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चंबल घाटी में लौट रहे हैं गिद्ध

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चंबल घाटी से डाकू और गिद्ध लगभग एक साथ ही गायब होना शुरू हुए. डाकुओं के कम होते असर ने निश्चित रूप से चंबल घाटी के लोगों को राहत दी होगी लेकिन गिद्धों की कमी ने स्थानीय नागरिकों को परेशान कर दिया था. लेकिन एक अच्छी खबर है. वन विभाग के ताजा सर्वे में एक बात उभरकर सामने आयी है कि चंबल घाटी में गिद्ध लौटने लगे हैं. दिनेश शाक्य की विशेष रिपोर्ट-

आम जनमानस में सफाई कर्मी के रूप में प्रचालित गिद्धों के ऊपर संकट 1990 के बाद से शुरू हुआ. इन पर संकट आने की मुख्य वजह अभी तक पशुओं के लिये इस्तेमाल की जाने वाली दर्द निवारक दवा डाक्यलोफेनिक है जिसके वेजा प्रयोग ने गिद्धों की प्रजाति को नुकसान पंहुचाया. चंबल में इससे पहले 2003 तक गिद्दों की तीन प्रजातियों को देखा जाता रहा है, इनमें लांगबिल्डबल्चर, वाइटबैक्डबल्चर, किंगबल्चर है,जो बड़ी तेजी से विलुप्त हुये जब कि इजफ्सियनबल्चर लगातार देखे जाते रहे है, इनके उपर किसी तरह का प्रभाव नजर नहीं आया.

गिद्ध आम तौर पर मरे हुये शवों की गंदगी को खाकर प्राकृतिक रूप से सफाई कर्मी का काम करते है और इनसे फैलने वाली बीमारियों को रोकने में मदद करते है. इसलिये गिद्ध पारिस्थित तंत्र की वो कड़ी है, जो हमें काफी सुरक्षा प्रदान करती है ऐसे में गिद्धो की वापसी प्राकृतिक रूप से एक शुभ संकेत ही माना जायेगा. इटावा ओर आसपास के इलाके मे ंकाम कर रही पर्यावरणीय संस्था के सचिव डा.राजीव चौहान ने चंबल में वन्य जीवों के सर्वे के दौरान इन गिद्धों को देखा उसके बाद चंबल इलाके से कई स्थानों पर गिद्धों के देखे जाने की खबरे मिलने लगी है.

गिद्ध को प्रकृति द्वारा प्रदत्त सफाईकर्मी माना जाता है। जानवरों और इंसानों के सड़ते हुए उन शवों को यह अपना निवाला बनाता है जिनसे दुर्गंध आती है और वातावरण प्रदूषित होता। इतना ही नहीं शवों पर बैठने वाली जो मक्खियां विभिन्न वायरसों को इंसान के शरीर तक पहुंचाने वाली मक्खियों को भी यह अपने आहार में षामिल कर लेता है। गिद्ध की संख्या में जिस तेजी से गिरावट आई उसने केंद्र सरकार को भी चिंता में डाल दिया। गिद्ध के संरक्षण की दिशा में काम कर रही वर्ल्ड कंजर्वेशन यूनियन की पहल के बाद वर्श 2002 में इसे वन्य जीव अधिनियम के तहत इसके शिकार को प्रतिबंधित करते हुए इसे शेड्यूल वन का दर्जा दिया गया।

अस्सी के दशक में एशिया के देशों में गिद्धों की सर्वाधिक संख्या भारत में ही थी। किए गए शोध के मुताबिक भारत, नेपाल और पाकिस्तान में गिद्धों की संख्या सिमट कर महज तीन हजार रह गई है। जबकि अस्सी के दशक में गिद्धों की संख्या साढ़े आठ करोड़ थी। गिद्धों के अस्तित्व पर संकट लाने का सर्वाधिक श्रेय डायक्लोफिनेक नामक दवा को है। जानवरों के जिस्म में उठने वाले दर्द को मिटाने के लिए पशुपालक इस रसायन का प्रयोग करते हैं। इस रसायन का सेवन करने के बाद होने वाली पशु की मौत के बाद शव को खाने से गिद्ध के शरीर से इस रसायन के चलते यूरिक एसिड नहीं बनती है और परिणामस्वरूप गिद्ध की किडनी नाकाम हो जाती है और वह दम तोड़ देता है।

ताज्जुब यह है कि पिछले एक दशक के दौरान ही गिद्ध की संख्या में अप्रत्याशित रूप से 99 फीसदी की गिरावट आई है। इतना ही नहीं गिद्धों की संख्या दिन ब दिन कम होती गई और हम यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। मुंबई की संस्था बांबे नेचुरल इंस्टीट्यूट को गिद्धों की मौत के बारे में जानकारी हासिल करने में ही पूरा एक दशक का वक्त लग गया। अब गिद्ध को बचाने के हमारी पहल क्या कामयाब हो सकेगी यह तो तभी मुमकिन हो सकेगा जब बाजार से डायक्लोफिनेक का स्टॉक पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए। अन्यथा तो खेतों में, सड़क किनारे पड़े रहने वाले पिंजर मानवीय जीवन को खतरा पहुंचाते हुए पर्यावरण को प्रदूषित करते रहेंगें।यही कारण है कि नब्बे के दशक में गिद्ध की संख्या में अप्रत्याशित कमी आई। प्रकृति के सबसे बड़े एडवेंचर समझे जाने वाले गिद्ध को बचाने के नजरिये से कुछ राज्यों ने डायक्लोफिन के प्रयोग पर रोक लगाई जो नाकाफी है। इसकी बजह है कि भारत सरकार की एजेंसियों और कृषि मंत्रालय की एनीमल हसबैंडरी को इस दवा पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रधानमंत्री के आदेशों की जरूरत है। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सरकार गिद्धों के अस्तित्व को बचाने के लिए पहल करे तो डायक्लोफिन को प्रतिबंधित करे क्योंकि इसके विकल्प के रूप में  देश के पास मैलोक्सिकैम का विकल्प मौजूद है। पष्चिमी देषों में इसके सफलतापूर्वक प्रयोग भी सामने आये हैं। हालांकि यह रसायन डायक्लोफिन की अपेक्षाकृत थोड़ा मंहगा तो पड़ता है, परंतु प्रकृति की इस अभूतपूर्व देन को जिंदा रखने के लिए यह कदम तो उठाने ही होंगें।

हालांकि पर्यावरण से जुड़ी तमाम संस्थाएं अब गिद्ध को बचाने के लिए सामने आईं हैं। इतना ही नहीं हरियाणा सरकार ने भी पर्यावरण मंत्रालय के साथ मिलकर पिंजौर में पहला बल्चर कंजर्वेशन ग्रेडिंग सेंटर की स्थापना की है। इसके साथ ही गिद्ध को संरक्षित करने के लिए पष्चिमी बंगाल के बक्सा में भी इसी प्रकार के संेटर की स्थापना की गई है, परंतु महज इस प्रयास से गिद्ध को बचा पाना आसान होगा, कहना मुश्किल है। इसकी बजह है कि गिद्ध एक बार में सिर्फ एक ही शिशु को जन्म देता है इसलिए एक दशक पूर्व वाली स्थिति में आने में गिद्ध को एक कठिन लड़ाई लड़नी होगी।

जानकार बताते हैं कि जिस तेजी के साथ बल्चर गायब हुआ ऐसा अभी तक कोई जीव गायब नहीं हुआ। महज दवा के प्रचलन ने ही इस जीव पर संकट खड़ा कर दिया है। आश्यर्यजनक यह है कि गिद्धों के अस्तित्व को मिटाने वाली यह डायक्लोफिनेक दवा आसानी से खुले बाजार में मौजूद है। इस दवा के प्रचलन का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि भारत में डायक्लोफिनेक दवा को पच्चीस बड़ी कंपनियां बनाती हैं और इसका प्रतिवर्श का बीस करोड़ रूपये से अधिक का कारोबार है। हालांकि प्रधानमंत्री ने 17 मार्च, 2005 को डायक्लोफिनेक को रोकने का निर्देश देने के साथ ही गिद्ध को बाघ और तेंदुआ के समान दर्जा दिया था, परंतु ठोस पहल के अभाव में धरातल पर यह निर्देश नहीं उतर सका।

चंबल के सेंचुरी क्षेत्र में मध्य प्रदेश वन विभाग की टीम उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद के सोसायटी फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के महासचिव डॉ. राजीव चौहान के साथ सेंचुरी क्षेत्र में पाए जाने वाले संरक्षित जीवों की गणना के दौरान जब किंग बल्चर देखा तो श्री चौहान खासे उत्साहित नजर आए। बकौल राजीव चौहान गिद्ध की आवश्यकता को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। पर्यावरण के लिहाज से महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसकी बजह है कि आज आवारा जानवरों को खाने वाला कोई नहीं है जबकि पूर्व में यह गिद्ध खा जाते थे। इससे वातावरण में तमाम खतरनाक वायरस भी पनप रहे है। जिस प्रकार से विलुप्त प्रजाति का गिद्ध देखने को मिला इससे साफ है कि गिद्धों की वापिसी होने लगी है और यदि संरक्षण करने के प्रयास तेज किए गए तो आसमान में गिद्धों को उड़ते हुए आसानी से देखा जा सकेगा। इसी प्रकार गिद्ध को देख खासे उत्साहित हुए पर्यावरण प्रेमी अजय मिश्रा का मानना है कि गिद्ध की वापिसी गिद्ध के साथ ही मानवीय जीवन के लिए भी खासी महत्वपूर्ण है। इससे पर्यावरण को बचाया जा सकेगा। उम्मीद जताते हुए वे कहते हैं कि आने वाले दिनों में गिद्धों को सामान्य रूप से विचरण करते हुए देखा जा सकेगा। चंबल में गिद्धों को देखना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि चंबल में जहां तमाम विलुप्तप्राय प्रजातियों के जीवों को संरक्षित किया गया है तो ऐसे में गिद्ध भी संरक्षित हो सकेगा।

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mahendra singh on 19 March, 2010 14:36;46
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बेहद लाजबाब है यह रिपोर्ट, जिससे यह साबित होता है गिद्धों की वापसी की दिशा तय होती हुयी दिख रही है
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sachin jain on 30 March, 2010 20:22;27
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dinesh ji ke lekh ko phad kar laga ki koi patrakar to hai. jo paryavaran ke liye likh raha hai.
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arvind tripathi on 22 May, 2010 17:16;45
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dinesh ji, aapke lekh ko padh kar ek baar pahle bhi comment likh chuka hoon par visfot main nahi lag paya, koi karan raha hoga. gidhon ka gayab hona chintaniya vishay raha hai. yah ati vaigyanikta ke viprit asar ke roop main maan kar chlen.
vaise rahi baat daakuon ke saath gayab hone ki to bataa doon ki aadmiyon ke beech chhipe gidhhon se dar kar aur sharma kar gidh mar gaye.
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image दिनेश शाक्य इटावा के रहनेवाले दिनेश शाक्य १९८९ से मीडिया में कार्यरत. १९८९ में पत्रिका हलचल से जुडे फिर साप्ताहिक चौथी दुनिया के बाद दिल्ली प्रेस प्रकाशन से जुडे,१९९६ से समाचार ए़जेसी वार्ता में २००३ मार्च तक इटावा में रिपोर्टर के रूप में काम किया, सहारा समय न्यूज चैनल में काम. उत्तर प्रदेश में विस्फोट.कॉम की ओर से स्पेशल स्टेट करेस्पांडेन्ट.
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