गडकरी की टीम गरीब और दलित विरोधी
आखिर, जो सोचा था वही हुआ। न तो सोच बदली है न दृष्टि। सोचने की शक्ति भी वहीं की वहीं है। देखने की क्षमता में भी कोई सुधार नहीं हुआ है। नितिन गडकरी ने अपनी टीम की घोषणा कर दी है। टीम देखकर लगता है कि पूरा कोटे का इस्तेमाल हुआ है। वही लोग, वही टीम, वही सोच। जो लोग जमीन पर फेल हो गए, आधारहीन रहे, वही एक बार फिर गडकरी की टीम में आ गए हैं।
और तो और कुछ लोगों ने उन समझदारों को बाहर किया जो पार्टी को मजबूत करते। कुछ लोगों ने कोटे की पद्वति से अपने समर्थकों का नाम डलवा दिया। दिलचस्प बात है कि पूरी टीम में कहीं भी सामंजस्य, सामाजिक समता और जनाधार नहीं दिखता। कुछ नाराज न हो इसलिए टीम में रखे गए है तो कुछ इसलिए रखे गए है कि वे किसी के खास है। कुछ एसे लोग है जो नाराज भी हो जाए तो कोई समस्या नहीं, क्योंकि न तो इनके पास कोई आधार है न दम, फिर भी वे टीम में अपनी जगह बना गए। गडकरी की टीम में शामिल महिलाओं की पृष्टभूमि को देख मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव के उस आरोप में दम नजर आता है कि 33 प्रतिशत आरक्षण से देश की एलिट और शहरी महिलाएं गरीब और पिछड़े महिलाओं की हक मार लेंगी।
नितिन गडकरी की टीम में शांता कुमार, कलराज मिश्र, विनय कटियार, भगत सिंह कोश्यारी, मुख्तार अब्बास नकवी, करुणा शुक्ला, नजमा हेप्तुल्ला, हेमा मालिनी, विजय चक्रवर्ती, पुरुषोत्तम रूपाला और श्रीमती किरण घई बतौर उपाध्यक्ष आए है। जबकि थावरचंद गहलौत, अनंत कुमार, वसुंधरा राजे, विजय गोयल, अर्जुन मुण्डा, रविशंकर प्रसाद, धर्मेन्द्र प्रधान, नरेन्द्र सिंह तोमर, जगत प्रकाश नड्डा, बतौर महासचिव आए है। रामलाल, वी सतीश और सौदान सिंह संगठन महामंत्री के तौर पर आए है। जबकि संतोष गंगवार, श्रीमती स्मृति इरानी, श्रीमती सरोज पाण्डे, श्रीमती किरण माहेश्वरी, श्री तापिर गाव, नवजोत सिंह सिद्धू, अशोक प्रधान, वरुण गांधी, मुरलीधर राव, किरीट सोमैया, डॉ लक्ष्मण, कैप्टन अभिमन्यु, श्रीमती आरती मेहरा, भूपेन्द्र यादव और कुमारी वाणी त्रिपाठी सचिव के तौर पर आयी है।
पहली बार महाराष्ट्र से बाहर निकले नितिन गडकरी ने पूरी तरह से अपनी टीम में ग्रामीणों, दलितों और पिछड़ों की उपेक्षा की है। शुरूआत उपाध्यक्ष से की जाए तो बेहतर होगा। शांता कुमार को इसलिए टीम में रखा गया है कि वे प्रेम कुमार धूमल से नाराज न हो। हिमाचल प्रदेश से बाहर जनाधारहीन शांता कुमार को इसलिए सिर्फ टीम में लिया गया है कि वे प्रेम कुमार धूमल के खिलाफ बगावत को और न हवा दे। हालांकि चार सीटों वाले हिमाचल प्रदेश में जो काम भाजपा ने किया है वही उतरांचल में किया है। वहां के नाराज भगत सिंह कोश्यारी रमेश पोखरियाल निशंक को नुकसान न कर दे इसलिए उन्हें भी टीम में ले लिया गया है। उधर कलराज मिश्र की स्थिति सारे जानते है। उतर प्रदेश के जनाधारहीन कलराज मिश्र को टीम में लेकर राजनाथ सिंह को चिढ़ाया गया है। उपाध्यक्ष पद पर दो मुसलमान है। पर दोनों शो पीस है। नजमा हेपतुल्ला कांग्रेस में शो पीस रह चुकी है। जबकि मुख्तार अब्बास नकवी मुसलमानों में आज तक आधार नहीं बना पाए। राजेंद्र सिंह रज्जू भईया के दामाद होने का फायदा नकवी आजतक उठा रहे है। जबकि वे रामपुर जैसे मुसलिम बहुल इलाके में जमानत तक जब्त करा चुके है।
दिलचस्प बात है कि गडकरी की टीम में जो मुसलमान रखे गए है वे जनाधारहीन है। दूसरी तरफ मध्यवर्ती किसान जातियों को जगह नहीं मिली है। बिहार और उतर प्रदेश से मध्यवर्ती किसान जातियों को गडकरी ने पूरी तरह से खारिज किया है जिसका खामियाजा गडकरी को भुगतना पड़ सकता है। बिहार से किसी भी राजपूत या भूमिहार को टीम में जगह नहीं दी गई है, जबकि इस साल अक्तूबर में ही बिहार में चुनाव है। जबकि बिहार से ही पिछड़े यादव और कुर्मी को भी टीम में जगह देना गडकरी ने उचित नहीं समझा है। बिहार के राजपूत और भूमिहार भाजपा समर्थक है। अब टीम में उनकी जाति को जगह नहीं मिलने का खामियाजा तो भाजपा को भुगतना पड़ेगा। क्योंकि उपरोक्त दोनों जातियों को राजद, कांग्रेस और जद (यू) तीनों पार्टिया महत्व दे रही है। बिहार से दो लोग जो आए है उनका आधार ही बिहार में नहीं है। रविशंकर प्रसाद कायस्थ है और उनका आधार बिहार में न के बराबर है। रविशंकर प्रसाद की जाति का वोट बिहार में आधे प्रतिशत के करीब ही है। किरण घई बिहार से है। उनका भी आधार बिहार में जीरो है और पंजाबी वोटर बिहार में न के बराबर है। किरण घई के पति कायस्थ है और उन्हें उपाध्यक्ष बनाकर भाजपा ने कायस्थों को ही खुश किया है। बिहार में ही नहीं उतर प्रदेश में चौकीदार की भूमिका में पहुंच चुकी भाजपा ने जातीए संतुलन को पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया है। यादव, लोध, शाक्य, अति पिछड़ा गडकरी की टीम से गायब है। बिनय कटियार पिछड़े जरूर है पर पिछड़ों के नेता होने के बजाए वो विश्व हिंदू परिषद के कोटे से टीम में जगह पा गए है। सोनिया गांधी से जमानत जब्त करवाने के बाद कटियार पूरी तरह से जमीन से उखड़ चुके है।
निश्चित तौर पर भाजपा ने संगठन में 33 प्रतिशत महिलाओं को रखा है। पर जो महिलाएं टीम में ली गई है वो मुलायम सिंह और लालू यादव के आरोपों को सही ठहराती है। दोनों लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण का विरोध कर रहे है। विरोध कारण है कि एलिट महिलाएं लोकसभा में आएंगी और गरीब महिलाओं को आने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए वे पिछड़ों और मुसलमानों की आरक्षण की मांग कर रहे है। दिलचस्प बात है कि टीम गडकरी में एलिट शहरी महिलाओं ने ही कब्जा जमाया है। चाहे वो नजमा हेपतुल्ला हो या हेमा मालिनी या स्मृति ईरानी। करूणा शुक्ला अटल बिहारी वाजपेयी की रिश्तेदार है। एक वाणी त्रिपाठी है वो भी एलिट या शहरी क्लास से ही है। किरण घई और आरती मेहरा भी शहरी महिला है जिनका गांव से गरीबी से कोई लेना देना नहीं है। एक पटना शहर की एलिट है तो एक दिल्ली की एलिट है। गांव देहात की महिलाएं गडकरी की टीम से गायब है। सिर्फ सरोज पांडेय है जो चुनाव जीतकर लोकसभा में आयी है और शायद जमीनी महिला है। भाजपा की महिला टीम को देख मुलायम के आरोप सही नजर आते है।
दिलचस्प बात है कि टीम में उस अर्जुन मुंडा को महासचिव बनाया गया है जो राजनाथ सिंह के हुक्मदार थे। भाजपा को राजनाथ सिंह के इशारे पर झारखंड में खत्म करने वाले अर्जुन मुंडा ही थे। लेकिन झारखंड के परिणाम से सीख लेने के बजाए भाजपा ने अर्जुन मुंडा को टीम में रख लिया है। जबकि उस बाबू लाल मरांडी को टीम में लाने की कोई कोशिश भाजपा ने नहीं की जो अपने दम पर झारखंड में दस सीट ले गया। वहीं नरेंद्र मोदी का विरोध और पक्ष दोनों का ख्याल गडकरी ने रखा। संगठन को मजबूत करने वाले और मजबूत करने की आगे भी क्षमता रखने वाले संजय जोशी को नरेंद्र मोदी के विरोध के कारण टीम में जगह नहीं मिली। संजय जोशी को लेकर एलके आडवाणी और अरुण जेतली भी मोदी के साथ थे। वहीं मोदी की सिफारिश पर पुरूषोतम रूपाला को राष्ट्रीय टीम में गडकरी ने रख लिया है।
यह तय है कि भाजपा का अब जल्द भला नहीं होगा। एक बार पार्टी पूरी गर्त में जाएगी। इस पार्टी में दलितों, पिछड़ों और ग्रामीणों के लिए कोई जगह नहीं है। जो पिछड़े आए है वो पिछड़े होने के कारण नहीं आए है। वे कोटे से आए है। निश्चित तौर पर उतर प्रदेश में भाजपा को वर्तमान टीम कोई जगह नहीं दिला पाएगी। क्योंकि यूपी के जो नेता टीम में लिए गए है वे हवाई है। बिहार में इस साल अक्तूबर में चुनाव है। चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन इस बार देखने लायक होगा। पहले से ही कमजोर हो रही भाजपा इस टीम की घोषणा के बाद और कमजोर होगी। क्योंकि बिहार से जो लोग टीम में आए है वो बिहार की धरती पर जीरो है। वे न तो जनता के बीच अपनी कोई पकड़ रखते है न खुद ही चुनाव लड़ने की क्षमता रखते है।
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
नितिन गडकरी की टीम में 33 प्रतिशत महिला। मुलायम और लालू के आरोप सही। एक भी ग्रामीण, दलित या पिछड़े पृष्ठभूमि की महिला नहीं। सारी शहरी एलिट महिला टीम में। शो पीस ज्यादा, जनता के बीच आधार कम। स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी वाणी त्रिपाठी ग्लैमर के बल पर। जबकि किरण घई, नजमा हेपत्तुल्ला आधारहीन। करूणा शुक्ला अटल बिहारी वाजपेयी की रिश्तेदार। जमीन से आयी हुई सिर्फ सरोज पांडेय। सारी महिलाएं शहरी पृष्ठभूमि की। कोई भी ग्रामीण परिवेश की नहीं। दलित और पिछड़ी जातियों की महिला की टीम में पूरी उपेक्षा। महिलाओं को रखते हुए भी क्षेत्रीए संतुलन का ध्यान नहीं। मुख्य टीम में स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी वाणी त्रिपाठी मुंबई से। आरती मेहरा दिल्ली से। किरण घई पटना से। देश के चार बड़े शहरों से चार महिला। जबकि मुख्य टीम में आयी अन्य दो महिला सरोज पांडेय और करूणा शुक्ला छतीसगढ़ से।
मुख्य टीम में आए मुसलमान नेता भाजपा का मुसलमानों में आधार बढ़ाने के बजाए भाजपा में सिर्फ मुसलमान होने का फायदा उठाते है। भाजपा को शो पीस मुसलमानों को दिखाने के लिए। मुख्तार अब्बास नकवी जनाधारहीन, तो शहनवाज हुसैन को बोलने की अक्ल तक नहीं। पिछले बीस सालों में एक भी नए मुसलमान को खोजने में भाजपा विफल। दोनों मुसलमानों को अपने हल्के में मुसलमानों के वोट ही नहीं मिलते। हिंदुओं के वोट पर जीतकर आते है। मतलब भाजपा को इन दो मुसलमानों से कोई फायदा नहीं, पर इन्हें मुसलमान होने का जोरदार फायदा भाजपा में मिलता है।
किसान मध्यवर्ती जातियों की उपेक्षा। गडकरी की टीम में किसान मध्यवर्ती जातियों को नकार दिया गया है। इससे पता चलता है कि भाजपा बनियों की पार्टी फिर बन रही है। मुख्य टीम में मध्यवर्ती किसान जातियां भूमिहार, राजपूत, गुर्जर, लोध, यादव और दक्षिण की किसान जातियां रेड्डी, कापू, कम्मा आदि की घोर उपेक्षा। पूरी तरह से टीम को देखकर लगता है कि ब्राहमणों और बनियों की पार्टी। उपाध्यक्ष टीम में ही करूणा शुक्ला, शांता कुमार और कलराज मिश्र ब्राहमण है।
पूरी तरह से क्षेत्रीए असंतुलन। चार सीट वाले हिमाचल प्रदेश से दो लोग मुख्य टीम में। पांच सीट वाले उतरांचल से एक मुख्य टीम में। जबकि चालीस सीट वाले बिहार से दो लोग टीम में, वो भी ग्रामीण बिहारी नहीं। किरण घई की पृष्ठभूमि बिहार की नहीं। दो लोग बिहार से। कायस्थ रविशंकर प्रसाद। पंजाबी किरण घई। उनके पति भी कायस्थ है। उतर प्रदेश को भी लगभग हिमाचल प्रदेश के बराबर प्रतिनिधित्व। क्योंकि यहां से अस्सी सीटें आती है। कुल मिलाकर भाजपा ने अपने गिरते जनाधार को यूपी स्वीकार में किया है। पर उसमें सुधार की सोच नहीं आयी है।
गडकरी की टीम में दक्षिण के राज्य पूरी तरह से साफ। आंध्र प्रदेश, तामिलनाडू, केरल से मुख्य टीम में कोई नहीं। कुल मिलाकर भाजपा ने खुद माना कि पिछले पचास सालों में भाजपा का इन राज्यों में कोई काम नहीं हुआ। यही कारण है कि इन प्रदेशों से कोई राष्ट्रीय स्तर के नेता भाजपा को नहीं मिला। एक वेकैंया नायडू आंध्र प्रदेश से। अपने ही जाति बिरादरी में स्वीकार्य नहीं। पूरी टीम में से बंगाल जैसे बड़ा और मह्तवपूर्व प्रदेश भी गायब। यानि की लगभग डेढ सौ सीटों वाले चार राज्यों से एक भी व्यक्ति भाजपा की मुख्य टीम में नहीं। इससे पता चलता है कि भाजपा का जनाधार अभी भी कितना सिमटा है। एसे में कांग्रेस के बराबर राष्ट्रीय पार्टी का दावा भाजपा का कितना सच है। इन राज्यों में कांग्रेस का विकल्प क्षेत्रीए दल ही अभी भी है।
उतर प्रदेश के जाट भाजपा के वोटर। पर भाजपा की राष्ट्रीय टीम में यूपी के जाट नहीं। कुल मिलाकर भाजपा ने अब खुद ही जाटों को अजीत सिंह के पाले में जाने का संदेश दे दिया है। वहीं हरियाणा के जाट कांग्रेस के वोटर पर भाजपा ने उस अभिमन्यू सिंह को टीम में लिया जो लोकसभा भी हार गए है और विधानसभा भी हार गए।
कांग्रेस कई राज्यों में अब अपने दम पर लड़ने की तैयारी में। वहीं भाजपा को देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सहयोगी दलों की बैशाखी की जरूरत। झारखंड जैसे राज्य में भी अब छोटा सहयोगी बनना पड़ा। बंगाल, उड़ीसा से भाजपा साफ हो गई है। उतर-पूर्व में भाजपा का आधार ही नहीं बना है। उतर भारत के हरियाणा और पंजाब में भाजपा सहयोगियों की बैशाखी रहती है। दक्षिण के आंध्र प्रदेश, केरल, तामिलनाडू में भाजपा के पास तो अब सहयोगियों भी नहीं है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में भाजपा शिवसेना के छोटे भाई की भूमिका में। बिहार में जद यू के छोटे भाई के रुप में। यूपी में छोटे भाई तो छोड़े अब सिर्फ चौकीदार या द्वारपाल की भूमिका रहेगी भाजपा की। भाजपा के लोग अब सपा, बसपा या कांग्रेस के दरवाजे खोलने या बंद करने का काम करेंगे।
गडकरी की टीम गरीब और दलित विरोधी hai aur age kehte ho
बिहार से किसी भी राजपूत या भूमिहार को टीम में जगह नहीं दी गई है,
PAGAL TO NAHI HO YAR TUM,
kya tuhe lena chahiye tha.
ya sirf kuch bhi karo
"APAN TO BJP KA VIRODH KAREGA HI"
-छत्तीसगढ को जगह दी, पर फ़लां राज्यों को क्यों नहीं दी?
-उत्तर को खूब प्रतिनिधत्व मिला, पर दक्षिण को क्यों भूल गए? वेंकैया को लिया भी तो उनका कोई मोल नहीं.
-उत्तर से भी फ़लां-फ़लां को क्यों ले लिया? यह तो ऐसा है, वह तो ऐसा है.
- इसे बोलना ही नहीं आता, इसे क्यों ले लिया?
- इसे बोलना तो आता है, पर इसका कोई जनाधार नहीं, इसे क्यों ले लिया?
- यह जनाधार वाला वक्ता है, पर इसकी जाति ठीक नहीं. यह शहरी भी है, इसे क्यों लिया?
- यह तो नाम का मुसलमान है, इसे क्यों ले लिया? - दाऊद इब्राहीम, अफ़जल गुरू इत्यादि का खूब जनाधार है, उन्हें क्यों नहीं लिया?
- धन्यवाद.
भईया गरीब, दलित और किसान विरोधी भाजपा अगर नहीं होती तो अपने दम पर सता में आती। साठ साल हो गए, बैशाखियों पर चल रही है। दम है तो अपने दम पर सता में आए। मित्रों भूमिहार और राजपूत को अगड़ी जाति नहीं, मध्यवर्ती किसान के रुप में ले।
ज्यादा देर नहीं लगेगी। अक्तूबर में पता चल जाएगा। बिहार में चुनाव होने वाला है। जो लोग भाजपा में पदाधिकारी बने है उनकी औकात सब जानते है। दाऊद इब्राहिम को लेने की जरूरत नहीं है। क्योंकि दाऊद इब्राहिम के पैसे पर पलने वाले भाजपा में कई नेता है। उनकी रोजी रोटी दाऊद इब्राहिम ही चलाते है। अब बेचारे उपरोक्त दो महोदय भाजपा में दरी बिछाने का काम करते है तो उसमें हमारी कोई गलती नहीं है। उनका काम है दरी बिछाने और अपने नेताओं को भगवान राम के रुप में देखा।
अरे भाइयों भाजपा ने तो राम को भी नहीं छोड़ा। राम को बेच दिया। सता आयी तो राम को भूल गए। समय बताएगा कि गडकरी की टीम कितना कामयाब होती है। लेकिन भाइयों इतना तय है कि बिहार और यूपी में गडकरी की टीम दरवाजा ही खोलेगी। सता में आने का ख्वाब भूल जाए। राम को बेचने वालों को देश की जनता माफ नहीं करेगी। नाम राम का लेते है और माल दाउद इब्राहिम से खाते है।
बाकी, उन्होंने जिस भाषा-शैली में जवाब देने की कोशिश की है, उससे भी उनके बौद्धिक स्तर का पता चल जाता है.
(नंदन की टिप्पणी में भी भाषा का स्तर अच्छा नहीं है, लेकिन हम एक पाठक और स्वनामधन्य पत्रकार से एक जैसी भाषा की उम्मीद नहीं करते.)
Lagta hai aap kisi khas apne ke na liye jane se itni ahat hain.
मित्रों भूमिहार और राजपूत को अगड़ी जाति नहीं, मध्यवर्ती किसान के रुप में ले।
agar ye kathit agri jatiyan nahi hai to kya sirf AAP JAISE BRAHMAN HI AGRI JATI HAI kya PANDEYJI.
Ek muft ki salah aur PATRKARIT mat kariye aap, koi BJP virodhi parti join karen,
aur Nukkad sabha kare, aur vahi ye betuki, satahi aur chichli bate karnen,
bahut tarakki karenge aap.
BEST OF LUCK
- वह नौजवान है या बुज़ुर्ग.
- उसकी राजनीतिक समझ में कमी है.
- वह फ़ासिस्ट शक्तियों के असर में है.
- वह किसी पार्टी के लिए काम करता है.
- वह अपने हित में काम नहीं करता.
यह "जनवाद" का कौन सा जादू है?
Post your comment