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लोकतंत्र का गला घोंटता लोकतंत्र

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भारत में लोकतंत्र की जड़े कमजोर हो रही है यह अनेक उदाहरणों से स्पष्ट हो सकता है । अब तो वोट देने के अधिकार को छोड़कर अन्य कही भी लोकतंत्र के दर्शन ही दुर्लभ है। किन्तु विचारणीय विषय यह है कि ऐसा हुआ क्यों ?

गांधी हत्या के बाद सामान्य लोग तो गांधी के अतिरिक्त कुछ और समझते नहीं थे। जो गांधी ने कहा वही उनके लिये तो लोकतंत्र था। गांधी के बाद चार पांच प्रकार के लोग आगे आये। उन सब में साम्यवाद सबसे अधिक प्रभावी था। साम्यवाद पूरी दुनिया में आज तक सर्वाधिक खतरनाक विचार धारा मानी जाती है। इनका लोकतंत्र से पूरा पूरा छत्तीस का संबंध है। ये तानाशाही विचारों के पोशक है, सर्वाधिक चालाक है। लोकतंत्र को अच्छी तरह समझते है। लोकतंत्र को किस तरह परास्त किया जा सकता है यह भी खूब जानते है। प्रारंभ से ही ये भारत में अपनी योजना में सफल रहे। लोकतंत्र को लोकतांत्रिक तरीके से असफल करने में सर्वाधिक भूमिका साम्यवाद की रही है। दूसरा गुट था संघ परिवार का। इसकी नीयत बिल्कुल ठीक थी किन्तु इन्होंने लोकतंत्र को कभी समझा ही नहीं। साम्यवाद की सधी हुई योजनाबद्ध चालों के समक्श ये कभी टिक ही नहीं पाये। अर्थनीति का तो इन्हें कभी ज्ञान रहा ही नही किन्तु अन्य मामलों में भी इनके पास लाठी के अलावा कभी कुछ नही रहा अन्यथा जिस तरह भारत के आम लोगों ने संघ परिवार की मदद की है और वह पूरी की पूरी व्यवस्था में बदलाव के लिये पर्याप्त था किन्तु जिस तरह साम्यवादी समय समय पर अपनी नीतियों की समीक्शा करते रहते है उस तरह आज तक इन्होंने समीक्शा नहीं की। ये तो केवल अपने कार्यक्रमों की ही समीक्शा करते रह गये।

तीसरा ग्रुप था समाजवादियों का। ये लोग लोकतंत्र को समझते भी थे और नीयत भी ठीक थी किन्तु संघर्श में अकेले पड़ गये। साम्यवादी चालाक थे, संघ परिवार नासमझ था, नेहरू अम्बेड़कर आदि चालाक तो थे ही किन्तु गांधी का नाम और सत्ता का ढांचा उनके पास था। इसलिये नेहरू अम्बेड़कर के ग्रुप ने कुछ समाजवादियों को तोड़ लिया और कुछ को छोड़ दिया। भारत में एक चौथा ग्रुप था मुसलमानों का जो न कभी लोकतंत्र को समझे न ही उन्हें समझने की जरूरत थी । भारत के अधिकांश मुसलमान भी तो समझदारी में संघ परिवार के भाई बन्द ही रहे। भारत में अपना धार्मिक संगठन मजबूत करना है, अपनी संख्या बढ़ाना है चाहे लोकतंत्र रहे या अन्य तंत्र इससे अधिक इनको मतलब नहीं। संघ परिवार की अपेक्षा इस्लामिक परिवार के पास और भी कम समझदारी थी किन्तु इन्हें यह अतिरिक्त सुविधा प्राप्त थी कि विश्व इस्लामिक मूवमेंट इन्हें सहायता भी देता रहता था और मार्ग दर्शन भी। इसलिये ये लगातार बढ़ते रहे अन्यथा ये अपनी साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सफल नही हो पाते।
भारत में लोकतंत्र का नाम मजबूत होता चला गया और लोकतंत्र लगातार कमजोर होता रहा। आज तो भारत की स्थिति यह है कि यदि कोई तानाशाह पूरी सत्ता अपने हाथ में लेकर उसे लोकतंत्र कह दे तो या तो भारतीय उसे ही लोकंतत्र कह देंगे या पष्चिम की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करेंगे कि नयी स्थिति को पश्चिम लोकतंत्र कहता है या लोकतंत्र विरोधी। लोकतंत्र की मूल अवधारणा को तो लोग समझते ही नहीं और यदि कुछ लोग समझते भी है तो या तो उनकी नीयत खराब है या वे निराश है.
ऐसी विकट स्थिति में विचारणीय प्रश्न है कि मार्ग क्या है? लोकतंत्र की लोकतंत्र विरोधी मान्यताएं ही भारत में लोकतंत्र मान ली गई है। दो वर्ष पूर्व तो अन्तिम रूप से लगने लगा था कि अब लोकतंत्र का किला ढहने वाला है किन्तु प्रकाश करात जी के लड़कपन ने मनमोहन सिंह जी को वह अवसर दे दिया कि वे लोकतंत्र को ढ़हने से बचाने का एक और प्रयास करें। अब तक तो मनमोहन सिंह जी के सधे हुए कदम लोकतंत्र के पटरी पर आने का संकेत दे रहे हैं। लोकसभा चुनावों के बाद दो तीन लक्षण स्पष्ट दिखे है। पहला तो यह है कि बात बात में अमेरिका को दोष देने की प्रवृति कम हुई है। एक समय तो ऐसा आया था कि अमेरिका को अनावश्यक भी गाली देने का एक फैशन बन गया था। अब ऐसे लोग धीरे धीरे कमजोर हो रहे है। आप अभी पाकिस्तान भारत संयुक्त वार्ता को ही देखिये। चारों तरफ से वार्ता विरोध मात्र यह कहकर हुआ कि वार्ता अमेरिका के दबाव में हो रही है। कम्युनिस्टों की तो इस संबंध में चर्चा ही व्यर्थ है क्योकि उनकी डिक्सनरी में तो कोई दूसरा शब्द ही नहीं है किन्तु संघ परिवार ने भी वार्ता का विरोध किया। वे कभी समझ ही नही पाये कि उनकी विरोध की प्राथमिकता इस्लामिक कट्टरवाद है या पाकिस्तान। स्पष्ट दिखता है कि भारत को इस्लामिक आतंकवाद अस्थिर कर रहा है न कि पाकिस्तान। जिस देश की संभावित प्रधानमंत्री की कट्टरवादियों ने इसलिये हत्या कर दी हो कि वह भारत से तालमेल चाहती है उस देश की सरकार सहानुभति की पात्र है विरोध की नहीं। किन्तु इतनी महीन बात न ये समझ सकते है न समझना चाहते है। ये तो बस इतना ही जानते है कि चाहे पाकिस्तान हो या इस्लाम। हमारा तो सिर्फ विरोध करना ही काम। यदि लगे हाथ दो चार खरी खोटी अमेरिका भी सुन ले तो इन्हें और संतोश मिल जाता है। ऐसी स्थिति में भी मनमोहन सिंह जी ने वार्ता शुरू करके ठीक लाइन पकड़ी है।

मनमोहन सिंह जी ने मंहगाई के मुद्दे पर भी नई राह पकड़ी है। सच्चाई यह है कि जब जब भाजपा सत्ता में आती है तब तब वस्तुओं के मूल्य बहुत कम हो जाते है। सन् सतहत्तर में शक्कर सस्ती होते होते ढ़ाई रूपया प्रति किलो तक और सरसों तेल पांच रूपया लीटर हो गया था। किसानों की कमर टूट गई। खेती बन्द होने लगी भाजपा को खूब वाहवाही मिली किन्तु उत्पादन घटता चला गया। मनमोहन सिंह ने चौतरफा आलोचनाओं की परवाह न करते हुये वस्तुओं को मंहगा होने दिया । मैं जानता हॅ कि जितना विरोध मंहगाई के नाम पर मनमोहन सिंह झेल रहे है वह अभूतपूर्व है किन्तु वे डिगे नहीं और मंहगाई को बरदान मानकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। इसी तरह मनमोहन सिंह जी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने के कदम उठाये हैं। ग्राम सभाओं को अधिकार देने का प्रयत्न जारी है ही। उनका यह प्रयत्न भी लोकतंत्र को सशक्त करेगा ।

किन्तु मनमोहन सिंह जी एक बात आज तक नही समझे कि भारत की सभी आर्थिक समस्याओं का समाधान कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि ही है। या तो वे समझ नही पाये या हिम्मत नहीं कर पाये । कारण चाहे जो भी हो किन्तु यह काम कठिन नहीं था । यदि एक समझदारी से काम लिया जाता और कृत्रिम उर्जा के मूल्यों में बीस प्रतिशत वृद्धि करके संपूर्ण राशि गरीबी रेखा से नीचे वालों को दें दी जाती तो सरकार को बहुत समर्थन मिलता। कृत्रिम उर्जा की कुल खपत पर बीस प्रतिशत की मूल्य वृद्धि से करीब पन्द्रह खरब रूपया इकट्टा होगा। यदि पचीस करोड़ आबादी में बांटे तो प्रति व्यक्ति छः हजार रूपया प्रति वर्श होगा। बीस प्रतिशत कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि और छः हजार रूपया प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष में जनता किसे पसंद करेगी यह आप स्वयं सोचिये। जनता सरकारी बजट के लिये कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि के खिलाफ है किन्तु उसे नगद मिले तो तुरन्त सहमत हो जायेगी।

भारत में व्यवस्था कुछ सुधर तो सकती है किन्तु आदर्श लोकतंत्र संभव नहीं। लोकतंत्र के नाम पर समाज को परोसी जा रही गुलामी राजनेताओं की नीयत का खोट है। यदि मनमोहन सिंह जी ज्यादा प्रयत्न करेंगे तो विद्रोह का भी खतरा है। इसलिये लोकतंत्र के शुद्धिकरण की प्रतीक्षा ठीक नहीं। यही सोचकर हम लोगों ने आदर्ष लोकतंत्र को लोकतंत्र न कहकर लोक स्वराज्य नाम देना शुरू किया। वास्तव में लोक स्वराज्य आदर्ष लोकतंत्र का बदला हुआ नाम है किन्तु लोकतंत्र शब्द जितना बदनाम हो गया है उस स्थिति में उसे छोड़ना ठीक लगा। साम्यवादी, संघ परिवार, इस्लामिक रूढ़िवादी तो लोक स्वराज्य को समझेंगे नहीं किन्तु समाजवादी, गांधीवादी, कांग्रेस भी जिनकी नीयत ठीक है वे समझ सकते है। यही सोचकर लोकतंत्र के शुद्धिकरण के लिये लोक स्वराज्य की अवधारणा विकसित की जा रही है।

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ghakki on 09 March, 2010 22:54;17
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मुनि जी आप के बारे में ज्यादा तो पता नहीं है. हो सकता है ये मेरा अज्ञान हो हो क्या है ही | पर इस लेख में आप की कांग्रेस के प्रति पूर्व अनुराग दिखाई देता है | इसे पूर्ण रूप से देश की राजनीत का सही विश्लेष्ण करने वाला लेख नहीं कह सकते है | आपका कोंग्रेस को छोड़ कर सभी पार्टियो के प्रति दुराग्रह साफ दिखाई देता है |ये ठीक बात नहीं है| लोकतंत्र या आपके हिसाब से लोक स्वराज में सभी तरह के मत होते है, और सभी के मानने वाले भी पर आप को कोंग्रेस और "मनमोहन" जी के प्रति प्यार ही देख्लाई देता है | ये भी ठीक बात नहीं है अगर आप जैसे विद्वान लोग ही पूर्वाग्रह से ग्रास्सित हो जायेंगे तो फिर बेचारी आम जनता को दोष देना ठीक नहीं है|
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एक पुराना भाजपाई on 10 March, 2010 01:13;05
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घक्की लगता है तुम हमेशा संघ की चक्की पीसते रहते हो. थोड़ा अपना विकास कर लो. ज्यादा संघ की चक्की मत पीसो.
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vivek on 10 March, 2010 16:05;48
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bilkul besirpair ka lekh hai
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shailendra kumar on 10 March, 2010 17:55;03
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अच्छा लेख लेकिन कहीं कहीं असंतुष्ट हू जैसे मह्गाई के मामले में
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prashant mehrishi on 10 April, 2010 21:39;43
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मनमोहन सिंह जी ने मंहगाई के मुद्दे पर भी नई राह पकड़ी है। मंहगाई को बरदान मानकर आगे बढ़ते जा रहे हैं।
muni ji ye kon se lok ka arthshastra hai? kisan ko labh hota to atmahatya kyon karta . lagta hai umr ka asar aap par aane laga hai .
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image बजरंग मुनि वरिष्ठ गांधीवादी और सर्वोदयी बजरंगलाल अग्रवाल ने जीवन को अपनी ही कसौटियों पर जिस तरह से कसा है वह अनुकरणीय है. गृहस्थ जीवन में रहते हुए उन्होंने हर अवस्था की मर्यादा का पालन किया और अब बजरंग लाल से बजरंगमुनि हो चुके हैं. समाजशास्त्र पर विस्तृत अध्ययन, शोध और प्रयोग. लोकस्वराज मंच के संस्थापक और ज्ञानतत्व के संपादक.
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