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पन्ना के बाघों का वंशनाश

image पन्ना टाइगर रिजर्व

पन्ना नेशनल पार्क के जंगल का गहरा भूरा रंग अब मानसून की आहट के साथ हरे रंग में बदल गया है, यहां का धुंधवा पहाड़ बांधवगढ़ से लाई गई बाघिन और उसके नवजात 4 बच्चों की अठखेलियों से पुन: पुलकित हुआ था और पार्क के फील्ड डायरेक्टर व डीएफओ हर्ष व्यक्त कर पत्रकारों को मिठाइयां भी खिला चुके हैं पर वास्तव में पन्ना क्षेत्र की जनता को फिलहाल कोई विशेष हर्ष नहीं है। उनके लिये दु:ख की बात यह है कि हमारे इलाके के जन्मजात बाघ समाप्त हो गये हैं। अब जो भी बाघ-बाघिन हैं, वे बाहर से लाये जा रहे हैं।

पौराणिक कर्णावती (केन) नदी के दोनों ओर लगभग 545 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले पन्ना नेशनल पार्क की विधिवत स्थापना सन् 1981 में हुई थी जबकि 1994 में भारत सरकार ने यहां 'प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व' की स्थापना की। उस समय यह राष्ट्रीय उद्यान लगभग 50-60 बाघों सहित सैकड़ों चीतल, सांभर, नीलगाय, भालुओं व सियारों से भरा हुआ था, लेकिन व्यवस्था का करिश्मा देखिये कि टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट की स्थापना के बाद से यहां बाघ लगातार घटते चले गए और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की एक टीम ने पिछले वर्ष अचानक यह खुलासा किया कि यहां एक भी बाघ नहीं है। बाद में यहां पदस्थ करोड़ों का बजट उदरस्थ कर चुके अफसरों ने भी माना कि हां सारे बाघ चुक गए। पन्ना बाघ अभयारण्य की यह कहानी देश की भ्रष्ट व्यवस्था और इसके लचीले कानूनों की पोल में पल रहे उस सामंतवाद की कहानी है, जो आजादी के बाद चेहरा बदलकर सामने आया है। इसकी ऊपरी परत पर तो एक संस्कारवान भले मानुस का चेहरा है पर अंदरुनी परत में कई क्रूर सामंतों के बिगड़ैल शहजादे छिपे हुये हैं जिनकी जिंदगी के दो ही मायने दिखाई पड़ते हैं-शिकार एवं मैथुन।

नागौद एवं पन्ना राज परिवार शिकारी दल के अगुआ बताये जाते हैं। इनको पन्ना राष्ट्रीय अभयारण्य को अपनी बपौती माने की छूट मिली सन् 2003-04 से जब नागौद राजपरिवार से संबंधित नागेन्द्र सिंह उर्फ बिटलू हुजूर को प्रदेश का गृहमंत्री बनाया गया। सन् 89-93 के बीच जब नागेन्द्र सिंह प्रदेश पर्यटन निगम के अध्यक्ष थे, तब खजुराहो में खोला गया उनका होटल अभी सन् 2004 से गुलजार हुआ। होटल को संचालित करने वाले नागेन्द्र सिंह के पुत्र श्यामेन्द्र सिंह उर्फ बिन्नी राजा ने इंदिरा गांधी गरीबी हटाओ योजना के माध्यम से सबल स्वसहायता समूह बनाया और उसके नाम पर केन नदी के किनारे झिन्ना नामक स्थान पर जंगल के अंदर छोटी-छोटी सर्वसुविधा युक्त झोंपडिय़ां (हट्स) बनवाई, जिनमें चुनिंदा विदेशी पर्यटकों को जंगल में मंगल मनाने के लिये रुकाया जाने लगा। उसी दरम्यान अनेक सालों से मंडला के नजदीक केन नदी में ट्री हाउस बनाकर रहने वाला स्वीडिश नागरिक जील कहीं गायब हो गया। बताया गया कि वह बिन्नी राजा को अपना ट्री हाउस बेचकर अपने देश चला गया है। बिन्नी का ट्री हाउस हो गया तो शीघ्र ही पन्ना के एक समय के बिगड़ैल नवाबजादे युवराज व रिश्ते में ससुर लगने वाले लोकेन्द्र सिंह ने भी वहां ट्री हाउस बनवा लिया और कुछ दिनों के भीतर पन्ना राजलक्ष्मी होटल के मालिक खनिज व्यवसाई प्रदीप सिंह राठौर का भी रिसोर्ट वहां बन गया। पांडव फॉल के पास एक दुर्गम रेंज में बने इन आधुनिक ऐयाश गृहों में आने-जाने व रहने वालों का शीघ्र ही पूरे उद्यान में दबदबा हो गया। नागेन्द्र सिंह के पुत्र बिन्नी राजा की कुछ गाडिय़ां हमेशा कभी हिनौता रेंज, कभी मंडला व कभी कल्दा आदि रेंजों में घूमने लगीं, जिनमें ''डिस्कवरी'' लिखा हआ था। बताया गया कि इन गाडिय़ों के माध्यम से जंगली जानवरों को 'शूट' कर डिस्कवरी चैनल को भेजा जाता है। वन्य प्राणी संरक्षण के लिए प्रदेश की जो समिति बनी, उसमें बिन्नी राजा एवं लोकेन्द्र सिंह भी सदस्य बन गए। लिहाजा, राष्ट्रीय उद्यान में शाम 5:30 बजे से सुबह तक रात में किसी का भी प्रवेश वर्जित है, पर इन महानुभावों की सशस्त्र गाडिय़ों में लगातार अंजान लोग और ये स्वयं रात में कभी यहां से घुसते, कभी वहां से निकलते सर्वत्र जंगल में देखे जाने लगे।

अभी हाल बांधवगढ़ में एक शेरनी को जीप द्वारा कुचलकर मारने के प्रसंग में जब मंत्री पुत्र बिन्नी राजा का नाम आया तो पन्ना व सतना की आम जनता को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। गोया, बांधवगढ़ में भी बिन्नी राजा का रिसोर्ट है। अनेक लोग यह जानते हैं कि एक अरसे पूर्व परसमनिया (सतना) के जंगल में जो घायल बाघिन मिली थी, जिसका प्राणांत बाद में भोपाल में हो गया; वह पन्ना की कल्दा रेन्ज से भाग कर वहां पहुंची थी और वह भी ठोकरों से घायल थी। इस बाघिन को पार्क की आखिरी बाघिन कहा जाता है। उसके बच्चे भी थे जो आज तक नहीं मिले। इन कांड में तीन आदिवासी तो पकड़े गए पर मंत्री के भाई होने के नाते एक अन्य मुजरिम कन्नू हुजूर बचा ही रह गया।

मधुर व्यवहार के लिए मशहूर प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री व वर्तमान में लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह के बड़े चिरंजीव श्यामेन्द्र सिंह उर्फ बिन्नी राजा का नाम वर्तमान में दक्षिणी बुंदेलखंड के सभी प्रचलित 'राजाओं' के नामों में सबसे बड़ा है। गोया, आजकल वे इन सब की आंखों के तारे हैं। हर दबदबेदार आदमी एक बार उनके साथ बैठना चाहता है। खजुराहो से जुड़ी ट्रेवल्स कंपनियां व होटल सदैव उनकी कृपा की मोहताज हैंं। जंगली गांवों में पुख्ता धारणा है कि बिन्नी राजा और उनकी शिकारी टोली ने पिछले पांच वर्षों में क्षेत्रीय डांग के एक सैकड़ा से अधिक बाघों व तेंदुओं को मारा है। पुरानी शिकारगाहें आबाद हो गई हैं और अन्य जानवर भी रोजाना मारे व खाए जा रहे हैं। पन्ना राष्ट्रीय अभयारण्य में जबसे नागौद के कचलोहा गांव के एक शिकारी युवक विक्रम सिंह डीएफओ बनकर आ गए, तबसे आग में जैसे घी जैसा पड़ गया। अब दिक्कत यह है कि बीट गार्ड अवैध शिकार एवं शिकारियों की रिपोर्ट किसे दें क्योंकि डीएफओ तो स्वयं बिन्नी राजा का पारिवारिक सदस्य है और उन्हीं के साथ घूमता है। जब कभी इस डीएफओ को हटाकर यहां गहन जांच की जाएगी तो अभी तक की सारी रिपोर्टें धरी की धरी रह जाएंगी और रिपोर्ट आएगी कि बाड़ी ने ही खेत को खा लिया है। कभी खुली सशस्त्र जिप्सियों में तो कभी बंद बड़ी गाडिय़ों में शिकारी जंगलों में मंडराते देखे जाते हैं। स्थानीय इलाकेदारों और पन्ना के रियासती परिवार द्वारा उनको दिए जा रहे समर्थन की वजह से गांवों में आवाज उठाने की दम किसी में नहीं है। लगभग एक वर्ष पूर्व मंडला के पास की एक महिला ने अपने साथ किए गए कदाचार और अत्याचार की जब रिपोर्ट लिखानी चाही तो कई दिनों की हीलाहवाली के बाद बिन्नी राजा के खिलाफ धारा 447/323/34 की साधारण रिपोर्ट दर्ज की गई और उन्हें मंडला थाने बुलाकर वहीं से जमानत दे दी गई। स्थिति यह है कि किसी ग्रामीण के पशु जंगली एरिया में घुस जाने पर उसे अपमानित व दण्डित किया जाता है, परंतु बाघ मारकर ले जाने वाले या बाघ के बच्चों की विदेश तस्करी कर देने वालों और सांभर, हिरण, खरगोश रोजाना खाने वालों पर किसी का नियंत्रण नहीं है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि नागौद राजपरिवार के बिन्नी राजा की मां तथा स्वयं उनकी धर्मपत्नी नेपाल की हैं। नेपाल के रिश्ते का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि नेपाल के रास्ते चीन हमारे देश के वन्य प्राणियों और उनकी खालों,दांतों,नाखूनों व चमड़ों का बड़ा ग्राहक है।

पन्ना राज परिवार के लोकेन्द्र सिंह की पुत्री कामाक्षा सिंह बिन्नी राजा के चचेरे भाई प्रीतेन्द्र सिंह को व्याही हैं। कामाक्षा आजकल नागौद नगर पंचायत की अध्यक्ष हैं। नागौद राज परिवार के आखिरी राजा महेन्द्र सिंह के बारे में कहा जाता है कि सोते शेर को मारना उनका शौक था और उन्होंने अपनी जिंदगी में 157 शेर मारे थे। इस मामले में नाती पूरी तरह बाबा पर गया है। मंत्री नागेन्द्र सिंह ने भी पिछले वर्ष एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि सन् 71 के पूर्व अपने युवा काल में मैंने 5 शेर मारे थे। असल में सन् 48 में परसमनिया का इलाका शिकार खेलने के लिए नागौद राज परिवार को तथा इसी तरह केन का इलाका पन्ना व छतरपुर राज परिवार को दिया गया था। प्रिवीपर्स के साथ शिकार की यह छूट भी शामिल थी। सन् 71 से प्रिवीपर्स खत्म हो गए, लेकिन शिकार का यह खेल कभी कम कभी ज्यादा चलता ही रहा। नागौद व पन्ना राज परिवार तथा उनसे जुड़े लोग आजकल भी जंगलों में काबिज हैं। यहां के खनिज व वन संसाधनों के उपार्जन में ये लोग खदान मालिकों व ठेकेदारों से पैसा वसूलते हैं। जो पैसा नहीं देगा वह इलाके में काम नहीं कर सकता।

यह विडंबना ही है कि देश व प्रदेश सरकार की मदद से यहां खूबसूरत बाघ अभयारण्य बना परंतु इसकी व्यवस्था और इस पर नियंत्रण अघोषित तौर पर उनका हो गया जो खानदानी शिकारी हैं। न केवल पन्ना वल्कि बांधवगढ़ में भी इन्होंने अपने रिसोर्टों और वहां पदस्थ वन विभाग के अधिकारियों व पुलिस के माध्यम से अपना नियंत्रण और दबदबा स्थापित कर लिया है। जैसे भेड़ों की रक्षा के लिए भेडिय़ों को नियुक्त कर दिया जाए, कुछ इसी तरह ही पन्ना बाघ अभयारण्य की दशा है। प्रदेश सरकार हमेशा यहां पाखंड करती रहती है, पर मुख्य समस्या की तरफ से अंधी बनी हुई है। कभी पारधियों और बहेलियों पर आरोप जड़कर तो कभी संसार चंद गिरोह का नाम उछालकर प्रपंच किया जाता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं बाघ के बच्चों को देखने के लिए सपरिवार पेंच के जंगलों में चले जाते हैं, पर पन्ना के जंगलों पर कुछ नहीं बोलते। शायद, हकीकत से वाकिफ होंगे।

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Sanjay on 17 June, 2010 21:26;06
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जैसे भेड़ों की रक्षा के लिए भेडिय़ों को नियुक्त कर दिया जाए, कुछ इसी तरह ही पन्ना बाघ अभयारण्य की दशा है। प्रदेश सरकार हमेशा यहां पाखंड करती रहती है, पर मुख्य समस्या की तरफ से अंधी बनी हुई है।
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Vivienne Chauhan on 17 June, 2010 23:33;51
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I can't read a word of this being English but if it is the banning of this idiot's hotel as a result of his scandalous behaviour in connection with the running over of the tigress, I wholeheartedly agree, sometimes the only way to make people realise their stupidity is to hit them in the pocket. so let's do just that.
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Sanjeet Tripathi on 18 June, 2010 01:01;01
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shandar report, sahasi kahna chahiye....
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sachin dube on 18 June, 2010 11:54;25
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badi gahri report hai. government ko is mudde per janch bithani chahiye.rastriy pashu bagh ki rakchha ke liye turant kadam uthaye jayen.
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amit singh on 18 June, 2010 21:53;45
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nagendra singh aur unke jaise anya rasukhdar logon ke panna aur bandhawgarh jaisi jaghon me bane hue restorento par pratibandh lagaya jana jaroori hai.visfot ko dhanyawad; publik ko pata chala ki aisa bhi hota hai.
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pankaj mishra on 21 June, 2010 20:59;50
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नागोद के महाराज सोते शेर को नहीं वल्कि सोते शेर को जगा कर मारा करते थे. मेरे पास १९९२ की एक पत्रिका है जिसमें नागोद राज परिवार विषयक लेख में लिखा है -महाराजा महेंद्र सिंह का राज तिलक १९३६ में हुआ .वे बचपन से ही शिकार खेलने के शौक़ीन थे. सोते शेर को जगा कर मारना उनका शौक था. उन्होंने अपने जीवन काल में १५७ शेर मारने का कीर्तिमान कायम किया.
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rajesh dhami on 25 June, 2010 19:59;11
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व्यवस्था की पोल खोलती पन्ना नेशनल पार्क की ये कहानी पढ़कर बड़ा दुःख हुआ. मैं स्वयं पन्ना का रहने वाला हूँ. सालों पहले जब सुना कि पन्ना के जंगलों को पार्क घोषित किया गया है तो बड़ा अच्छा लगा था . रास्ट्रीय धरोहर बाघ के साथ यह सलूक असहनीय है.
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Pramod Rawat on 30 June, 2010 14:58;23
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To know more about bundelkhand then please visit the url given below.

Pramod Rawat Tikamgarh
http://www.bundelkhanddarshan.com
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