Home | सभा-संगत | पुस्तक प्रेम पर भारी पड़ गया बुलडोजर

पुस्तक प्रेम पर भारी पड़ गया बुलडोजर

Font size: Decrease font Enlarge font 573
image राष्ट्रीय पुस्तक मेला जो अब मौजूद नहीं है

उधर दिल्ली छोड़कर इधर नागपुर आइये. किताबों को पड़ते पाठकों के अकाल के बीच दिल्ली और देश में भले ही पुस्तक मेलों को प्रोत्साहन दिया जाता हो लेकिन इधर नागपुर में ऐसे पुस्तक मेलों को बुलडोजर लगाकर ढहा दिया जाता है और कहा जाता है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि निगम के इन नियमों का पालन नहीं किया गया.

संतरानगरी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब महानगर पालिका ने साहित्य प्रेमियों के उत्साह पर पानी फेर दिया। कस्तूरचंद पार्क में गत 1 जनवरी से शुरू राष्ट्रीय पुस्तक मेले में साहित्य प्रेमियों का उत्साह महानगर पालिका से देखा नहीं गया। उसने पुस्तक मेले को उजाडऩे के लिए मंगलवार को बुलडोजर समेत मनपा का तोडू दस्ता भेज दिया गया। पुस्तक मेला न खुले इसके लिए मुख्य द्वार पर तोडू दस्ते की गाडिय़ां खड़ी कर द्वार बंद कर दिया गया। साहित्य प्रेमी पुस्तक खरीदने आए और निराश होकर लौट गए।

10 जनवरी तक चलने वाले इस पुस्तक मेले के अचानक बंद हो जाने से शहर के पुस्तक प्रेमियों में निराशा फैल गई है। हालांकि कस्तूरचंद पार्क मैदान में  महानगर पालिका और नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से भी पुस्तक प्रदर्शनी लगाई गई है। लेकिन इस प्रदर्शनी में स्थानीय प्रकाशकों की भरमार होने से पाठकों का रूझान राष्ट्रीय पुस्तक मेले के प्रति ज्यादा था, जहां राष्ट्रीय स्तर के प्रकाशक विभिन्न विषयों के पुस्तकों के साथ आए थे।

पुस्तक मेला समिति नई दिल्ली एवं समय इंडिया ने गत वर्ष 2009 जून माह में नागपुर के कस्तुरचंद पार्क में विगत 10 वर्षों की तरह इस साल भी राष्ट्रीय पुस्तक मेले का आयोजन करने के लिए अनुमति मांगी थी। समिति के सचिव तथा पुस्तक मेले के आयोजक चंद्रभूषण ने बताया कि मेले का आयोजन करने के लिए 6 विभागों से अनुमति, नाहरकत प्रमाण पत्र (एनओसी) की दरकार थी। इसमें से पुलिस उपायुक्त विशेष शाखा नागपुर, पुलिस उपायुक्त (वाहतूक) नागपुर, कार्यकारी अभियंता (महाराष्ट्र राज्य विद्युत कंपनी) नागपुर, सहा. संचालक नगर रचना मनपा, नागपुर, आरोग्य अधिकारी मनपा, नागपुर ने मेले के लिए अनुमति प्रदान कर दी। लेकिन मनपा के मुख्य अग्निशामक अधिकारी ने एनओसी नहीं दिया।

मेला समिति के सचिव चंद्रभूषण ने कहा कि वे पिछले 10 वर्षों से नागपुर शहर में राष्ट्रीय पुस्तक का आयोजन कर रहे है। लेकिन इस वर्ष मनपा की ओर से कस्तूरचंद पार्क में 2 जनवरी को राष्ट्रीय पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसी कारण उन्हें मनपा के मुख्य अग्निशामक अधिकारी की ओर से अनुमति नहीं दी गई। इसके लिए उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालन ने मेला समिति की अर्जी पर सुनवाई के लिए 6 जनवरी का समय दिया। इसी बीच मेले के पांचवें दिन उच्च न्यायालय में सुनवाई के एक दिन पूर्व मंगलवार की सुबह 11 बजे मनपा का अतिक्रमण विभाग बुलडोजर के साथ पुस्तक मेले को उखाडऩे के लिए कस्तूरचंद पार्क पहुंच गया। भारी पुलिस बंदोबस्त, मनपा कर्मचारी तथा बुलडोजर को देखकर देश के कोने-कोने से नागपुर पहुंचे पुस्तक विक्रेता सकते में पड़ गए। इस खबर को कवर करने तथा नागपुर के नाम को कलंकित कर देने वाली इस कार्रवाई को कैमरे में कैद करने के लिए प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी पहुंची। इस बीच नगर के वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी उमेश चौबे यहां पहुंच गए। अनेक पत्रकारों तथा उमेश चौबे ने मनपा के इस कार्रवाई पर खेद जताते हुए प्रशासन से अपना निर्णय बदलने की प्रार्थना की। लेकिन शासकीय अधिकारी टस से मस नहीं हुए। मेले के आयोजक चंद्रभूषण ने प्रशासनिक अधिकारियों से कहा कि यह मामला अदालत में चल रहा है, अगली सुनवाई 6 जनवरी को होगी, उस में जो फैसला होगा उसे स्वीकार कर लिया जाएगा, लेकिन चंद्रभूषण की बात को हवा में उड़ाते हुए राष्ट्रीय पुस्तक मेला को चलने नहीं दिया गया। वरिष्ठ समाजसेवी उमेश चौबे ने इस घटना को खेदजनक बताते हुए कहा कि मामला व्यक्तिगत हो गया है और व्यक्तिगत दुश्मनी की इस देश में कोई जगह नही है। उन्होंने कहा कि यहां प्रजातंत्र है कोई औरंगजेब का कानून यहा नहीं चल रहा है।

मेले में साहित्य खरीदने आए पाठकों को यहां से निराश होकर जाना पड़ा। कई पाठकों ने कहा कि मनपा की इस तरह की कार्रवाई से नागपुर का नाम राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम होगा। मामला साहित्य जगत से जुड़ा होने के कारण मनपा की यह कार्रवाई साहित्य पर हमला करने जैसी बताई जा रही है।

बुलडोजर संस्कृति मान्य नहीं
कलाकारों, साहित्यकारों ने की तीव्र भर्त्सना
शहर के प्रबुद्ध कलाकारों, कथाकारों, रंगकर्मियों, कवि, लेखकों ने कस्तूरचंद पार्क मैदान पर आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेला को बुलडोजर चलाकर बंद करने के मनपा के प्रयासों की तीव्र भत्र्सना की है। इन बुद्धिजीवियों का कहना है कि आजाद देश में बुलडोजर संस्कृति की जितनी निंदा की जाए, कम है। नागपुर के कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने अपनी अहं की तुष्टि के लिए पूरे देश में नागपुर की छवि को कलंकित कर दिया है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था। इन अधिकारियों का कृत्य आपातकाल के दौरान किए गए अत्याचार की तरह है। नागपुर में पिछले 10 वर्षों से पुस्तक मेला का आयोजन किया जा रहा है। मनपा का यह कृत्य वाचन-पठन संस्कृति को ही समाप्त करने का प्रयास है। पुस्तक मेला अपने मूल स्वरूप में कस्तूरचंद पार्क मैदान में ही लगना चाहिए। उमेश चौबे, राजेंद्र पटोरिया, मधुप पांडेय, डा. सागर खादीवाला, हरीश अड्यालकर, अनिल मालोकर, राधेश्याम महेंद्र, बाबा रॉक, सुरेश जैन, मनीष वाजपेयी, सुनील ककवानी, शंकर मिश्रा, रमेश गुप्ता, अविनाश बागड़े, डा. शशिकांत शर्मा, गोपाल गुप्ता, प्रज्ञा मेहता, सुमित कुमार 'आतिश', प्रकाश काशिव, मधु गुप्ता, नरेंद्र परिहार, प्रभा मेहता, रविशंकर दीक्षित सहित कई कलाकारों, साहित्यकारों ने मनपा की इस करतूत का कड़ा विरोध किया है।

Subscribe to comments feed Comments (2 posted):

Ashish Agarwal on 06 January, 2010 12:31;40
avatar
BAHUT AFSOSJANAK
Thumbs Up Thumbs Down
0
sanjay swadesh on 09 January, 2010 23:10;57
avatar
उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय पुस्तकमेले में किसी भी प्रकार की रूकावट न डालने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने शुक्रवार को मनपा के संबंधित विभाग को ताकीद की कि वे आयोजकों को 24 घंटे का समय दे, ताकि विभागीय उचित मापदंड को वे पूरा कर सकें। सुनवाई के दौरान अदालत ने मनपा से मेले के संबंध में ना-हरकत प्रमाण-पत्र नहीं देने का कारण भी जानना चाहा। परंतु मनपा के अधिकारी अदालत को अपने जवाब से संतुष्ट नहीं कर पाए। तब न्यायालय ने इसे अहम् से जोड़ते हुए उक्त निर्देश जारी किए। न्यायालय का आदेश आते ही आयोजन स्थल कस्तुरचंद में लगे राष्ट्रीय मेले के मुख्य द्वार से मनपा का बुलडोजर तत्काल हटा लिया गया और मेला पुन:प्रारंभ कर दिया गया। शाम को मेले में पुस्तक प्रेमियों का तांता लग गया। मेला समिति के सचिव चंद्र भूषण ने कहा कि मुझे न्यायपालिका पर विश्वास था और वह कायम रहा। हमें न्याय मिल ही गया। पुस्तक मेला समिति की ओर से इस मामले की पैरवी नागपुर के वरिष्ठ अधि. रमेश दर्डा, तुषार दर्डा तथा दिल्ली से नागपुर आए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कुमार कार्तिकेय ने की। कस्तुरचंद पार्क मैदान में 1 जनवरी से राष्ट्रीय पुस्तक मेला शुरू हुआ था, लेकिन 5 जनवरी को मनपा प्रशासन की ओर से मेले के मुख्यद्वार पर बुलडोजर लाकर खड़ा कर दिया गया और मेला बंद हो गया। यही नहीं 6 जनवरी को मेले से बिजली भी काट दी गई। मनपा ने कागज पूरा नहीं होने के कथित आरोप में मेले का जबरन बंद करवा दिया था। साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने इस घटना को हिटलरशाही और तानाशाही करार दिया। मामला उच्च न्यायालय में गया और शुक्रवार को तत्काल घेराबंदी हटाने तथा पुस्तक प्रेमियों के लिए मेला खोलने का निर्देश जारी किया गया। मेला समिति के वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश दर्डा ने मेला परिसर में आमंत्रित संवाददाताओं को बताया कि अदालत के आदेश ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनपा का कदम अधिकारियों के व्यक्तिगत अहम् के कारण उठाया गया था। अधिवक्ता कुमार कार्तिकेय तथा लोहिया अध्ययन केंद्र के हरिश अड्यालकर, नंद किशोर व्यास तथा वरिष्ठ समाजसेवी उमेश चौबे, राजेंद्र पटोरिया ने इसे नगर के साहित्यकारों तथा पुस्तक प्रेमियों की जीत बताई।
०००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 2 | displaying: 1 - 2

Post your comment comment

Please enter the code you see in the image:

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image संजय स्वदेश किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं। sanjayinmedia@rediffmail.com
Rate this article
0
More from सभा-संगत
Previous
image
आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
क्या आतंकवाद बौद्धिक स्तर पर इतना विकसित हो चुका है कि उसका राजनीतिक धरातल तैयार हो सके? इस जटिल प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है. जो लोग अल-कायदा को आतंकी संगठन बताकर उसके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं वे भी शायद इसे इस्लामिक चरमपंथ कहना ज्यादा मुनासिब समझेंगे बनिस्बत कि आतंकवाद के दर्शन में निहित राजनीति को मान्यता प्रदान करें. लेकिन मुस्लिम देशों में आतंकी गतिविधियों के द्वारा दुनियाभर में थरथराहट पैदा करनेवाले इस्लामिक विद्वान इसे उस राजनीति की प्रतिक्रिया मानते हैं जिसके वैचारिक आक्रमण के कारण इस्लाम को खतरा पैदा हो गया है. शायद इसीलिए "जिहाद" जरूरी हो गया था. ...
image
कारपोरेट पत्रकारों की समाजवादी चिंता
11 जुलाई को सुप्रसिद्ध पत्रकार स्वर्गीय उदयन शर्मा का जन्म दिन था। हर साल की तरह इस साल भी 'संवाद 2010' के तहत एक परिचर्चा 'लॉबींयग, पैसे के बदल खबर और समकालीन पत्रकारिता' का आयोजन किया गया था। इस परिचर्चा में देश के कई दिग्गज पत्रकार दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में जुटें और अपने विचार रखे।...
image
घर में बढ़ती विदेशी घुसपैठ
घुसपैठ और सामान्य आवाजाही में फर्क है। दुनियाभर में अपनी आवश्यकताओं के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर आबादी की आवाजाही सामान्य बात है। लेकिन घुसपैठ सुनियोजित और रणनीतिक है। अर्थात भारत में घुसपैठ आवश्यकता या परिस्थितियों के कारण नहीं बल्कि किसी खास मकसद का हिस्सा है। इनका आगमन, बसाहट और निवास सब रणनीतिक होता है।...
image
समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?
दिल्ली में यूँ तो रोज़ाना अनेक गोष्ठियां अनेक विषयों पर होती रहती हैं, लेकिन ऐसी गोष्ठियां कभी-कभार ही होती हैं जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी, विशेषज्ञ, पेशेवर, कार्यकर्ता आदि एक साथ किसी एक मुद्दे पर अपना नज़रिया पेश करते हों. शुक्रवार की शाम दक्षिण दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में ऐसी ही एक गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें 'अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों में आम आदमी' विषय पर चर्चा हुई....
image
पत्रकारिता में साहित्य का होना न होना
वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधारा के माननेवाले लोगों में काम करने की शैली में वैसे तो कोई खास अंतर नहीं होता लेकिन दोनों के व्यवहार में एक साफ अंतर दिखाई देगा. दोनों ही पहले से निर्धारित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं लेकिन तरीका थोड़ा अलग होता है. दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थक संवाद इत्यादि में बहुत कम विश्वास करता है. वह सीधे दिशानिर्देश जारी करता है जबकि वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग दिखावे के लिए ही सही बहस करते हैं. भले ही बहस में परिवर्तन की किसी भी गुंजाइश को स्वीकार न करें लेकिन कम से कम बहस की गुंजाइश तो रखते ही है. ऐसी ही एक बहस का आयोजन मंगलवार की शाम इंडिया हैबिटेट सेन्टर में ढेर सारे वामपंथी विचारधारा से जुड़े बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में हुई. ...
image
मिस्टर चिदम्बरम! गो बैक
जिस वक्त चिदम्बरम नक्सलवाद को समाप्त करने के अपने तरीकों के समर्थन में भाषण देने जेएनयू पहुंचे पूरा इलाका छावनी में तब्दील कर दिया गया था. संभवत: चिदम्बरम जानते थे कि वे उस बौद्धिक गढ़ में नक्सलवाद के सफाये का समर्थन करने जा रहे हैं जहां से बौद्धिक खुराक मिलने का आरोप लगता रहा है. यहां के छात्रों का आरोप है कि जेएनयू में पहुंच बनाने के लिए उन्होंने अपनी बौद्धिक तर्क क्षमता के साथ साथ अपनी प्रशासनिक क्षमता का भी इस्तेमाल किया. ...
image
हिंदी सिनेमा मुंबई की बपौती नहीं है
मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को रिपोर्ट करनेवाले फिल्म पत्रकार और समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज का कहना है कि हिन्दी सिनेमा मुंबई की बपौती नहीं है. यह बात उन्होंने जयपुर में आयोजित एक संवाद में कही. ...
image
बनी रहेगी वैकल्पिक मीडिया की जरूरत
आवारा पूंजी की मीडिया पर पकड़ मजबूत हुई है और इस पकड़ ने खबर को मनोरंजन में बदल दिया है। राहुल महाजन, मल्लिका शेरावत या राखी सावंत जैसे चरित्रों का मीडिया सुर्खियों में होने के कारण भी यही है। मनोरंजन की प्रवृत्ति स्थिर नहीं है। अतः ये चरित्र भी तेजी से बदलते और आते जाते है।...
image
गांधी कथा के महात्मा गांधी
नारायण भाई देसाई के बारे में अनुपम मिश्र द्वारा दिया जाने वाला परिचय सबसे सटीक है. अनुपम मिश्र कहते हैं - "नारायण भाई ऐसे शख्स हैं जिन्हें पहले गांधी जी ने जाना. उन्होंने तो गांधी जी को बाद में जाना." अनुपम मिश्र बिल्कुल सही कह रहे हैं. गांधी के छायारूप सचिव महादेवभाई देसाई के बेटे नारायण भाई देसाई गांधी की गोद में पलकर बड़े हुए हैं....
image
भाषा भी होती है सर्वहारा, दलित और सवर्ण
बड़ोदरा में भाषा अनुसंधान एवं प्रकाशन संस्था ने एक बेहतरिन आयोजन किया। जिसमें भाषा और बोली के सवाल पर देश भर के विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठे हुए। भाषा के सवाल पर इतने बड़े पैमाने पर विद्वानों के जुटान का शायद यह एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था। प्रोफेसर गणेशी देवी के संयोजन में हुए इस कार्यक्रम को बड़ोदरा की स्थानीय मीडिया में तो अच्छी कवरेज मिली लेकिन नहीं कह सकता उसके बाहर वह खबर बनी या नहीं। ...
image
बिल्डरों, ठेकेदारों और सरकारी अफसरों का 'हिन्दू' समागम
भाजपा नेता, सरकारी अमला, बिल्डर-ठेकेदार और रसूखदारों के समर्थन-सहयोग से भोपाल में हिन्दू संगम सम्पन्न तो हो गया, लेकिन संघ जैसा चाहता था, वैसा हिन्दू समागम तो तब भी नहीं हुआ। इन सब की भीड़ में संघ और उसके कार्यकर्ता दोनों ही कहीं गुम गये। लेकिन शायद यही नया संघ है, जहां वह दिल से नहीं दिमाग से चलता है। यह संघ अपने स्वयंसेवक और कार्यकर्ताओं से नहीं समर्थकों से चलता है। इस संघ में कार्यकर्ता कम हो गए, नेता बढ़ गए। यह संघ क्लालिटी नहीं, क्वांटिटी चाहता है। भीड़ के लिए वह कुछ भी करेगा। ...
image
अंबेडकर और गांधी : संवाद जारी है
बाबासाहब अम्बेडकर और महात्मा गांधी सिर्फ दो व्यक्ति नहीं, दो 'स्कूल' हैं, दो वैचारिक केन्द्र हैं, दो संस्थाएं हैं। दोनों आधुनिक भारत के सर्वाधिक विवादास्पद चरित्रों में हैं। चूंकि दोनों लीक से हटकर चले, इसलिए उन पर उनके समय से लेकर आज तक सवाल उठाए जाते रहे हैं। दोनों की मंजिल एक-दूसरे से जितनी मिलती थी, रास्ते उतने ही जुदा थे।...
image
मानस और महात्मा के बीच रामकथा का सेतुबंध
पिछली सदी के महानायक और समय बीतने के साथ अवतार के रूप में स्थापित होते जा रहे महात्मा गांधी भारतीय कथा परंपरा के विषय इतनी जल्दी बन जाएंगे, इसकी कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन ऐसा हो गया. महात्मा गांधी अब भारत की कथा परंपरा में शामिल हो गये हैं. इस दिशा में पहली कोशिश की महात्मा गांधी के सचिव रहे महादेव भाई देसाई के बेटे नारायणभाई देसाई ने की....
image
भारतीय पत्रकारिता के महात्मा गांधी
किसी को महात्मा गांधी कब कहना चाहिए यह जानने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि महात्मा गांधी होने का अर्थ क्या है? मेरी समझ में समकालीन भारतीय संदर्भ में महात्मा गांधी का अर्थ वह सागर है जिसमें सभी धाराएं आकर समाहित हो जाती हैं. इसी अर्थ में प्रभाष जोशी हिन्दी पत्रकारिता के महात्मा गांधी हैं. ...
image
बीस बरस बाद भी हजार कोस दूर
पूरी कश्मीर घाटी में पिछले दो हफ्ते से जमात-ए-इस्लामी द्वारा गठित हिजबुल मुजाहीदीन जमकर कत्लेआम कर रहा है. राज्य सरकार और राज्य के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला पूरी तरह से नकारा साबित हो चुके हैं. ऐसे ही वक्त में 19 जनवरी 1990 को कश्मीर में बतौर राज्यपाल जगमोहन का प्रवेश होता है. ...
image
मानवता के हित में है तिब्बत की स्वायत्तता
तिब्बत की आजादी का संघर्ष गत पांच दशकों से जारी है। चीन द्वारा अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए तिब्बती नागरिकों का दमन किए जाने के कारण वे निर्वासित होकर भारत में रहने के लिए मजबूर है। किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र पर जबरन आधिपत्य एक गंभीर मानवीय मसला है और पड़ासी देश के नाते भारत के लिए भी यह स्थिति घातक है। ...
image
पुस्तक प्रेम पर भारी पड़ गया बुलडोजर
उधर दिल्ली छोड़कर इधर नागपुर आइये. किताबों को पड़ते पाठकों के अकाल के बीच दिल्ली और देश में भले ही पुस्तक मेलों को प्रोत्साहन दिया जाता हो लेकिन इधर नागपुर में ऐसे पुस्तक मेलों को बुलडोजर लगाकर ढहा दिया जाता है और कहा जाता है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि निगम के इन नियमों का पालन नहीं किया गया. ...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम कॉपीराइट के सभी प्रकार के दावों और दायरों से मुक्त है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2