसानी की नींव डाली, उसका ही असर है कि इन दिनों हायतौबा ज्यादा मची हुई है।
मानसूनी दगाबाजी ने उन किसानों को अपनी पुरानी खेती की याद शिद्दत से आने लगी है, जो साठ के दशक से पहले ही जवान हो चुके थे। उन्हें पता है कि आज की खेती को पानी और रासायनिक खाद की ज्यादा जरूरत है, बनिस्बत उनके पिता की खेती के दौर के। लेकिन नीति-नियंताओं के स्तर पर यह समझने की कोशिश ही नहीं की जा रही है कि आज जो हायतौबा मची हुई है, उसका विकल्प पारंपरिक खेती-किसानी में पहले से ही छुपे हैं। हरित क्रांति के दौर में शुरू हुई खेती जैसे-जैसे आगे बढ़ी है, पानी और रासायनिक खाद की उसकी मांग उतनी ही तेजी से बढ़ी है। अगर ऐसा नहीं होता तो पांच नदियों के पानी से लबालब रहने वाले पंजाब में आज भूमिगत जल का स्तर चार सौ फीट से भी नीचे नहीं चला जाता। जहां तक रासायनिक खादों की बात है तो आज हालत ये है कि सरकार को हर साल रासायनिक खाद पर करीब चालीस हजार करोड़ की सब्सिडी देनी पड़ रही है।
आज मध्यवय में पहुंची पीढ़ी को भी याद होगा कि बीस-पंद्रह साल पहले तक जून की शुरूआत में ही उन इलाकों में भी धान की नर्सरी तैयार नहीं की जाती थी, जो धान की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन हरित क्रांति और बाद में डंकेल प्रस्तावों के बाद बहुराष्ट्रीय बीज निगमों के लिए बाजार खुलने के बाद से आई खेती क्रांति ने जून की तपती दोपहरी में ही धान की नर्सरी लगाने की परिपाटी शुरू कर दी। जो पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश गेहूं की पैदावार के लिए जाना जाता था, वहां धान की खेती भी उतनी ही तेजी से फैली। लिहाजा भूमिगत पानी को तपती जून में निकालने की परिपाटी बढ़ी। कोढ़ में खाज ये कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विकसित बीजों के लिए पानी की जरूरत भी ज्यादा पड़ती है। नतीजा सामने है। आज इन इलाकों में लोग पानी के लिए तरस रहे हैं। शायद ही कोई साल हो, जब पानी के लिए दिल्ली, पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों के बीच तलवार नहीं खिंचती, यहां के लोग सड़कों पर नहीं निकलकर अपना गुस्सा जाहिर नहीं करते।
साठ के दशक में भारत को खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ा था। तब लालबहादुर शास्त्री ने अमेरिका का सड़ा गेहूं खरीदने की बजाय देसी और कठिन रास्ता चुना था, सोमवार की शाम अन्न ना खाने का। इसके बाद ही एम एस स्वामीनाथन की अगुआई में देश को हरित क्रांति की जिम्मेदारी सौंपी गई। स्वामीनाथन की अगुआई में आई हरित क्रांति ने देश के भंडारों को अनाज से भर दिया। ये सब पारंपरिकता की कीमत पर हुआ, लिहाजा मानसूनी दगाबाजी पर देश की वह सरकार भी हिलने लगती है, जिसके लिए खेती की बनिस्बत उदारीकरण और पश्चिमीकरण ज्यादा मायने रखता है। मनमोहन सिंह ने ही 1991 में वित्त मंत्री रहते उदारीकरण की दिशा भारत के दरवाजे खोले थे। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक तब 11 करोड़ 70 लाख लोग सीधे खेती से जुड़े थे। लेकिन उदारीकरण की आंधी में यह संख्या घटकर 10 करोड़ 26 लाख रह गई। इस समय सरकारी अनुमान है कि यह संख्या नौ करोड़ से भी कम हो गई है। आज जिस तरह की खेती हो रही है, उसकी लागत जितनी है, उतनी कमाई नहीं है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक आज इस नौ करोड़ लोगों में से भी 54 प्रतिशत लोग खेती से पिंड छुड़ाने के लिए तड़फड़ा रहे हैं। जबकि इन्हीं नौ करोड़ लोगों पर सतर करोड़ लोगों की जीविका जुड़ी हुई है। उदारीकरण के दौर में देश ने औद्योगिक खेती को भी अपनाया। लेकिन नमूना सर्वेक्षण ही मानता है कि पिछले सात साल में जिन 25 हजार किसानों ने आत्महत्या की, उसके पीछे औद्योगिक और आधुनिक कही जाने वाली खेती का सबसे बड़ा हाथ है।
यह उस देश की हालत है, जहां कहावत ही कही जाती थी – सुख चाहो तो करो खेती। लेकिन आज खेती किसानी की हालत यह है कि अब यह कहावत ऐसी लगती है कि दुख चाहो तो करो खेती. इस आधुनिक खेती ने पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाया है, इसका नमूना हैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के भूमिगत जल स्रोत की जांच रिपोर्टें, जिनके मुताबिक अधिकांश जगहों का पानी आर्सेनिक से दूषित हो गया है और पीने लायक तो कतई नहीं रहा। शायद यही वजह है कि इस आधुनिक खेती के अगुआ रहे एम एस स्वामीनाथन भी हरित क्रांति की जगह एवरग्रीन रिवोल्यूशन यानी सतत हरित क्रांति की वकालत करने लगे हैं। यानी वे भी मानने लगे हैं कि हरित क्रांति ने देश की भूख मिटाने में भले ही मदद की, लेकिन पर्यावरण को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है।
मानसूनी दगाबाजी ने एक बार फिर से इसी समस्या की ओर ही ध्यान दिलाने की कोशिश की है। लेकिन प्रकृति के संकेतों को अब भी समझने में भूल की जा रही है। सरकार का ध्यान अब भी फौरी उपायों पर ही ज्यादा है। जबकि जरूरत सबसे ज्यादा दीर्घकालीन उपायों को आजमाने की है। हमें धीरे-धीरे ही सही अपनी पारंपरिक खेती पर आधारित नई किसानी की ओर लौटना होगा। जिसमें पारंपरिक जैविक खादों के साथ आधुनिक भारतीय परिवेश के मुताबिक बीज और खाद का इस्तेमाल होगा। दरअसल ये सीमित और उपलब्ध संसाधनों में की जाने वाली खेती होगी, जिसमें प्रकृति की स्वाभाविक राह में कम से कम रोड़ा बना जाएगा, उसके चक्र में कम से कम हस्तक्षेप होगा। इतना ही नहीं, जैविक तौर पर भूमि और प्रकृति से जो लिया जाएगा, उसे उसी अनुपात में प्राकृतिक तौर पर वापस भी कर दिया जाएगा। तभी मानसूनी दगाबाजी से हम ज्यादा परेशान नहीं होंगे। तब स्वामीनाथन का एवरग्रीन रिवोल्यूशन या सतत हरित क्रांति का भी सपना पूरा होगा। जिसकी कल्पना उदारीकरण के शुरूआती दौर से ही सुंदरलाल बहुगुणा, राजेंद्र सिंह और अनुपम मिश्र जैसे अनगिनत पर्यावरण प्रेमी करते रहे हैं। जिन्हें उदारीकरण की राह में रोड़ा माना जाता रहा है। हालांकि ये इतना आसान भी नहीं है। उदारीकरण के दौर में वैसे ही किसान परेशान हैं। परंपरा आधारित आधुनिक खेती के चलते किसानों को उपज में शुरूआती गिरावट का सामना भी करना पड़ सकता है। हाल ही में जैविक खेती अभियान पर आयोजित एक कार्यक्रम में ये चिंता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता अतुल कुमार अनजान और आंध्रप्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव और जैविक खेती अभियान से जुड़े रहे के यादवरेड्डी ने भी जताई थी। जाहिर है, शुरूआती दौर में किसानों को सीधे सरकारी सहायता की जरूरत होगी। तभी मानसूनी दगाबाजी को झेलते हुए हम देश की इतनी बड़ी जनसंख्या की भूख भी शांत कर सकेंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि माल संस्कृति के इस दौर में ये आवाज कितनी शिद्दत से सुनी जाती है।
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