सामाजिक मूल्यांकन से साँसत में सरपंचों की जान
पचास साल पहले पंचायतीराज की स्थापना राजस्थान में हुई। स्वर्ण जयंती भी यही मनाई गई। सोशल आडिट (सामाजिक मूल्यांकन) भी यही से आरम्भ हुआ और अब सरपंच भी यहीं के परेशान है। उदयपुर में खुलेआम प्रदर्शन हो रहा है तो दूसरी जगहों से सरकार पर कागजी दबाब बनाया जा रहा है। आखिर क्यों ?
नरेगा अब महानरेगा हो गया है। लगता है जैसे घोटाला शब्द महाघोटाला हो गया हो। लेकिन सरकारी मूल्यांकन अब सामाजिक मूल्यांकन हो गया है। जिसने महानरेगा के महाघोटालों को उजागर करने का बीड़ा उठा लिया है। अकेले भीलबाड़ा की खुशबू पूरे राजस्थान में धीरे धीरे फैल गई। अब हर एक जिले में एक ग्राम पंचायत को चुना जा रहा है। चुनने की प्रक्रिया में महानरेगा के तहत सबसे अधिक पैसा लेकर काम कराने वालों पर नजर गई है।
आम तौर पर अधिक काम और पैसा खर्च करने वाले सरपंचों को सरकारें सम्मानित करती रही हैं। लेकिन अबकी बार इन अधिक पैसा खर्च करने वालों की जान साँसत में फस गई है। वो सोच रहे है ऐसा पता होता तो एक भी रूपये का काम नहीं कराते। अब क्या करें सरकार पर दबाब बनाने के अलावा कोई विकल्प नजर ही नहीं आ रहा है। उधर फरवरी 2010 में पंचायतों के चुनाब और सिर पर आ गये है। भीलबाड़ा से सटे झीलों की नगरी और राजस्थान के कश्मीर कहे जाने वाले उदयपुर में सरपंचों ने विरोध का झण्डा उठा लिया है। सरपंचों का कहना है कि सामाजिक मूल्यांकन तो हम जनता के चुने हुये जनप्रतिनिधियों को उसकी ही नजरों में चोर ठहरा रहा है। उनकी दलील है कि पंचायतों ने अपने स्तर पर सामाजिक मूल्यांकन ग्राम सभाओं में करा लिया है। अब वो किसी गैर सरकारी संगठन के द्वारा अपने यहाँ मूल्यांकन नहीं करने देगें। इसे लेकर जिले भर के सरपंचों ने महापंचायत का आयोजन कर मुख्यमंत्री के नाम अपना ज्ञापन भी भेज दिया है।
सरपंचों की दलील है कि महानरेगा के अधिकांश काम मिटटी डालने को लेकर हुये है। बर्षा के बहाव में अगर मिटटी बह गई तो अब हम क्या करें? केवल सडकें मिट्टी की बनी थीं। अब तो उन जगहों पर कुछ नहीं मिलेगा तो क्या सरपंचों को चोर मान लिया जायेगा?
महानरेगा में मिट्टी डालने का काम अधिक हुआ है। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पूरा काम ही मिट्टी का हो। 60-40 का रेसियो रहता है। 60 प्रतिशत पैसा मजदूरी है तो 40 प्रतिशत पक्के काम की लागत तय है। भीलवाडा जो केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री का क्षेत्र हैं। यहाँ की 11 ग्राम पंचायतों में एक एनजीओ और देश भर से पहुँचे सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में 12 दिनों तक सोशल आडिट का काम किया गया। राजस्थान में पिछले वित्तीय बर्ष में 8000 करोड़ का महानरेगा बजट था। जिसमें से 300 करोड़ अकेले भीलबाड़ा में खर्च हुआ है। 11 ग्राम पंचायतों में ही लगभग 2 करोड़ रूपये के घोटाले सामने आये। स्थिति इतनी बदतर मिली कि एक जगह के काम का तीन बार भुगतान उठा लिया गया। सुवाडा पंचायत समिति की रीछडा ग्राम पंचायत में तो साईकिल पंक्चर की दुकान करने वाले को ही 40 लाख की सामग्री का टैण्डर दे दिया गया। सफेद कागज के बिलों पर 27 लाख का भुगतान भी कर दिया। इस मामले के सामाजिक मूल्यांकन में सामने आने के बाद संबधित सचिब को संस्पेंड कर दिया गया है तो सरपंच के खिलाफ भी मामला दर्ज करने की सिफारिश की गई है।
महानरेगा के क्रियान्वयन को लेकर राजस्थान अभी तक अव्वल बना हुआ हैं। गत भाजपा सरकार के साथ ही वर्तमान कांग्रेस सरकार भी देश में सर्वाधिक रोजगार देने वालों में शीर्ष पर है। इतना ही नहीं राजस्थान में सर्वाधिक संख्या में महिलाओं ने रोजगार की माँग और काम किया है। यही कारण है कि वर्तमान वित्तीय बर्ष में भी देश में सर्वाधिक 9525 करोड रूपयों का बजट भी राजस्थान को ही मिला है। ग्रामीण विकास मंत्री भी राजस्थान के है और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी है।
सवाल ये है कि देश में सबसे अधिक पैसे और मजदूरों के काम करने के आँकडों की वास्तविक सच्चाई क्या है। क्या वास्तव में पैसे का सदुपयोग हुआ है। हकदार को उसका काम मिला है। क्या धरातल पर वो काम हुआ है जिसके लिए सरकारी खजाने से धन लिया गया हैं? क्या मजदूर के खाते की पूरी रकम उसके परिवार के काम आई है? क्या इससे ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ढाचागत बदलाब आऐ भी है ? या सब कुछ वैसे ही चल रहा है जैसे चलता आ रहा है?
भीलबाडा के सामाजिक मूल्यांकन की धाधलियों ने जो तस्वीर रखी है। वो तो कुछ और ही इशारा कर रही है। इसके अलावा अब सरपंचों के सामाजिक मूल्यांकन के खिलाफ लामबंद होकर जो विरोध दर्ज कराया है। उससे लगता है चोर की डाढी में तिनका भर नहीं है। दो जिला कलक्टरों के खिलाफ महानरेगा में पेड और कम्प्यूटर खरीदने में भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुये है। कई उपखंडअधिकारी,विकास अधिकारियों के साथ ही महानरेगा से जुडे दर्जनों दूसरे अधिकारी कर्मचारियों के खिलाफ भी दर्ज हुये मामले कुछ दूसरी ही कहानी की ओर इशारा कर रहे है। जो सच नहीं तो उसके बहुत नजदीक की कहानी है।
हमारे यहाँ एक कहावत है‘‘साँच को आँच नहीं’’। यदि ऐसा सच है तो सरपंचों के विरोध की क्या जरूरत है। राज्य सरकार के शासन सचिवालय और मुख्यमंत्री कार्यालय को रोजाना फोन और फैक्स करने की क्या आवश्यकता हैं। कि सामाजिक मूल्यांकन को रोक दिया जाना चाहिये। सरपंचों ने सही काम कराया होता. वास्तविक मजदूरों ने अपना काम किया होता और सामग्री की गुणवत्ता ठीक रही होती तो सामाजिक मूल्यांकन के खिलाफ खडा होने की जरूरत क्या पडती। लोग तो अपने अच्छे कामों को दिखाने के लिए दूसरों को बुलाते है। यहाँ उल्टा हो रहा है। देखने आने वालों को रोका जा रहा है. जबकि वो किसी से एक पैसा खर्चे के नाम तक पर नहीं माँग रहे है। उल्टा आपके काम को प्रमाणित करके दुनिया के सामने रखेगें। सरपंचों के विरोध के पीछे जरूर कोई बात है।
एक सरपंच और उसके सचिव के इस संवाद में सच्चाई नजर आती है। "भीलबाडा के जैसा हमारे यहाँ हो गया तो हम बर्वाद हो जायेगें।" यही वो सामाजिक मूल्यांकन की फाँस है जो इन दिनों सरपंचों सहित अन्य महानरेगा से जुडे कर्मचारियों के गले में अटकी हुई है. इस काम के अधिकार की योजना का हित इसमें है कि ये फाँस कुछ और तिरछी होकर अटके।
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