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गिरवी हो गये गन्ना किसान

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देश में किसान और किसानी के क्या हालात हैं इसे वर्तमान समय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के आंदोलन को देखकर समझ सकते हैं. सरकार, मीडिया और समाज तीनों में हाशिये पर धकेल दिये गये किसानों के लिए बात करे भी तो आखिर कौन? पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के संकट के पीछे केन्द्र का ही एक काला कानून है लेकिन केन्द्र सरकार कच्ची रॉ सुगर मंगाकर खुश है इसलिए वह कानून में बदलाव नहीं करना चाहती. वह बदलाव करेगी भी क्यों? जिस देश में एक दशक से भी कम समय में दो लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हों और सरकार विकास का डंका पीट रही हो उससे किसान उम्मीद भी रखे तो कैसे?

मूल्य वृद्धि को लेकर देश का अन्नदाता सड़कों पर है। राजनीतिक दलों के पास इस बहाने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकेने का मौका है। एक-दूसरे पर दोषारोपण किया जा रहा है, कृषि का देश के सकल घरेलू उत्पाद में(जीडीपी) में योगदान लगातार कम होता जा रहा है। हम देश में मॉल बना रहे हैं, केंद्र सरकार सेज के निर्माण को धड़ाधड़ मंजूरी दे रही है और अन्न बाहर से मंगाकर खाया जा रहा है। यह उस देश की कहानी है जिसे कृषि प्रधान देश माना जाता है। पूरे देश में किसान आंदोलनरत है, आत्महत्या करने को मजबूर हैं। मीडिया के पास चर्चा के लिए मसाला यह है कि भाजपा में नये अध्यक्ष को लेकर घमासान तेज हो गया है या राज ठाकरे वाकई मराठा प्रेम के ध्वजवाहक हैं या नहीं। संप्रग सरकार ने किसानों के प्रति छद्म सहानूभूति दिखाते हुए साठ हजार करोड़ रुपये कर्ज माफी की घोषणा तो कर दी लेकिन इसका फायदा कितना और किस हद तक किसानों को मिला है किसानों की लगातार हो रही आत्महत्याओं से इस बात को बताने की जरूरत नहीं है। भारत पूरी दुनिया में अन्न देने वाले किसान की दुर्दशा और लगातार आत्महत्याओं के कारण चर्चा में है और पड़ोसी देशों के पास हमारी हंसी बनाने के लिए यह एक पर्याप्त कारण है।

बात करें झारखंड राज्य के पलामू की जहां के किसानों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड और महाराष्ट्र के विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के नये मामले लगातार सामने आते हैं। ताजा घटनाक्रम में पश्चिमी यूपी के किसान मूल्य वृद्धि को लेकर आंदोलनरत हैं। किसानों का कहना है कि उन्हें गन्ने का उचित मूल्य दिया जाए। गन्ना किसानों के समर्थन में राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख चौ अजित सिंह, भारतीय किसान यूनियन समेत तमाम राजनीतिक व सामाजिक संगठन लगे हुए हैं जिनका यह कहना है कि उनके लिए किसानों के हित सर्वोपरि हैं। यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया है कि उन्होंनें केंद्र को इस संबंध में पत्र लिखकर गन्ना किसानों की मांगों पर ध्यान देने को कहा है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का कहना है कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर लोगों को गुमराह कर रही है केंद्र किसानों का रहनुमा है। कुल मिलाकर नुकसान और परेशानी देश के अन्नदाता को ही भुगतनी पड़ रही है वह अन्नदाता जो गर्मी, सर्दी और तमाम तरह की मुसीबतों को भूलकर खेत में हल या टे्रक्टर चलाता है और हमारे थाली की रोटी सजाता है। चारों ओर भ्रष्ट नेताओं का बोलबाला है लोकतंत्र में बदइंतजामी का शोर है। राजनेता आपसी बयानबाजी कर मीडिया की सुर्खियों में बने हुए हैं।

मीडया यह दिखा रहा है कि शिल्पा शेट्टी और राज कुंद्रा किस तरह मिले और कैसा उनका प्रेम सफर रहा। बहरहाल यूपी के किसानों ने आंदोलन किया, रेल यातायात बाधित किया लेकिन केंद्र व राज्य सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। एक सामाजिक संगठन के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले पांच से छह वर्षों में कृषि प्रधान देश में तकरीबन दो लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। जब महाराष्ट्र के विदर्भ में किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहे थे तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने किसानों को सलाह देते हुए कहा था किसानों को मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए योग का सहारा लेना चाहिए। इससे बेशर्मी भरा बयान और क्या हो सकता था लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें उनके पद पर बनाए रखा। कांग्रेसी युवराज ने महाराष्ट्र में यवतमाल नामक जगह का दौरा किया जहां पर किसान लगातार आत्महत्या कर रहे थे। उसके बाद उन्होंने संसद में एक विधवा कलावती का भी जिक्र छेड़ा जिससे वह भी अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में आ गयी।

उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों और सरकार की सांठगांठ का सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। निजी मिल मालिकों ने इस बात के लिए हामी भर दी है कि वे 180 रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से भुगतान को तैयार हैं लेकिन देश के अन्नदाता का कहना है कि वे 280 रुपये प्रति कुंतल पर ही गन्ना देंगे। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एक नया कारनामा सुना। किसान अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे तो पता चला कि इस वर्ष का भुगतान निर्धारण तो रहा दूर वर्ष 2007-2008 का 7-15 रुपये प्रति एरियर का भुगतान भी अभी तक नहीं किया गया है। विदेशों से हम रॉ शुगर यानी कच्ची शुगर मंगवा रहे हैं जो मूल्य में उपभोक्ताओं को सस्ती पड़ती है जिस वजह से कोई क्यों 38 रुपये प्रति किलो की चीनी खरीदेगा। फिर पिछले वर्ष के 140-145 रुपये प्रति किलो का भाव इस वर्ष कहीं से भी तर्कसंगत नहीं बैठता। क्योंकि डीजल, पेराई में लगने वाला खर्च, टेक्ट्रर की मरम्मत का खर्चा सभी कुछ तो बढ़ चुका है। ऐसे में 140 रुपये का भाव देने की बात कोई मानवीय संवेदनाओं से परे रहने वाला मनुष्य ही कर सकता है। किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार की एफआरपी प्रणाली किसानों के लिए काला कानून है और केंद्र सरकार इसे हर हालात में वापस ले।

अन्नदाता का कहना है कि उसे 280 रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से गन्ने का भुगतान किया जाए। अब यूपी की शुगर इंडस्ट्री ने नया फार्मूला निकाला है। शुगर इंडस्ट्री कहती है कि हम आपको 15 से 20 रुपये इंसेटिव या प्रीमियम के तौर पर देंगे, क्या देश को अन्न देने वाले को उद्योगपति 15-20 रुपये इंसेटिव देकर उसे भीख दे रहे हैं। इस वर्ष पहले से गन्ने पर बीमारियों की मार और अब सरकार का उचित गन्ना मूल्य न देना इस सबसे क्या इन राजनेताओं की अन्नदाता के प्रति संवेदनहीनता जाहिर नहीं होती। क्या देश के राजनेताओं को किसानों की यह बात नागवार गुजरती है कि पिछले वर्ष गन्ने का मूल्य 140-145 रुपये था और चीनी 16 रुपये प्रति किलो थी इस वर्ष चीनी 38 रुपये प्रति किलो है ऐसे में उन्हें गन्ने का उचित मूल्य क्यों न मिले। किसानों का कहना है कि वे इस मूल्य पर किसी भी हालत में गन्ना नहीं बेचेंगे चाहे फिर उन्हें गन्ना खेतों में ही क्यों न जलाना पड़े। अन्नदाता को भी अपनी मांगों के लिए सड़कों पर उतरना पड़े इसे इस कृषि प्रधान देश का दुर्भाग्य कहा जाएगा।

केंद्र सरकार की एफआरपी प्रणाली के विरोध में पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों ने झंडा उठा लिया है। अभी से ज्यादा समय पहले की बात नहीं है जब भारत विदेशों को अनाज का निर्यात किया करता था और अब परिस्थिति यह है कि हम अनाज का आयात कर रहे हैं। कभी सेज के नाम पर, तो कभी नये उद्योगों के नाम पर देश की कृषि योग्य भूमि को बंजर करने पर सरकारें तुली हुई हैं। जिस जमीन पर खेती कर इस देश का पेट पलता था वहां आज सबसे ज्यादा मौतें कुपोषण व भूख से होती हैं। हाल ही में यूनीसेफ की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें यह कहा गया था कि विश्व का हर छठा भूखा आदमी भारतीय है। चलिए हमें नहीं चाहिए मॉल संस्कृति या कारपोरेट कल्चर लेकिन रोटी तो भारत के आदमी को भरपेट मिले। लेकिन नहीं देश के भ्रष्ट नेता 4000 करोड़ रुपये का घोटाला तो कर सकते हैं लेकिन किसानों के हित में सोचने के लिए उनके पास समय नहीं है। वे एसी रूम में बैठकर चुनाव प्रबंधन की नीतियों पर तो घंटो माथा पच्ची कर सकते हैं लेकिन अन्नदाता के लिए सोचने का समय या यूं कहें कि यह उनके लिए मुद्दा नहीं है क्योंकि उन्होंने केंद्र या राज्यों की सत्ता में रहकर इतनी माया जोड़ ली है कि आसानी से अपना और अपनी सात पुश्तों का पेट भर सकें।

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prashant mehrishi on 16 November, 2009 22:11;55
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upreti ji aapne theek likha aur apni bhadas nikal li v 5 minuts ke liye mujhe bhi shanti mili .lekin kuchh badalne wala nahi hai kyoki badlav prajatantra main vote se aata hai agar aapki baat sahi hai to fir ye kisan ka khoon pine wale election kaise jeet gaye . vidarbh main bhi congress jiti.
haryana, andhra,rajasthan,padelike logo ki delhi sabhi choro ke sath mil gaye .gareeb hathyar uthaye to naksalwad se bhi kuchh hal nahi hoga.
rashtra bhakt kya kare ?
lekh likhne v padhne se kuchh nahi hoga is congress ka nam desh se mitana hoga tabhi kheti kisani bachegi.
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