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अब थारो कई पतियारो रे परदेशी...

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यह वास्तव में शोकसभा थी. यहां कोई दो मिनट का मौन नहीं था. जाने वाले व्यक्ति के बारे में प्रशंसा के गान नहीं थे. अनुभव और यादों का वर्णन नहीं था. बोलनेवालों में होड़ नहीं लगी थी. कोई बोलने खड़ा हुआ तो गला रुंध गया, किसी ने सिर्फ यह कहा कि मेरी श्रद्धांजलि. और ऐसा कहनेवाले वे लोग जिन्हें जमाना सुनता है. वे लोग जो खूब बोलते हैं और जमकर लिखते हैं. लेकिन यहां मानों शब्द स्थिर और जड़वत हो चला था. कौन बोले? क्या बोले? और सबसे बढ़कर, क्यों बोले?

प्रभाष जोशी के घाट पर सबकी अपनी यादें हैं. यादों का ऐसी थाती को कोई भला क्यों खोले? नामवर सिंह, अजीत भट्टाचार्जी, अनुपम मिश्र, रामबहादुर राय, गोविन्दाचार्य, दिग्विजय सिंह, अरुणा राय सहित न जाने कितने लोग. कुछ पत्रकार, कुछ साहित्यकार, कुछ राजनेता, कुछ पारिवारिक सदस्य, मित्र और प्रभाष जी के अनुयायी. सबके सब पूरे समय मौन. दो मिनट की कोई औपचारिकता नहीं. प्रभाष जी से स्पर्श पाये लोगों के मन मष्तिष्क में जो मौन पसर गया है वह अब शायद ही टूटे. टूटना भी नहीं चाहिए. मौन शास्वत अभिव्यक्ति है. और पत्रकारिता का प्रभाष जोशी कोई नश्वर देह भर नहीं था. वे शास्वत अभिव्यक्ति थे और शास्वत का अनुभव सिर्फ मौन से ही होता है. सिर्फ मौन से....

प्रभाष जी मालवी शैली में गाये भजन बहुत पसंद करते थे. इसलिए मालवा में देवास से कालूराम और उनके साथियों को बुलाया गया था.  कालूराम अपने साथियों समेत गा रहे हैं- अब थारो कई पतियारो रे परदेशी....मालवी में अलाप ले रहे हैं और मानों उनका अलाप दिलों में चीरा लगाते हुए वेदना को असह्य करता जा रहा है. उत्सवधर्मी प्रभाष जी की याद में आयोजित शोकसभा........

कालूराम मालवी में भजन कर रहे हैं है....घाट घड़ी को यो साथ जो मीठो... यो तो गांठ-गांठ रस न्यारो रे परदेशी....

शोकसभा समाप्त हो गयी लेकिन कुछ के लिए यह कभी खत्म नहीं होगी...कभी नहीं.

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